राजा दशरथका शोक और उनका कौसल्यासे अपने द्वारा मुनिकुमारके मारे जानेका प्रसङ्ग सुनाना
“शब्दवेधी बाण”
॥ २ · ६३ · २४–२५ ॥
पूर्णेन्दुभासिते सरयूतीरे कुम्भं पूरयन् वल्कलधरो मुनिबालः शब्दवेधिशरेण विद्धो भूमौ पतितः, स्रवन्तं निकुब्जकुम्भं प्रति करं प्रसारयति; उपरि तरुणो दशरथः सचापः प्रसारितबाहुः त्रस्तस्तब्धाननः गजभ्रान्त्या हतमिमं मुनिं ज्ञात्वा तं प्रति धावति।
पूर्णचन्द्रके उजालेमें सरयूके सरकंडोंसे भरे तटपर जल भरने झुके वल्कलधारी तपस्वी बालक श्रवण दशरथके शब्दवेधी बाणसे बिंधकर गिर पड़ा है — उसके वक्षमें पंखयुक्त बाण धँसा है, रक्त बह रहा है, और उसका हाथ अब भी ढुलके हुए घड़ेकी ओर बढ़ रहा है, जिससे जल छलककर नदीमें गिर रहा है; ऊपर युवा राजकुमार दशरथ अपना विशाल धनुष लिये, एक हाथ फैलाये, यह जानकर कि जिसे हाथी समझकर मारा वह तो मुनिकुमार था, भयभीत-स्तब्ध मुखसे उसकी ओर दौड़ पड़ा है।
By the light of the full moon on the reedy bank of the Sarayu, the young ascetic Shravan — stooping to fill his clay pot — has been pierced by Dasharath's sound-aimed arrow and lies fallen; the feathered shaft is buried in his chest, blood darkening the bark cloth, his hand still reaching toward the toppled pot that spills its water into the river; above him the youthful prince Dasharath, his great bow still in hand and one arm flung out, rushes forward aghast, realizing that the sound he shot at — taken for an elephant drinking — was this holy boy.
pratibuddho muhūrtena śokopahatacetanaḥ।
atha rājā daśarathaḥ sa cintāmabhyapadyata ॥
राजा दशरथ दो ही घड़ी के बाद फिर जाग उठे। उस समय उनका हृदय शोक से व्याकुल हो रहा था। वे मन-ही-मन चिन्ता करने लगे
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rāmalakṣmaṇayoścaiva vivāsād vāsavopamam।
āpede upasargastaṁ tamaḥ sūryamivāsuram ॥
श्रीराम और लक्ष्मण के वन में चले जाने से इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज दशरथ को शोक ने उसी प्रकार धर दबाया था, जैसे राहु का अन्धकार सूर्य को ढक देता है
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sabhārye hi gate rāme kausalyāṁ kosaleśvaraḥ।
vivakṣurasitāpāṅgīṁ smṛtvā duṣkṛtamātmanaḥ ॥
पत्नीसहित श्रीराम के वन में चले जाने पर कोसलनरेश दशरथ ने अपने पुरातन पाप का स्मरण करके कजरारे नेत्रोंवाली कौसल्या से कहने का विचार किया
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sa rājā rajanīṁ ṣaṣṭhīṁ rāme pravrājite vanam।
ardharātre daśarathaḥ so'smarad duṣkṛtaṁ kṛtam ॥
उस समय श्रीरामचन्द्रजी को वन में गये छठी रात बीत रही थी। जब आधी रात हुई, तब राजा दशरथ को उस पहले के किये हुए दुष्कर्म का स्मरण हुआ
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sa rājā putraśokārtaḥ smṛtvā duṣkṛtamātmanaḥ।
kausalyāṁ putraśokārtāmidaṁ vacanamabravīt ॥
पुत्रशोक से पीड़ित हुए महाराज ने अपने उस दुष्कर्म को याद करके पुत्रशोक से व्याकुल हुई कौसल्या से इस प्रकार कहना आरम्भ किया—
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yadācarati kalyāṇi śubhaṁ vā yadi vāśubham।
tadeva labhate bhadre kartā karmajamātmanaḥ ॥
