वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ७३ · २८ श्लोकाःSarga 73 · 28 ślokas

भरतका कैकेयीको धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना

भरत का धिक्कार

“भरत का धिक्कार”
॥ २ · ७३ · ४–५ ॥

रोषदीप्तमुखो युवा भरतः प्रसारितबाहुर्विधवां श्वेतवसनां कैकेयीं तर्जयति — 'कालरात्रिरिव त्वं कुलक्षयायागता, त्वयैव मे पिता मृत्युमापादितः' इति; सा शीता संत्रस्ता चापसरति॥

अन्धकारभरे राजभवनके कक्षमें हरे-सुनहरे परिधानमें अर्धनग्न वक्षवाले युवा भरत शोकजनित क्रोधसे दहक उठे हैं — मुख खुला, एक भुजा तानकर वे अपनी माताकी ओर अभियोगकी अँगुली उठाये खड़े हैं; बिना आभूषण, कोरे श्वेत वस्त्रमें लिपटी विधवा कैकेयीको वे धिक्कारते हैं कि तू कुलके नाशके लिये कालरात्रि बनकर आयी और तूने ही महाराजको कालके गालमें डाल दिया। वह ठंडी पर भीतरसे काँपती हुई, श्वेत आँचल समेटे, नीची दृष्टि किये पीछे सिमट रही है।

In a dim palace chamber the young prince Bharat — bare-chested in green and gold, mouth open in reproach, his face ablaze with grief-born fury — flings out one arm to point in accusation at his mother; he denounces the widowed Kaikeyi, wrapped in plain undyed white with every ornament stripped away, as the night of doom come to destroy the house and the one who cast his father the king into death's jaws. She shrinks back, cold yet inwardly shaken, gathering her white drape close, her eyes cast down.

॥ २ · ७३ · १ ॥
श्रुत्वा पितुर्वृत्तं भ्रातरौ विवासितौ। भरतो दुःखसंतप्त इदं वचनमब्रवीत्

śrutvā ca sa piturvṛttaṁ bhrātarau ca vivāsitau।
bharato duḥkhasaṁtapta idaṁ vacanamabravīt ॥

पिता के परलोकवास और दोनों भाइयों के वनवास का समाचार सुनकर भरत दुःख से संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ७३ · २ ॥
किं नु कार्यं हतस्येह मम राज्येन शोचतः। विहीनस्याथ पित्रा भ्रात्रा पितृसमेन

kiṁ nu kāryaṁ hatasyeha mama rājyena śocataḥ।
vihīnasyātha pitrā ca bhrātrā pitṛsamena ca ॥

‘हाय! तूने मुझे मार डाला। मैं पिता से सदा के लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाई से भी बिलग हो गया। अब तो मैं शोक में डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है?

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॥ २ · ७३ · ३ ॥
दुःखे मे दुःखमकरोद्व्रणे क्षारमिवाददाः। राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं तापसम्

duḥkhe me duḥkhamakarodvraṇe kṣāramivādadāḥ।
rājānaṁ pretabhāvasthaṁ kṛtvā rāmaṁ ca tāpasam ॥

‘तूने राजा को परलोकवासी तथा श्रीराम को तपस्वी बनाकर मुझे दुःख-पर-दुःख दिया है, घाव पर नमक-सा छिड़क दिया है

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॥ २ · ७३ · ४ ॥
कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता। अङ्गारमुपगूह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान्

kulasya tvamabhāvāya kālarātririvāgatā।
aṅgāramupagūhya sma pitā me nāvabuddhavān ॥

‘तू इस कुल का विनाश करने के लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिता ने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गार को हृदय से लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझ में नहीं आयी थी

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॥ २ · ७३ · ५ ॥
मृत्युमापादितो राजा त्वया मे पापदर्शिनि। सुखं परिहृतं मोहात् कुलेऽस्मिन् कुलपांसनि

mṛtyumāpādito rājā tvayā me pāpadarśini।
sukhaṁ parihṛtaṁ mohāt kule'smin kulapāṁsani ॥

‘पाप पर ही दृष्टि रखनेवाली! कुलकलङ्किनी! तूने मेरे महाराज को काल के गाल में डाल दिया और मोहवश इस कुल का सुख सदा के लिये छीन लिया

