वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६५ · २९ श्लोकाःSarga 65 · 29 ślokas

वन्दीजनोंका स्तुतिपाठ, राजा दशरथको दिवंगत हुआ जान उनकी रानियोंका करुण-विलाप

रानियोंका करुण-विलाप

“रानियोंका करुण-विलाप”
॥ २ · ६५ · २२–२५ ॥

प्रभाते श्वेताम्बराः विधवाः देव्यः पुष्पास्तीर्णशय्यायां निष्प्राणं दशरथं परिवार्य 'हा नाथ' इति क्रोशन्त्यः भूमौ पतिताः — कौसल्या चरणयोः, सुमित्रा पार्श्वे, कैकेयी तु पृथक् शोकग्लानिविह्वला; समन्ततः परिचारिका आक्रन्दन्ति।

भोरके धुँधले उजालेमें, श्वेत वस्त्रोंमें लिपटी नवविधवा रानियाँ पुष्पोंसे ढकी शय्यापर निष्प्राण पड़े महाराज दशरथके चारों ओर बिखर गयी हैं — कौसल्या राजाके चरणोंपर औंधी होकर बिलख रही हैं, सुमित्रा उनके शरीरपर काँपता हाथ रखे व्यथित झुकी हैं, और कैकेयी अलग एक ओर, छातीपर हाथ धरे, मुखपर उभरते अपराधबोधके साथ स्तब्ध बैठी हैं; पीछे श्वेतवसना सेविकाओंका समूह बाँहें उठाये करुण आर्तनाद कर रहा है, और मेहराबसे झाँकते धुँधले गुम्बद शोकके इस प्रभातको साक्षी दे रहे हैं।

In the grey light of dawn the newly-widowed queens — stripped to plain undyed white — have collapsed about the flower-strewn couch where King Dasharath lies lifeless: Kausalya fallen weeping across his feet, Sumitra bent over his body with a trembling hand, and Kaikeyi apart to one side, a hand pressed to her breast, her face frozen with dawning guilt; behind them a throng of white-clad serving-women wail with upraised arms, while through an arch the distant domes of Ayodhya wake to a day of shattering grief.

॥ २ · ६५ · १ ॥
अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि। वन्दिनः पर्युपातिष्ठंस्तत्पार्थिवनिवेशनम्

atha rātryāṁ vyatītāyāṁ prātarevāpare'hani।
vandinaḥ paryupātiṣṭhaṁstatpārthivaniveśanam ॥

तदनन्तर रात बीतने पर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन (महाराज की स्तुति करने के लिये) राजमहल में उपस्थित हुए

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॥ २ · ६५ · २ ॥
सूताः परमसंस्काराः मागधाश्चोत्तमश्रुताः। गायकाः श्रुतिशीलाश्च निगदन्तः पृथक्पृथक्

sūtāḥ paramasaṁskārāḥ māgadhāścottamaśrutāḥ।
gāyakāḥ śrutiśīlāśca nigadantaḥ pṛthakpṛthak ॥

व्याकरण-ज्ञान से सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारों से विभूषित) सूत, उत्तमरूप से वंशपरम्परा का श्रवण करानेवाले मागध और सङ्गीतशास्त्र का अनुशीलन करनेवाले गायक अपने-अपने मार्ग के अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये

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॥ २ · ६५ · ३ ॥
राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम्। प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत

rājānaṁ stuvatāṁ teṣāmudāttābhihitāśiṣām।
prāsādābhogavistīrṇaḥ stutiśabdo hyavartata ॥

उच्चस्वर से आशीर्वाद देते हुए राजा की स्तुति करनेवाले उन सूत-मागध आदि का शब्द राजमहलों के भीतरी भाग में फैलकर गूँजने लगा

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॥ २ · ६५ · ४ ॥
ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादकाः। अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन्

tatastu stuvatāṁ teṣāṁ sūtānāṁ pāṇivādakāḥ।
apadānānyudāhṛtya pāṇivādānyavādayan ॥

वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतनेही में पाणिवादक (हाथों से ताल देकर गानेवाले) वहाँ आये और राजाओं के बीते हुए अद्भुत कर्मों का बखान करते हुए तालगति के अनुसार तालियाँ बजाने लगे

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॥ २ · ६५ · ५ ॥
तेन शब्देन विहगाः प्रतिबुद्धाश्च सस्वनुः। शाखास्थाः पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचराः

tena śabdena vihagāḥ pratibuddhāśca sasvanuḥ।
śākhāsthāḥ pañjarasthāśca ye rājakulagocarāḥ ॥

