वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८ · ३९ श्लोकाःSarga 8 · 39 ślokas

मन्थराका पुनः श्रीरामके राज्याभिषेकको कैकेयीके लिये अनिष्टकारी बताना, कैकेयीका श्रीरामके गुणोंको बताकर उनके अभिषेकका समर्थन करना तत्पश्चात् कुब्जाका पुनः श्रीरामराज्यको भरतके लिये भयजनक बताकर कैकेयीको भड़काना

मन्थराका दुराग्रह

“मन्थराका दुराग्रह”
॥ २ · ८ · १–२७ ॥

चन्द्रधवले कक्षे कैकेय्या दत्तं रत्नं भूमौ क्षिप्तं, वृद्धा कुब्जा मन्थरा तीव्रनिर्बन्धेन अङ्गुलिमुद्धृत्य रामाभिषेको भरताय विनाशकर इति पुनर्वदति; पर्यङ्के ईषदुत्थिता कैकेयी रामगुणान् स्तुवती क्रमेण भयसंशयौ प्राप्ता करं वक्षसि निदधाति।

चन्द्रवत् धवल कक्षमें कैकेयीद्वारा अभी दी गयी बहुमूल्य मणि फर्शपर फेंकी पड़ी है; वृद्धा कुबड़ी मन्थरा तीव्र हठसे झुककर—एक उँगली उठाये, तीखे मुखपर कपट और बनावटी शोक लिये—बार-बार समझा रही है कि श्रीरामका राज्याभिषेक बालक भरतके लिये अनिष्टकारी होगा; पर्यङ्कपर अधउठी कैकेयी, जो पहले श्रीरामके गुणोंकी प्रशंसा कर रही थीं, अब भय और संशयमें पड़कर एक हाथ छातीपर रखे हैं।

In the moon-pale chamber, the costly jewel the queen had just gifted now flung onto the marble floor, the aged hunchbacked Manthara leans in with fierce insistence — finger raised, sharp face alight with cunning and feigned grief — pressing her poison that Ram's coronation will doom young Bharat; the queen Kaikeyi, half-risen on her couch, her first praise of Ram's virtues giving way to fear and doubt, draws a hand to her breast.

॥ २ · ८ · १ ॥
मन्थरा त्वभ्यसूयैनामुत्सृज्याभरणं हि तत्। उवाचेदं ततो वाक्यं कोपदुःखसमन्विता॥

mantharā tvabhyasūyaināmutsṛjyābharaṇaṁ hi tat।
uvācedaṁ tato vākyaṁ kopaduḥkhasamanvitā॥

यह सुनकर मन्थरा ने कैकेयी की निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषण को उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दुःख से भरकर वह इस प्रकार बोली—

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॥ २ · ८ · २ ॥
हर्षं किमर्थमस्थाने कृतवत्यसि बालिशे। शोकसागरमध्यस्थं नात्मानमवबुध्यसे॥

harṣaṁ kimarthamasthāne kṛtavatyasi bāliśe।
śokasāgaramadhyasthaṁ nātmānamavabudhyase॥

‘रानी! तुम बड़ी नादान हो। अहो! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोक के स्थान पर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोक के समुद्र में डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्था का बोध नहीं हो रहा है

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॥ २ · ८ · ३ ॥
मनसा प्रसहामि त्वां देवि दुःखार्दिता सती। यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्य त्वं व्यसनं महत्॥

manasā prasahāmi tvāṁ devi duḥkhārditā satī।
yacchocitavye hṛṣṭāsi prāpya tvaṁ vyasanaṁ mahat॥

‘देवि! महान् संकट में पड़नेपर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे मन-ही-मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है। मैं दुःख से व्याकुल हुई जाती हूँ

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॥ २ · ८ · ४ ॥
शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत्। अरेः सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्योरिवागताम्॥

śocāmi durmatitvaṁ te kā hi prājñā praharṣayet।
areḥ sapatnīputrasya vṛddhiṁ mṛtyorivāgatām॥

