वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८५ · २२ श्लोकाःSarga 85 · 22 ślokas

गुह और भरतकी बातचीत तथा भरतका शोक

गुह-भरत मिलन

“गुह-भरत मिलन”
॥ २ · ८५ · ९–२२ ॥

गङ्गातटे मयूरपिच्छमुकुटधरो निषादाधिपतिर्गुहः शोकार्तं श्वेताम्बरं राजकुमारं भरतं बाहुभ्यां परिगृह्य सस्नेहं समाश्वासयति; पृष्ठतो निषादनौकाः सलिले तरन्ति।

गङ्गाके तट पर मोरपंखका मुकुट, मणि-मालाएँ और मृगचर्म धारण किये धनुर्धर निषादराज गुह अपने दोनों हाथोंसे शोक-विह्वल भरतकी भुजाएँ थामे उन्हें सस्नेह सान्त्वना दे रहे हैं; श्वेत शोक-वस्त्रमें लिपटे राजकुमार भरत नेत्र झुकाये, भाई श्रीरामके वियोगमें डूबे खड़े हैं; पीछे नदीमें निषाद मल्लाहोंकी नावें तैर रही हैं।

On the bank of the Ganga, the Nishad king Guha — crowned with a peacock-feather band, hung with bead and peacock necklaces, clad in animal skin with his bow and quiver — clasps the arms of the grief-worn prince Bharat and consoles him with warm affection; wrapped in a plain white mourner's cloth, his eyes lowered, Bharat stands sunk in sorrow for his exiled brother Ram, while behind them Nishad boatmen drift on the river.

॥ २ · ८५ · १ ॥
एवमुक्तस्तु भरतो निषादाधिपतिं गुहम्। प्रत्युवाच महाप्राज्ञो वाक्यं हेत्वर्थसंहितम्

evamuktastu bharato niṣādādhipatiṁ guham।
pratyuvāca mahāprājño vākyaṁ hetvarthasaṁhitam ॥

(निषादराज गुह के) ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् भरत ने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनों में उसे इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ २ · ८५ · २ ॥
ऊर्जितः खलु ते कामः कृतो मम गुरोः सखे। यो मे त्वमीदृशीं सेनामभ्यर्चयितुमिच्छसि

ūrjitaḥ khalu te kāmaḥ kṛto mama guroḥ sakhe।
yo me tvamīdṛśīṁ senāmabhyarcayitumicchasi ॥

‘भैया! तुम मेरे बड़े भाई श्रीराम के सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेना का सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो—तुम्हारी श्रद्धा से ही हम सब लोगों का सत्कार हो गया’

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॥ २ · ८५ · ३ ॥
इत्युक्त्वा महातेजा गुहं वचनमुत्तमम्। अब्रवीद् भरतः श्रीमान् पन्थानं दर्शयन् पुनः

ityuktvā sa mahātejā guhaṁ vacanamuttamam।
abravīd bharataḥ śrīmān panthānaṁ darśayan punaḥ ॥

यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरत ने गन्तव्य मार्ग को हाथ के संकेत से दिखाते हुए पुनः गुह से उत्तम वाणी में पूछा—

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॥ २ · ८५ · ४ ॥
कतरेण गमिष्यामि भरद्वाजाश्रमं यथा। गहनोऽयं भृशं देशो गङ्गानूपो दुरत्ययः

katareṇa gamiṣyāmi bharadvājāśramaṁ yathā।
gahano'yaṁ bhṛśaṁ deśo gaṅgānūpo duratyayaḥ ॥

‘निषादराज! इन दो मार्गों में से किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनि के आश्रम पर जाना होगा? गङ्गा के किनारे का यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है’

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॥ २ · ८५ · ५ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः। अब्रवीत् प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो गहनगोचरः

tasya tad vacanaṁ śrutvā rājaputrasya dhīmataḥ।
abravīt prāñjalirbhūtvā guho gahanagocaraḥ ॥

बुद्धिमान् राजकुमार भरत का यह वचन सुनकर वन में विचरनेवाले गुह ने हाथ जोड़कर कहा—

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॥ २ · ८५ · ६ ॥
दाशास्त्वनुगमिष्यन्ति देशज्ञः सुसमाहिताः। अहं चानुगमिष्यामि राजपुत्र महाबल

dāśāstvanugamiṣyanti deśajñaḥ susamāhitāḥ।
ahaṁ cānugamiṣyāmi rājaputra mahābala ॥

‘महाबली राजकुमार! आपके साथ बहुत-से मल्लाह जायेंगे, जो इस प्रदेश से पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहनेवाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा

