वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६ · २८ श्लोकाःSarga 6 · 28 ślokas

सीतासहित श्रीरामका नियमपरायण होना, हर्षमें भरे पुरवासियोंद्वारा नगरकी सजावट, राजाके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा अयोध्यापुरीमें जनपदवासी मनुष्योंकी भीड़का एकत्र होना

॥ २ · ६ · १ ॥
गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः। सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्॥

gate purohite rāmaḥ snāto niyatamānasaḥ।
saha patnyā viśālākṣyā nārāyaṇamupāgamat॥

पुरोहितजी के चले जानेपर मनको संयम में रखनेवाले श्रीराम ने स्नान करके अपनी विशाललोचना पत्नी के साथ श्रीनारायण की उपासना आरम्भ की॥ १॥

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॥ २ · ६ · २ ॥
प्रगृह्य शिरसा पात्रीं हविषो विधिवत्ततः। महते दैवतायाश्च जुहाव ज्वलितानले॥

pragṛhya śirasā pātrīṁ haviṣo vidhivattataḥ।
mahate daivatāyāśca juhāva jvalitānale॥

उन्होंने हविष्य-पात्रको सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्नि में महान् देवता (शेषशायी नारायण) की प्रसन्नता के लिये विधिपूर्वक उस हविष्य की आहुति दी॥ २॥

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॥ २ · ६ · ३ ॥
शेषं हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम्। ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे॥

śeṣaṁ ca haviṣastasya prāśyāśāsyātmanaḥ priyam।
dhyāyannārāyaṇaṁ devaṁ svāstīrṇe kuśasaṁstare॥

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॥ २ · ६ · ४ ॥
वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः। श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः॥

vāgyataḥ saha vaidehyā bhūtvā niyatamānasaḥ।
śrīmatyāyatane viṣṇoḥ śiśye naravarātmajaḥ॥

॥ ३–४ ॥

तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथ की सिद्धि का संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञशेष हविष्य का भक्षण किया और मनको संयम में रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहनन्दिनी सीता के साथ भगवान् विष्णु के सुन्दर मन्दिर में श्रीनारायण देव का ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुश की चटाई पर सोये॥ ३-४॥

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॥ २ · ६ · ५ ॥
एकयामावशिष्टायां रात्र्यां प्रतिविबुध्य सः। अलंकारविधिं सम्यक् कारयामास वेश्मनः॥

ekayāmāvaśiṣṭāyāṁ rātryāṁ prativibudhya saḥ।
alaṁkāravidhiṁ samyak kārayāmāsa veśmanaḥ॥

जब तीन पहर बीतकर एक ही पहर रात शेष रह गयी, तब वे शयनसे उठ बैठे। उस समय उन्होंने सभामण्डपको सजाने के लिये सेवकोंको आज्ञा दी॥ ५॥

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॥ २ · ६ · ६ ॥
तत्र शृण्वन् सुखा वाचः सूतमागधवन्दिनाम्। पूर्वां संध्यामुपासीनो जजाप सुसमाहितः॥

tatra śṛṇvan sukhā vācaḥ sūtamāgadhavandinām।
pūrvāṁ saṁdhyāmupāsīno jajāpa susamāhitaḥ॥

वहाँ सूत, मागध और बंदियोंकी श्रवणसुखद वाणी सुनते हुए श्रीराम ने प्रातःकालिक संध्योपासना की; फिर एकाग्रचित्त होकर वे जप करने लगे॥ ६॥

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॥ २ · ६ · ७ ॥
तुष्टाव प्रणतश्चैव शिरसा मधुसूदनम्। विमलक्षौमसंवीतो वाचयामास द्विजान्॥

tuṣṭāva praṇataścaiva śirasā madhusūdanam।
vimalakṣaumasaṁvīto vācayāmāsa sa dvijān॥

तदनन्तर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए श्रीराम ने मस्तक झुकाकर भगवान् मधुसूदनको प्रणाम और उनका स्तवन किया; इसके बाद ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया॥ ७॥

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॥ २ · ६ · ८ ॥
तेषां पुण्याहघोषोऽथ गम्भीरमधुरस्तथा। अयोध्यां पूरयामास तूर्यघोषानुनादितः॥

teṣāṁ puṇyāhaghoṣo'tha gambhīramadhurastathā।
ayodhyāṁ pūrayāmāsa tūryaghoṣānunāditaḥ॥

