वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८४ · १८ श्लोकाःSarga 84 · 18 ślokas

निषादराज गुहका अपने बन्धुओंको नदीकी रक्षा करते हुए युद्धके लिये तैयार रहनेका आदेश दे भेंटकी सामग्री ले भरतके पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करनेके लिये अनुरोध करना

गुह की चौकसी

“गुह की चौकसी”
॥ २ · ८४ · २–३ ॥

गङ्गातटे शरासनपाणिर्निषादराजो गुहः स्वबन्धुभिः परिवृतः, प्रसारितकरेण पारे निविष्टां सागराभां सेनां तत्र कोविदारध्वजं भरतरथं च दर्शयन्, नदीरक्षायै सन्नद्धान् ज्ञातीन् सतर्को समादिशति।

गङ्गाके वन-छाये तटपर, धनुष थामे और मोरपंख-मणियों तथा मृगचर्मसे सज्जित निषादराज गुह अपने सशस्त्र बन्धुओंके बीच खड़ा है; तर्जनी फैलाकर वह उस पार समुद्र-सी अपार सेनाकी ओर संकेत करता है, जहाँ तम्बुओंकी अनन्त पंक्तियोंमें कोविदार-वृक्षकी ध्वजा फहराता भरतका स्वर्णिम रथ चमक रहा है। सन्ध्याकी सुनहरी आभामें उसका मुख सतर्क एवं दृढ़ है — श्रीरामके प्रति स्वामिभक्तिसे नदीकी रक्षाको तत्पर, फिर भी युद्धके लिये उद्यत; तटके सरकंडोंके बीच उसके साथी अपने धनुष चढ़ा रहे हैं।

On the wooded near bank of the Ganga, bow in hand and clad in beaded peacock-feather and animal-skin, the Nishad king Guha stands among his armed kinsmen and flings out a pointing arm across the water — toward an army spread vast as the ocean, where amid endless rows of tents one golden chariot flies the kovidara-tree banner of Bharat. His face is wary and resolute in the low golden light, loyal to Ram yet ready for battle, while his kinsmen string their bows among the reeds of the shore.

॥ २ · ८४ · १ ॥
ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम्। निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन् परितोऽब्रवीत्

tato niviṣṭāṁ dhvajinīṁ gaṅgāmanvāśritāṁ nadīm।
niṣādarājo dṛṣṭvaiva jñātīn sa parito'bravīt ॥

उधर निषादराज गुह ने गङ्गा नदी के तट पर ठहरी हुई भरत की सेना को देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओं से कहा—

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॥ २ · ८४ · २ ॥
महतीयमितः सेना सागराभा प्रदृश्यते। नास्यान्तमवगच्छामि मनसापि विचिन्तयन्

mahatīyamitaḥ senā sāgarābhā pradṛśyate।
nāsyāntamavagacchāmi manasāpi vicintayan ॥

‘भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्र के समान अपार दिखायी देती है; मैं मन से बहुत सोचने पर भी इसका पार नहीं पाता हूँ

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॥ २ · ८४ · ३ ॥
यदा नु खलु दुर्बुद्धिर्भरतः स्वयमागतः। एष हि महाकायः कोविदारध्वजो रथे

yadā nu khalu durbuddhirbharataḥ svayamāgataḥ।
sa eṣa hi mahākāyaḥ kovidāradhvajo rathe ॥

‘निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है; यह कोविदार के चिह्नवाली विशाल ध्वजा उसीके रथ पर फहरा रही है

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॥ २ · ८४ · ४ ॥
बन्धयिष्यति वा पाशैरथ वास्मान् वधिष्यति। अनु दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद् विवासितम्

bandhayiṣyati vā pāśairatha vāsmān vadhiṣyati।
anu dāśarathiṁ rāmaṁ pitrā rājyād vivāsitam ॥

‘मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियोंद्वारा पहले हमलोगों को पाशों से बँधवायगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिता ने राज्य से निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीराम को भी मार डालेगा

