वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ७४ · ३६ श्लोकाःSarga 74 · 36 ślokas

भरतका कैकेयीको कड़ी फटकार देना

क्रोधमूर्च्छित भरत

“क्रोधमूर्च्छित भरत”
॥ २ · ७४ · ३५–३६ ॥

मातरं गर्हयित्वा संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरो विधूतसर्वाभरणो भरतः, उत्सवक्षये शक्रकेतुरिव, मार्मरभूमौ पतितो निःश्वसन्नास्ते; विकीर्णानि भग्नानि हैमाभरणानि परितः; पृष्ठे श्वेताम्बरा विधवा कैकेयी सकम्पा विमुखी तिष्ठति।

माताको कठोर शाप सुनाकर भरत क्रोध और शोकसे अभिभूत होकर संगमरमरके फर्शपर ढह पड़े हैं; उनके नेत्र लाल तथा आँसुओंसे भरे हैं, वस्त्र ढीले होकर सरक गये हैं और टूटे हुए स्वर्णाभूषण चारों ओर बिखरे पड़े हैं—मानो उत्सवके अन्तमें गिराया गया इन्द्रध्वज हो। पीछे धुँधले कक्षमें श्वेत विधवा-वस्त्र पहने कैकेयी सिहरकर, ठिठकी-सी मुँह फेरे खड़ी हैं।

Having hurled his final terrible curse at his mother, Bharat is overcome by grief and wrath and sinks to the marble floor — his eyes burning red and streaming, his garments slipped loose, his snapped golden ornaments scattered in a glittering ruin all around him, like Indra's festival-banner toppled when the festival ends. In the dim chamber behind, Kaikeyi, clad in a widow's plain white, recoils and turns half away, cold yet visibly shaken.

॥ २ · ७४ · १ ॥
तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा। रोषेण महताविष्टः पुनरेवाब्रवीद् वचः

tāṁ tathā garhayitvā tu mātaraṁ bharatastadā।
roṣeṇa mahatāviṣṭaḥ punarevābravīd vacaḥ ॥

इस प्रकार माता की निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेश से भर गये और फिर कठोर वाणी में कहने लगे—

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॥ २ · ७४ · २ ॥
राज्याद् भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि। परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रुदती भव

rājyād bhraṁśasva kaikeyi nṛśaṁse duṣṭacāriṇi।
parityaktāsi dharmeṇa mā mṛtaṁ rudatī bhava ॥

‘दुष्टतापूर्ण बर्ताव करनेवाली क्रूरहृदया कैकेयि! तू राज्य से भ्रष्ट हो जा। धर्म ने तेरा परित्याग कर दिया है, अतः अब तू मरे हुए महाराज के लिये रोना मत, (क्योंकि तू पत्नीधर्म से गिर चुकी है) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्र के लिये रोया कर

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॥ २ · ७४ · ३ ॥
किं नु तेऽदूषयद् रामो राजा वा भृशधार्मिकः। ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ

kiṁ nu te'dūṣayad rāmo rājā vā bhṛśadhārmikaḥ।
yayormṛtyurvivāsaśca tvatkṛte tulyamāgatau ॥

‘श्रीराम ने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज (पिताजी) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्यु का कष्ट भोगना पड़ा?

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॥ २ · ७४ · ४ ॥
भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात्। कैकेयि नरकं गच्छ मा तातसलोकताम्

bhrūṇahatyāmasi prāptā kulasyāsya vināśanāt।
kaikeyi narakaṁ gaccha mā ca tātasalokatām ॥

‘कैकेयि! तूने इस कुल का विनाश करने के कारण भ्रूणहत्या का पाप अपने सिर पर लिया है, इसलिये तू नरक में जा और पिताजी का लोक तुझे न मिले

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॥ २ · ७४ · ५ ॥
यत्त्वया हीदृशं पापं कृतं घोरेण कर्मणा। सर्वलोकप्रियं हित्वा ममाप्यापादितं भयम्

yattvayā hīdṛśaṁ pāpaṁ kṛtaṁ ghoreṇa karmaṇā।
sarvalokapriyaṁ hitvā mamāpyāpāditaṁ bhayam ॥

‘तूने इस घोर कर्म के द्वारा समस्त लोकों के प्रिय श्रीराम को देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पाप किया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है