‘कल्याणि! मनुष्य शुभ या अशुभ जो भी कर्म करता है, भद्रे! अपने उसी कर्म के फलस्वरूप सुख या दुःख कर्ता को प्राप्त होते हैं
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gurulāghavamarthānāmārambhe karmaṇāṁ phalam।
doṣaṁ vā yo na jānāti sa bāla iti hocyate ॥
‘जो कर्मों का आरम्भ करते समय उनके फलों की गुरुता या लघुता को नहीं जानता, उनसे होनेवाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोष को नहीं समझता, वह मनुष्य बालक (मूर्ख) कहा जाता है
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kaścidāmravaṇaṁ chittvā palāśāṁśca niṣiñcati।
puṣpaṁ dṛṣṭvā phale gṛdhnuḥ sa śocati phalāgame ॥
‘कोई मनुष्य पलाश का सुन्दर फूल देखकर मन-ही-मन यह अनुमान करके कि इसका फल और भी मनोहर तथा सुस्वादु होगा, फल की अभिलाषा से आम के बगीचे को काटकर वहाँ पलाश के पौदे लगाता और सींचता है, वह फल लगने के समय पश्चात्ताप करता है (क्योंकि उससे अपनी आशा के अनुरूप फल वह नहीं पाता है)
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avijñāya phalaṁ yo hi karma tvevānudhāvati।
sa śocet phalavelāyāṁ yathā kiṁśukasecakaḥ ॥
‘जो क्रियमाण कर्म के फल का ज्ञान या विचार न करके केवल कर्म की ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलने के समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचनेवाले को हुआ करता है
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so'hamāmravaṇaṁ chittvā palāśāṁśca nyaṣecayam।
rāmaṁ phalāgame tyaktvā paścācchocāmi durmatiḥ ॥
‘मैंने भी आम का वन काटकर पलाशों को ही सींचा है, इस कर्म के फल की प्राप्ति के समय अब श्रीराम को खोकर मैं पश्चात्ताप कर रहा हूँ। मेरी बुद्धि कैसी खोटी है?
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labdhaśabdena kausalye kumāreṇa dhanuṣmatā।
kumāraḥ śabdavedhīti mayā pāpamidaṁ kṛtam ॥
‘कौसल्ये! पिता के जीवनकाल में जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धर के रूप में मेरी ख्याति फैल गयी थी। सब लोग यही कहते थे कि ‘राजकुमार दशरथ शब्द-वेधी बाण चलाना जानते हैं।’ इसी ख्याति में पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था (जिसे अभी बताऊँगा)
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tadidaṁ me'nusamprāptaṁ devi duḥkhaṁ svayaṁkṛtam।
sammohādiha bālena yathā syād bhakṣitaṁ viṣam ॥
‘देवि! उस अपने ही किये हुए कुकर्म का फल मुझे इस महान् दुःख के रूप में प्राप्त हुआ है। जैसे कोई बालक अज्ञानवश विष खा ले तो उसे भी वह विष मार ही डालता है, उसी प्रकार मोह या अज्ञानवश किये हुए दुष्कर्म का फल भी यहाँ मुझे भोगना पड़ रहा है
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yathānyaḥ puruṣaḥ kaścit palāśairmohito bhavet।
evaṁ mayāpyavijñātaṁ śabdavedhyamidaṁ phalam ॥
‘जैसे दूसरा कोई गँवार मनुष्य पलाश के फूलों पर ही मोहित हो उसके कड़वे फल को नहीं जानता, उसी प्रकार मैं भी ‘शब्दवेधी बाण-विद्या’ की प्रशंसा सुनकर उसपर लट्टू हो गया। उसके द्वारा ऐसा क्रूरतापूर्ण पापकर्म बन सकता है और ऐसा भयंकर फल प्राप्त हो सकता है, इसका ज्ञान मुझे नहीं हुआ
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devyanūḍhā tvamabhavo yuvarājo bhavāmyaham।
tataḥ prāvṛḍanuprāptā mama kāmavivardhinī ॥
