मन्थराका पुनः श्रीरामके राज्याभिषेकको कैकेयीके लिये अनिष्टकारी बताना, कैकेयीका श्रीरामके गुणोंको बताकर उनके अभिषेकका समर्थन करना तत्पश्चात् कुब्जाका पुनः श्रीरामराज्यको भरतके लिये भयजनक बताकर कैकेयीको भड़काना
“मन्थराका दुराग्रह”
॥ २ · ८ · १–२७ ॥
चन्द्रधवले कक्षे कैकेय्या दत्तं रत्नं भूमौ क्षिप्तं, वृद्धा कुब्जा मन्थरा तीव्रनिर्बन्धेन अङ्गुलिमुद्धृत्य रामाभिषेको भरताय विनाशकर इति पुनर्वदति; पर्यङ्के ईषदुत्थिता कैकेयी रामगुणान् स्तुवती क्रमेण भयसंशयौ प्राप्ता करं वक्षसि निदधाति।
चन्द्रवत् धवल कक्षमें कैकेयीद्वारा अभी दी गयी बहुमूल्य मणि फर्शपर फेंकी पड़ी है; वृद्धा कुबड़ी मन्थरा तीव्र हठसे झुककर—एक उँगली उठाये, तीखे मुखपर कपट और बनावटी शोक लिये—बार-बार समझा रही है कि श्रीरामका राज्याभिषेक बालक भरतके लिये अनिष्टकारी होगा; पर्यङ्कपर अधउठी कैकेयी, जो पहले श्रीरामके गुणोंकी प्रशंसा कर रही थीं, अब भय और संशयमें पड़कर एक हाथ छातीपर रखे हैं।
In the moon-pale chamber, the costly jewel the queen had just gifted now flung onto the marble floor, the aged hunchbacked Manthara leans in with fierce insistence — finger raised, sharp face alight with cunning and feigned grief — pressing her poison that Ram's coronation will doom young Bharat; the queen Kaikeyi, half-risen on her couch, her first praise of Ram's virtues giving way to fear and doubt, draws a hand to her breast.
mantharā tvabhyasūyaināmutsṛjyābharaṇaṁ hi tat।
uvācedaṁ tato vākyaṁ kopaduḥkhasamanvitā॥
यह सुनकर मन्थरा ने कैकेयी की निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषण को उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दुःख से भरकर वह इस प्रकार बोली—
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harṣaṁ kimarthamasthāne kṛtavatyasi bāliśe।
śokasāgaramadhyasthaṁ nātmānamavabudhyase॥
‘रानी! तुम बड़ी नादान हो। अहो! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोक के स्थान पर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोक के समुद्र में डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्था का बोध नहीं हो रहा है
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manasā prasahāmi tvāṁ devi duḥkhārditā satī।
yacchocitavye hṛṣṭāsi prāpya tvaṁ vyasanaṁ mahat॥
‘देवि! महान् संकट में पड़नेपर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे मन-ही-मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है। मैं दुःख से व्याकुल हुई जाती हूँ
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śocāmi durmatitvaṁ te kā hi prājñā praharṣayet।
areḥ sapatnīputrasya vṛddhiṁ mṛtyorivāgatām॥
‘मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धि के लिये ही अधिक शोक होता है। अरी! सौत का बेटा शत्रु होता है। वह सौतेली माँ के लिये साक्षात् मृत्यु के समान है। भला, उसके अभ्युदय का अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मन में हर्ष मानेगी
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bharatādeva rāmasya rājyasādhāraṇād bhayam।
tadvicintya viṣaṇṇāsmi bhayaṁ bhītāddhi jāyate॥
‘यह राज्य भरत और राम दोनों के लिये साधारण भोग्यवस्तु है, इस पर दोनों का समान अधिकार है, इसलिये श्रीराम को भरत से ही भय है। यही सोचकर मैं विषाद में डूबी जाती हूँ; क्योंकि भयभीत से ही भय प्राप्त होता है अर्थात् आज जिसे भय है, वही राज्य प्राप्त करनेपर जब सबल हो जायगा, तब अपने भय के हेतु को उखाड़ फेंकेगा