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॥ २ · ७४ · ६ ॥
त्वत्कृते मे पिता वृत्तो रामश्चारण्यमाश्रितः। अयशो जीवलोके त्वयाहं प्रतिपादितः

tvatkṛte me pitā vṛtto rāmaścāraṇyamāśritaḥ।
ayaśo jīvaloke ca tvayāhaṁ pratipāditaḥ ॥

‘तेरे कारण मेरे पिता की मृत्यु हुई, श्रीराम को वन का आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीवजगत् में अपयश का भागी बना दिया

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॥ २ · ७४ · ७ ॥
मातुरूपे ममामित्रे नृशंसे राज्यकामुके। तेऽहमभिभाष्योऽस्मि दुर्वृत्ते पतिघातिनि

māturūpe mamāmitre nṛśaṁse rājyakāmuke।
na te'hamabhibhāṣyo'smi durvṛtte patighātini ॥

‘राज्य के लोभ में पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली दुराचारिणी पतिघातिनि! तू माता के रूप में मेरी शत्रु है। तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये

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॥ २ · ७४ · ८ ॥
कौसल्या सुमित्रा याश्चान्या मम मातरः। दुःखेन महताविष्टास्त्वां प्राप्य कुलदूषिणीम्

kausalyā ca sumitrā ca yāścānyā mama mātaraḥ।
duḥkhena mahatāviṣṭāstvāṁ prāpya kuladūṣiṇīm ॥

‘कौसल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनी के कारण महान् दुःख में पड़ गयी हैं

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॥ २ · ७४ · ९ ॥
त्वमश्वपतेः कन्या धर्मराजस्य धीमतः। राक्षसी तत्र जातासि कुलप्रध्वंसिनी पितुः

na tvamaśvapateḥ kanyā dharmarājasya dhīmataḥ।
rākṣasī tatra jātāsi kulapradhvaṁsinī pituḥ ॥

‘तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपति की कन्या नहीं है। तू उनके कुल में कोई राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिता के वंश का विध्वंस करनेवाली है

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॥ २ · ७४ · १० ॥
यत् त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायणः। वनं प्रस्थापितो वीरः पितापि त्रिदिवं गतः

yat tvayā dhārmiko rāmo nityaṁ satyaparāyaṇaḥ।
vanaṁ prasthāpito vīraḥ pitāpi tridivaṁ gataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ७४ · ११ ॥
यत् प्रधानासि तत् पापं मयि पित्रा विना कृते। भ्रातृभ्यां परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये

yat pradhānāsi tat pāpaṁ mayi pitrā vinā kṛte।
bhrātṛbhyāṁ ca parityakte sarvalokasya cāpriye ॥

॥ १०–११ ॥

‘तूने सदा सत्य में तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा वीर श्रीराम को जो वन में भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्योंद्वारा तूने प्रधान रूप से जिस पाप का अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयों से बिछुड़ गया और समस्त जगत् के लोगों के लिये अप्रिय बन गया

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॥ २ · ७४ · १२ ॥
कौसल्यां धर्मसंयुक्तां वियुक्तां पापनिश्चये। कृत्वा कं प्राप्स्यसे ह्यद्य लोकं निरयगामिनि

kausalyāṁ dharmasaṁyuktāṁ viyuktāṁ pāpaniścaye।
kṛtvā kaṁ prāpsyase hyadya lokaṁ nirayagāmini ॥

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली नरकगामिनी कैकेयि! धर्मपरायणा माता कौसल्या को पति और पुत्र से वञ्चित करके अब तू किस लोक में जायगी?

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॥ २ · ७४ · १३ ॥
किं नावबुध्यसे क्रूरे नियतं बन्धुसंश्रयम्। ज्येष्ठं पितृसमं रामं कौसल्यायात्मसम्भवम्

kiṁ nāvabudhyase krūre niyataṁ bandhusaṁśrayam।
jyeṣṭhaṁ pitṛsamaṁ rāmaṁ kausalyāyātmasambhavam ॥

‘क्रूरहृदये! कौसल्यापुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिता के तुल्य हैं। वे जितेन्द्रिय और बन्धुओं के आश्रयदाता हैं। क्या तू उन्हें इस रूप में नहीं जानती है?

