वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ७६ · २३ श्लोकाःSarga 76 · 23 ślokas

राजा दशरथका अन्त्येष्टिसंस्कार

दशरथ-अन्त्येष्टि

“दशरथ-अन्त्येष्टि”
॥ २ · ७६ · १४–१५ ॥

प्रभातवेलायां सरयूतीरे पुष्पमालाभिरलंकृतं श्वेतवस्त्रावगुण्ठितं मृतं दशरथं काञ्चनशिबिकायामारोप्य परिचारका वहन्ति; अग्रे शोकनतशिराः श्वेताम्बरो वृद्धो वसिष्ठः सुवर्णकलशं दधत् चलति, पार्श्वे च भरतः, ऋत्विजश्चाग्निपात्राणि दधति; दक्षिणतश्चन्दनदेवदारुभिश्चिता रचिता, जनाश्च मार्गे हिरण्यं वासांसि च प्रकिरन्ति।

उषःकाल में सरयू के तट पर, पुष्पमालाओं से ढँके और श्वेत वस्त्र में लिपटे मृत राजा दशरथ के शव को स्वर्णिम शिबिका पर रखकर परिचारक श्मशान की ओर ले जा रहे हैं; आगे-आगे शोक से सिर झुकाए श्वेतवस्त्रधारी वृद्ध महर्षि वसिष्ठ हाथ में सुवर्ण-कलश लिये चल रहे हैं, उनके पास श्वेत शोक-वस्त्र में भरत, तथा ऋत्विज् अपने पात्रों में पवित्र अग्नि सँभाले चल रहे हैं; दाहिनी ओर चन्दन-देवदारु की विशाल चिता सजी है और मार्ग में एक सेवक स्वर्णमुद्राएँ व वस्त्र लुटा रहा है, चारों ओर श्वेतवसना शोकाकुल जनसमूह खड़ा है।

At dawn on the bank of the Sarayu, the shrouded, garland-heaped body of the dead King Dasharath is borne on a golden bier toward the cremation ground; the aged white-robed sage Vasishth walks ahead with bowed head, a golden vessel in hand, with Bharat beside him in plain white mourner's cloth, while ritual priests cradle the sacred fire in gilded pots; to the right rises the great pyre of sandalwood and devadaru logs, an attendant strews gold coins and lengths of cloth along the path, and a hushed crowd of white-clad mourners lines the shore beneath a pale rising sun.

॥ २ · ७६ · १ ॥
तमेवं शोकसंतप्तं भरतं कैकयीसुतम्। उवाच वदतां श्रेष्ठो वसिष्ठः श्रेष्ठवागृषिः

tamevaṁ śokasaṁtaptaṁ bharataṁ kaikayīsutam।
uvāca vadatāṁ śreṣṭho vasiṣṭhaḥ śreṣṭhavāgṛṣiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ७६ · २ ॥
अलं शोकेन भद्रं ते राजपुत्र महायशः। प्राप्तकालं नरपतेः कुरु संयानमुत्तमम्

alaṁ śokena bhadraṁ te rājaputra mahāyaśaḥ।
prāptakālaṁ narapateḥ kuru saṁyānamuttamam ॥

॥ १–२ ॥

इस प्रकार शोक से संतप्त हुए केकयीकुमार भरत से वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ ने उत्तम वाणी में कहा— ‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जानेवाला नहीं है। अब समयोचित कर्तव्य पर ध्यान दो। राजा दशरथ के शव को दाहसंस्कार के लिये ले चलने का उत्तम प्रबन्ध करो’

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॥ २ · ७६ · ३ ॥
वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा भरतो धरणीं गतः। प्रेतकृत्यानि सर्वाणि कारयामास धर्मवित्

vasiṣṭhasya vacaḥ śrutvā bharato dharaṇīṁ gataḥ।
pretakṛtyāni sarvāṇi kārayāmāsa dharmavit ॥

वसिष्ठजी का वचन सुनकर धर्मज्ञ भरत ने पृथ्वी पर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियोंद्वारा पिता के सम्पूर्ण प्रेतकर्म का प्रबन्ध करवाया

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॥ २ · ७६ · ४ ॥
उद्धृत्य तैलसंसेकात् तु भूमौ निवेशितम्। आपीतवर्णवदनं प्रसुप्तमिव भूमिपम्

uddhṛtya tailasaṁsekāt sa tu bhūmau niveśitam।
āpītavarṇavadanaṁ prasuptamiva bhūmipam ॥

राजा दशरथ का शव तेल के कड़ाह से निकालकर भूमि पर रखा गया। अधिक समयतक तेल में पड़े रहने से उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखने से ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों

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॥ २ · ७६ · ५ ॥
संवेश्य शयने चाग्र्ये नानारत्नपरिष्कृते। ततो दशरथं पुत्रो विललाप सुदुःखितः

saṁveśya śayane cāgrye nānāratnapariṣkṛte।
tato daśarathaṁ putro vilalāpa suduḥkhitaḥ ॥

तदनन्तर मृत राजा दशरथ को धो-पोंछकर नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित उत्तम शय्या (विमान) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे—

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॥ २ · ७६ · ६ ॥
किं ते व्यवसितं राजन् प्रोषिते मय्यनागते। विवास्य रामं धर्मज्ञं लक्ष्मणं महाबलम्

kiṁ te vyavasitaṁ rājan proṣite mayyanāgate।
vivāsya rāmaṁ dharmajñaṁ lakṣmaṇaṁ ca mahābalam ॥

‘राजन्! मैं परदेश में था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तबतक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर आपने इस तरह स्वर्ग में जाने का निश्चय कैसे कर लिया?

