वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ५ · २६ श्लोकाःSarga 5 · 26 ślokas

राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सीतासहित श्रीरामको उपवासव्रतकी दीक्षा देकर आना और राजाको इस समाचारसे अवगत कराना; राजाका अन्तःपुरमें प्रवेश

॥ २ · ५ · १ ॥
संदिश्य रामं नृपतिः श्वोभाविन्यभिषेचने। पुरोहितं समाहूय वसिष्ठमिदमब्रवीत्‌॥

saṁdiśya rāmaṁ nṛpatiḥ śvobhāvinyabhiṣecane।
purohitaṁ samāhūya vasiṣṭhamidamabravīt‌॥

उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजी को दूसरे दिन होनेवाले अभिषेक के विषय में आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वसिष्ठजी को बुलाकर बोले-॥ १॥

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॥ २ · ५ · २ ॥
गच्छोपवासं काकुत्स्थं कारयाद्य तपोधन। श्रेयसे राज्यलाभाय वध्वा सह यतव्रत॥

gacchopavāsaṁ kākutsthaṁ kārayādya tapodhana।
śreyase rājyalābhāya vadhvā saha yatavrata॥

नियमपूर्वक व्रत का पालन करनेवाले तपोधन! आप जाइये और विघ्ननिवारणरूप कल्याण की सिद्धि तथा राज्य की प्राप्ति के लिये बहूसहित श्रीराम से उपवासव्रत का पालन कराइये'॥ २॥

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॥ २ · ५ · ३ ॥
तथेति राजानमुक्त्वा वेदविदां वरः। स्वयं वसिष्ठो भगवान्‌ ययौ रामनिवेशनम्‌॥

tatheti ca sa rājānamuktvā vedavidāṁ varaḥ।
svayaṁ vasiṣṭho bhagavān‌ yayau rāmaniveśanam‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५ · ४ ॥
उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम्‌। ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रतः॥

upavāsayituṁ vīraṁ mantravinmantrakovidam‌।
brāhmaṁ rathavaraṁ yuktamāsthāya sudhṛtavrataḥ॥

॥ ३–४ ॥

तब राजा से 'तथास्तु' कहकर वेदवेत्ता विद्वानों में श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान्‌ वसिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीराम को उपवास-व्रत की दीक्षा देने के लिये ब्राह्मण के चढ़नेयोग्य जुते-जुताये श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ हो श्रीराम के महल की ओर चल दिये॥ ३-४॥

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॥ २ · ५ · ५ ॥
रामभवनं प्राप्य पाण्डुराभ्रघनप्रभम्‌। तिस्रः कक्ष्या रथेनैव विवेश मुनिसत्तमः॥

sa rāmabhavanaṁ prāpya pāṇḍurābhraghanaprabham‌।
tisraḥ kakṣyā rathenaiva viveśa munisattamaḥ॥

श्रीराम का भवन श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल था, उसके पास पहुँचकर मुनिवर वसिष्ठने उसकी तीन ड्योढ़ियों में रथ के द्वारा ही प्रवेश किया॥ ५॥

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॥ २ · ५ · ६ ॥
तमागतमृषिं रामस्त्वरन्निव ससम्भ्रमम्‌। मानयिष्यन्‌ मानार्हं निश्चक्राम निवेशनात्‌॥

tamāgatamṛṣiṁ rāmastvaranniva sasambhramam‌।
mānayiṣyan‌ sa mānārhaṁ niścakrāma niveśanāt‌॥

वहाँ पधारे हुए उन सम्माननीय महर्षि का सम्मान करने के लिये श्रीरामचन्द्रजी बड़ी उतावली के साथ वेगपूर्वक घर से बाहर निकले॥ ६॥

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॥ २ · ५ · ७ ॥
अभ्येत्य त्वरमाणोऽथ रथाभ्याशं मनीषिणः। ततोऽवतारयामास परिगृह्य रथात्‌ स्वयम्‌॥

abhyetya tvaramāṇo'tha rathābhyāśaṁ manīṣiṇaḥ।
tato'vatārayāmāsa parigṛhya rathāt‌ svayam‌॥