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॥ २ · ७३ · ६ ॥
त्वां प्राप्य हि पिता मेऽद्य सत्यसंधो महायशाः। तीव्रदुःखाभिसंतप्तो वृत्तो दशरथो नृपः

tvāṁ prāpya hi pitā me'dya satyasaṁdho mahāyaśāḥ।
tīvraduḥkhābhisaṁtapto vṛtto daśaratho nṛpaḥ ॥

‘तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दुःसह दुःख से संतप्त होकर प्राण त्यागने को विवश हुए हैं

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॥ २ · ७३ · ७ ॥
विनाशितो महाराजः पिता मे धर्मवत्सलः। कस्मात् प्रव्राजितो रामः कस्मादेव वनं गतः

vināśito mahārājaḥ pitā me dharmavatsalaḥ।
kasmāt pravrājito rāmaḥ kasmādeva vanaṁ gataḥ ॥

‘बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथ का विनाश क्यों किया? मेरे बड़े भाई श्रीराम को क्यों घर से निकाला और वे भी क्यों (तेरे ही कहने से) वन को चले गये?

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॥ २ · ७३ · ८ ॥
कौसल्या सुमित्रा पुत्रशोकाभिपीडिते। दुष्करं यदि जीवेतां प्राप्य त्वां जननीं मम

kausalyā ca sumitrā ca putraśokābhipīḍite।
duṣkaraṁ yadi jīvetāṁ prāpya tvāṁ jananīṁ mama ॥

‘कौसल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलानेवाली तुझ कैकेयी को पाकर पुत्रशोक से पीड़ित हो गयीं। अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है

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॥ २ · ७३ · ९ ॥
नन्वार्योऽपि धर्मात्मा त्वयि वृत्तिमनुत्तमाम्। वर्तते गुरुवृत्तिज्ञो यथा मातरि वर्तते

nanvāryo'pi ca dharmātmā tvayi vṛttimanuttamām।
vartate guruvṛttijño yathā mātari vartate ॥

‘बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये—इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माता के प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे

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॥ २ · ७३ · १० ॥
तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी। त्वयि धर्मं समास्थाय भगिन्यामिव वर्तते

tathā jyeṣṭhā hi me mātā kausalyā dīrghadarśinī।
tvayi dharmaṁ samāsthāya bhaginyāmiva vartate ॥

‘मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्म का ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिन का-सा बर्ताव करती हैं

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॥ २ · ७३ · ११ ॥
तस्याः पुत्रं महात्मानं चीरवल्कलवाससम्। प्रस्थाप्य वनवासाय कथं पापे शोचसे

tasyāḥ putraṁ mahātmānaṁ cīravalkalavāsasam।
prasthāpya vanavāsāya kathaṁ pāpe na śocase ॥

‘पापिनि! उनके महात्मा पुत्र को चीर और वल्कल पहनाकर तूने वन में रहने के लिये भेज दिया। फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है

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॥ २ · ७३ · १२ ॥
अपापदर्शिनं शूरं कृतात्मानं यशस्विनम्। प्रव्राज्य चीरवसनं किं नु पश्यसि कारणम्

apāpadarśinaṁ śūraṁ kṛtātmānaṁ yaśasvinam।
pravrājya cīravasanaṁ kiṁ nu paśyasi kāraṇam ॥

‘श्रीराम किसीकी बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्रात्मा और यशस्वी हैं। उन्हें चीर पहनाकर वनवास दे देने में तू कौन-सा लाभ देख रही है?

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॥ २ · ७३ · १३ ॥
लुब्धाया विदितो मन्ये तेऽहं राघवं यथा। तथा ह्यनर्थो राज्यार्थं त्वयाऽऽनीतो महानयम्

lubdhāyā vidito manye na te'haṁ rāghavaṁ yathā।
tathā hyanartho rājyārthaṁ tvayā''nīto mahānayam ॥

‘तू लोभिन है। मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजी के प्रति कैसा भाव है, तभी तूने राज्य के लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है

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॥ २ · ७३ · १४ ॥
अहं हि पुरुषव्याघ्रावपश्यन् रामलक्ष्मणौ। केन शक्तिप्रभावेण राज्यं रक्षितुमुत्सहे

ahaṁ hi puruṣavyāghrāvapaśyan rāmalakṣmaṇau।
kena śaktiprabhāveṇa rājyaṁ rakṣitumutsahe ॥