उस शब्द से वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हुए तथा राजकुल में ही विचरनेवाले पिंजड़े में बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे

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॥ २ · ६५ · ६ ॥
व्याहृताः पुण्यशब्दाश्च वीणानां चापि निःस्वनाः। आशीर्गेयं गाथानां पूरयामास वेश्म तत्

vyāhṛtāḥ puṇyaśabdāśca vīṇānāṁ cāpi niḥsvanāḥ।
āśīrgeyaṁ ca gāthānāṁ pūrayāmāsa veśma tat ॥

शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणों के मुख से निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओं के मधुर नाद तथा गाथाओं के आशीर्वादयुक्त गान से वह सारा भवन गूँज उठा

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॥ २ · ६५ · ७ ॥
ततः शुचिसमाचाराः पर्युपस्थानकोविदाः। स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठा उपतस्थुर्यथापुरा

tataḥ śucisamācārāḥ paryupasthānakovidāḥ।
strīvarṣavarabhūyiṣṭhā upatasthuryathāpurā ॥

तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजों की संख्या अधिक थी, पहले की भाँति उस दिन भी राजभवन में उपस्थित हुए

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॥ २ · ६५ · ८ ॥
हरिचन्दनसम्पृक्तमुदकं काञ्चनैर्घटैः। आनिन्युः स्नानशिक्षाज्ञा यथाकालं यथाविधि

haricandanasampṛktamudakaṁ kāñcanairghaṭaiḥ।
āninyuḥ snānaśikṣājñā yathākālaṁ yathāvidhi ॥

स्नानविधि के ज्ञाता भृत्यजन विधिपूर्वक सोने के घड़ों में चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समय पर आये

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॥ २ · ६५ · ९ ॥
मङ्गलालम्भनीयानि प्राशनीयान्युपस्करान्। उपानिन्युस्तथा पुण्याः कुमारीबहुलाः स्त्रियः

maṅgalālambhanīyāni prāśanīyānyupaskarān।
upāninyustathā puṇyāḥ kumārībahulāḥ striyaḥ ॥

पवित्र आचार-विचारवाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओं की संख्या अधिक थी, मङ्गल के लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीनेयोग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण—दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं

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॥ २ · ६५ · १० ॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वं विधिवदर्चितम्। सर्वं सुगुणलक्ष्मीवत् तदभूदाभिहारिकम्

sarvalakṣaṇasampannaṁ sarvaṁ vidhivadarcitam।
sarvaṁ suguṇalakṣmīvat tadabhūdābhihārikam ॥

प्रातःकाल राजाओं के मङ्गल के लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, विधि के अनुरूप, आदर और प्रशंसा के योग्य उत्तम गुण से युक्त तथा शोभायमान थी

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॥ २ · ६५ · ११ ॥
ततः सूर्योदयं यावत् सर्वं परिसमुत्सुकम्। तस्थावनुपसम्प्राप्तं किंस्विदित्युपशङ्कितम्

tataḥ sūryodayaṁ yāvat sarvaṁ parisamutsukam।
tasthāvanupasamprāptaṁ kiṁsvidityupaśaṅkitam ॥

सूर्योदय होनेतक राजा को सेवा के लिये उत्सुक हुआ सारा परिजनवर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समयतक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मन में यह शङ्का हो गयी कि महाराज के न आने का क्या कारण हो सकता है?

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॥ २ · ६५ · १२ ॥
अथ याः कोसलेन्द्रस्य शयनं प्रत्यनन्तराः। ताः स्त्रियस्तु समागम्य भर्तारं प्रत्यबोधयन्

atha yāḥ kosalendrasya śayanaṁ pratyanantarāḥ।
tāḥ striyastu samāgamya bhartāraṁ pratyabodhayan ॥

तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथ के समीप रहनेवाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्या के पास जाकर अपने स्वामी को जगाने लगीं

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॥ २ · ६५ · १३ ॥
अथाप्युचितवृत्तास्ता विनयेन नयेन च। नह्यस्य शयनं स्पृष्ट्वा किंचिदप्युपलेभिरे

athāpyucitavṛttāstā vinayena nayena ca।
nahyasya śayanaṁ spṛṣṭvā kiṁcidapyupalebhire ॥

वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करने के योग्य थीं; अतः विनीतभाव से युक्तिपूर्वक उन्होंने उनको शय्या का स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवन का कोई चिह्न नहीं पा सकीं

