श्रीरामके अभिषेकका समाचार पाकर खिन्न हुई मन्थराका कैकेयीको उभाड़ना, परंतु प्रसन्न हुई कैकेयीका उसे पुरस्काररूपमें आभूषण देना और वर माँगनेके लिये प्रेरित करना
jñātidāsī yato jātā kaikeyyā tu sahoṣitā।
prāsādaṁ candrasaṁkāśamāruroha yadṛcchayā॥
रानी कैकेयी के पास एक दासी थी, जो उसके मायके से आयी हुई थी। वह सदा कैकेयी के ही साथ रहा करती थी। उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता-पिता कौन थे? इसका पता किसी को नहीं था। अभिषेक से एक दिन पहले वह स्वेच्छा से ही कैकेयी के चन्द्रमा के समान कान्तिमान् महल की छत पर जा चढ़ी॥ १॥
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siktarājapathāṁ kṛtsnāṁ prakīrṇakamalotpalām।
ayodhyāṁ mantharā tasmātprāsādādanvavaikṣata॥
उस दासी का नाम था—मन्थरा। उसने उस महल की छत से देखा—अयोध्या की सड़कों पर छिड़काव किया गया है और सारी पुरी में यत्र-तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं॥ २॥
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patākābhirvarāhībhirdhvajaiśca samalaṁkṛtām।
siktāṁ candanatoyaiśca śiraḥsnātajanairyutām॥
सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं। ध्वजाओं से इस पुरी की अपूर्व शोभा हो रही है। राजमार्गों पर चन्दनमिश्रित जल का छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरी में सब लोग उबटन लगाकर सिर के ऊपर से स्नान किये हुए हैं॥ ३॥
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mālyamodakahastaiśca dvijendrairabhināditām।
śukladevagṛhadvārāṁ sarvavāditranāditām॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
samprahṛṣṭajanākīrṇāṁ brahmaghoṣanināditām।
prahṛṣṭavarahastyaśvāṁ sampraṇarditagovṛṣām॥
श्रीराम के दिये हुए माल्य और मोदक हाथ में लिये श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षनाद कर रहे हैं, देवमन्दिरों के दरवाजे चूने और चन्दन आदि से लीपकर सफेद एवं सुन्दर बनाये गये हैं, सब प्रकार के बाजों की मनोहर ध्वनि हो रही है, अत्यन्त हर्ष से भरे हुए मनुष्यों से सारा नगर परिपूर्ण है और चारों ओर वेदपाठकों की ध्वनि गूँज रही है, श्रेष्ठ हाथी और घोड़े हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देते हैं तथा गाय-बैल प्रसन्न होकर रँभा रहे हैं॥ ४-५॥
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hṛṣṭapramuditaiḥ paurairucchritadhvajamālinīm।
ayodhyāṁ mantharā dṛṣṭvā paraṁ vismayamāgatā॥
सारे नगरनिवासी हर्षजनित रोमाञ्च से युक्त और आनन्दमग्न हैं तथा नगर में सब ओर श्रेणीबद्ध ऊँचे-ऊँचे ध्वज फहरा रहे हैं। अयोध्या की ऐसी शोभा को देखकर मन्थरा को बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ६॥
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sā harṣotphullanayanāṁ pāṇḍurakṣaumavāsinīm।
avidūre sthitāṁ dṛṣṭvā dhātrīṁ papraccha mantharā॥
उसने पास के ही कोठे से राम की धाय को खड़ी देखा, उसके नेत्र प्रसन्नता से खिले हुए थे और शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पा रही थी। उसे देखकर मन्थरा ने उससे पूछा—॥ ७॥
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uttamenābhisaṁyuktā harṣeṇārthaparā satī।
rāmasya mātā dhanaṁ kiṁ nu janebhyaḥ samprayacchati॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
atimātrapraharṣeyaṁ kiṁ janasya ca śaṁsa me।
kārayiṣyati kiṁ vāpi samprahṛṣṭo mahīpatiḥ॥