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॥ २ · ७४ · १४ ॥
अङ्गप्रत्यङ्गजः पुत्रो हृदयाच्चाभिजायते। तस्मात् प्रियतरो मातुः प्रिया एव तु बान्धवाः

aṅgapratyaṅgajaḥ putro hṛdayāccābhijāyate।
tasmāt priyataro mātuḥ priyā eva tu bāndhavāḥ ॥

‘पुत्र माता के अङ्ग-प्रत्यङ्ग और हृदय से उत्पन्न होता है, इसलिये वह माता को अधिक प्रिय होता है। अन्य भाई-बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं (किंतु पुत्र प्रियतर होता है)

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॥ २ · ७४ · १५ ॥
अन्यदा किल धर्मज्ञा सुरभिः सुरसम्मता। वहमानौ ददर्शोर्व्यां पुत्रौ विगतचेतसौ

anyadā kila dharmajñā surabhiḥ surasammatā।
vahamānau dadarśorvyāṁ putrau vigatacetasau ॥

‘एक समय की बात है कि धर्म को जाननेवाली देव-सम्मानित सुरभि (कामधेनु) ने पृथ्वी पर अपने दो पुत्रों को देखा, जो हल जोतते-जोतते अचेत हो गये थे

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॥ २ · ७४ · १६ ॥
तावर्धदिवसं श्रान्तौ दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले। रुरोद पुत्रशोकेन बाष्पपर्याकुलेक्षणम्

tāvardhadivasaṁ śrāntau dṛṣṭvā putrau mahītale।
ruroda putraśokena bāṣpaparyākulekṣaṇam ॥

‘मध्याह्न का समय होनेतक लगातार हल जोतने से वे बहुत थक गये थे। पृथ्वी पर अपने उन दोनों पुत्रों को ऐसी दुर्दशा में पड़ा देख सुरभि पुत्रशोक से रोने लगी। उसके नेत्रों में आँसू उमड़ आये

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॥ २ · ७४ · १७ ॥
अधस्ताद् व्रजतस्तस्याः सुरराज्ञो महात्मनः। बिन्दवः पतिता गात्रे सूक्ष्माः सुरभिगन्धिनः

adhastād vrajatastasyāḥ surarājño mahātmanaḥ।
bindavaḥ patitā gātre sūkṣmāḥ surabhigandhinaḥ ॥

‘उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभि के नीचे से होकर कहीं जा रहे थे। उनके शरीर पर कामधेनु के दो बूँद सुगन्धित आँसू गिर पड़े

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॥ २ · ७४ · १८ ॥
निरीक्षमाणस्तां शक्रो ददर्श सुरभिं स्थिताम्। आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीं भृशदुःखिताम्

nirīkṣamāṇastāṁ śakro dadarśa surabhiṁ sthitām।
ākāśe viṣṭhitāṁ dīnāṁ rudatīṁ bhṛśaduḥkhitām ॥

‘जब इन्द्र ने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा—आकाश में सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दुःखी हो दीनभाव से रो रही हैं

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॥ २ · ७४ · १९ ॥
तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनीम्। इन्द्रः प्राञ्जलिरुद्विग्रः सुरराजोऽब्रवीद् वचः

tāṁ dṛṣṭvā śokasaṁtaptāṁ vajrapāṇiryaśasvinīm।
indraḥ prāñjalirudvigraḥ surarājo'bravīd vacaḥ ॥

‘यशस्विनी सुरभि को शोक से संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्र हो उठे और हाथ जोड़कर बोले—

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॥ २ · ७४ · २० ॥
भयं कच्चिन्न चास्मासु कुतश्चिद् विद्यते महत्। कुतोनिमित्तः शोकस्ते ब्रूहि सर्वहितैषिणि

bhayaṁ kaccinna cāsmāsu kutaścid vidyate mahat।
kutonimittaḥ śokaste brūhi sarvahitaiṣiṇi ॥

‘सब का हित चाहनेवाली देवि! हमलोगों पर कहीं से कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? बताओ, किस कारण से तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है?