‘देवि! तुम्हारा विवाह नहीं हुआ था और मैं अभी युवराज ही था, उन्हीं दिनों की बात है। मेरी कामभावना को बढ़ानेवाली वर्षा ऋतु आयी
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apāsya hi rasān bhaumāṁstaptvā ca jagadaṁśubhiḥ।
paretācaritāṁ bhīmāṁ ravirācarate diśam ॥
‘सूर्यदेव पृथ्वी के रसों को सुखाकर और जगत् को अपनी किरणों से भलीभाँति संतप्त करके जिसमें यमलोकवर्ती प्रेत विचरा करते हैं, उस भयंकर दक्षिण दिशा में संचरण करते थे
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uṣṇamantardadhe sadyaḥ snigdhā dadṛśire ghanāḥ।
tato jahṛṣire sarve bhekasāraṅgabarhiṇaḥ ॥
‘सब ओर सजल मेघ दृष्टिगोचर होने लगे और गरमी तत्काल शान्त हो गयी; इससे समस्त मेढकों, चातकों और मयूरों में हर्ष छा गया
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klinnapakṣottarāḥ snātāḥ kṛcchrādiva patattriṇaḥ।
vṛṣṭivātāvadhūtāgrān pādapānabhipedire ॥
‘पक्षियों की पाँखें ऊपर से भींग गयी थीं। वे नहा उठे थे और बड़ी कठिनाई से उन वृक्षोंतक पहुँच पाते थे, जिनकी डालियों के अग्रभाग वर्षा और वायु के झोकों से झूम रहे थे
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patitenāmbhasā''cchannaḥ patamānena cāsakṛt।
ābabhau mattasāraṅgastoyarāśirivācalaḥ ॥
‘गिरे हुए और बारंबार गिरते हुए जल से आच्छादित हुआ मतवाला हाथी तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र तथा भीगे पर्वत के समान प्रतीत होता था
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pāṇḍurāruṇavarṇāni srotāṁsi vimalānyapi।
susruburgiridhātubhyaḥ sabhasmāni bhujaṁgavat ॥
‘पर्वतों से गिरनेवाले स्रोत या झरने निर्मल होने पर भी पर्वतीय धातुओं के सम्पर्क से श्वेत, लाल और भस्मयुक्त होकर सर्पों की भाँति कुटिल गति से बह रहे थे
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tasminnatisukhe kāle dhanuṣmāniṣumān rathī।
vyāyāmakṛtasaṁkalpaḥ sarayūmanvagāṁ nadīm ॥
‘वर्षा ऋतु के उस अत्यन्त सुखद सुहावने समय में मैं धनुष-बाण लेकर रथ पर सवार हो शिकार खेलने के लिये सरयू नदी के तट पर गया
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nipāne mahiṣaṁ rātrau gajaṁ vābhyāgataṁ mṛgam।
anyad vā śvāpadaṁ kiṁcijjighāṁsurajitendriyaḥ ॥
‘मेरी इन्द्रियाँ मेरे वश में नहीं थीं। मैंने सोचा था कि पानी पीने के घाट पर रात के समय जब कोई उपद्रवकारी भेंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह-व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा
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athāndhakāre tvaśrauṣaṁ jale kumbhasya pūryataḥ।
acakṣurviṣaye ghoṣaṁ vāraṇasyeva nardataḥ ॥
‘उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था। मुझे अकस्मात् पानी में घड़ा भरने की आवाज सुनायी पड़ी। मेरी दृष्टि तो वहाँतक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथी के पानी पीते समय होनेवाले शब्द के समान जान पड़ी
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tato'haṁ śaramuddhṛtya dīptamāśīviṣopamam।
śabdaṁ prati gajaprepsurabhilakṣyamapātayam ॥
‘तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूँड में पानी खींच रहा होगा; अतः वही मेरे बाण का निशाना बनेगा। तरकस से एक तीर निकाला और उस शब्द को लक्ष्य करके चला दिया। वह दीप्तिमान् बाण विषधर सर्प के समान भयंकर था