'धाय! आज श्रीरामचन्द्रजी की माता अपने किसी अभीष्ट मनोरथ के साधन में तत्पर हो अत्यन्त हर्ष में भरकर लोगों को धन क्यों बाँट रही हैं? आज यहाँ के सभी मनुष्यों को इतनी अधिक प्रसन्नता क्यों है? इसका कारण मुझे बताओ! आज महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न होकर कौन-सा कार्य करायेंगे॥ ८-९॥
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vidīryamāṇā harṣeṇa dhātrī tu parayā mudā।
ācacakṣe'tha kubjāyai bhūyasīṁ rāghave śriyam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
śvaḥ puṣyeṇa jitakrodhaṁ yauvarājyena cānagham।
rājā daśaratho rāmamabhiṣektā hi rāghavam॥
श्रीराम की धाय तो हर्ष से फूली नहीं समाती थी, उसने कुब्जा के पूछने पर बड़े आनन्द के साथ उसे बताया—'कुब्जे! रघुनाथजी को बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होनेवाली है। कल महाराज दशरथ पुष्यनक्षत्र के योग में क्रोध को जीतनेवाले, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीराम को युवराज के पद पर अभिषिक्त करेंगे'॥ १०-११॥
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dhātryāstu vacanaṁ śrutvā kubjā kṣipramamarṣitā।
kailāsaśikharākārātprāsādādavarohata॥
धाय का यह वचन सुनकर कुब्जा मन-ही-मन कुढ़ गयी और उस कैलास-शिखर की भाँति उज्ज्वल एवं गगनचुम्बी प्रासाद से तुरंत ही नीचे उतर गयी॥ १२॥
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sā dahyamānā krodhena mantharā pāpadarśinī।
śayānāmeva kaikeyīmidaṁ vacanamabravīt॥
मन्थरा को इसमें कैकेयी का अनिष्ट दिखायी देता था, इसलिये क्रोध से जल रही थी। उसने महल में लेटी हुई कैकेयी के पास जाकर इस प्रकार कहा—॥ १३॥
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uttiṣṭha mūḍhe kiṁ śeṣe bhayaṁ tvāmabhivartate।
upaplutamaghaughena nātmānamavabudhyase॥
'मूर्खे! उठ। क्या सो रही है? तुझपर बड़ा भारी भय आ रहा है। अरी! तेरे ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तुझे अपनी इस दुरवस्था का बोध नहीं होता?'॥ १४॥
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aniṣṭe subhagākāre saubhāgyena vikatthase।
calaṁ hi tava saubhāgyaṁ nadyāḥ srota ivoṣṇage॥
'तेरे प्रियतम तेरे सामने ऐसा आकार बनाये आते हैं मानो सारा सौभाग्य तुझे ही अर्पित कर देते हों, परंतु पीठ-पीछे वे तेरा अनिष्ट करते हैं। तू उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर सौभाग्य की डींग हाँका करती है, परंतु जैसे ग्रीष्म ऋतु में नदी का स्रोत सूखता चला जाता है, उसी प्रकार वह तेरा सौभाग्य अब अस्थिर हो गया है—तेरे हाथ से चला जाना चाहता है!'॥ १५॥
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evamuktā tu kaikeyī ruṣṭayā paruṣaṁ vacaḥ।
kubjayā pāpadarśinyā viṣādamagamatparam॥
इष्ट में भी अनिष्ट का दर्शन करानेवाली रोषभरी कुब्जा के इस प्रकार कठोर वचन कहने पर कैकेयी के मन में बड़ा दुःख हुआ॥ १६॥
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kaikeyyabravītkubjāṁ kaccitkṣemaṁ na manthare।
viṣaṇṇavadanāṁ hi tvāṁ lakṣaye bhṛśaduḥkhitām॥
उस समय केकयराजकुमारी ने कुब्जा से पूछा—'मन्थरे! कोई अमंगल की बात तो नहीं हो गयी; क्योंकि तेरे मुख पर विषाद छा रहा है और तू मुझे बहुत दुःखी दिखायी देती है'॥ १७॥
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mantharā tu vacaḥ śrutvā kaikeyyā madhurākṣaram।
uvāca krodhasaṁyuktā vākyaṁ vākyaviśāradā॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sā viṣaṇṇatarā bhūtvā kubjā tasyā hitaiṣiṇī।