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॥ २ · ६५ · १४ ॥
ताः स्त्रियः स्वप्नशीलज्ञाश्चेष्टां संचलनादिषु। ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शङ्किताः

tāḥ striyaḥ svapnaśīlajñāśceṣṭāṁ saṁcalanādiṣu।
tā vepathuparītāśca rājñaḥ prāṇeṣu śaṅkitāḥ ॥

सोये हुए पुरुष की जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अतः उन्होंने हृदय एवं हाथ के मूलभाग में चलनेवाली नाड़ियों की भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई। फिर तो वे काँप उठीं। उनके मन में राजा के प्राणों के निकल जाने की आशङ्का हो गयी

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॥ २ · ६५ · १५ ॥
प्रतिस्रोतस्तृणाग्राणां सदृशं संचकाशिरे। अथ संदेहमानानां स्त्रीणां दृष्ट्वा पार्थिवम्। यत् तदाशङ्कितं पापं तदा जज्ञे विनिश्चयः

pratisrotastṛṇāgrāṇāṁ sadṛśaṁ saṁcakāśire।
atha saṁdehamānānāṁ strīṇāṁ dṛṣṭvā ca pārthivam।
yat tadāśaṅkitaṁ pāpaṁ tadā jajñe viniścayaḥ ॥

वे जल के प्रवाह के सम्मुख पड़े हुए तिनकों के अग्रभाग की भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशय में पड़ी हुई उन स्त्रियों को राजा की ओर देखकर उनकी मृत्यु के विषय में जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया

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॥ २ · ६५ · १६ ॥
कौसल्या सुमित्रा पुत्रशोकपराजिते। प्रसुप्ते प्रबुध्येते यथा कालसमन्विते

kausalyā ca sumitrā ca putraśokaparājite।
prasupte na prabudhyete yathā kālasamanvite ॥

पुत्रशोक से आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुई के समान सो गयी थीं और उस समयतक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी

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॥ २ · ६५ · १७ ॥
निष्प्रभासा विवर्णा सन्ना शोकेन संनता। व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता

niṣprabhāsā vivarṇā ca sannā śokena saṁnatā।
na vyarājata kausalyā tāreva timirāvṛtā ॥

सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीर का रंग बदल गया था। वे शोक से पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकार से आच्छादित हुई तारिका के समान शोभा नहीं पा रही थीं

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॥ २ · ६५ · १८ ॥
कौसल्यानन्तरं राज्ञः सुमित्रा तदनन्तरम्। स्म विभ्राजते देवी शोकाश्रुलुलितानना

kausalyānantaraṁ rājñaḥ sumitrā tadanantaram।
na sma vibhrājate devī śokāśrululitānanā ॥

राजा के पास कौसल्या थीं और कौसल्या के समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जाने के कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनों के मुख पर शोक के आँसू फैले हुए थे

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॥ २ · ६५ · १९ ॥
ते दृष्ट्वा तदा सुप्ते उभे देव्यौ तं नृपम्। सुप्तमेवोद्धृतप्राणमन्तःपुरममन्यत

te ca dṛṣṭvā tadā supte ubhe devyau ca taṁ nṛpam।
suptamevoddhṛtaprāṇamantaḥpuramamanyata ॥

उस समय उन दोनों देवियों को निद्रामग्न देख अन्तःपुर को अन्य स्त्रियों ने यही समझा कि सोते अवस्था में ही महाराज के प्राण निकल गये हैं

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॥ २ · ६५ · २० ॥
ततः प्रचुक्रुशुर्दीनाः सस्वरं ता वराङ्गनाः। करेणेव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपाः

tataḥ pracukruśurdīnāḥ sasvaraṁ tā varāṅganāḥ।
kareṇeva ivāraṇye sthānapracyutayūthapāḥ ॥

फिर तो जैसे जंगल में यूथपति गजराज के अपने वासस्थान से अन्यत्र चले जाने पर हथिनियाँ करुण चीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्तःपुर की सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुःखी हो उच्चस्वर से आर्तनाद करने लगीं

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॥ २ · ६५ · २१ ॥
तासामाक्रन्दशब्देन सहसोद्धृतचेतने। कौसल्या सुमित्रा त्यक्तनिद्रे बभूवतुः

tāsāmākrandaśabdena sahasoddhṛtacetane।
kausalyā ca sumitrā ca tyaktanidre babhūvatuḥ ॥

