वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६३ · ५३ श्लोकाःSarga 63 · 53 ślokas

राजा दशरथका शोक और उनका कौसल्यासे अपने द्वारा मुनिकुमारके मारे जानेका प्रसङ्ग सुनाना

शब्दवेधी बाण

“शब्दवेधी बाण”
॥ २ · ६३ · २४–२५ ॥

पूर्णेन्दुभासिते सरयूतीरे कुम्भं पूरयन् वल्कलधरो मुनिबालः शब्दवेधिशरेण विद्धो भूमौ पतितः, स्रवन्तं निकुब्जकुम्भं प्रति करं प्रसारयति; उपरि तरुणो दशरथः सचापः प्रसारितबाहुः त्रस्तस्तब्धाननः गजभ्रान्त्या हतमिमं मुनिं ज्ञात्वा तं प्रति धावति।

पूर्णचन्द्रके उजालेमें सरयूके सरकंडोंसे भरे तटपर जल भरने झुके वल्कलधारी तपस्वी बालक श्रवण दशरथके शब्दवेधी बाणसे बिंधकर गिर पड़ा है — उसके वक्षमें पंखयुक्त बाण धँसा है, रक्त बह रहा है, और उसका हाथ अब भी ढुलके हुए घड़ेकी ओर बढ़ रहा है, जिससे जल छलककर नदीमें गिर रहा है; ऊपर युवा राजकुमार दशरथ अपना विशाल धनुष लिये, एक हाथ फैलाये, यह जानकर कि जिसे हाथी समझकर मारा वह तो मुनिकुमार था, भयभीत-स्तब्ध मुखसे उसकी ओर दौड़ पड़ा है।

By the light of the full moon on the reedy bank of the Sarayu, the young ascetic Shravan — stooping to fill his clay pot — has been pierced by Dasharath's sound-aimed arrow and lies fallen; the feathered shaft is buried in his chest, blood darkening the bark cloth, his hand still reaching toward the toppled pot that spills its water into the river; above him the youthful prince Dasharath, his great bow still in hand and one arm flung out, rushes forward aghast, realizing that the sound he shot at — taken for an elephant drinking — was this holy boy.

॥ २ · ६३ · १ ॥
प्रतिबुद्धो मुहूर्तेन शोकोपहतचेतनः। अथ राजा दशरथः चिन्तामभ्यपद्यत

pratibuddho muhūrtena śokopahatacetanaḥ।
atha rājā daśarathaḥ sa cintāmabhyapadyata ॥

राजा दशरथ दो ही घड़ी के बाद फिर जाग उठे। उस समय उनका हृदय शोक से व्याकुल हो रहा था। वे मन-ही-मन चिन्ता करने लगे

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॥ २ · ६३ · २ ॥
रामलक्ष्मणयोश्चैव विवासाद् वासवोपमम्। आपेदे उपसर्गस्तं तमः सूर्यमिवासुरम्

rāmalakṣmaṇayoścaiva vivāsād vāsavopamam।
āpede upasargastaṁ tamaḥ sūryamivāsuram ॥

श्रीराम और लक्ष्मण के वन में चले जाने से इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज दशरथ को शोक ने उसी प्रकार धर दबाया था, जैसे राहु का अन्धकार सूर्य को ढक देता है

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॥ २ · ६३ · ३ ॥
सभार्ये हि गते रामे कौसल्यां कोसलेश्वरः। विवक्षुरसितापाङ्गीं स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः

sabhārye hi gate rāme kausalyāṁ kosaleśvaraḥ।
vivakṣurasitāpāṅgīṁ smṛtvā duṣkṛtamātmanaḥ ॥

पत्नीसहित श्रीराम के वन में चले जाने पर कोसलनरेश दशरथ ने अपने पुरातन पाप का स्मरण करके कजरारे नेत्रोंवाली कौसल्या से कहने का विचार किया

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॥ २ · ६३ · ४ ॥
राजा रजनीं षष्ठीं रामे प्रव्राजिते वनम्। अर्धरात्रे दशरथः सोऽस्मरद् दुष्कृतं कृतम्

sa rājā rajanīṁ ṣaṣṭhīṁ rāme pravrājite vanam।
ardharātre daśarathaḥ so'smarad duṣkṛtaṁ kṛtam ॥