‘मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धि के लिये ही अधिक शोक होता है। अरी! सौत का बेटा शत्रु होता है। वह सौतेली माँ के लिये साक्षात् मृत्यु के समान है। भला, उसके अभ्युदय का अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मन में हर्ष मानेगी

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॥ २ · ८ · ५ ॥
भरतादेव रामस्य राज्यसाधारणाद् भयम्। तद्विचिन्त्य विषण्णास्मि भयं भीताद्धि जायते॥

bharatādeva rāmasya rājyasādhāraṇād bhayam।
tadvicintya viṣaṇṇāsmi bhayaṁ bhītāddhi jāyate॥

‘यह राज्य भरत और राम दोनों के लिये साधारण भोग्यवस्तु है, इस पर दोनों का समान अधिकार है, इसलिये श्रीराम को भरत से ही भय है। यही सोचकर मैं विषाद में डूबी जाती हूँ; क्योंकि भयभीत से ही भय प्राप्त होता है अर्थात् आज जिसे भय है, वही राज्य प्राप्त करनेपर जब सबल हो जायगा, तब अपने भय के हेतु को उखाड़ फेंकेगा

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॥ २ · ८ · ६ ॥
लक्ष्मणो हि महाबाहू रामं सर्वात्मना गतः। शत्रुघ्नश्चापि भरतं काकुत्स्थं लक्ष्मणो यथा॥

lakṣmaṇo hi mahābāhū rāmaṁ sarvātmanā gataḥ।
śatrughnaścāpi bharataṁ kākutsthaṁ lakṣmaṇo yathā॥

‘महाबाहु लक्ष्मण सम्पूर्ण हृदय से श्रीरामचन्द्रजी के अनुगत हैं। जैसे लक्ष्मण श्रीराम के अनुगत हैं, उसी तरह शत्रुघ्न भी भरत का अनुसरण करनेवाले हैं

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॥ २ · ८ · ७ ॥
प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्यैव भामिनि। राज्यक्रमो विसृष्टस्तु तयोस्तावद्यवीयसोः॥

pratyāsannakrameṇāpi bharatasyaiva bhāmini।
rājyakramo visṛṣṭastu tayostāvadyavīyasoḥ॥

‘भामिनि! उत्पत्ति के क्रम से श्रीराम के बाद भरत का ही पहले राज्य पर अधिकार हो सकता है (अतः भरत से भय होना स्वाभाविक है)। लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे हैं; अतः उनके लिये राज्यप्राप्ति की सम्भावना दूर है

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॥ २ · ८ · ८ ॥
विदुषः क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिणः। भयात् प्रवेपे रामस्य चिन्तयन्ती तवात्मजम्॥

viduṣaḥ kṣatracāritre prājñasya prāptakāriṇaḥ।
bhayāt pravepe rāmasya cintayantī tavātmajam॥

‘श्रीराम समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, विशेषतः क्षत्रियचरित्र (राजनीति) के पण्डित हैं तथा समयोचित कर्तव्य का पालन करनेवाले हैं; अतः उनका तुम्हारे पुत्र के प्रति जो क्रूरतापूर्ण बर्ताव होगा, उसे सोचकर मैं भय से काँप उठती हूँ

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॥ २ · ८ · ९ ॥
सुभगा किल कौसल्या यस्याः पुत्रोऽभिषेक्ष्यते। यौवराज्येन महता श्वः पुष्येण द्विजोत्तमैः॥

subhagā kila kausalyā yasyāḥ putro'bhiṣekṣyate।
yauvarājyena mahatā śvaḥ puṣyeṇa dvijottamaiḥ॥

‘वास्तव में कौसल्या ही सौभाग्यवती हैं, जिनके पुत्र का कल पुष्यनक्षत्र के योग में श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा युवराज के महान् पद पर अभिषेक होने जा रहा है