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॥ २ · ८४ · ५ ॥
सम्पन्नां श्रियमन्विच्छंस्तस्य राज्ञः सुदुर्लभाम्। भरतः कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति

sampannāṁ śriyamanvicchaṁstasya rājñaḥ sudurlabhām।
bharataḥ kaikayīputro hantuṁ samadhigacchati ॥

‘कैकेयी का पुत्र भरत राजा दशरथ की सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मी को अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजी को वन में मार डालने के लिये जा रहा है

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॥ २ · ८४ · ६ ॥
भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम। तस्यार्थकामाः संनद्धा गङ्गानूपेऽत्र तिष्ठत

bhartā caiva sakhā caiva rāmo dāśarathirmama।
tasyārthakāmāḥ saṁnaddhā gaṅgānūpe'tra tiṣṭhata ॥

‘परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हित की कामना रखकर तुमलोग अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो यहाँ गङ्गा के तट पर मौजूद रहो

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॥ २ · ८४ · ७ ॥
तिष्ठन्तु सर्वदाशाश्च गङ्गामन्वाश्रिता नदीम्। बलयुक्ता नदीरक्षा मांसमूलफलाशनाः

tiṣṭhantu sarvadāśāśca gaṅgāmanvāśritā nadīm।
balayuktā nadīrakṣā māṁsamūlaphalāśanāḥ ॥

‘सभी मल्लाह सेना के साथ नदी की रक्षा करते हुए गङ्गा के तट पर ही खड़े रहें और नाव पर रखे हुए फल-मूल आदि का आहार करके ही आज की रात बितावें

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॥ २ · ८४ · ८ ॥
नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम्। संनद्धानां तथा यूनां तिष्ठन्त्वित्यभ्यचोदयत्

nāvāṁ śatānāṁ pañcānāṁ kaivartānāṁ śataṁ śatam।
saṁnaddhānāṁ tathā yūnāṁ tiṣṭhantvityabhyacodayat ॥

‘हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमें से एक-एक नाव पर मल्लाहों के सौ-सौ जवान युद्ध-सामग्री से लैस होकर बैठे रहें।’ इस प्रकार गुह ने उन सबको आदेश दिया

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॥ २ · ८४ · ९ ॥
यदि तुष्टस्तु भरतो रामस्येह भविष्यति। इयं स्वस्तिमती सेना गङ्गामद्य तरिष्यति

yadi tuṣṭastu bharato rāmasyeha bhaviṣyati।
iyaṁ svastimatī senā gaṅgāmadya tariṣyati ॥

उसने फिर कहा कि ‘यदि यहाँ भरत का भाव श्रीराम के प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गा के पार जा सकेगी’

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॥ २ · ८४ · १० ॥
इत्युक्त्वोपायनं गृह्य मत्स्यमांसमधूनि च। अभिचक्राम भरतं निषादाधिपतिर्गुहः

ityuktvopāyanaṁ gṛhya matsyamāṁsamadhūni ca।
abhicakrāma bharataṁ niṣādādhipatirguhaḥ ॥

यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी* (मिश्री), फल के गूदे और मधु आदि भेंट की सामग्री लेकर भरत के पास गया

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॥ २ · ८४ · ११ ॥
तमायान्तं तु सम्प्रेक्ष्य सूतपुत्रः प्रतापवान्। भरतायाचचक्षेऽथ समयज्ञो विनीतवत्

tamāyāntaṁ tu samprekṣya sūtaputraḥ pratāpavān।
bharatāyācacakṣe'tha samayajño vinītavat ॥

उसे आते देख समयोचित कर्तव्य को समझनेवाले प्रतापी सूतपुत्र सुमन्त्र ने विनीत की भाँति भरत से कहा—