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lakṣmaṇo hi mahābāhū rāmaṁ sarvātmanā gataḥ।
śatrughnaścāpi bharataṁ kākutsthaṁ lakṣmaṇo yathā॥
‘महाबाहु लक्ष्मण सम्पूर्ण हृदय से श्रीरामचन्द्रजी के अनुगत हैं। जैसे लक्ष्मण श्रीराम के अनुगत हैं, उसी तरह शत्रुघ्न भी भरत का अनुसरण करनेवाले हैं
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pratyāsannakrameṇāpi bharatasyaiva bhāmini।
rājyakramo visṛṣṭastu tayostāvadyavīyasoḥ॥
‘भामिनि! उत्पत्ति के क्रम से श्रीराम के बाद भरत का ही पहले राज्य पर अधिकार हो सकता है (अतः भरत से भय होना स्वाभाविक है)। लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे हैं; अतः उनके लिये राज्यप्राप्ति की सम्भावना दूर है
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viduṣaḥ kṣatracāritre prājñasya prāptakāriṇaḥ।
bhayāt pravepe rāmasya cintayantī tavātmajam॥
‘श्रीराम समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, विशेषतः क्षत्रियचरित्र (राजनीति) के पण्डित हैं तथा समयोचित कर्तव्य का पालन करनेवाले हैं; अतः उनका तुम्हारे पुत्र के प्रति जो क्रूरतापूर्ण बर्ताव होगा, उसे सोचकर मैं भय से काँप उठती हूँ
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subhagā kila kausalyā yasyāḥ putro'bhiṣekṣyate।
yauvarājyena mahatā śvaḥ puṣyeṇa dvijottamaiḥ॥
‘वास्तव में कौसल्या ही सौभाग्यवती हैं, जिनके पुत्र का कल पुष्यनक्षत्र के योग में श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा युवराज के महान् पद पर अभिषेक होने जा रहा है
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prāptāṁ vasumatīṁ prītiṁ pratītāṁ hatavidviṣam।
upasthāsyasi kausalyāṁ dāsīvat tvaṁ kṛtāñjaliḥ॥
‘वे भूमण्डल का निष्कण्टक राज्य पाकर प्रसन्न होंगी, क्योंकि वे राजा की विश्वासपात्र हैं और तुम दासी की भाँति हाथ जोड़कर उनकी सेवा में उपस्थित होओगी
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evaṁ ca tvaṁ sahāsmābhistasyāḥ preṣyā bhaviṣyasi।
putraśca tava rāmasya preṣyatvaṁ hi gamiṣyati॥
‘इस प्रकार हमलोगों के साथ तुम भी कौसल्या की दासी बनोगी और तुम्हारे पुत्र भरत को भी श्रीरामचन्द्रजी की गुलामी करनी पड़ेगी
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hṛṣṭāḥ khalu bhaviṣyanti rāmasya paramāḥ striyaḥ।
aprahṛṣṭā bhaviṣyanti snuṣāste bharatakṣaye॥
‘श्रीरामचन्द्रजी की अन्तःपुर की परम सुन्दरी स्त्रियाँ—सीतादेवी और उनकी सखियाँ निश्चय ही बहुत प्रसन्न होंगी और भरत के प्रभुत्व का नाश होनेसे तुम्हारी बहुएँ शोकमग्न हो जायँगी’
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tāṁ dṛṣṭvā paramaprītāṁ bruvantīṁ mantharāṁ tataḥ।
rāmasyaiva guṇān devī kaikeyī praśaśaṁsa ha॥
मन्थरा को अत्यन्त अप्रसन्नता के कारण इस प्रकार बहकी-बहकी बातें करती देख देवी कैकेयी ने श्रीराम के गुणों की ही प्रशंसा करते हुए कहा—
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dharmajño guṇavān dāntaḥ kṛtajñaḥ satyavān śuciḥ।
rāmo rājasuto jyeṣṭho yauvarājyamato'rhati॥
‘कुब्जे! श्रीराम धर्म के ज्ञाता, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी और पवित्र होनेके साथ ही महाराज के ज्येष्ठ पुत्र हैं; अतः युवराज होनेके योग्य वे ही हैं
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bhrātṝn bhṛtyāṁśca dīrghāyuḥ pitṛvat pālayiṣyati।
saṁtapyase kathaṁ kubje śrutvā rāmābhiṣecanam॥
‘वे दीर्घजीवी होकर अपने भाइयों और भृत्यों का पिता की भाँति पालन करेंगे। कुब्जे! उनके अभिषेक की बात सुनकर तू इतनी जल क्यों रही है?