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॥ २ · ८ · १० ॥
प्राप्तां वसुमतीं प्रीतिं प्रतीतां हतविद्विषम्। उपस्थास्यसि कौसल्यां दासीवत् त्वं कृताञ्जलिः॥

prāptāṁ vasumatīṁ prītiṁ pratītāṁ hatavidviṣam।
upasthāsyasi kausalyāṁ dāsīvat tvaṁ kṛtāñjaliḥ॥

‘वे भूमण्डल का निष्कण्टक राज्य पाकर प्रसन्न होंगी, क्योंकि वे राजा की विश्वासपात्र हैं और तुम दासी की भाँति हाथ जोड़कर उनकी सेवा में उपस्थित होओगी

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॥ २ · ८ · ११ ॥
एवं त्वं सहास्माभिस्तस्याः प्रेष्या भविष्यसि। पुत्रश्च तव रामस्य प्रेष्यत्वं हि गमिष्यति॥

evaṁ ca tvaṁ sahāsmābhistasyāḥ preṣyā bhaviṣyasi।
putraśca tava rāmasya preṣyatvaṁ hi gamiṣyati॥

‘इस प्रकार हमलोगों के साथ तुम भी कौसल्या की दासी बनोगी और तुम्हारे पुत्र भरत को भी श्रीरामचन्द्रजी की गुलामी करनी पड़ेगी

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॥ २ · ८ · १२ ॥
हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः। अप्रहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये॥

hṛṣṭāḥ khalu bhaviṣyanti rāmasya paramāḥ striyaḥ।
aprahṛṣṭā bhaviṣyanti snuṣāste bharatakṣaye॥

‘श्रीरामचन्द्रजी की अन्तःपुर की परम सुन्दरी स्त्रियाँ—सीतादेवी और उनकी सखियाँ निश्चय ही बहुत प्रसन्न होंगी और भरत के प्रभुत्व का नाश होनेसे तुम्हारी बहुएँ शोकमग्न हो जायँगी’

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॥ २ · ८ · १३ ॥
तां दृष्ट्वा परमप्रीतां ब्रुवन्तीं मन्थरां ततः। रामस्यैव गुणान् देवी कैकेयी प्रशशंस ह॥

tāṁ dṛṣṭvā paramaprītāṁ bruvantīṁ mantharāṁ tataḥ।
rāmasyaiva guṇān devī kaikeyī praśaśaṁsa ha॥

मन्थरा को अत्यन्त अप्रसन्नता के कारण इस प्रकार बहकी-बहकी बातें करती देख देवी कैकेयी ने श्रीराम के गुणों की ही प्रशंसा करते हुए कहा—

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॥ २ · ८ · १४ ॥
धर्मज्ञो गुणवान् दान्तः कृतज्ञः सत्यवान् शुचिः। रामो राजसुतो ज्येष्ठो यौवराज्यमतोऽर्हति॥

dharmajño guṇavān dāntaḥ kṛtajñaḥ satyavān śuciḥ।
rāmo rājasuto jyeṣṭho yauvarājyamato'rhati॥

‘कुब्जे! श्रीराम धर्म के ज्ञाता, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी और पवित्र होनेके साथ ही महाराज के ज्येष्ठ पुत्र हैं; अतः युवराज होनेके योग्य वे ही हैं

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॥ २ · ८ · १५ ॥
भ्रातॄन् भृत्यांश्च दीर्घायुः पितृवत् पालयिष्यति। संतप्यसे कथं कुब्जे श्रुत्वा रामाभिषेचनम्॥

bhrātṝn bhṛtyāṁśca dīrghāyuḥ pitṛvat pālayiṣyati।
saṁtapyase kathaṁ kubje śrutvā rāmābhiṣecanam॥

‘वे दीर्घजीवी होकर अपने भाइयों और भृत्यों का पिता की भाँति पालन करेंगे। कुब्जे! उनके अभिषेक की बात सुनकर तू इतनी जल क्यों रही है?