उनके रोने की आवाज से कौसल्या और सुमित्रा की भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं

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॥ २ · ६५ · २२ ॥
कौसल्या सुमित्रा दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पार्थिवम्। हा नाथेति परिक्रुश्य पेततुर्धरणीतले

kausalyā ca sumitrā ca dṛṣṭvā spṛṣṭvā ca pārthivam।
hā nātheti parikruśya petaturdharaṇītale ॥

कौसल्या और सुमित्रा ने राजा को देखा, उनके शरीर का स्पर्श किया और ‘हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वी पर गिर पड़ीं

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॥ २ · ६५ · २३ ॥
सा कोसलेन्द्रदुहिता चेष्टमाना महीतले। भ्राजते रजोध्वस्ता तारेव गगनच्युता

sā kosalendraduhitā ceṣṭamānā mahītale।
na bhrājate rajodhvastā tāreva gaganacyutā ॥

कोसलराजकुमारी कौसल्या धरती पर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि-धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाश से टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूल में लोट रही हो

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॥ २ · ६५ · २४ ॥
नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्यां पतितां भुवि। अपश्यंस्ताः स्त्रियः सर्वा हतां नागवधूमिव

nṛpe śāntaguṇe jāte kausalyāṁ patitāṁ bhuvi।
apaśyaṁstāḥ striyaḥ sarvā hatāṁ nāgavadhūmiva ॥

राजा दशरथ के शरीर की उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जाने पर भूमि पर अचेत पड़ी हुई कौसल्या को अन्तःपुर की उन सारी स्त्रियों ने मरी हुई नागिन के समान देखा

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॥ २ · ६५ · २५ ॥
ततः सर्वा नरेन्द्रस्य कैकेयीप्रमुखाः स्त्रियः। रुदन्त्यः शोकसंतप्ता निपेतुर्गतचेतनाः

tataḥ sarvā narendrasya kaikeyīpramukhāḥ striyaḥ।
rudantyaḥ śokasaṁtaptā nipeturgatacetanāḥ ॥

तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराज की कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोक से संतप्त होकर रोने लगीं और अचेत होकर गिर पड़ीं

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॥ २ · ६५ · २६ ॥
ताभिः बलवान् नादः क्रोशन्तीभिरनुद्रुतः। येन स्फीतीकृतो भूयस्तद् गृहं समनादयत्

tābhiḥ sa balavān nādaḥ krośantībhiranudrutaḥ।
yena sphītīkṛto bhūyastad gṛhaṁ samanādayat ॥

उन क्रन्दन करती हुई रानियों ने वहाँ पहले से होनेवाले प्रबल आर्तनाद को और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनाद से वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोर से गूँज उठा

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॥ २ · ६५ · २७ ॥
तत् परित्रस्तसम्भ्रान्तपर्युत्सुकजनाकुलम्। सर्वतस्तुमुलाक्रन्दं परितापार्तबान्धवम्

tat paritrastasambhrāntaparyutsukajanākulam।
sarvatastumulākrandaṁ paritāpārtabāndhavam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६५ · २८ ॥
सद्योनिपतितानन्दं दीनं विक्लवदर्शनम्। बभूव नरदेवस्य सद्य दिष्टान्तमीयुषः

sadyonipatitānandaṁ dīnaṁ viklavadarśanam।
babhūva naradevasya sadya diṣṭāntamīyuṣaḥ ॥

॥ २७–२८ ॥

कालधर्म को प्राप्त हुए राजा दशरथ का वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्यों से भर गया। सब ओर रोने-चिल्लाने का भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजा के सभी बन्धु-बान्धव शोक-संताप से पीड़ित होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुःखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा

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॥ २ · ६५ · २९ ॥
अतीतमाज्ञाय तु पार्थिवर्षभं यशस्विनं तं परिवार्य पत्न्यः। भृशं रुदन्त्यः करुणं सुदुःखिताः प्रगृह्य बाहू व्यलपन्ननाथवत्

atītamājñāya tu pārthivarṣabhaṁ
yaśasvinaṁ taṁ parivārya patnyaḥ।
bhṛśaṁ rudantyaḥ karuṇaṁ suduḥkhitāḥ
pragṛhya bāhū vyalapannanāthavat ॥

उन यशस्वी भूपालशिरोमणि को दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर अत्यन्त दुःखी हो जोर-जोर से रोने लगीं और उनकी दोनों बाहें पकड़कर अनाथ की भाँति करुण-विलाप करने लगीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