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bharataścāpi rāmasya dhruvaṁ varṣaśatāt param।
pitṛpaitāmahaṁ rājyamavāpsyati nararṣabhaḥ॥
‘श्रीराम की राज्यप्राप्ति के सौ वर्ष बाद नरश्रेष्ठ भरत को भी निश्चय ही अपने पिता-पितामहों का राज्य मिलेगा
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sā tvamabhyudaye prāpte dahyamāneva manthare।
bhaviṣyati ca kalyāṇe kimidaṁ paritapyase॥
‘मन्थरे! ऐसे अभ्युदय की प्राप्ति के समय, जब कि भविष्य में कल्याण-ही-कल्याण दिखायी दे रहा है, तू इस प्रकार जलती हुई-सी संतप्त क्यों हो रही है?
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yathā vai bharato mānyastathā bhūyo'pi rāghavaḥ।
kausalyāto'tiriktaṁ ca mama śuśrūṣate bahu॥
‘मेरे लिये जैसे भरत आदर के पात्र हैं, वैसे ही बल्कि उनसे भी बढ़कर श्रीराम हैं; क्योंकि वे कौसल्या से भी बढ़कर मेरी बहुत सेवा किया करते हैं
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rājyaṁ yadi hi rāmasya bharatasyāpi tat tadā।
manyate hi yathā''tmānaṁ tathā bhrātṝṁstu rāghavaḥ॥
‘यदि श्रीराम को राज्य मिल रहा है तो उसे भरत को मिला हुआ समझ; क्योंकि श्रीरामचन्द्र अपने भाइयों को भी अपने ही समान समझते हैं’
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kaikeyyā vacanaṁ śrutvā mantharā bhṛśaduḥkhitā।
dīrghamuṣṇaṁ viniḥśvasya kaikeyīmidamabravīt॥
कैकेयी की यह बात सुनकर मन्थरा को बड़ा दुःख हुआ। वह लंबी और गरम साँस खींचकर कैकेयी से बोली—
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anarthadarśinī maurkhyānnātmānamavabudhyase।
śokavyasanavistīrṇe majjantī duḥkhasāgare॥
‘रानी! तुम मूर्खतावश अनर्थ को ही अर्थ समझ रही हो। तुम्हें अपनी स्थिति का पता नहीं है। तुम दुःख के उस महासागर में डूब रही हो, जो शोक (इष्ट से वियोग की चिन्ता) और व्यसन (अनिष्ट की प्राप्ति के दुःख) से महान् विस्तार को प्राप्त हो रहा है
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bhavitā rāghavo rājā rāghavasya ca yaḥ sutaḥ।
rājavaṁśāttu bharataḥ kaikeyi parihāsyate॥
‘केकयराजकुमारी! जब श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँगे, तब उनके बाद उनका जो पुत्र होगा, उसी को राज्य मिलेगा। भरत तो राजपरम्परा से अलग हो जायँगे
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nahi rājñaḥ sutāḥ sarve rājye tiṣṭhanti bhāmini।
sthāpyamāneṣu sarveṣu sumahānanayo bhavet॥
‘भामिनि! राजा के सभी पुत्र राज्यसिंहासन पर नहीं बैठते हैं; यदि सबको बिठा दिया जाय तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाय
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tasmājjyeṣṭhe hi kaikeyi rājyatantrāṇi pārthivāḥ।
sthāpayantyanavadyāṅgi guṇavatsvitareṣvapi॥
‘परमसुन्दरी केकयनन्दिनि! इसीलिये राजालोग राजकाज का भार ज्येष्ठ पुत्र पर ही रखते हैं। यदि ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् न हो तो दूसरे गुणवान् पुत्रों को भी राज्य सौंप देते हैं