उन ब्राह्मणोंका पुण्याहवाचनसम्बन्धी गम्भीर एवं मधुर घोष नाना प्रकार के वाद्योंकी ध्वनि से व्याप्त होकर सारी अयोध्यापुरी में फैल गया॥ ८॥

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॥ २ · ६ · ९ ॥
कृतोपवासं तु तदा वैदेह्या सह राघवम्। अयोध्यानिलयः श्रुत्वा सर्वः प्रमुदितो जनः॥

kṛtopavāsaṁ tu tadā vaidehyā saha rāghavam।
ayodhyānilayaḥ śrutvā sarvaḥ pramudito janaḥ॥

उस समय अयोध्यावासी मनुष्योंने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजी ने सीता के साथ उपवास-व्रत आरम्भ कर दिया है, तब उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ९॥

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॥ २ · ६ · १० ॥
ततः पौरजनः सर्वः श्रुत्वा रामाभिषेचनम्। प्रभातां रजनीं दृष्ट्वा चक्रे शोभयितुं पुरीम्॥

tataḥ paurajanaḥ sarvaḥ śrutvā rāmābhiṣecanam।
prabhātāṁ rajanīṁ dṛṣṭvā cakre śobhayituṁ purīm॥

सबेरा होनेपर श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अयोध्यापुरीको सजाने में लग गये॥ १०॥

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॥ २ · ६ · ११ ॥
सिताभ्रशिखराभेषु देवतायतनेषु च। चतुष्पथेषु रथ्यासु चैत्येष्वट्टालकेषु च॥

sitābhraśikharābheṣu devatāyataneṣu ca।
catuṣpatheṣu rathyāsu caityeṣvaṭṭālakeṣu ca॥

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॥ २ · ६ · १२ ॥
नानापण्यसमृद्धेषु वणिजामापणेषु च। कुटुम्बिनां समृद्धेषु श्रीमत्सु भवनेषु च॥

nānāpaṇyasamṛddheṣu vaṇijāmāpaṇeṣu ca।
kuṭumbināṁ samṛddheṣu śrīmatsu bhavaneṣu ca॥

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॥ २ · ६ · १३ ॥
सभासु चैव सर्वासु वृक्षेष्वालक्षितेषु च। ध्वजाः समुच्छ्रिताः साधु पताकाश्चाभवंस्तथा॥

sabhāsu caiva sarvāsu vṛkṣeṣvālakṣiteṣu ca।
dhvajāḥ samucchritāḥ sādhu patākāścābhavaṁstathā॥

॥ ११–१३ ॥

जिनके शिखरोंपर श्वेत बादल विश्राम करते हैं, उन पर्वतोंके समान गगनचुम्बी देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, देववृक्षों, समस्त सभाओं, अट्टालिकाओं, नाना प्रकार की बेचनेयोग्य वस्तुओंसे भरी हुई व्यापारियोंकी बड़ी-बड़ी दूकानों तथा कुटुम्बी गृहस्थोंके सुन्दर समृद्धिशाली भवनों में और दूरसे दिखायी देनेवाले वृक्षोंपर भी ऊँची ध्वजाएँ लगायी गयीं और उनमें पताकाएँ फहरायी गयीं॥ ११-१३॥

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॥ २ · ६ · १४ ॥
नटनर्तकसङ्घानां गायकानां गायताम्। मनःकर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः॥

naṭanartakasaṅghānāṁ gāyakānāṁ ca gāyatām।
manaḥkarṇasukhā vācaḥ śuśrāva janatā tataḥ॥

उस समय वहाँकी जनता सब ओर नटों और नर्तकोंके समूहों तथा गानेवाले गायकोंकी मन और कानोंको सुख देनेवाली वाणी सुनती थी॥ १४॥

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॥ २ · ६ · १५ ॥
रामाभिषेकयुक्ताश्च कथाश्चक्रुर्मिथो जनाः। रामाभिषेके सम्प्राप्ते चत्वरेषु गृहेषु च॥

rāmābhiṣekayuktāśca kathāścakrurmitho janāḥ।
rāmābhiṣeke samprāpte catvareṣu gṛheṣu ca॥

