वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६८ · २२ श्लोकाःSarga 68 · 22 ślokas

वसिष्ठजीकी आज्ञासे पाँच दूतोंका अयोध्यासे केकयदेशके राजगृह नगरमें जाना

केकय-दूत-प्रेषण

“केकय-दूत-प्रेषण”
॥ २ · ६८ · ५–६ ॥

अयोध्याद्वारे उद्धृतदक्षिणहस्तः श्वेतवस्त्रो रुद्राक्षमालाभूषितो वसिष्ठः, पञ्च अश्वारूढान् दूतान् केकयराजगृहं प्रति त्वरितं प्रस्थातुम् आदिशति; प्रभातालोके ते तं नमन्तः अश्वान् परिवर्तयन्ति।

अयोध्या के तोरण-द्वार के पास श्वेत वस्त्र धारण किये, रुद्राक्ष-मालाओं से सज्जित गुरु वसिष्ठ खड़े हैं; उनका दाहिना हाथ उठा हुआ है, मानो आज्ञा दे रहे हों। सामने पाँच वीर दूत तेज घोड़ों पर सवार हैं — अग्रभाग में दो अपनी पीठ हमारी ओर किये (एक के कंधे पर केसरिया उत्तरीय, दूसरे की पीठ पर गोल ढाल), और पीछे तीन विविध पगड़ियों में मुनि की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं। भोर की सुनहरी किरणों में नगर के मन्दिर-शिखर चमक रहे हैं; मुनि उन्हें केकयदेश के राजगृह नगर की ओर शीघ्र प्रस्थान की आज्ञा दे रहे हैं, जहाँ से भरत को लौटा लाना है।

At the gateway of Ayodhya, the royal preceptor Vasishth — white-robed and garlanded with rudraksha beads — stands with his right hand raised in urgent command; before him five chosen messengers wait on spirited horses, two turned away from us in the foreground (one with a saffron scarf across his shoulder, another with a round shield slung on his back) and three in varied turbans gazing up at the sage. As the dawn light gilds the temple-towers of the city, he bids them ride with all speed to Rajagriha in the Kekaya land to bring prince Bharat home.

॥ २ · ६८ · १ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठः प्रत्युवाच ह। मित्रामात्यजनान् सर्वान् ब्राह्मणांस्तानिदं वचः

teṣāṁ tad vacanaṁ śrutvā vasiṣṭhaḥ pratyuvāca ha।
mitrāmātyajanān sarvān brāhmaṇāṁstānidaṁ vacaḥ ॥

मार्कण्डेय आदि के ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणों को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ २ · ६८ · २ ॥
यदसौ मातुलकुले दत्तराज्यः परं सुखी। भरतो वसति भ्रात्रा शत्रुघ्नेन मुदान्वितः

yadasau mātulakule dattarājyaḥ paraṁ sukhī।
bharato vasati bhrātrā śatrughnena mudānvitaḥ ॥

‘राजा दशरथ ने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नता के साथ निवास करते हैं

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॥ २ · ६८ · ३ ॥
तच्छीघ्रं जवना दूता गच्छन्तु त्वरितं हयैः। आनेतुं भ्रातरौ वीरौ किं समीक्षामहे वयम्

tacchīghraṁ javanā dūtā gacchantu tvaritaṁ hayaiḥ।
ānetuṁ bhrātarau vīrau kiṁ samīkṣāmahe vayam ॥

‘उन दोनों वीर बन्धुओं को बुलाने के लिये शीघ्र ही तेज चलनेवाले दूत घोड़ों पर सवार होकर यहाँ से जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं?’

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॥ २ · ६८ · ४ ॥
गच्छन्त्विति ततः सर्वे वसिष्ठं वाक्यमब्रुवन्। तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्

gacchantviti tataḥ sarve vasiṣṭhaṁ vākyamabruvan।
teṣāṁ tad vacanaṁ śrutvā vasiṣṭho vākyamabravīt ॥

इसपर सबने वसिष्ठजी से कहा—‘हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ।’ उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजी ने दूतों को सम्बोधित करके कहा—

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॥ २ · ६८ · ५ ॥
एहि सिद्धार्थ विजय जयन्ताशोकनन्दन। श्रूयतामितिकर्तव्यं सर्वानेव ब्रवीमि वः

ehi siddhārtha vijaya jayantāśokanandana।
śrūyatāmitikartavyaṁ sarvāneva bravīmi vaḥ ॥

“सिद्धार्थ! विजय! जयन्त! अशोक! और नन्दन! तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है, उसे सुनो। मैं तुम सब लोगों से ही कहता हूँ

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॥ २ · ६८ · ६ ॥
पुरं राजगृहं गत्वा शीघ्रं शीघ्रजवैर्हयैः। त्यक्तशोकैरिदं वाच्यः शासनाद् भरतो मम

puraṁ rājagṛhaṁ gatvā śīghraṁ śīghrajavairhayaiḥ।
tyaktaśokairidaṁ vācyaḥ śāsanād bharato mama ॥