‘मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण को न देखकर किस शक्ति के प्रभाव से इस राज्य की रक्षा कर सकता हूँ? (मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं)

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॥ २ · ७३ · १५ ॥
तं हि नित्यं महाराजो बलवन्तं महौजसम्। उपाश्रितोऽभूद् धर्मात्मा मेरुर्मेरुवनं यथा

taṁ hi nityaṁ mahārājo balavantaṁ mahaujasam।
upāśrito'bhūd dharmātmā merurmeruvanaṁ yathā ॥

‘मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उन महातेजस्वी बलवान् श्रीराम का ही आश्रय लेते थे (उन्हींसे अपने लोक-परलोक की सिद्धि की आशा रखते थे), ठीक उसी तरह जैसे मेरुपर्वत अपनी रक्षा के लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वन का ही आश्रय लेता है (यदि वह दुर्गम वन से घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उसपर आक्रमण कर सकते हैं)

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॥ २ · ७३ · १६ ॥
सोऽहं कथमिमं भारं महाधुर्यसमुद्यतम्। दम्यो धुरमिवासाद्य सहेयं केन चौजसा

so'haṁ kathamimaṁ bhāraṁ mahādhuryasamudyatam।
damyo dhuramivāsādya saheyaṁ kena caujasā ॥

‘यह राज्य का भार, जिसे किसी महाधुरंधर ने धारण किया था, मैं कैसे, किस बल से धारण कर सकता हूँ? जैसे कोई छोटा-सा बछड़ा बड़े-बड़े बैलोंद्वारा ढोये जानेयोग्य महान् भार को नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्य का महान् भार मेरे लिये असह्य है

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॥ २ · ७३ · १७ ॥
अथवा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा। सकामां करिष्यामि त्वामहं पुत्रगृद्धिनीम्

athavā me bhavecchaktiryogairbuddhibalena vā।
sakāmāṁ na kariṣyāmi tvāmahaṁ putragṛddhinīm ॥

‘अथवा नाना प्रकार के उपायों तथा बुद्धिबल से मुझमें राज्य के भरण-पोषण की शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटे के लिये राज्य चाहनेवाली तुझ कैकेयी की मनःकामना पूरी नहीं होने दूँगा

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॥ २ · ७३ · १८ ॥
मे विकांक्षा जायेत त्यक्तुं त्वां पापनिश्चयाम्। यदि रामस्य नावेक्षा त्वयि स्यान्मातृवत् सदा

na me vikāṁkṣā jāyeta tyaktuṁ tvāṁ pāpaniścayām।
yadi rāmasya nāvekṣā tvayi syānmātṛvat sadā ॥

‘यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माता के समान नहीं देखते होते तो तेरी-जैसी पापपूर्ण विचारवाली माता का त्याग करने में मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती

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॥ २ · ७३ · १९ ॥
उत्पन्ना तु कथं बुद्धिस्तवेयं पापदर्शिनी। साधुचारित्रविभ्रष्टे पूर्वेषां नो विगर्हिता

utpannā tu kathaṁ buddhistaveyaṁ pāpadarśinī।
sādhucāritravibhraṣṭe pūrveṣāṁ no vigarhitā ॥

‘उत्तम चरित्र से गिरी हुई पापिनि! मेरे पूर्वजों ने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पाप पर ही दृष्टि रखनेवाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी?

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॥ २ · ७३ · २० ॥
अस्मिन् कुले हि सर्वेषां ज्येष्ठो राज्येऽभिषिच्यते। अपरे भ्रातरस्तस्मिन् प्रवर्तन्ते समाहिताः

asmin kule hi sarveṣāṁ jyeṣṭho rājye'bhiṣicyate।
apare bhrātarastasmin pravartante samāhitāḥ ॥

‘इस कुल में जो सबसे बड़ा होता है, उसीका राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानी के साथ बड़े की आज्ञा के अधीन रहकर कार्य करते हैं

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॥ २ · ७३ · २१ ॥
हि मन्ये नृशंसे त्वं राजधर्ममवेक्षसे। गतिं वा विजानासि राजवृत्तस्य शाश्वतीम्

na hi manye nṛśaṁse tvaṁ rājadharmamavekṣase।
gatiṁ vā na vijānāsi rājavṛttasya śāśvatīm ॥