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amuñcaṁ niśitaṁ bāṇamahamāśīviṣopamam।
tatra vāguṣasi vyaktā prādurāsīd vanaukasaḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
hā heti patatastoye bāṇād vyathitamarmaṇaḥ।
tasminnipatite bhūmau vāgabhūt tatra mānuṣī ॥
‘वह उषःकाल की वेला थी। विषैले सर्प के सदृश उस तीखे बाण को मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही वहाँ पानी में गिरते हुए किसी वनवासी का हाहाकार मुझे स्पष्टरूप से सुनायी दिया। मेरे बाण से उसके मर्म में बड़ी पीड़ा हो रही थी। उस पुरुष के धराशायी हो जाने पर वहाँ यह मानव-वाणी प्रकट हुई-सुनायी देने लगी—
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kathamasmadvidhe śastraṁ nipatecca tapasvini।
praviviktāṁ nadīṁ rātrāvudāhāro'hamāgataḥ ॥
‘आह! मेरे-जैसे तपस्वी पर शस्त्र का प्रहार कैसे सम्भव हुआ? मैं तो नदी के इस एकान्त तट पर रात में पानी लेने के लिये आया था
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iṣuṇābhihataḥ kena kasya vāpakṛtaṁ mayā।
ṛṣerhi nyastadaṇḍasya vane vanyena jīvataḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
kathaṁ nu śastreṇa vadho madvidhasya vidhīyate।
jaṭābhāradharasyaiva valkalājinavāsasaḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
ko vadhena mamārthī syāt kiṁ vāsyāpakṛtaṁ mayā।
evaṁ niṣphalamārabdhaṁ kevalānarthasaṁhitam ॥
‘किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसका क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवों को पीड़ा देने की वृत्ति का त्याग करके ऋषि-जीवन बिताता था, वन में रहकर जंगली फल-मूलों से ही जीविका चलाता था। मुझ-जैसे निरपराध मनुष्य का शस्त्र से वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहननेवाला जटाधारी तपस्वी हूँ। मेरा वध करने में किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारनेवाले का क्या अपराध किया था? मेरी हत्या का प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया! इससे किसीको कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा
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na kvacit sādhu manyeta yathaiva gurutalpagam।
nemaṁ tathānuśocāmi jīvitakṣayamātmanaḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
mātaraṁ pitaraṁ cobhāvanuśocāmi madvadhe।
tadetanmithunaṁ vṛddhaṁ cirakālabhṛtaṁ mayā ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
mayi pañcatvamāpanne kāṁ vṛttiṁ vartayiṣyati।
vṛddhau ca mātāpitarāvahaṁ caikeṣuṇā hataḥ ॥
kena sma nihatāḥ sarve subālenākṛtātmanā।
‘इस हत्यारे को संसार में कहीं भी कोई उसी तरह अच्छा नहीं समझेगा, जैसे गुरुपत्नीगामी को। मुझे अपने इस जीवन के नष्ट होने की उतनी चिन्ता नहीं है; मेरे मारे जाने से मेरे माता-पिता को जो कष्ट होगा, उसीके लिये मुझे बारंबार शोक हो रहा है। मैंने इन दोनों वृद्धों का बहुत समय से पालन-पोषण किया है; अब मेरे शरीर के न रहने पर ये किस प्रकार जीवन-निर्वाह करेंगे? घातक ने एक ही बाण से मुझे और मेरे बूढ़े माता-पिता को भी मौत के मुख में डाल दिया। किस विवेकहीन और अजितेन्द्रिय पुरुष ने हम सब लोगों का एक साथ ही वध कर डाला?’