श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ अवसर प्राप्त होनेपर प्रायः सब लोग चौराहोंपर और घरों में भी आपस में श्रीराम के राज्याभिषेक की ही चर्चा करते थे॥ १५॥

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॥ २ · ६ · १६ ॥
बाला अपि क्रीडमाना गृहद्वारेषु सङ्घशः। रामाभिषवसंयुक्ताश्चक्रुरेव कथा मिथः॥

bālā api krīḍamānā gṛhadvāreṣu saṅghaśaḥ।
rāmābhiṣavasaṁyuktāścakrureva kathā mithaḥ॥

घरोंके दरवाजोंपर खेलते हुए झुंड-के-झुंड बालक भी आपस में श्रीराम के राज्याभिषेक की ही बातें करते थे॥ १६॥

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॥ २ · ६ · १७ ॥
कृतपुष्पोपहारश्च धूपगन्धाधिवासितः। राजमार्गः कृतः श्रीमान् पौरै रामाभिषेचने॥

kṛtapuṣpopahāraśca dhūpagandhādhivāsitaḥ।
rājamārgaḥ kṛtaḥ śrīmān paurai rāmābhiṣecane॥

पुरवासियोंने श्रीराम के राज्याभिषेक के समय राजमार्ग पर फूलोंकी भेंट चढ़ाकर वहाँ सब ओर धूप की सुगन्ध फैला दी; ऐसा करके उन्होंने राजमार्गको बहुत सुन्दर बना दिया॥ १७॥

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॥ २ · ६ · १८ ॥
प्रकाशकरणार्थं निशागमनशङ्कया। दीपवृक्षांस्तथा चक्रुरनुरथ्यासु सर्वशः॥

prakāśakaraṇārthaṁ ca niśāgamanaśaṅkayā।
dīpavṛkṣāṁstathā cakruranurathyāsu sarvaśaḥ॥

राज्याभिषेक होते-होते रात हो जाने की आशङ्का से प्रकाश की व्यवस्था करने के लिये पुरवासियोंने सब ओर सड़कोंके दोनों तरफ वृक्ष की भाँति अनेक शाखाओंसे युक्त दीपस्तम्भ खड़े कर दिये॥ १८॥

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॥ २ · ६ · १९ ॥
अलंकारं पुरस्यैवं कृत्वा तत् पुरवासिनः। आकांक्षमाणा रामस्य यौवराज्याभिषेचनम्॥

alaṁkāraṁ purasyaivaṁ kṛtvā tat puravāsinaḥ।
ākāṁkṣamāṇā rāmasya yauvarājyābhiṣecanam॥

इस प्रकार नगरको सजाकर श्रीराम के युवराजपद पर अभिषेक की अभिलाषा रखनेवाले समस्त पुरवासी॥ १९॥

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॥ २ · ६ · २० ॥
समेत्य सङ्घशः सर्वे चत्वरेषु सभासु च। कथयन्तो मिथस्तत्र प्रशशंसुर्जनाधिपम्॥

sametya saṅghaśaḥ sarve catvareṣu sabhāsu ca।
kathayanto mithastatra praśaśaṁsurjanādhipam॥

चौराहों और सभाओं में झुंड-के-झुंड एकत्र हो वहाँ परस्पर बातें करते हुए महाराज दशरथ की प्रशंसा करने लगे—॥ २०॥

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॥ २ · ६ · २१ ॥
अहो महात्मा राजायमिक्ष्वाकुकुलनन्दनः। ज्ञात्वा वृद्धं स्वमात्मानं रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति॥

aho mahātmā rājāyamikṣvākukulanandanaḥ।
jñātvā vṛddhaṁ svamātmānaṁ rāmaṁ rājye'bhiṣekṣyati॥

'अहो! इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले ये राजा दशरथ बड़े महात्मा हैं, जो कि अपने-आपको बूढ़ा हुआ जानकर श्रीराम का राज्याभिषेक करने जा रहे हैं॥ २१॥

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॥ २ · ६ · २२ ॥
सर्वे ह्यनुगृहीताः स्म यन्नो रामो महीपतिः। चिराय भविता गोप्ता दृष्टलोकपरावरः॥

sarve hyanugṛhītāḥ sma yanno rāmo mahīpatiḥ।
cirāya bhavitā goptā dṛṣṭalokaparāvaraḥ॥