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॥ २ · ७४ · २१ ॥
एवमुक्ता तु सुरभिः सुरराजेन धीमता। प्रत्युवाच ततो धीरा वाक्यं वाक्यविशारदा

evamuktā tu surabhiḥ surarājena dhīmatā।
pratyuvāca tato dhīrā vākyaṁ vākyaviśāradā ॥

‘बुद्धिमान् देवराज इन्द्र के इस प्रकार पूछने पर बोलने में चतुर और धीरस्वभाववाली सुरभि ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ २ · ७४ · २२ ॥
शान्तं पापं वः किंचित् कुतश्चिदमराधिप। अहं तु मग्नौ शोचामि स्व पुत्रौ विषमे स्थितौ

śāntaṁ pāpaṁ na vaḥ kiṁcit kutaścidamarādhipa।
ahaṁ tu magnau śocāmi sva putrau viṣame sthitau ॥

‘देवेश्वर! पाप शान्त हो। तुमलोगों पर कहीं से कोई भय नहीं है। मैं तो अपने इन दोनों पुत्रों को विषम अवस्था (घोर सङ्कट) में मग्न हुआ देख शोक कर रही हूँ

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॥ २ · ७४ · २३ ॥
एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ। वध्यमानौ बलीवर्दौ कर्षकेण दुरात्मना

etau dṛṣṭvā kṛśau dīnau sūryaraśmipratāpitau।
vadhyamānau balīvardau karṣakeṇa durātmanā ॥

‘ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दुःखी हैं, सूर्य की किरणों से बहुत तप गये हैं और ऊपर से वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है

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॥ २ · ७४ · २४ ॥
मम कायात् प्रसूतौ हि दुःखितौ भारपीडितौ। यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसमः प्रियः

mama kāyāt prasūtau hi duḥkhitau bhārapīḍitau।
yau dṛṣṭvā paritapye'haṁ nāsti putrasamaḥ priyaḥ ॥

‘मेरे शरीर से इनकी उत्पत्ति हुई है। ये दोनों भार से पीड़ित और दुःखी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोक से संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्र के समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है’

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॥ २ · ७४ · २५ ॥
यस्याः पुत्रसहस्रैस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत्। तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो सुतान् मन्यते परम्

yasyāḥ putrasahasraistu kṛtsnaṁ vyāptamidaṁ jagat।
tāṁ dṛṣṭvā rudatīṁ śakro na sutān manyate param ॥

‘जिनके सहस्रों पुत्रों से यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनु को इस तरह रोती देख इन्द्र ने यह माना कि पुत्र से बढ़कर और कोई नहीं है

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॥ २ · ७४ · २६ ॥
इन्द्रो ह्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगन्धिनम्। सुरभिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसीं तामिहेश्वरः

indro hyaśrunipātaṁ taṁ svagātre puṇyagandhinam।
surabhiṁ manyate dṛṣṭvā bhūyasīṁ tāmiheśvaraḥ ॥

‘देवेश्वर इन्द्र ने अपने शरीर पर उस पवित्र गन्धवाले अश्रुपात को देखकर देवी सुरभि को इस जगत् में सबसे श्रेष्ठ माना

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॥ २ · ७४ · २७ ॥
समाप्रतिमवृत्ताया लोकधारणकाम्यया। श्रीमत्या गुणमुख्यायाः स्वभावपरिचेष्टया

samāpratimavṛttāyā lokadhāraṇakāmyayā।
śrīmatyā guṇamukhyāyāḥ svabhāvapariceṣṭayā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ७४ · २८ ॥
यस्याः पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक्। किं पुनर्या विना रामं कौसल्या वर्तयिष्यति

yasyāḥ putrasahasrāṇi sāpi śocati kāmadhuk।
kiṁ punaryā vinā rāmaṁ kausalyā vartayiṣyati ॥

॥ २७–२८ ॥

‘जिनका चरित्र समस्त प्राणियों के लिये समान रूप से हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दानरूप ऐश्वर्यशक्ति से सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुण से युक्त तथा लोकरक्षा की कामना से कार्य में प्रवृत्त होनेवाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रों के लिये उनके स्वाभाविक चेष्टा में रत होने पर भी कष्ट पाने के कारण शोक करती हैं तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौसल्या श्रीराम के बिना कैसे जीवित रहेंगी?