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॥ २ · ८ · १६ ॥
भरतश्चापि रामस्य ध्रुवं वर्षशतात् परम्। पितृपैतामहं राज्यमवाप्स्यति नरर्षभः॥

bharataścāpi rāmasya dhruvaṁ varṣaśatāt param।
pitṛpaitāmahaṁ rājyamavāpsyati nararṣabhaḥ॥

‘श्रीराम की राज्यप्राप्ति के सौ वर्ष बाद नरश्रेष्ठ भरत को भी निश्चय ही अपने पिता-पितामहों का राज्य मिलेगा

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॥ २ · ८ · १७ ॥
सा त्वमभ्युदये प्राप्ते दह्यमानेव मन्थरे। भविष्यति कल्याणे किमिदं परितप्यसे॥

sā tvamabhyudaye prāpte dahyamāneva manthare।
bhaviṣyati ca kalyāṇe kimidaṁ paritapyase॥

‘मन्थरे! ऐसे अभ्युदय की प्राप्ति के समय, जब कि भविष्य में कल्याण-ही-कल्याण दिखायी दे रहा है, तू इस प्रकार जलती हुई-सी संतप्त क्यों हो रही है?

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॥ २ · ८ · १८ ॥
यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघवः। कौसल्यातोऽतिरिक्तं मम शुश्रूषते बहु॥

yathā vai bharato mānyastathā bhūyo'pi rāghavaḥ।
kausalyāto'tiriktaṁ ca mama śuśrūṣate bahu॥

‘मेरे लिये जैसे भरत आदर के पात्र हैं, वैसे ही बल्कि उनसे भी बढ़कर श्रीराम हैं; क्योंकि वे कौसल्या से भी बढ़कर मेरी बहुत सेवा किया करते हैं

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॥ २ · ८ · १९ ॥
राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत् तदा। मन्यते हि यथाऽऽत्मानं तथा भ्रातॄंस्तु राघवः॥

rājyaṁ yadi hi rāmasya bharatasyāpi tat tadā।
manyate hi yathā''tmānaṁ tathā bhrātṝṁstu rāghavaḥ॥

‘यदि श्रीराम को राज्य मिल रहा है तो उसे भरत को मिला हुआ समझ; क्योंकि श्रीरामचन्द्र अपने भाइयों को भी अपने ही समान समझते हैं’

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॥ २ · ८ · २० ॥
कैकेय्या वचनं श्रुत्वा मन्थरा भृशदुःखिता। दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य कैकेयीमिदमब्रवीत्॥

kaikeyyā vacanaṁ śrutvā mantharā bhṛśaduḥkhitā।
dīrghamuṣṇaṁ viniḥśvasya kaikeyīmidamabravīt॥

कैकेयी की यह बात सुनकर मन्थरा को बड़ा दुःख हुआ। वह लंबी और गरम साँस खींचकर कैकेयी से बोली—

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॥ २ · ८ · २१ ॥
अनर्थदर्शिनी मौर्ख्यान्नात्मानमवबुध्यसे। शोकव्यसनविस्तीर्णे मज्जन्ती दुःखसागरे॥

anarthadarśinī maurkhyānnātmānamavabudhyase।
śokavyasanavistīrṇe majjantī duḥkhasāgare॥

‘रानी! तुम मूर्खतावश अनर्थ को ही अर्थ समझ रही हो। तुम्हें अपनी स्थिति का पता नहीं है। तुम दुःख के उस महासागर में डूब रही हो, जो शोक (इष्ट से वियोग की चिन्ता) और व्यसन (अनिष्ट की प्राप्ति के दुःख) से महान् विस्तार को प्राप्त हो रहा है

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॥ २ · ८ · २२ ॥
भविता राघवो राजा राघवस्य यः सुतः। राजवंशात्तु भरतः कैकेयि परिहास्यते॥

bhavitā rāghavo rājā rāghavasya ca yaḥ sutaḥ।
rājavaṁśāttu bharataḥ kaikeyi parihāsyate॥