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॥ २ · ८५ · ७ ॥
कच्चिन्न दुष्टो व्रजसि रामस्याक्लिष्टकर्मणः। इयं ते महती सेना शङ्कां जनयतीव मे

kaccinna duṣṭo vrajasi rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ।
iyaṁ te mahatī senā śaṅkāṁ janayatīva me ॥

‘परन्तु एक बात बताइये, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी के प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मन में शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है’

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॥ २ · ८५ · ८ ॥
तमेवमभिभाषन्तमाकाश इव निर्मलः। भरतः श्लक्ष्णया वाचा गुहं वचनमब्रवीत्

tamevamabhibhāṣantamākāśa iva nirmalaḥ।
bharataḥ ślakṣṇayā vācā guhaṁ vacanamabravīt ॥

ऐसी बात कहते हुए गुह से आकाश के समान निर्मल भरत ने मधुर वाणी में कहा—

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॥ २ · ८५ · ९ ॥
मा भूत् कालो यत् कष्टं मां शङ्कितुमर्हसि। राघवः हि मे भ्राता ज्येष्ठः पितृसमो मतः

mā bhūt sa kālo yat kaṣṭaṁ na māṁ śaṅkitumarhasi।
rāghavaḥ sa hi me bhrātā jyeṣṭhaḥ pitṛsamo mataḥ ॥

‘निषादराज! ऐसा समय कभी न आये। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिता के समान मानता हूँ

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॥ २ · ८५ · १० ॥
तं निवर्तयितुं यामि काकुत्स्थं वनवासिनम्। बुद्धिरन्या मे कार्या गुह सत्यं ब्रवीमि ते

taṁ nivartayituṁ yāmi kākutsthaṁ vanavāsinam।
buddhiranyā na me kāryā guha satyaṁ bravīmi te ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वन में निवास करते हैं, अतः उन्हें लौटा लाने के लिये जा रहा हूँ। गुह! मैं तुमसे सच कहता हूँ। तुम्हें मेरे विषय में कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’

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॥ २ · ८५ · ११ ॥
तु संहृष्टवदनः श्रुत्वा भरतभाषितम्। पुनरेवाब्रवीद् वाक्यं भरतं प्रति हर्षितः

sa tu saṁhṛṣṭavadanaḥ śrutvā bharatabhāṣitam।
punarevābravīd vākyaṁ bharataṁ prati harṣitaḥ ॥

भरत की बात सुनकर निषादराज का मुँह प्रसन्नता से खिल उठा। वह हर्ष से भरकर पुनः भरत से बोला—

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॥ २ · ८५ · १२ ॥
धन्यस्त्वं त्वया तुल्यं पश्यामि जगतीतले। अयत्नादागतं राज्यं यस्त्वं त्यक्तुमिहेच्छसि

dhanyastvaṁ na tvayā tulyaṁ paśyāmi jagatītale।
ayatnādāgataṁ rājyaṁ yastvaṁ tyaktumihecchasi ॥

‘आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्न के हाथ में आये हुए राज्य को त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डल में कोई नहीं दिखायी देता

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॥ २ · ८५ · १३ ॥
शाश्वती खलु ते कीर्तिर्लोकाननु चरिष्यति। यस्त्वं कृच्छ्रगतं रामं प्रत्यानयितुमिच्छसि

śāśvatī khalu te kīrtirlokānanu cariṣyati।
yastvaṁ kṛcchragataṁ rāmaṁ pratyānayitumicchasi ॥

‘कष्टप्रद वन में निवास करनेवाले श्रीराम को जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इससे समस्त लोकों में आपकी अक्षय कीर्ति का प्रसार होगा’

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॥ २ · ८५ · १४ ॥
एवं सम्भाषमाणस्य गुहस्य भरतं तदा। बभौ नष्टप्रभः सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत

evaṁ sambhāṣamāṇasya guhasya bharataṁ tadā।
babhau naṣṭaprabhaḥ sūryo rajanī cābhyavartata ॥

जब गुह भरत से इस प्रकार की बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेव की प्रभा अदृश्य हो गयी और रात का अन्धकार सब ओर फैल गया

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॥ २ · ८५ · १५ ॥
संनिवेश्य तां सेनां गुहेन परितोषितः। शत्रुघ्नेन समं श्रीमाञ्छयनं पुनरागमत्

saṁniveśya sa tāṁ senāṁ guhena paritoṣitaḥ।
śatrughnena samaṁ śrīmāñchayanaṁ punarāgamat ॥

गुह के बर्ताव से श्रीमान् भरत को बड़ा संतोष हुआ और वे सेना को विश्राम करने की आज्ञा दे शत्रुघ्न के साथ शयन करने के लिये गये