उन मनीषी महर्षि के रथ के समीप शीघ्रतापूर्वक जाकर श्रीराम ने स्वयं उनका हाथ पकड़कर उन्हें रथ से नीचे उतारा॥ ७॥

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॥ २ · ५ · ८ ॥
चैनं प्रश्रितं दृष्ट्वा सम्भाष्याभिप्रसाद्य च। प्रियार्हं हर्षयन्‌ राममित्युवाच पुरोहितः॥

sa cainaṁ praśritaṁ dṛṣṭvā sambhāṣyābhiprasādya ca।
priyārhaṁ harṣayan‌ rāmamityuvāca purohitaḥ॥

श्रीराम प्रिय वचन सुनने के योग्य थे। उन्हें इतना विनीत देखकर पुरोहितजी ने 'वत्स!' कहकर पुकारा और उन्हें प्रसन्न करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा-॥ ८॥

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॥ २ · ५ · ९ ॥
प्रसन्नस्ते पिता राम यत्त्वं राज्यमवाप्स्यसि। उपवासं भवानद्य करोतु सह सीतया॥

prasannaste pitā rāma yattvaṁ rājyamavāpsyasi।
upavāsaṁ bhavānadya karotu saha sītayā॥

श्रीराम! तुम्हारे पिता तुम पर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हें उन से राज्य प्राप्त होगा; अतः आज की रात में तुम वधू सीता के साथ उपवास करो॥ ९॥

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॥ २ · ५ · १० ॥
प्रातस्त्वामभिषेक्ता हि यौवराज्ये नराधिपः। पिता दशरथः प्रीत्या ययातिं नहुषो यथा॥

prātastvāmabhiṣektā hi yauvarājye narādhipaḥ।
pitā daśarathaḥ prītyā yayātiṁ nahuṣo yathā॥

रघुनन्दन! जैसे नहुष ने ययाति का अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रातःकाल बड़े प्रेम से तुम्हारा युवराज-पद पर अभिषेक करेंगे'॥ १०॥

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॥ २ · ५ · ११ ॥
इत्युक्त्वा तदा राममुपवासं यतव्रतः। मन्त्रवत्‌ कारयामास वैदेह्या सहितं शुचिः॥

ityuktvā sa tadā rāmamupavāsaṁ yatavrataḥ।
mantravat‌ kārayāmāsa vaidehyā sahitaṁ śuciḥ॥

ऐसा कहकर उन व्रतधारी एवं पवित्र महर्षि ने मन्त्रोच्चारणपूर्वक सीतासहित श्रीराम को उस समय उपवास-व्रत की दीक्षा दी॥ ११॥

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॥ २ · ५ · १२ ॥
ततो यथावद्‌ रामेण राज्ञो गुरुरर्चितः। अभ्यनुज्ञाप्य काकुत्स्थं ययौ रामनिवेशनात्‌॥

tato yathāvad‌ rāmeṇa sa rājño gururarcitaḥ।
abhyanujñāpya kākutsthaṁ yayau rāmaniveśanāt‌॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने महाराज के भी गुरु वसिष्ठ का यथावत्‌ पूजन किया; फिर वे मुनि श्रीराम की अनुमति ले उनके महल से बाहर निकले॥ १२॥

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॥ २ · ५ · १३ ॥
सुहृद्भिस्तत्र रामोऽपि सहासीनः प्रियंवदैः। सभाजितो विवेशाथ ताननुज्ञाप्य सर्वशः॥

suhṛdbhistatra rāmo'pi sahāsīnaḥ priyaṁvadaiḥ।
sabhājito viveśātha tānanujñāpya sarvaśaḥ॥

श्रीराम भी वहाँ प्रियवचन बोलनेवाले सुहृदों के साथ कुछ देरतक बैठे रहे; फिर उनसे सम्मानित हो उन सबकी अनुमति ले पुनः अपने महल के भीतर चले गये॥ १३॥