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॥ २ · ७६ · ७ ॥
क्व यास्यसि महाराज हित्वेमं दुःखितं जनम्। हीनं पुरुषसिंहेन रामेणाक्लिष्टकर्मणा

kva yāsyasi mahārāja hitvemaṁ duḥkhitaṁ janam।
hīnaṁ puruṣasiṁhena rāmeṇākliṣṭakarmaṇā ॥

‘महाराज! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम से हीन इस दुःखी सेवक को छोड़ आप कहाँ चले जायँगे?

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॥ २ · ७६ · ८ ॥
योगक्षेमं तु तेऽव्यग्रं कोऽस्मिन् कल्पयिता पुरे। त्वयि प्रयाते स्वस्तात रामे वनमाश्रिते

yogakṣemaṁ tu te'vyagraṁ ko'smin kalpayitā pure।
tvayi prayāte svastāta rāme ca vanamāśrite ॥

‘तात! आप स्वर्ग को चल दिये और श्रीराम ने वन का आश्रय लिया-ऐसी दशा में आपके इस नगर में निश्चिन्तता-पूर्वक प्रजा के योगक्षेम की व्यवस्था कौन करेगा?

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॥ २ · ७६ · ९ ॥
विधवा पृथिवी राजंस्त्वया हीना राजते। हीनचन्द्रेव रजनी नगरी प्रतिभाति माम्

vidhavā pṛthivī rājaṁstvayā hīnā na rājate।
hīnacandreva rajanī nagarī pratibhāti mām ॥

‘राजन्! आपके बिना यह पृथ्वी विधवा के समान हो गयी है, अतः इसकी शोभा नहीं हो रही है। यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रि के समान श्रीहीन प्रतीत होती है’

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॥ २ · ७६ · १० ॥
एवं विलपमानं तं भरतं दीनमानसम्। अब्रवीद् वचनं भूयो वसिष्ठस्तु महामुनिः

evaṁ vilapamānaṁ taṁ bharataṁ dīnamānasam।
abravīd vacanaṁ bhūyo vasiṣṭhastu mahāmuniḥ ॥

इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरत से महामुनि वसिष्ठ ने फिर कहा—

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॥ २ · ७६ · ११ ॥
प्रेतकार्याणि यान्यस्य कर्तव्यानि विशाम्पतेः। तान्यव्यग्रं महाबाहो क्रियतामविचारितम्

pretakāryāṇi yānyasya kartavyāni viśāmpateḥ।
tānyavyagraṁ mahābāho kriyatāmavicāritam ॥

‘महाबाहो! इन महाराज के लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो’

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॥ २ · ७६ · १२ ॥
तथेति भरतो वाक्यं वसिष्ठस्याभिपूज्य तत्। ऋत्विक्पुरोहिताचार्यांस्त्वरयामास सर्वशः

tatheti bharato vākyaṁ vasiṣṭhasyābhipūjya tat।
ṛtvikpurohitācāryāṁstvarayāmāsa sarvaśaḥ ॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरत ने वसिष्ठजी की आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य सबको इस कार्य के लिये जल्दी करने को कहा—

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॥ २ · ७६ · १३ ॥
ये त्वग्नयो नरेन्द्रस्य अग्न्यगाराद् बहिष्कृताः। ऋत्विग्भिर्याजकैश्चैव ते हूयन्ते यथाविधि

ye tvagnayo narendrasya agnyagārād bahiṣkṛtāḥ।
ṛtvigbhiryājakaiścaiva te hūyante yathāvidhi ॥

राजा की अग्निशाला से जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकोंद्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया

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॥ २ · ७६ · १४ ॥
शिबिकायामथारोप्य राजानं गतचेतनम्। बाष्पकण्ठा विमनसस्तमूहुः परिचारकाः

śibikāyāmathāropya rājānaṁ gatacetanam।
bāṣpakaṇṭhā vimanasastamūhuḥ paricārakāḥ ॥

तत्पश्चात् महाराज दशरथ के प्राणहीन शरीर को पालकी में बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमि को ले चले। उस समय आँसुओं से उनका गला रुँध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था

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॥ २ · ७६ · १५ ॥
हिरण्यं सुवर्णं वासांसि विविधानि च। प्रकिरन्तो जना मार्गे नृपतेरग्रतो ययुः

hiraṇyaṁ ca suvarṇaṁ ca vāsāṁsi vividhāni ca।
prakiranto janā mārge nṛpateragrato yayuḥ ॥