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॥ २ · ७४ · २९ ॥
एकपुत्रा साध्वी विवत्सेयं त्वया कृता। तस्मात् त्वं सततं दुःखं प्रेत्य चेह लप्स्यसे

ekaputrā ca sādhvī ca vivatseyaṁ tvayā kṛtā।
tasmāt tvaṁ satataṁ duḥkhaṁ pretya ceha ca lapsyase ॥

‘इकलौते बेटेवाली इन सती-साध्वी कौसल्या का तूने उनके पुत्र से बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोक में भी दुःख ही पायेगी

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॥ २ · ७४ · ३० ॥
अहं त्वपचितिं भ्रातुः पितुश्च सकलामिमाम्। वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि संशयः

ahaṁ tvapacitiṁ bhrātuḥ pituśca sakalāmimām।
vardhanaṁ yaśasaścāpi kariṣyāmi na saṁśayaḥ ॥

‘मैं तो यह राज्य लौटाकर भाई की पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टिसंस्कार आदि करके पिता का भी पूर्णरूप से पूजन करूँगा तथा निःसंदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो (तेरे दिये हुए कलङ्क को मिटानेवाला और) मेरे यश को बढ़ानेवाला हो

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॥ २ · ७४ · ३१ ॥
आनाय्य महाबाहुं कोसलेन्द्रं महाबलम्। स्वयमेव प्रवेक्ष्यामि वनं मुनिनिषेवितम्

ānāyya ca mahābāhuṁ kosalendraṁ mahābalam।
svayameva pravekṣyāmi vanaṁ muniniṣevitam ॥

‘महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीराम को यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजनसेवित वन में प्रवेश करूँगा

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॥ २ · ७४ · ३२ ॥
नह्यहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम्। शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षितः

nahyahaṁ pāpasaṁkalpe pāpe pāpaṁ tvayā kṛtam।
śakto dhārayituṁ paurairaśrukaṇṭhairnirīkṣitaḥ ॥

‘पापपूर्ण संकल्प करनेवाली पापिनि! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पाप का बोझ ढोता रहूँ—यह मुझसे नहीं हो सकता

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॥ २ · ७४ · ३३ ॥
सा त्वमग्निं प्रविश वा स्वयं वा विश दण्डकान्। रज्जुं बद्ध्वाथवा कण्ठे नहि तेऽन्यत् परायणम्

sā tvamagniṁ praviśa vā svayaṁ vā viśa daṇḍakān।
rajjuṁ baddhvāthavā kaṇṭhe nahi te'nyat parāyaṇam ॥

‘अब तू जलती आग में प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्य में चली जा अथवा गले में रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है

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॥ २ · ७४ · ३४ ॥
अहमप्यवनीं प्राप्ते रामे सत्यपराक्रमे। कृतकृत्यो भविष्यामि विप्रवासितकल्मषः

ahamapyavanīṁ prāpte rāme satyaparākrame।
kṛtakṛtyo bhaviṣyāmi vipravāsitakalmaṣaḥ ॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्या की भूमि पर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा’

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॥ २ · ७४ · ३५ ॥
इति नाग इवारण्ये तोमराङ्कुशतोदितः। पपात भुवि संक्रुद्धो निःश्वसन्निव पन्नगः

iti nāga ivāraṇye tomarāṅkuśatoditaḥ।
papāta bhuvi saṁkruddho niḥśvasanniva pannagaḥ ॥

यह कहकर भरत वन में तोमर और अंकुशद्वारा पीड़ित किये गये हाथी की भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और क्रोध में भरकर फुफकारते हुए साँप की भाँति लम्बी साँस खींचने लगे

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॥ २ · ७४ · ३६ ॥
संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरस्तथा विधूतसर्वाभरणः परंतपः। बभूव भूमौ पतितो नृपात्मजः शचीपतेः केतुरिवोत्सवक्षये

saṁraktanetraḥ śithilāmbarastathā vidhūtasarvābharaṇaḥ paraṁtapaḥ।
babhūva bhūmau patito nṛpātmajaḥ śacīpateḥ keturivotsavakṣaye ॥

शत्रुओं को तपानेवाले राजकुमार भरत उत्सव समाप्त होने पर नीचे गिराये गये शचीपति इन्द्र के ध्वज की भाँति उस समय पृथ्वी पर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे आभूषण टूटकर बिखर गये थे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥ ७४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७४ ॥