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tāṁ giraṁ karuṇaṁ śrutvā mama dharmānukāṁkṣiṇaḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
karābhyāṁ saśaraṁ cāpaṁ vyathitasyāpatad bhuvi।
tasyāhaṁ karuṇaṁ śrutvā ṛṣervilapato niśi ॥
sambhrāntaḥ śokavegena bhṛśamāsaṁ vicetanaḥ।
‘ये करुणाभरे वचन सुनकर मेरे मन में बड़ी व्यथा हुई। कहाँ तो मैं धर्म की अभिलाषा रखनेवाला था और कहाँ यह अधर्म का कार्य बन गया। उस समय मेरे हाथों से धनुष और बाण छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़े। रात में विलाप करते हुए ऋषि का वह करुण वचन सुनकर मैं शोक के वेग से घबरा उठा। मेरी चेतना अत्यन्त विलुप्त-सी होने लगी
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taṁ deśamahamāgamya dīnasattvaḥ sudurmanāḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
apaśyamiṣuṇā tīre sarayvāstāpasaṁ hatam।
avakīrṇajaṭābhāraṁ praviddhakalaśodakam ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
pāṁsuśoṇitadigdhāṅgaṁ śayānaṁ śalyavedhitam।
sa māmudvīkṣya netrābhyāṁ trastamasvasthacetanam ॥
ityuvāca vacaḥ krūraṁ didhakṣanniva tejasā।
‘मेरे हृदय में दीनता छा गयी, मन बहुत दुःखी हो गया। सरयू के किनारे उस स्थान पर जाकर मैंने देखा—एक तपस्वी बाण से घायल होकर पड़े हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़े का जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खून में सना हुआ है। वे बाण से बिंधे हुए पड़े थे। उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था। उन्होंने दोनों नेत्रों से मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेज से मुझे भस्म कर देना चाहते हों। वे कठोर वाणी में यों बोले—
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kiṁ tavāpakṛtaṁ rājan vane nivasatā mayā ॥
jihīrṣurambho gurvarthaṁ yadahaṁ tāḍitastvayā।
‘राजन्! वन में रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन-सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता-पिता के लिये पानी लेने की इच्छा से यहीं आया था
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ekena khalu bāṇena marmaṇyabhihate mayi ॥
dvāvandhau nihatau vṛddhau mātā janayitā ca me।
‘तुमने एक ही बाण से मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अन्धे और बूढ़े माता-पिता को भी मार डाला
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tau nūnaṁ durbalāvandhau matpratīkṣau pipāsitau ॥
ciramāśāṁ kṛtāṁ kaṣṭāṁ tṛṣṇāṁ saṁdhārayiṣyataḥ।
‘वे दोनों बहुत दुबले और अन्धे हैं। निश्चय ही प्यास से पीड़ित होकर वे मेरी प्रतीक्षा में बैठे होंगे। वे देरतक मेरे आगमन की आशा लगाये दुःखदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे
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na nūnaṁ tapaso vāsti phalayogaḥ śrutasya vā ॥
pitā yanmāṁ na jānīte śayānaṁ patitaṁ bhuvi।
‘अवश्य ही मेरी तपस्या अथवा शास्त्रज्ञान का कोई फल यहाँ प्रकट नहीं हो रहा है; क्योंकि पिताजी को यह नहीं मालूम है कि मैं पृथ्वी पर गिरकर मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ हूँ
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jānannapi ca kiṁ kuryādaśaktaścāparikramaḥ ॥
bhidyamānamivāśaktastrātumanyo nago nagam।
‘यदि जान भी लें तो क्या कर सकते हैं; क्योंकि असमर्थ हैं और चल-फिर भी नहीं सकते हैं। जैसे वायु आदि के द्वारा तोड़े जाते हुए वृक्ष को कोई दूसरा वृक्ष नहीं बचा सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी मेरी रक्षा नहीं कर सकते
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pitustvameva me gatvā śīghramācakṣva rāghava ॥
na tvāmanudahet kruddho vanamagnirivaidhitaḥ।
‘अतः रघुकुलनरेश! अब तुम्हीं जाकर शीघ्र ही मेरे पिता को यह समाचार सुना दो। (यदि स्वयं कह दोगे तो) जैसे प्रज्वलित अग्नि समूचे वन को जला डालती है, उस प्रकार वे क्रोध में भरकर तुमको भस्म नहीं करेंगे