मार्ग में राजकीय पुरुष राजा के शव के आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँति के वस्त्र लुटाते चलते थे

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॥ २ · ७६ · १६ ॥
चन्दनागुरुनिर्यासान् सरलं पद्मकं तथा। देवदारूणि चाहृत्य क्षेपयन्ति तथापरे

candanāguruniryāsān saralaṁ padmakaṁ tathā।
devadārūṇi cāhṛtya kṣepayanti tathāpare ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ७६ · १७ ॥
गन्धानुच्चावचांश्चान्यांस्तत्र गत्वाथ भूमिपम्। तत्र संवेशयामासुश्चितामध्ये तमृत्विजः

gandhānuccāvacāṁścānyāṁstatra gatvātha bhūmipam।
tatra saṁveśayāmāsuścitāmadhye tamṛtvijaḥ ॥

॥ १६–१७ ॥

श्मशानभूमि में पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसीने चन्दन लाकर रखा तो किसीने अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारु की लकड़ियाँ ला-लाकर चिता में डालने लगे। कुछ लोगों ने तरह-तरह के सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े। इसके बाद ऋत्विजों ने राजा के शव को चिता पर रखा

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॥ २ · ७६ · १८ ॥
तदा हुताशनं हुत्वा जेपुस्तस्य तदृत्विजः। जगुश्च ते यथाशास्त्रं तत्र सामानि सामगाः

tadā hutāśanaṁ hutvā jepustasya tadṛtvijaḥ।
jaguśca te yathāśāstraṁ tatra sāmāni sāmagāḥ ॥

उस समय अग्नि में आहुति देकर उनके ऋत्विजों ने वेदोक्त मन्त्रों का जप किया। सामगान करनेवाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धति के अनुसार साम-श्रुतियों का गायन करने लगे

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॥ २ · ७६ · १९ ॥
शिबिकाभिश्च यानैश्च यथार्ह तस्य योषितः। नगरान्निर्ययुस्तत्र वृद्धैः परिवृतास्तथा

śibikābhiśca yānaiśca yathārha tasya yoṣitaḥ।
nagarānniryayustatra vṛddhaiḥ parivṛtāstathā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ७६ · २० ॥
प्रसव्यं चापि तं चक्रुर्ऋत्विजोऽग्निचितं नृपम्। स्त्रियश्च शोकसंतप्ताः कौसल्याप्रमुखास्तदा

prasavyaṁ cāpi taṁ cakrurṛtvijo'gnicitaṁ nṛpam।
striyaśca śokasaṁtaptāḥ kausalyāpramukhāstadā ॥

॥ १९–२० ॥

(इसके बाद चिता में आग लगायी गयी) तदनन्तर राजा दशरथ की कौसल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकों से घिरी हुई यथायोग्य शिबिकाओं तथा रथों पर आरूढ़ होकर नगर से निकलीं तथा शोक से संतप्त हो श्मशानभूमि में आकर अश्वमेधान्त यज्ञों के अनुष्ठाता राजा दशरथ के शव की परिक्रमा करने लगीं। साथ ही ऋत्विजों ने भी उस शव की परिक्रमा की

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॥ २ · ७६ · २१ ॥
क्रौञ्चीनामिव नारीणां निनादस्तत्र शुश्रुवे। आर्तानां करुणं काले क्रोशन्तीनां सहस्रशः

krauñcīnāmiva nārīṇāṁ ninādastatra śuśruve।
ārtānāṁ karuṇaṁ kāle krośantīnāṁ sahasraśaḥ ॥

उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकार्त रानियों का आर्तनाद कुररियों के चीत्कार के समान सुनायी देता था

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॥ २ · ७६ · २२ ॥
ततो रुदन्त्यो विवशा विलप्य पुनः पुनः। यानेभ्यः सरयूतीरमवतेरुर्नृपाङ्गनाः

tato rudantyo vivaśā vilapya ca punaḥ punaḥ।
yānebhyaḥ sarayūtīramavaterurnṛpāṅganāḥ ॥

दाहकर्म के पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियों से ही सरयू के तट पर जाकर उतरीं

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॥ २ · ७६ · २३ ॥
कृत्वोदकं ते भरतेन सार्धं नृपाङ्गना मन्त्रिपुरोहिताश्च। पुरं प्रविश्याश्रुपरीतनेत्रा भूमौ दशाहं व्यनयन्त दुःखम्

kṛtvodakaṁ te bharatena sārdhaṁ nṛpāṅganā mantripurohitāśca।
puraṁ praviśyāśruparītanetrā bhūmau daśāhaṁ vyanayanta duḥkham ॥

भरत के साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितों ने भी राजा के लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रों से आँसू बहाते हुए नगर में आये और दस दिनोंतक भूमि पर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दुःख से अपना समय व्यतीत किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ॥ ७६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७६ ॥