“तुमलोग शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगर को जाओ और शोक का भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञा के अनुसार भरत से इस प्रकार कहो

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॥ २ · ६८ · ७ ॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे मन्त्रिणः। त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया

purohitastvāṁ kuśalaṁ prāha sarve ca mantriṇaḥ।
tvaramāṇaśca niryāhi kṛtyamātyayikaṁ tvayā ॥

“कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियों ने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँ से शीघ्र ही चलिये। अयोध्या में आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है

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॥ २ · ६८ · ८ ॥
मा चास्मै प्रोषितं रामं मा चास्मै पितरं मृतम्। भवन्तः शंसिषुर्गत्वा राघवाणामितः क्षयम्

mā cāsmai proṣitaṁ rāmaṁ mā cāsmai pitaraṁ mṛtam।
bhavantaḥ śaṁsiṣurgatvā rāghavāṇāmitaḥ kṣayam ॥

‘भरत को श्रीरामचन्द्र के वनवास और पिता को मृत्यु का हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियों के कारण रघुवंशियों के यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना

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॥ २ · ६८ · ९ ॥
कौशेयानि वस्त्राणि भूषणानि वराणि च। क्षिप्रमादाय राज्ञश्च भरतस्य गच्छत

kauśeyāni ca vastrāṇi bhūṣaṇāni varāṇi ca।
kṣipramādāya rājñaśca bharatasya ca gacchata ॥

“केकयराज तथा भरत को भेंट देने के लिये रेशमी वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुमलोग यहाँ से शीघ्र चल दो’

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॥ २ · ६८ · १० ॥
दत्तपथ्यशना दूता जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम्। केकयांस्ते गमिष्यन्तो हयानारुह्य सम्मतान्

dattapathyaśanā dūtā jagmuḥ svaṁ svaṁ niveśanam।
kekayāṁste gamiṣyanto hayānāruhya sammatān ॥

केकय देश को जानेवाले वे दूत रास्ते का खर्च ले अच्छे घोड़ों पर सवार हो अपने-अपने घर को गये

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॥ २ · ६८ · ११ ॥
ततः प्रास्थानिकं कृत्वा कार्यशेषमनन्तरम्। वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञाता दूताः संत्वरितं ययुः

tataḥ prāsthānikaṁ kṛtvā kāryaśeṣamanantaram।
vasiṣṭhenābhyanujñātā dūtāḥ saṁtvaritaṁ yayuḥ ॥

तदनन्तर यात्रासम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वसिष्ठजी की आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँ से प्रस्थित हो गये

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॥ २ · ६८ · १२ ॥
न्यन्तेनापरतालस्य प्रलम्बस्योत्तरं प्रति। निषेवमाणास्ते जग्मुर्नदीं मध्येन मालिनीम्

nyantenāparatālasya pralambasyottaraṁ prati।
niṣevamāṇāste jagmurnadīṁ madhyena mālinīm ॥

अपरताल नामक पर्वत के अन्तिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरि के उत्तरभाग में दोनों पर्वतों के बीच से बहनेवाली मालिनी नदी के तट पर होते हुए वे दूत आगे बढ़े

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॥ २ · ६८ · १३ ॥
ते हास्तिनपुरे गङ्गां तीर्त्वा प्रत्यङ्मुखा ययुः। पाञ्चालदेशमासाद्य मध्येन कुरुजाङ्गलम्

te hāstinapure gaṅgāṁ tīrtvā pratyaṅmukhā yayuḥ।
pāñcāladeśamāsādya madhyena kurujāṅgalam ॥

हस्तिनापुर में गङ्गा को पार करके वे पश्चिम की ओर गये और पाञ्चालदेश में पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेश के बीच से होते हुए आगे बढ़ गये

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॥ २ · ६८ · १४ ॥
सरांसि सुफुल्लानि नदीश्च विमलोदकाः। निरीक्षमाणा जग्मुस्ते दूताः कार्यवशादद्रुतम्

sarāṁsi ca suphullāni nadīśca vimalodakāḥ।
nirīkṣamāṇā jagmuste dūtāḥ kāryavaśādadrutam ॥

मार्ग में सुन्दर फूलों से सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जलवाली नदियों का दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्र-गति से आगे बढ़ते गये

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॥ २ · ६८ · १५ ॥
ते प्रसन्नोदकां दिव्यां नानाविहगसेविताम्। उपातिजग्मुर्वेगेन शरदण्डां जलाकुलाम्

te prasannodakāṁ divyāṁ nānāvihagasevitām।
upātijagmurvegena śaradaṇḍāṁ jalākulām ॥

तदनन्तर वे स्वच्छ जल से सुशोभित, पानी से भरी हुई और भाँति-भाँति के पक्षियों से सेवित दिव्य नदी शरदण्डा के तट पर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये