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asāvatyantanirbhagnastava putro bhaviṣyati।
anāthavat sukhebhyaśca rājavaṁśācca vatsale॥
‘पुत्रवत्सले! तुम्हारा पुत्र राज्य के अधिकार से तो बहुत दूर हटा ही दिया जायगा, वह अनाथ की भाँति समस्त सुखों से भी वञ्चित हो जायगा
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sāhaṁ tvadarthe samprāptā tvaṁ tu māṁ nāvabudhyase।
sapatnivṛddhau yā me tvaṁ pradeyaṁ dātumarhasi॥
‘इसलिये मैं तुम्हारे ही हित की बात सुझानेके लिये यहाँ आयी हूँ; परंतु तुम मेरा अभिप्राय तो समझती नहीं, उलटे सौत का अभ्युदय सुनकर मुझे पारितोषिक देने चली हो
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dhruvaṁ tu bharataṁ rāmaḥ prāpya rājyamakaṇṭakam।
deśāntaraṁ nāyayitā lokāntaramathāpi vā॥
‘याद रखो, यदि श्रीराम को निष्कण्टक राज्य मिल गया तो वे भरत को अवश्य ही इस देश से बाहर निकाल देंगे अथवा उन्हें परलोक में भी पहुँचा सकते हैं
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bāla eva tu mātulyaṁ bharato nāyitastvayā।
saṁnikarṣācca sauhārdaṁ jāyate sthāvareṣviva॥
‘छोटी अवस्था में ही तुमने भरत को मामा के घर भेज दिया। निकट रहनेसे सौहार्द उत्पन्न होता है। यह बात स्थावर योनियों में भी देखी जाती है (लता और वृक्ष आदि एक-दूसरे के निकट होनेपर परस्पर आलिङ्गन-पाश में बद्ध हो जाते हैं। यदि भरत यहाँ होते तो राजा का उनमें भी समानरूप से स्नेह बढ़ता; अतः वे उन्हें भी आधा राज्य दे देते)
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bharatānuvaśāt so'pi śatrughnastatsamaṁ gataḥ।
lakṣmaṇo hi yathā rāmaṁ tathāyaṁ bharataṁ gataḥ॥
‘भरत के अनुरोध से शत्रुघ्न भी उनके साथ ही चले गये (यदि वे यहाँ होते तो भरत का काम बिगड़ने नहीं पाता। क्योंकि—) जैसे लक्ष्मण राम के अनुगामी हैं, उसी प्रकार शत्रुघ्न भरत का अनुसरण करनेवाले हैं
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śrūyate hi drumaḥ kaścicchettavyo vanajīvanaiḥ।
saṁnikarṣādiṣīkābhirmocitaḥ paramād bhayāt॥
‘सुना जाता है, जंगल की लकड़ी बेचकर जीविका चलानेवाले कुछ लोगों ने किसी वृक्ष को काटने का निश्चय किया, परंतु वह वृक्ष काँटीली झाड़ियों से घिरा हुआ था; इसलिये वे उसे काट नहीं सके। इस प्रकार उन काँटीली झाड़ियों ने निकट रहनेके कारण उस वृक्ष को महान् भय से बचा लिया
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goptā hi rāmaṁ saumitrirlakṣmaṇaṁ cāpi rāghavaḥ।
aśvinoriva saubhrātraṁ tayorlokeṣu viśrutam॥
‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण श्रीराम की रक्षा करते हैं और श्रीराम उनकी। उन दोनों का उत्तम भ्रातृ-प्रेम दोनों अश्विनीकुमारों की भाँति तीनों लोकों में प्रसिद्ध है
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tasmānna lakṣmaṇe rāmaḥ pāpaṁ kiṁcit kariṣyati।
rāmastu bharate pāpaṁ kuryādeva na saṁśayaḥ॥