‘क्रूर स्वभाववाली कैकेयि! मेरी समझ में तू राजधर्म पर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती। राजाओं के बर्ताव का जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है

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॥ २ · ७३ · २२ ॥
सततं राजपुत्रेषु ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते। राज्ञामेतत् समं तत् स्यादिक्ष्वाकूणां विशेषतः

satataṁ rājaputreṣu jyeṣṭho rājābhiṣicyate।
rājñāmetat samaṁ tat syādikṣvākūṇāṁ viśeṣataḥ ॥

‘राजकुमारों में जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसीका राजा के पद पर अभिषेक किया जाता है। सभी राजाओं के यहाँ समान रूप से इस नियम का पालन होता है। इक्ष्वाकुवंशी नरेशों के कुल में इसका विशेष आदर है

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॥ २ · ७३ · २३ ॥
तेषां धर्मैकरक्षाणां कुलचारित्रशोभिनाम्। अद्य चारित्रशौटीर्यं त्वां प्राप्य विनिवर्तितम्

teṣāṁ dharmaikarakṣāṇāṁ kulacāritraśobhinām।
adya cāritraśauṭīryaṁ tvāṁ prāpya vinivartitam ॥

‘जिनकी एकमात्र धर्म से ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचार के पालन से ही सुशोभित हुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभियान आज तुझे पाकर-तेरे सम्बन्ध के कारण दूर हो गया

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॥ २ · ७३ · २४ ॥
तवापि सुमहाभागे जनेन्द्रकुलपूर्वके। बुद्धिमोहः कथमयं सम्भूतस्त्वयि गर्हितः

tavāpi sumahābhāge janendrakulapūrvake।
buddhimohaḥ kathamayaṁ sambhūtastvayi garhitaḥ ॥

‘महाभागे! तेरा जन्म भी तो महाराज केकय के कुल में हुआ है, फिर तेरे हृदय में यह निन्दित बुद्धिमोह कैसे उत्पन्न हो गया?

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॥ २ · ७३ · २५ ॥
तु कामं करिष्यामि तवाहं पापनिश्चये। यया व्यसनमारब्धं जीवितान्तकरं मम

na tu kāmaṁ kariṣyāmi tavāhaṁ pāpaniścaye।
yayā vyasanamārabdhaṁ jīvitāntakaraṁ mama ॥

‘अरी! तेरा विचार बड़ा ही पापपूर्ण है। मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा। तूने मेरे लिये उस विपत्ति की नींव डाल दी है, जो मेरे प्राणतक ले सकती है

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॥ २ · ७३ · २६ ॥
एष त्विदानीमेवाहमप्रियार्थं तवानघम्। निवर्तयिष्यामि वनाद् भ्रातरं स्वजनप्रियम्

eṣa tvidānīmevāhamapriyārthaṁ tavānagham।
nivartayiṣyāmi vanād bhrātaraṁ svajanapriyam ॥

‘यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करने के लिये तुल गया हूँ। मैं वन से निष्पाप भ्राता श्रीराम को, जो स्वजनों के प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा

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॥ २ · ७३ · २७ ॥
निवर्तयित्वा रामं तस्याहं दीप्ततेजसः। दासभूतो भविष्यामि सुस्थितेनान्तरात्मना

nivartayitvā rāmaṁ ca tasyāhaṁ dīptatejasaḥ।
dāsabhūto bhaviṣyāmi susthitenāntarātmanā ॥

श्रीराम को लौटा लाकर उद्दीप्त तेजवाले उन्हीं महापुरुष का दास बनकर स्वस्थचित्त से जीवन व्यतीत करूँगा’

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॥ २ · ७३ · २८ ॥
इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम्। शोकार्दितश्चापि ननाद भूयः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः

ityevamuktvā bharato mahātmā priyetarairvākyagaṇaistudaṁstām।
śokārditaścāpi nanāda bhūyaḥ siṁho yathā mandarakandarasthaḥ ॥

ऐसा कहकर महात्मा भरत शोक से पीड़ित हो पुनः जली-कटी बातों से कैकेयी को व्यथित करते हुए उसे जोर-जोर से फटकारने लगे, मानो मन्दराचल की गुहा में बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७३ ॥