‘केकयराजकुमारी! जब श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँगे, तब उनके बाद उनका जो पुत्र होगा, उसी को राज्य मिलेगा। भरत तो राजपरम्परा से अलग हो जायँगे

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॥ २ · ८ · २३ ॥
नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि। स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत्॥

nahi rājñaḥ sutāḥ sarve rājye tiṣṭhanti bhāmini।
sthāpyamāneṣu sarveṣu sumahānanayo bhavet॥

‘भामिनि! राजा के सभी पुत्र राज्यसिंहासन पर नहीं बैठते हैं; यदि सबको बिठा दिया जाय तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाय

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॥ २ · ८ · २४ ॥
तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः। स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि॥

tasmājjyeṣṭhe hi kaikeyi rājyatantrāṇi pārthivāḥ।
sthāpayantyanavadyāṅgi guṇavatsvitareṣvapi॥

‘परमसुन्दरी केकयनन्दिनि! इसीलिये राजालोग राजकाज का भार ज्येष्ठ पुत्र पर ही रखते हैं। यदि ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् न हो तो दूसरे गुणवान् पुत्रों को भी राज्य सौंप देते हैं

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॥ २ · ८ · २५ ॥
असावत्यन्तनिर्भग्नस्तव पुत्रो भविष्यति। अनाथवत् सुखेभ्यश्च राजवंशाच्च वत्सले॥

asāvatyantanirbhagnastava putro bhaviṣyati।
anāthavat sukhebhyaśca rājavaṁśācca vatsale॥

‘पुत्रवत्सले! तुम्हारा पुत्र राज्य के अधिकार से तो बहुत दूर हटा ही दिया जायगा, वह अनाथ की भाँति समस्त सुखों से भी वञ्चित हो जायगा

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॥ २ · ८ · २६ ॥
साहं त्वदर्थे सम्प्राप्ता त्वं तु मां नावबुध्यसे। सपत्निवृद्धौ या मे त्वं प्रदेयं दातुमर्हसि॥

sāhaṁ tvadarthe samprāptā tvaṁ tu māṁ nāvabudhyase।
sapatnivṛddhau yā me tvaṁ pradeyaṁ dātumarhasi॥

‘इसलिये मैं तुम्हारे ही हित की बात सुझानेके लिये यहाँ आयी हूँ; परंतु तुम मेरा अभिप्राय तो समझती नहीं, उलटे सौत का अभ्युदय सुनकर मुझे पारितोषिक देने चली हो

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॥ २ · ८ · २७ ॥
ध्रुवं तु भरतं रामः प्राप्य राज्यमकण्टकम्। देशान्तरं नाययिता लोकान्तरमथापि वा॥

dhruvaṁ tu bharataṁ rāmaḥ prāpya rājyamakaṇṭakam।
deśāntaraṁ nāyayitā lokāntaramathāpi vā॥

‘याद रखो, यदि श्रीराम को निष्कण्टक राज्य मिल गया तो वे भरत को अवश्य ही इस देश से बाहर निकाल देंगे अथवा उन्हें परलोक में भी पहुँचा सकते हैं

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॥ २ · ८ · २८ ॥
बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया। संनिकर्षाच्च सौहार्दं जायते स्थावरेष्विव॥

bāla eva tu mātulyaṁ bharato nāyitastvayā।
saṁnikarṣācca sauhārdaṁ jāyate sthāvareṣviva॥

‘छोटी अवस्था में ही तुमने भरत को मामा के घर भेज दिया। निकट रहनेसे सौहार्द उत्पन्न होता है। यह बात स्थावर योनियों में भी देखी जाती है (लता और वृक्ष आदि एक-दूसरे के निकट होनेपर परस्पर आलिङ्गन-पाश में बद्ध हो जाते हैं। यदि भरत यहाँ होते तो राजा का उनमें भी समानरूप से स्नेह बढ़ता; अतः वे उन्हें भी आधा राज्य दे देते)