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॥ २ · ८५ · १६ ॥
रामचिन्तामयः शोको भरतस्य महात्मनः। उपस्थितो ह्यनर्हस्य धर्मप्रेक्षस्य तादृशः

rāmacintāmayaḥ śoko bharatasya mahātmanaḥ।
upasthito hyanarhasya dharmaprekṣasya tādṛśaḥ ॥

धर्म पर दृष्टि रखनेवाले महात्मा भरत शोक के योग्य नहीं थे तथापि उनके मन में श्रीरामचन्द्रजी के लिये चिन्ता के कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता

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॥ २ · ८५ · १७ ॥
अन्तर्दाहेन दहनः संतापयति राघवम्। वनदाहाग्निसंतप्तं गूढोऽग्निरिव पादपम्

antardāhena dahanaḥ saṁtāpayati rāghavam।
vanadāhāgnisaṁtaptaṁ gūḍho'gniriva pādapam ॥

जैसे वन में फैले हुए दावानल से संतप्त हुए वृक्ष को उसके खोखले में छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ-मरणजन्य चिन्ता की आग से संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरत को वह राम-वियोग से उत्पन्न हुई शोकाग्नि और भी जलाने लगी

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॥ २ · ८५ · १८ ॥
प्रसृतः सर्वगात्रेभ्यः स्वेदं शोकाग्निसम्भवम्। यथा सूर्यांशुसंतप्तो हिमवान् प्रसृतो हिमम्

prasṛtaḥ sarvagātrebhyaḥ svedaṁ śokāgnisambhavam।
yathā sūryāṁśusaṁtapto himavān prasṛto himam ॥

जैसे सूर्य की किरणों से तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फ को बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्नि से संतप्त होने के कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गों से पसीना बहाने लगे

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॥ २ · ८५ · १९ ॥
ध्याननिर्दरशैलेन विनिःश्वसितधातुना। दैन्यपादपसंघेन शोकायासाधिशृङ्गिणा

dhyānanirdaraśailena viniḥśvasitadhātunā।
dainyapādapasaṁghena śokāyāsādhiśṛṅgiṇā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८५ · २० ॥
प्रमोहानन्तसत्त्वेन संतापौषधिवेणुना। आक्रान्तो दुःखशैलेन महता कैकयीसुतः

pramohānantasattvena saṁtāpauṣadhiveṇunā।
ākrānto duḥkhaśailena mahatā kaikayīsutaḥ ॥

॥ १९–२० ॥

उस समय कैकेयीकुमार भरत दुःख के विशाल पर्वत से आक्रान्त हो गये थे। श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओं का समूह था। दुःखपूर्ण उच्छ्वास ही गैरिक आदि धातु का स्थान ले रहा था। दीनता (इन्द्रियों की अपने विषयों से विमुखता) ही वृक्षसमूहों के रूप में प्रतीत होती थी। शोकजनित आयास ही उस दुःखरूपी पर्वत के ऊँचे शिखर थे। अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहर-भीतर की इन्द्रियों में होनेवाले संताप ही उस पर्वत की ओषधियाँ तथा बाँस के वृक्ष थे

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॥ २ · ८५ · २१ ॥
विनिःश्वसन् वै भृशदुर्मनास्ततः प्रमूढसंज्ञः परमापदं गतः। शमं लेभे हृदयज्वरार्दितो नरर्षभो यूथहतो यथर्षभः

viniḥśvasan vai bhṛśadurmanāstataḥ pramūḍhasaṁjñaḥ paramāpadaṁ gataḥ।
śamaṁ na lebhe hṛdayajvarārdito nararṣabho yūthahato yatharṣabhaḥ ॥

उनका मन बहुत दुःखी था। वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्ति में पड़ गये। मानसिक चिन्ता से पीड़ित होने के कारण नरश्रेष्ठ भरत को शान्ति नहीं मिलती थी। उनकी दशा अपने झुंड से बिछुड़े हुए वृषभकी-सी हो रही थी

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॥ २ · ८५ · २२ ॥
गुहेन सार्धं भरतः समागतो महानुभावः सजनः समाहितः। सुदुर्मनास्तं भरतं तदा पुनर्गुहः समाश्वासयदग्रजं प्रति

guhena sārdhaṁ bharataḥ samāgato mahānubhāvaḥ sajanaḥ samāhitaḥ।
sudurmanāstaṁ bharataṁ tadā punarguhaḥ samāśvāsayadagrajaṁ prati ॥

परिवारसहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुह से मिले, उस समय उनके मन में बड़ा दुःख था। वे अपने बड़े भाई के लिये चिन्तित थे, अतः गुह ने उन्हें पुनः आश्वासन दिया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः ॥ ८५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८५ ॥