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॥ २ · ५ · १४ ॥
हृष्टनारीनरयुतं रामवेश्म तदा बभौ। यथा मत्तद्विजगणं प्रफुल्लनलिनं सरः॥

hṛṣṭanārīnarayutaṁ rāmaveśma tadā babhau।
yathā mattadvijagaṇaṁ praphullanalinaṁ saraḥ॥

उस समय श्रीराम का भवन हर्षोत्फुल्ल नर-नारियों से भरा हुआ था और मतवाले पक्षियों के कलरवों से युक्त खिले हुए कमलवाले तालाब के समान शोभा पा रहा था॥ १४॥

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॥ २ · ५ · १५ ॥
राजभवनप्रख्यात्‌ तस्माद्‌ रामनिवेशनात्‌। निर्गत्य ददृशे मार्गं वसिष्ठो जनसंवृतम्‌॥

sa rājabhavanaprakhyāt‌ tasmād‌ rāmaniveśanāt‌।
nirgatya dadṛśe mārgaṁ vasiṣṭho janasaṁvṛtam‌॥

राजभवनों में श्रेष्ठ श्रीराम के महल से बाहर आकर वसिष्ठजी ने सारे मार्ग मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए देखे॥ १५॥

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॥ २ · ५ · १६ ॥
वृन्दवृन्दैरयोध्यायां राजमार्गाः समन्ततः। बभूवुरभिसम्बाधाः कुतूहलजनैर्वृताः॥

vṛndavṛndairayodhyāyāṁ rājamārgāḥ samantataḥ।
babhūvurabhisambādhāḥ kutūhalajanairvṛtāḥ॥

अयोध्या की सड़कों पर सब ओर झुंड-के-झुंड मनुष्य, जो श्रीराम का राज्याभिषेक देखने के लिये उत्सुक थे, खचाखच भरे हुए थे; सारे राजमार्ग उनसे घिरे हुए थे॥ १६॥

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॥ २ · ५ · १७ ॥
जनवृन्दोर्मिसंघर्षहर्षस्वनवृतस्तदा। बभूव राजमार्गस्य सागरस्येव निःस्वनः॥

janavṛndormisaṁgharṣaharṣasvanavṛtastadā।
babhūva rājamārgasya sāgarasyeva niḥsvanaḥ॥

जनसमुदायरूपी लहरों के परस्पर टकराने से उस समय जो हर्षध्वनि प्रकट होती थी, उससे व्याप्त हुआ राजमार्ग का कोलाहल समुद्र की गर्जना की भाँति सुनायी देता था॥ १७॥

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॥ २ · ५ · १८ ॥
सिक्तसम्मृष्टरथ्या हि तथा वनमालिनी। आसीदयोध्या तदहः समुच्छ्रितगृहध्वजा॥

siktasammṛṣṭarathyā hi tathā ca vanamālinī।
āsīdayodhyā tadahaḥ samucchritagṛhadhvajā॥

उस दिन वन और उपवनों की पंक्तियों से सुशोभित हुई अयोध्यापुरी के घर-घर में ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं; वहाँ की सभी गलियों और सड़कों को झाड़बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था॥ १८॥

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॥ २ · ५ · १९ ॥
तदा ह्ययोध्यानिलयः सस्त्रीबालाकुलो जनः। रामाभिषेकमाकांक्षन्नाकांक्षन्नुदयं रवेः॥

tadā hyayodhyānilayaḥ sastrībālākulo janaḥ।
rāmābhiṣekamākāṁkṣannākāṁkṣannudayaṁ raveḥ॥

स्त्रियों और बालकोंसहित अयोध्यावासी जनसमुदाय श्रीराम के राज्याभिषेक को देखने की इच्छा से उस समय शीघ्र सूर्योदय होने की कामना कर रहा था॥ १९॥

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॥ २ · ५ · २० ॥
प्रजालंकारभूतं जनस्यानन्दवर्धनम्‌। उत्सुकोऽभूज्जनो द्रष्टुं तमयोध्यामहोत्सवम्‌॥

prajālaṁkārabhūtaṁ ca janasyānandavardhanam‌।
utsuko'bhūjjano draṣṭuṁ tamayodhyāmahotsavam‌॥