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॥ २ · ८ · २९ ॥
भरतानुवशात् सोऽपि शत्रुघ्नस्तत्समं गतः। लक्ष्मणो हि यथा रामं तथायं भरतं गतः॥

bharatānuvaśāt so'pi śatrughnastatsamaṁ gataḥ।
lakṣmaṇo hi yathā rāmaṁ tathāyaṁ bharataṁ gataḥ॥

‘भरत के अनुरोध से शत्रुघ्न भी उनके साथ ही चले गये (यदि वे यहाँ होते तो भरत का काम बिगड़ने नहीं पाता। क्योंकि—) जैसे लक्ष्मण राम के अनुगामी हैं, उसी प्रकार शत्रुघ्न भरत का अनुसरण करनेवाले हैं

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॥ २ · ८ · ३० ॥
श्रूयते हि द्रुमः कश्चिच्छेत्तव्यो वनजीवनैः। संनिकर्षादिषीकाभिर्मोचितः परमाद् भयात्॥

śrūyate hi drumaḥ kaścicchettavyo vanajīvanaiḥ।
saṁnikarṣādiṣīkābhirmocitaḥ paramād bhayāt॥

‘सुना जाता है, जंगल की लकड़ी बेचकर जीविका चलानेवाले कुछ लोगों ने किसी वृक्ष को काटने का निश्चय किया, परंतु वह वृक्ष काँटीली झाड़ियों से घिरा हुआ था; इसलिये वे उसे काट नहीं सके। इस प्रकार उन काँटीली झाड़ियों ने निकट रहनेके कारण उस वृक्ष को महान् भय से बचा लिया

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॥ २ · ८ · ३१ ॥
गोप्ता हि रामं सौमित्रिर्लक्ष्मणं चापि राघवः। अश्विनोरिव सौभ्रात्रं तयोर्लोकेषु विश्रुतम्॥

goptā hi rāmaṁ saumitrirlakṣmaṇaṁ cāpi rāghavaḥ।
aśvinoriva saubhrātraṁ tayorlokeṣu viśrutam॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण श्रीराम की रक्षा करते हैं और श्रीराम उनकी। उन दोनों का उत्तम भ्रातृ-प्रेम दोनों अश्विनीकुमारों की भाँति तीनों लोकों में प्रसिद्ध है

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॥ २ · ८ · ३२ ॥
तस्मान्न लक्ष्मणे रामः पापं किंचित् करिष्यति। रामस्तु भरते पापं कुर्यादेव संशयः॥

tasmānna lakṣmaṇe rāmaḥ pāpaṁ kiṁcit kariṣyati।
rāmastu bharate pāpaṁ kuryādeva na saṁśayaḥ॥

‘इसलिये श्रीराम लक्ष्मण का तो किञ्चित् भी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरत का अनिष्ट किये बिना वे रह नहीं सकते; इसमें संशय नहीं है

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॥ २ · ८ · ३३ ॥
तस्माद् राजगृहादेव वनं गच्छतु राघवः। एतद्धि रोचते मह्यं भृशं चापि हितं तव॥

tasmād rājagṛhādeva vanaṁ gacchatu rāghavaḥ।
etaddhi rocate mahyaṁ bhṛśaṁ cāpi hitaṁ tava॥

‘अतः श्रीरामचन्द्र महाराज के महल से ही सीधे वन को चले जायँ—मुझे तो यही अच्छा जान पड़ता है और इसी में तुम्हारा परम हित है

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॥ २ · ८ · ३४ ॥
एवं ते ज्ञातिपक्षस्य श्रेयश्चैव भविष्यति। यदि चेद् भरतो धर्मात् पित्र्यं राज्यमवाप्स्यति॥

evaṁ te jñātipakṣasya śreyaścaiva bhaviṣyati।
yadi ced bharato dharmāt pitryaṁ rājyamavāpsyati॥