viṣādayantī provāca bhedayantī ca rāghavam॥
मन्थरा बातचीत करने में बड़ी कुशल थी, वह कैकेयी के मीठे वचन सुनकर और भी खिन्न हो गयी, उसके प्रति अपनी हितैषिता प्रकट करती हुई कुपित हो उठी और कैकेयी के मन में श्रीराम के प्रति भेदभाव और विषाद उत्पन्न करती हुई इस प्रकार बोली—॥ १८-१९॥
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akṣayyaṁ sumahaddevi pravṛttaṁ tvadvināśanam।
rāmaṁ daśaratho rājā yauvarājye'bhiṣekṣyati॥
'देवि! तुम्हारे सौभाग्य के महान् विनाश का कार्य आरम्भ हो गया है, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है। कल महाराज दशरथ श्रीराम को युवराज के पद पर अभिषिक्त कर देंगे॥ २०॥
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sā'smyagādhe bhaye magnā duḥkhaśokasamanvitā।
dahyamānānaleneva tvaddhitārthamihāgatā॥
'यह समाचार पाकर मैं दुःख और शोक से व्याकुल हो अगाध भय के समुद्र में डूब गयी हूँ, चिन्ता की आग से मानो जली जा रही हूँ और तुम्हारे हित की बात बताने के लिये यहाँ आयी हूँ'॥ २१॥
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tava duḥkhena kaikeyi mama duḥkhaṁ mahadbhavet।
tvadvṛddhau mama vṛddhiśca bhavediha na saṁśayaḥ॥
'केकयनन्दिनि! यदि तुमपर कोई दुःख आया तो उससे मुझे भी बड़े भारी दुःख में पड़ना होगा। तुम्हारी उन्नति में ही मेरी भी उन्नति है, इसमें संशय नहीं है॥ २२॥
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narādhipakule jātā mahiṣī tvaṁ mahīpateḥ।
ugratvaṁ rājadharmāṇāṁ kathaṁ devi na budhyase॥
'देवि! तुम राजाओं के कुल में उत्पन्न हुई हो और एक महाराज की महारानी हो, फिर भी राजधर्मों की उग्रता को कैसे नहीं समझ रही हो?॥ २३॥
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dharmavādī śaṭho bhartā ślakṣṇavādī ca dāruṇaḥ।
śuddhabhāvena jānīṣe tenaivamatisaṁdhitā॥
'तुम्हारे स्वामी धर्म की बातें तो बहुत करते हैं, परंतु हैं बड़े शठ। मुँह से चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, परंतु हृदय के बड़े क्रूर हैं। तुम समझती हो कि वे सारी बातें शुद्ध भाव से ही कहते हैं, इसीलिये आज उनके द्वारा इस बेतरह ठगी गयी॥ २४॥
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upasthitaḥ prayuñjānastvayi sāntvamanarthakam।
arthenaivādya te bhartā kausalyāṁ yojayiṣyati॥
'तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ सान्त्वना देने के लिये यहाँ उपस्थित होते हैं, वे ही अब रानी कौसल्या को अर्थ से सम्पन्न करने जा रहे हैं॥ २५॥
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apavāhya tu duṣṭātmā bharataṁ tava bandhuṣu।
kālye sthāpayitā rāmaṁ rājye nihatakaṇṭakam॥
'उनका हृदय इतना दूषित है कि भरत को तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया और कल सबेरे ही अवध के निष्कण्टक राज्य पर वे श्रीराम का अभिषेक करेंगे॥ २६॥
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śatruḥ patipravādena mātreva hitakāmyayā।
āśīviṣa ivāṅkena bāle paridhṛtastvayā॥
'बाले! जैसे माता हित की कामना से पुत्र का पोषण करती है, उसी प्रकार 'पति' कहलानेवाले जिस व्यक्ति का तुमने पोषण किया, वह वास्तव में शत्रु निकला। जैसे कोई अज्ञानवश सर्प को अपनी गोद में लेकर उसका लालन करे, उसी प्रकार तुमने उन सर्पवत् बर्ताव करनेवाले महाराज को अपने अङ्क में स्थान दिया है॥ २७॥
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yathā hi rājñā śatrurvā sarpo vā pratyupekṣitaḥ।