उस समय श्रीरामचन्द्रजी को वन में गये छठी रात बीत रही थी। जब आधी रात हुई, तब राजा दशरथ को उस पहले के किये हुए दुष्कर्म का स्मरण हुआ

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॥ २ · ६३ · ५ ॥
राजा पुत्रशोकार्तः स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः। कौसल्यां पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत्

sa rājā putraśokārtaḥ smṛtvā duṣkṛtamātmanaḥ।
kausalyāṁ putraśokārtāmidaṁ vacanamabravīt ॥

पुत्रशोक से पीड़ित हुए महाराज ने अपने उस दुष्कर्म को याद करके पुत्रशोक से व्याकुल हुई कौसल्या से इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

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॥ २ · ६३ · ६ ॥
यदाचरति कल्याणि शुभं वा यदि वाशुभम्। तदेव लभते भद्रे कर्ता कर्मजमात्मनः

yadācarati kalyāṇi śubhaṁ vā yadi vāśubham।
tadeva labhate bhadre kartā karmajamātmanaḥ ॥

‘कल्याणि! मनुष्य शुभ या अशुभ जो भी कर्म करता है, भद्रे! अपने उसी कर्म के फलस्वरूप सुख या दुःख कर्ता को प्राप्त होते हैं

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॥ २ · ६३ · ७ ॥
गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम्। दोषं वा यो जानाति बाल इति होच्यते

gurulāghavamarthānāmārambhe karmaṇāṁ phalam।
doṣaṁ vā yo na jānāti sa bāla iti hocyate ॥

‘जो कर्मों का आरम्भ करते समय उनके फलों की गुरुता या लघुता को नहीं जानता, उनसे होनेवाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोष को नहीं समझता, वह मनुष्य बालक (मूर्ख) कहा जाता है

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॥ २ · ६३ · ८ ॥
कश्चिदाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च निषिञ्चति। पुष्पं दृष्ट्वा फले गृध्नुः शोचति फलागमे

kaścidāmravaṇaṁ chittvā palāśāṁśca niṣiñcati।
puṣpaṁ dṛṣṭvā phale gṛdhnuḥ sa śocati phalāgame ॥

‘कोई मनुष्य पलाश का सुन्दर फूल देखकर मन-ही-मन यह अनुमान करके कि इसका फल और भी मनोहर तथा सुस्वादु होगा, फल की अभिलाषा से आम के बगीचे को काटकर वहाँ पलाश के पौदे लगाता और सींचता है, वह फल लगने के समय पश्चात्ताप करता है (क्योंकि उससे अपनी आशा के अनुरूप फल वह नहीं पाता है)

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॥ २ · ६३ · ९ ॥
अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति। शोचेत् फलवेलायां यथा किंशुकसेचकः

avijñāya phalaṁ yo hi karma tvevānudhāvati।
sa śocet phalavelāyāṁ yathā kiṁśukasecakaḥ ॥

‘जो क्रियमाण कर्म के फल का ज्ञान या विचार न करके केवल कर्म की ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलने के समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचनेवाले को हुआ करता है

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॥ २ · ६३ · १० ॥
सोऽहमाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च न्यषेचयम्। रामं फलागमे त्यक्त्वा पश्चाच्छोचामि दुर्मतिः

so'hamāmravaṇaṁ chittvā palāśāṁśca nyaṣecayam।
rāmaṁ phalāgame tyaktvā paścācchocāmi durmatiḥ ॥

‘मैंने भी आम का वन काटकर पलाशों को ही सींचा है, इस कर्म के फल की प्राप्ति के समय अब श्रीराम को खोकर मैं पश्चात्ताप कर रहा हूँ। मेरी बुद्धि कैसी खोटी है?