‘इसलिये श्रीराम लक्ष्मण का तो किञ्चित् भी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरत का अनिष्ट किये बिना वे रह नहीं सकते; इसमें संशय नहीं है
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tasmād rājagṛhādeva vanaṁ gacchatu rāghavaḥ।
etaddhi rocate mahyaṁ bhṛśaṁ cāpi hitaṁ tava॥
‘अतः श्रीरामचन्द्र महाराज के महल से ही सीधे वन को चले जायँ—मुझे तो यही अच्छा जान पड़ता है और इसी में तुम्हारा परम हित है
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evaṁ te jñātipakṣasya śreyaścaiva bhaviṣyati।
yadi ced bharato dharmāt pitryaṁ rājyamavāpsyati॥
‘यदि भरत धर्मानुसार अपने पिता का राज्य प्राप्त कर लेंगे तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्ष के अन्य सब लोगों का भी कल्याण होगा
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sa te sukhocito bālo rāmasya sahajo ripuḥ।
samṛddhārthasya naṣṭārtho jīviṣyati kathaṁ vaśe॥
‘सौतेला भाई होनेके कारण जो श्रीराम का सहज शत्रु है, वह सुख भोगनेके योग्य तुम्हारा बालक भरत राज्य और धन से वञ्चित हो राज्य पाकर समृद्धिशाली बने हुए श्रीराम के वश में पड़कर कैसे जीवित रहेगा
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abhidrutamivāraṇye siṁhena gajayūthapam।
pracchādyamānaṁ rāmeṇa bharataṁ trātumarhasi॥
‘जैसे वन में सिंह हाथियों के यूथपति पर आक्रमण करता है और वह भागा फिरता है, उसी प्रकार राजा राम भरत का तिरस्कार करेंगे; अतः उस तिरस्कार से तुम भरत की रक्षा करो
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darpānnirākṛtā pūrvaṁ tvayā saubhāgyavattayā।
rāmamātā sapatnī te kathaṁ vairaṁ na yāpayet॥
‘तुमने पहले पति का अत्यन्त प्रेम प्राप्त होनेके कारण घमंड में आकर जिनका अनादर किया था, वे ही तुम्हारी सौत श्रीराममाता कौसल्या पुत्र की राज्यप्राप्ति से परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं; अब वे तुमसे अपने वैर का बदला क्यों नहीं लेंगी
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yadā ca rāmaḥ pṛthivīmavāpsyate
prabhūtaratnākaraśailasaṁyutām।
tadā gamiṣyasyaśubhaṁ parābhavaṁ
sahaiva dīnā bharatena bhāmini॥
‘भामिनि! जब श्रीराम अनेक समुद्रों और पर्वतों से युक्त समस्त भूमण्डल का राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब तुम अपने पुत्र भरत के साथ ही दीन-हीन होकर अशुभ पराभव का पात्र बन जाओगी
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yadā hi rāmaḥ pṛthivīmavāpsyate
dhruvaṁ praṇaṣṭo bharato bhaviṣyati।
ato hi saṁcintaya rājyamātmaje
parasya caivāsya vivāsakāraṇam॥
‘याद रखो, जब श्रीराम इस पृथ्वी पर अधिकार प्राप्त कर लेंगे, तब निश्चय ही तुम्हारे पुत्र भरत नष्टप्राय हो जायँगे। अतः ऐसा कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारे पुत्र को तो राज्य मिले और शत्रुभूत श्रीराम का वनवास हो जाय’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