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॥ २ · ६८ · १६ ॥
निकूलवृक्षमासाद्य दिव्यं सत्योपयाचनम्। अभिगम्याभिवाद्य तं कुलिङ्गां प्राविशन् पुरीम्

nikūlavṛkṣamāsādya divyaṁ satyopayācanam।
abhigamyābhivādya taṁ kuliṅgāṁ prāviśan purīm ॥

शरदण्डा के पश्चिमतट पर एक दिव्य वृक्ष था, जिसपर किसी देवता का आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य (सफल) होती थी, अतः उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था। उस वन्दनीय वृक्ष के निकट पहुँचकर दूतों ने उसकी परिक्रमा की और वहाँ से आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरी में प्रवेश किया

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॥ २ · ६८ · १७ ॥
अभिकालं ततः प्राप्य तेजोऽभिभवनाच्च्युताः। पितृपैतामहीं पुण्यां तेरुरिक्षुमतीं नदीम्

abhikālaṁ tataḥ prāpya tejo'bhibhavanāccyutāḥ।
pitṛpaitāmahīṁ puṇyāṁ terurikṣumatīṁ nadīm ॥

वहाँ से तेजोऽभिभवन नामक गाँव को पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँव में पहुँचे और वहाँ से आगे बढ़ने पर उन्होंने राजा दशरथ के पिता-पितामहोंद्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदी को पार किया

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॥ २ · ६८ · १८ ॥
अवेक्ष्याञ्जलिपानांश्च ब्राह्मणान् वेदपारगान्। ययुर्मध्येन बाह्लीकान् सुदामानं पर्वतम्

avekṣyāñjalipānāṁśca brāhmaṇān vedapāragān।
yayurmadhyena bāhlīkān sudāmānaṁ ca parvatam ॥

वहाँ केवल अञ्जलि भर जल पीकर तपस्या करनेवाले वेदों के पारगामी ब्राह्मणों का दर्शन करके वे दूत बाह्लीक देश के मध्यभाग में स्थित सुदामा नामक पर्वत के पास जा पहुँचे

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॥ २ · ६८ · १९ ॥
विष्णोः पदं प्रेक्ष्यमाणा विपाशां चापि शाल्मलीम्। नदीर्वापीतटाकानि पल्वलानि सरांसि

viṣṇoḥ padaṁ prekṣyamāṇā vipāśāṁ cāpi śālmalīm।
nadīrvāpītaṭākāni palvalāni sarāṁsi ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६८ · २० ॥
पश्यन्तो विविधांश्चापि सिंहान् व्याघ्रान् मृगान् द्विपान्। ययुः पथातिमहता शासनं भर्तुरीप्सवः

paśyanto vividhāṁścāpi siṁhān vyāghrān mṛgān dvipān।
yayuḥ pathātimahatā śāsanaṁ bharturīpsavaḥ ॥

॥ १९–२० ॥

उस पर्वत के शिखर पर स्थित भगवान् विष्णु के चरणचिह्न का दर्शन करके वे विपाशा (व्यास) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्ष के निकट गये। वहाँ से आगे बढ़ने पर बहुत-सी नदियों, बावड़ियों, पोखरों, छोटे तालाबों, सरोवरों तथा भाँति-भाँति के वनजन्तुओं—सिंह, व्याघ्र, मृग और हाथियों का दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्ग के द्वारा आगे बढ़ने लगे। वे अपने स्वामी की आज्ञा का शीघ्र पालन करने की इच्छा रखते थे

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॥ २ · ६८ · २१ ॥
ते श्रान्तवाहना दूता विकृष्टेन सता पथा। गिरिव्रजं पुरवरं शीघ्रमासेदुरञ्जसा

te śrāntavāhanā dūtā vikṛṣṭena satā pathā।
girivrajaṁ puravaraṁ śīghramāsedurañjasā ॥

उन दूतों के वाहन (घोड़े) चलते-चलते थक गये थे। वह मार्ग बड़ी दूर का होने पर उपद्रव से रहित था। उसे तै करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्ट के श्रेष्ठ नगर गिरिव्रज में जा पहुँचे

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॥ २ · ६८ · २२ ॥
भर्तुः प्रियार्थं कुलरक्षणार्थं भर्तुश्च वंशस्य परिग्रहार्थम्। अहेडमानास्त्वरया स्म दूता रात्र्यां तु ते तत्पुरमेव याताः

bhartuḥ priyārthaṁ kularakṣaṇārthaṁ bhartuśca vaṁśasya parigrahārtham।
aheḍamānāstvarayā sma dūtā rātryāṁ tu te tatpurameva yātāḥ ॥

अपने स्वामी (आज्ञा देनेवाले वसिष्ठजी) का प्रिय और प्रजावर्ग की रक्षा करने तथा महाराज दशरथ के वंशपरम्परागत राज्य को भरतजी से स्वीकार कराने के लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावली के साथ चलकर रात में ही उस नगर में जा पहुँचे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