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॥ २ · ८४ · १२ ॥
एष ज्ञातिसहस्रेण स्थपतिः परिवारितः। कुशलो दण्डकारण्ये वृद्धो भ्रातुश्च ते सखा

eṣa jñātisahasreṇa sthapatiḥ parivāritaḥ।
kuśalo daṇḍakāraṇye vṛddho bhrātuśca te sakhā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८४ · १३ ॥
तस्मात् पश्यतु काकुत्स्थं त्वां निषादाधिपो गुहः। असंशयं विजानीते यत्र तौ रामलक्ष्मणौ

tasmāt paśyatu kākutsthaṁ tvāṁ niṣādādhipo guhaḥ।
asaṁśayaṁ vijānīte yatra tau rāmalakṣmaṇau ॥

॥ १२–१३ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओं के साथ यहाँ निवास करता है। यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीराम का सखा है। इसे दण्डकारण्य के मार्ग की विशेष जानकारी है। निश्चय ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अतः निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये अवसर दो’

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॥ २ · ८४ · १४ ॥
एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुमन्त्राद् भरतः शुभम्। उवाच वचनं शीघ्रं गुहः पश्यतु मामिति

etat tu vacanaṁ śrutvā sumantrād bharataḥ śubham।
uvāca vacanaṁ śīghraṁ guhaḥ paśyatu māmiti ॥

सुमन्त्र के मुख से यह शुभ वचन सुनकर भरत ने कहा—‘निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें—इसकी व्यवस्था की जाय’

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॥ २ · ८४ · १५ ॥
लब्ध्वानुज्ञां सम्प्रहृष्टो ज्ञातिभिः परिवारितः। आगम्य भरतं प्रह्वो गुहो वचनमब्रवीत्

labdhvānujñāṁ samprahṛṣṭo jñātibhiḥ parivāritaḥ।
āgamya bharataṁ prahvo guho vacanamabravīt ॥

मिलने की अनुमति पाकर गुह अपने भाई-बन्धुओं के साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरत से मिलकर बड़ी नम्रता के साथ बोला—

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॥ २ · ८४ · १६ ॥
निष्कुटश्चैव देशोऽयं वञ्चिताश्चापि ते वयम्। निवेदयाम ते सर्वं स्वके दाशगृहे वस

niṣkuṭaścaiva deśo'yaṁ vañcitāścāpi te vayam।
nivedayāma te sarvaṁ svake dāśagṛhe vasa ॥

‘यह वन-प्रदेश आपके लिये घर में लगे हुए बगीचे के समान है। आपने अपने आगमन को सूचना न देकर हमें धोखे में रख दिया—हम आपके स्वागत की कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवा में अर्पित है। यह निषादों का घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें

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॥ २ · ८४ · १७ ॥
अस्ति मूलफलं चैतन्निषादैः स्वयमर्जितम्। आर्द्रं शुष्कं तथा मांसं वन्यं चोच्चावचं तथा

asti mūlaphalaṁ caitanniṣādaiḥ svayamarjitam।
ārdraṁ śuṣkaṁ tathā māṁsaṁ vanyaṁ coccāvacaṁ tathā ॥

‘यह फल-मूल आपकी सेवा में प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमें से कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इनके साथ तैयार किया हुआ फल का गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकार के दूसरे-दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें

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॥ २ · ८४ · १८ ॥
आशंसे स्वाशिता सेना वत्स्यत्येनां विभावरीम्। अर्चितो विविधैः कामैः श्वः ससैन्यो गमिष्यसि

āśaṁse svāśitā senā vatsyatyenāṁ vibhāvarīm।
arcito vividhaiḥ kāmaiḥ śvaḥ sasainyo gamiṣyasi ॥

‘हम आशा करते हैं कि यह सेना आज की रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकार की मनोवाञ्छित वस्तुओं से आज हम सेनासहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सबेरे आप अपने सैनिकों के साथ यहाँ से अन्यत्र जाइयेगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः ॥ ८४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८४ ॥