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iyamekapadī rājan yato me piturāśramaḥ ॥
taṁ prasādaya gatvā tvaṁ na tvā saṁkupitaḥ śapet।
‘राजन्! यह पगडंडी उधर ही गयी है, जहाँ मेरे पिता का आश्रम है। तुम जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे कुपित होकर तुम्हें शाप न दें
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viśalyaṁ kuru māṁ rājan marma me niśitaḥ śaraḥ ॥
ruṇaddhi mṛdu sotsedhaṁ tīramamburayo yathā।
‘राजन्! मेरे शरीर से इस बाण को निकाल दो। यह तीखा बाण मेरे मर्मस्थान को उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे नदी के जल का वेग उसके कोमल बालुकामय ऊँचे तट को छिन्न-भिन्न कर देता है’
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saśalyaḥ kliśyate prāṇairviśalyo vinaśiṣyati ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
iti māmaviśaccintā tasya śalyāpakarṣaṇe।
duḥkhitasya ca dīnasya mama śokāturasya ca ॥
lakṣayāmāsa sa ṛṣiścintāṁ munisutastadā।
‘मुनिकुमार की यह बात सुनकर मेरे मन में यह चिन्ता समायी कि यदि बाण नहीं निकालता हूँ तो इन्हें क्लेश होता है और निकाल देता हूँ तो ये अभी प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं। इस प्रकार बाण को निकालने के विषय में मुझ दीन-दुःखी और शोकाकुल दशरथ की इस चिन्ता को उस समय मुनिकुमार ने लक्ष्य किया
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tāmyamānaṁ sa māṁ kṛcchrāduvāca paramārthavit ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sīdamāno vivṛttāṅgo'ceṣṭamāno gataḥ kṣayam।
saṁstabhya śokaṁ dhairyeṇa sthiracitto bhavāmyaham ॥
‘यथार्थ बात को समझ लेनेवाले उन महर्षि ने मुझे अत्यन्त ग्लानि में पड़ा हुआ देख बड़े कष्ट से कहा—राजन्! मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। मेरी आँखें चढ़ गयी हैं, अङ्ग-अङ्ग में तड़पन हो रही है। मुझसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती। अब मैं मृत्यु के समीप पहुँच गया हूँ, फिर भी धैर्य के द्वारा शोक को रोककर अपने चित्त को स्थिर करता हूँ (अब मेरी बात सुनो)
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brahmahatyākṛtaṁ tāpaṁ hṛdayādapanīyatām।
na dvijātirahaṁ rājan mā bhūt te manaso vyathā ॥
‘मुझसे ब्रह्महत्या हो गयी—इस चिन्ता को अपने हृदय से निकाल दो। राजन्! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, इसलिये तुम्हारे मन में ब्राह्मणवध को लेकर कोई व्यथा नहीं होनी चाहिये
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śūdrāyāmasmi vaiśyena jāto naravarādhipa।
itīva vadataḥ kṛcchrād bāṇābhihatamarmaṇaḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
vighūrṇato viceṣṭasya vepamānasya bhūtale।
tasya tvātāmyamānasya taṁ bāṇamahamuddharam।
sa māmudvīkṣya saṁtrasto jahau prāṇāṁstapodhanaḥ ॥
‘नरश्रेष्ठ! मैं वैश्य पिताद्वारा शूद्रजातीय माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ हूँ।’ बाण से मर्म में आघात पहुँचने के कारण वे बड़े कष्ट से इतना ही कह सके। उनकी आँखें घूम रही थीं। उनसे कोई चेष्टा नहीं बनती थी। वे पृथ्वी पर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे और अत्यन्त कष्ट का अनुभव करते थे। उस अवस्था में मैंने उनके शरीर से उस बाण को निकाल दिया। फिर तो अत्यन्त भयभीत हो उन तपोधन ने मेरी ओर देखकर अपने प्राण त्याग दिये
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jalārdragātraṁ tu vilapya kṛcchraṁ marmavraṇaṁ saṁtatamucchvasantam।
tataḥ sarayvāṁ tamahaṁ śayānaṁ samīkṣya bhadre subhṛśaṁ viṣaṇṇaḥ ॥
‘पानी में गिरने के कारण उनका सारा शरीर भीग गया था। मर्म में आघात लगने के कारण बड़े कष्ट से विलाप करके और बारंबार उच्छ्वास लेकर उन्होंने प्राणों का त्याग किया था। कल्याणी कौसल्ये! उस अवस्था में सरयू के तट पर मरे पड़े मुनिपुत्र को देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