‘यदि भरत धर्मानुसार अपने पिता का राज्य प्राप्त कर लेंगे तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्ष के अन्य सब लोगों का भी कल्याण होगा

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॥ २ · ८ · ३५ ॥
ते सुखोचितो बालो रामस्य सहजो रिपुः। समृद्धार्थस्य नष्टार्थो जीविष्यति कथं वशे॥

sa te sukhocito bālo rāmasya sahajo ripuḥ।
samṛddhārthasya naṣṭārtho jīviṣyati kathaṁ vaśe॥

‘सौतेला भाई होनेके कारण जो श्रीराम का सहज शत्रु है, वह सुख भोगनेके योग्य तुम्हारा बालक भरत राज्य और धन से वञ्चित हो राज्य पाकर समृद्धिशाली बने हुए श्रीराम के वश में पड़कर कैसे जीवित रहेगा

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॥ २ · ८ · ३६ ॥
अभिद्रुतमिवारण्ये सिंहेन गजयूथपम्। प्रच्छाद्यमानं रामेण भरतं त्रातुमर्हसि॥

abhidrutamivāraṇye siṁhena gajayūthapam।
pracchādyamānaṁ rāmeṇa bharataṁ trātumarhasi॥

‘जैसे वन में सिंह हाथियों के यूथपति पर आक्रमण करता है और वह भागा फिरता है, उसी प्रकार राजा राम भरत का तिरस्कार करेंगे; अतः उस तिरस्कार से तुम भरत की रक्षा करो

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॥ २ · ८ · ३७ ॥
दर्पान्निराकृता पूर्वं त्वया सौभाग्यवत्तया। राममाता सपत्नी ते कथं वैरं यापयेत्॥

darpānnirākṛtā pūrvaṁ tvayā saubhāgyavattayā।
rāmamātā sapatnī te kathaṁ vairaṁ na yāpayet॥

‘तुमने पहले पति का अत्यन्त प्रेम प्राप्त होनेके कारण घमंड में आकर जिनका अनादर किया था, वे ही तुम्हारी सौत श्रीराममाता कौसल्या पुत्र की राज्यप्राप्ति से परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं; अब वे तुमसे अपने वैर का बदला क्यों नहीं लेंगी

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॥ २ · ८ · ३८ ॥
यदा रामः पृथिवीमवाप्स्यते प्रभूतरत्नाकरशैलसंयुताम्। तदा गमिष्यस्यशुभं पराभवं सहैव दीना भरतेन भामिनि॥

yadā ca rāmaḥ pṛthivīmavāpsyate
prabhūtaratnākaraśailasaṁyutām।
tadā gamiṣyasyaśubhaṁ parābhavaṁ
sahaiva dīnā bharatena bhāmini॥

‘भामिनि! जब श्रीराम अनेक समुद्रों और पर्वतों से युक्त समस्त भूमण्डल का राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब तुम अपने पुत्र भरत के साथ ही दीन-हीन होकर अशुभ पराभव का पात्र बन जाओगी

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॥ २ · ८ · ३९ ॥
यदा हि रामः पृथिवीमवाप्स्यते ध्रुवं प्रणष्टो भरतो भविष्यति। अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे परस्य चैवास्य विवासकारणम्॥

yadā hi rāmaḥ pṛthivīmavāpsyate
dhruvaṁ praṇaṣṭo bharato bhaviṣyati।
ato hi saṁcintaya rājyamātmaje
parasya caivāsya vivāsakāraṇam॥

‘याद रखो, जब श्रीराम इस पृथ्वी पर अधिकार प्राप्त कर लेंगे, तब निश्चय ही तुम्हारे पुत्र भरत नष्टप्राय हो जायँगे। अतः ऐसा कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारे पुत्र को तो राज्य मिले और शत्रुभूत श्रीराम का वनवास हो जाय’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