भगवान् का हम सब लोगोंपर बड़ा अनुग्रह है कि श्रीरामचन्द्रजी हमारे राजा होंगे और चिरकालतक हमारी रक्षा करते रहेंगे; क्योंकि वे समस्त लोकोंके निवासियों में जो भलाई या बुराई है, उसे अच्छी तरह देख चुके हैं॥ २२॥

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॥ २ · ६ · २३ ॥
अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सलः। यथा भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघवः॥

anuddhatamanā vidvān dharmātmā bhrātṛvatsalaḥ।
yathā ca bhrātṛṣu snigdhastathāsmāsvapi rāghavaḥ॥

श्रीराम का मन कभी उद्धत नहीं होता। वे विद्वान्, धर्मात्मा और अपने भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले हैं। उनका अपने भाइयोंपर जैसा स्नेह है, वैसा ही हमलोगोंपर भी है॥ २३॥

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॥ २ · ६ · २४ ॥
चिरं जीवतु धर्मात्मा राजा दशरथोऽनघः। यत्प्रसादेनाभिषिक्तं रामं द्रक्ष्यामहे वयम्॥

ciraṁ jīvatu dharmātmā rājā daśaratho'naghaḥ।
yatprasādenābhiṣiktaṁ rāmaṁ drakṣyāmahe vayam॥

धर्मात्मा एवं निष्पाप राजा दशरथ चिरकालतक जीवित रहें, जिनके प्रसाद से हमें श्रीराम के राज्याभिषेक का दर्शन सुलभ होगा'॥ २४॥

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॥ २ · ६ · २५ ॥
एवंविधं कथयतां पौराणां शुश्रुवुः परे। दिग्भ्यो विश्रुतवृत्तान्ताः प्राप्ता जानपदा जनाः॥

evaṁvidhaṁ kathayatāṁ paurāṇāṁ śuśruvuḥ pare।
digbhyo viśrutavṛttāntāḥ prāptā jānapadā janāḥ॥

अभिषेक का वृत्तान्त सुनकर नाना दिशाओंसे उस जनपद के लोग भी वहाँ पहुँचे थे, उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पुरवासियोंकी सभी बातें सुनीं॥ २५॥

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॥ २ · ६ · २६ ॥
ते तु दिग्भ्यः पुरीं प्राप्ता द्रष्टुं रामाभिषेचनम्। रामस्य पूरयामासुः पुरीं जानपदा जनाः॥

te tu digbhyaḥ purīṁ prāptā draṣṭuṁ rāmābhiṣecanam।
rāmasya pūrayāmāsuḥ purīṁ jānapadā janāḥ॥

वे सब-के-सब श्रीराम का राज्याभिषेक देखने के लिये अनेक दिशाओंसे अयोध्यापुरी में आये थे। उन जनपदनिवासी मनुष्योंने श्रीरामपुरीको अपनी उपस्थिति से भर दिया था॥ २६॥

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॥ २ · ६ · २७ ॥
जनौघैस्तैर्विसर्पद्भिः शुश्रुवे तत्र निःस्वनः। पर्वसूदीर्णवेगस्य सागरस्येव निःस्वनः॥

janaughaistairvisarpadbhiḥ śuśruve tatra niḥsvanaḥ।
parvasūdīrṇavegasya sāgarasyeva niḥsvanaḥ॥

वहाँ मनुष्योंकी भीड़-भाड़ बढ़नेसे जो जनरव सुनायी देता था, वह पर्वोके दिन बढ़े हुए वेगवाले महासागर की गर्जना के समान जान पड़ता था॥ २७॥

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॥ २ · ६ · २८ ॥
ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं दिदृक्षुभिर्जानपदैरूपाहितैः। समन्ततः सस्वनमाकुलं बभौ समुद्र्यादोभिरिवार्णवोदकम्॥

tatastadindrakṣayasaṁnibhaṁ puraṁ
didṛkṣubhirjānapadairūpāhitaiḥ।
samantataḥ sasvanamākulaṁ babhau
samudryādobhirivārṇavodakam॥

उस समय श्रीराम के अभिषेक का उत्सव देखने के लिये पधारे हुए जनपदवासी मनुष्योंद्वारा सब ओर से भरा हुआ वह इन्द्रपुरी के समान नगर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण होने के कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल-जन्तुओंसे परिपूर्ण महासागर के समान प्रतीत होता था॥ २८॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