अयोध्या का वह महान्‌ उत्सव प्रजाओं के लिये अलंकाररूप और सब लोगों के आनन्द को बढ़ानेवाला था; वहाँ के सभी मनुष्य उसे देखने के लिये उत्कण्ठित हो रहे थे॥ २०॥

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॥ २ · ५ · २१ ॥
एवं तज्जनसम्बाधं राजमार्गं पुरोहितः। व्यूहन्निव जनौघं तं शनै राजकुलं ययौ॥

evaṁ tajjanasambādhaṁ rājamārgaṁ purohitaḥ।
vyūhanniva janaughaṁ taṁ śanai rājakulaṁ yayau॥

इस प्रकार मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्ग पर पहुँचकर पुरोहितजी उस जनसमूह को एक ओर करते हुए-से धीरे-धीरे राजमहल की ओर गये॥ २१॥

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॥ २ · ५ · २२ ॥
सिताभ्रशिखरप्रख्यं प्रासादमधिरुह्य च। समीयाय नरेन्द्रेण शक्रेणेव बृहस्पतिः॥

sitābhraśikharaprakhyaṁ prāsādamadhiruhya ca।
samīyāya narendreṇa śakreṇeva bṛhaspatiḥ॥

श्वेत जलद-खण्ड के समान सुशोभित होनेवाले महल के ऊपर चढ़कर वसिष्ठजी राजा दशरथ से उसी प्रकार मिले, जैसे बृहस्पति देवराज इन्द्र से मिल रहे हों॥ २२॥

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॥ २ · ५ · २३ ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य हित्वा राजासनं नृपः। पप्रच्छ स्वमतं तस्मै कृतमित्यभिवेदयत्‌॥

tamāgatamabhiprekṣya hitvā rājāsanaṁ nṛpaḥ।
papraccha svamataṁ tasmai kṛtamityabhivedayat‌॥

उन्हें आया देख राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और पूछने लगे-'मुने! क्या आपने मेरा अभिप्राय सिद्ध किया।' वसिष्ठजी ने उत्तर दिया-'हाँ! कर दिया'॥ २३॥

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॥ २ · ५ · २४ ॥
तेन चैव तदा तुल्यं सहासीनाः सभासदः। आसनेभ्यः समुत्तस्थुः पूजयन्तः पुरोहितम्‌॥

tena caiva tadā tulyaṁ sahāsīnāḥ sabhāsadaḥ।
āsanebhyaḥ samuttasthuḥ pūjayantaḥ purohitam‌॥

उनके साथ ही उस समय वहाँ बैठे हुए अन्य सभासद्‌ भी पुरोहित का समादर करते हुए अपने-अपने आसनों से उठकर खड़े हो गये॥ २४॥

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॥ २ · ५ · २५ ॥
गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातो मनुजौघं विसृज्य तम्‌। विवेशान्तःपुरं राजा सिंहो गिरिगुहामिव॥

guruṇā tvabhyanujñāto manujaughaṁ visṛjya tam‌।
viveśāntaḥpuraṁ rājā siṁho giriguhāmiva॥

तदनन्तर गुरुजी की आज्ञा ले राजा दशरथ ने उस जनसमुदाय को विदा करके पर्वत की कन्दरा में घुसनेवाले सिंह के समान अपने अन्तःपुर में प्रवेश किया॥ २५॥

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॥ २ · ५ · २६ ॥
तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम्‌। व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिवः शशीव तारागणसंकुलं नभः॥

tadagryaveṣapramadājanākulaṁ mahendraveśmapratimaṁ niveśanam‌।
vyadīpayaṁścāru viveśa pārthivaḥ śaśīva tārāgaṇasaṁkulaṁ nabhaḥ॥

सुन्दर वेश-भूषा धारण करनेवाली सुन्दरियों से भरे हुए इन्द्रसदन के समान उस मनोहर राजभवन को अपनी शोभा से प्रकाशित करते हुए राजा दशरथ ने उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे चन्द्रमा ताराओं से भरे हुए आकाश में पदार्पण करते हैं॥ २६॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