rājñā daśarathenādya saputrā tvaṁ tathā kṛtā॥
'उपेक्षित शत्रु अथवा सर्प जैसा बर्ताव कर सकता है, राजा दशरथ ने आज पुत्रसहित तुझ कैकेयी के प्रति वैसा ही बर्ताव किया है॥ २८॥
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pāpenānṛtasāntvena bāle nityaṁ sukhocitā।
rāmaṁ sthāpayatā rājye sānubandhā hatā hyasi॥
'बाले! तुम सदा सुख भोगने के योग्य हो, परंतु मन में पाप (दुर्भावना) रखकर ऊपर से झूठी सान्त्वना देनेवाले महाराज ने श्रीराम को राज्य पर स्थापित करने का विचार करके आज सगे-सम्बन्धियोंसहित तुमको मानो मौत के मुख में डाल दिया है॥ २९॥
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sā prāptakālaṁ kaikeyi kṣipraṁ kuru hitaṁ tava।
trāyasva putramātmānaṁ māṁ ca vismayadarśane॥
'केकयराजकुमारी! तुम दुःखजनक बात सुनकर भी मेरी ओर इस तरह देख रही हो, मानो तुम्हें प्रसन्नता हुई हो और मेरी बातों से तुम्हें विस्मय हो रहा हो, परंतु यह विस्मय छोड़ो और जिसे करने का समय आ गया है, अपने उस हितकर कार्य को शीघ्र करो तथा ऐसा करके अपनी, अपने पुत्र की और मेरी भी रक्षा करो'॥ ३०॥
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mantharāyā vacaḥ śrutvā śayanātsā śubhānanā।
uttasthau harṣasampūrṇā candralekheva śāradī॥
मन्थरा की यह बात सुनकर सुन्दर मुखवाली कैकेयी सहसा शय्या से उठ बैठी। उसका हृदय हर्ष से भर गया। वह शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमण्डल की भाँति उद्दीप्त हो उठी॥ ३१॥
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atīva sā tu saṁtuṣṭā kaikeyī vismayānvitā।
divyābharaṇaṁ tasyai kubjāyai pradadau śubham॥
कैकेयी मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हुई। विस्मयविमुग्ध हो मुसकराते हुए उसने कुब्जा को पुरस्कार के रूप में एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण प्रदान किया॥ ३२॥
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dattvā tvābharaṇaṁ tasyai kubjāyai pramadottamā।
kaikeyī mantharāṁ hṛṣṭā punarevābravīdidam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
idaṁ tu manthare mahyamākhyātaṁ paramaṁ priyam।
etanme priyamākhyātuḥ kiṁ vā bhūyaḥ karomi te॥
कुब्जा को वह आभूषण देकर हर्ष से भरी हुई रमणीशिरोमणि कैकेयी ने पुनः मन्थरा से इस प्रकार कहा—'मन्थरे! यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया। तूने मेरे लिये यह प्रिय संवाद सुनाया, इसके लिये मैं तेरा और कौन-सा उपकार करूँ॥ ३३-३४॥
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rāme vā bharate vāhaṁ viśeṣaṁ nopalakṣaye।
tasmāttuṣṭāsmi yadrājā rāmaṁ rājye'bhiṣekṣyati॥
'मैं भी राम और भरत में कोई भेद नहीं समझती। अतः यह जानकर कि राजा श्रीराम का अभिषेक करनेवाले हैं, मुझे बड़ी खुशी हुई है॥ ३५॥
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na me paraṁ kiṁcidito'sti varaṁ punaḥ
priyaṁ priyārhe suvacaṁ vaco'mṛtam।
tathā hyavocastvamataḥ priyottaraṁ
varaṁ paraṁ te pradadāmi taṁ vṛṇu॥
'मन्थरे! तू मुझसे प्रिय वस्तु पाने के योग्य है। मेरे लिये श्रीराम के अभिषेकसम्बन्धी इस समाचार से बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृत के समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता। ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अतः अब जो प्रिय संवाद सुनाने के बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूँगी'॥ ३६॥
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