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॥ २ · ६३ · ११ ॥
लब्धशब्देन कौसल्ये कुमारेण धनुष्मता। कुमारः शब्दवेधीति मया पापमिदं कृतम्

labdhaśabdena kausalye kumāreṇa dhanuṣmatā।
kumāraḥ śabdavedhīti mayā pāpamidaṁ kṛtam ॥

‘कौसल्ये! पिता के जीवनकाल में जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धर के रूप में मेरी ख्याति फैल गयी थी। सब लोग यही कहते थे कि ‘राजकुमार दशरथ शब्द-वेधी बाण चलाना जानते हैं।’ इसी ख्याति में पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था (जिसे अभी बताऊँगा)

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॥ २ · ६३ · १२ ॥
तदिदं मेऽनुसम्प्राप्तं देवि दुःखं स्वयंकृतम्। सम्मोहादिह बालेन यथा स्याद् भक्षितं विषम्

tadidaṁ me'nusamprāptaṁ devi duḥkhaṁ svayaṁkṛtam।
sammohādiha bālena yathā syād bhakṣitaṁ viṣam ॥

‘देवि! उस अपने ही किये हुए कुकर्म का फल मुझे इस महान् दुःख के रूप में प्राप्त हुआ है। जैसे कोई बालक अज्ञानवश विष खा ले तो उसे भी वह विष मार ही डालता है, उसी प्रकार मोह या अज्ञानवश किये हुए दुष्कर्म का फल भी यहाँ मुझे भोगना पड़ रहा है

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॥ २ · ६३ · १३ ॥
यथान्यः पुरुषः कश्चित् पलाशैर्मोहितो भवेत्। एवं मयाप्यविज्ञातं शब्दवेध्यमिदं फलम्

yathānyaḥ puruṣaḥ kaścit palāśairmohito bhavet।
evaṁ mayāpyavijñātaṁ śabdavedhyamidaṁ phalam ॥

‘जैसे दूसरा कोई गँवार मनुष्य पलाश के फूलों पर ही मोहित हो उसके कड़वे फल को नहीं जानता, उसी प्रकार मैं भी ‘शब्दवेधी बाण-विद्या’ की प्रशंसा सुनकर उसपर लट्टू हो गया। उसके द्वारा ऐसा क्रूरतापूर्ण पापकर्म बन सकता है और ऐसा भयंकर फल प्राप्त हो सकता है, इसका ज्ञान मुझे नहीं हुआ

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॥ २ · ६३ · १४ ॥
देव्यनूढा त्वमभवो युवराजो भवाम्यहम्। ततः प्रावृडनुप्राप्ता मम कामविवर्धिनी

devyanūḍhā tvamabhavo yuvarājo bhavāmyaham।
tataḥ prāvṛḍanuprāptā mama kāmavivardhinī ॥

‘देवि! तुम्हारा विवाह नहीं हुआ था और मैं अभी युवराज ही था, उन्हीं दिनों की बात है। मेरी कामभावना को बढ़ानेवाली वर्षा ऋतु आयी

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॥ २ · ६३ · १५ ॥
अपास्य हि रसान् भौमांस्तप्त्वा जगदंशुभिः। परेताचरितां भीमां रविराचरते दिशम्

apāsya hi rasān bhaumāṁstaptvā ca jagadaṁśubhiḥ।
paretācaritāṁ bhīmāṁ ravirācarate diśam ॥

‘सूर्यदेव पृथ्वी के रसों को सुखाकर और जगत्‌ को अपनी किरणों से भलीभाँति संतप्त करके जिसमें यमलोकवर्ती प्रेत विचरा करते हैं, उस भयंकर दक्षिण दिशा में संचरण करते थे

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॥ २ · ६३ · १६ ॥
उष्णमन्तर्दधे सद्यः स्निग्धा ददृशिरे घनाः। ततो जहृषिरे सर्वे भेकसारङ्गबर्हिणः

uṣṇamantardadhe sadyaḥ snigdhā dadṛśire ghanāḥ।
tato jahṛṣire sarve bhekasāraṅgabarhiṇaḥ ॥

‘सब ओर सजल मेघ दृष्टिगोचर होने लगे और गरमी तत्काल शान्त हो गयी; इससे समस्त मेढकों, चातकों और मयूरों में हर्ष छा गया

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॥ २ · ६३ · १७ ॥
क्लिन्नपक्षोत्तराः स्नाताः कृच्छ्रादिव पतत्त्रिणः। वृष्टिवातावधूताग्रान् पादपानभिपेदिरे

klinnapakṣottarāḥ snātāḥ kṛcchrādiva patattriṇaḥ।
vṛṣṭivātāvadhūtāgrān pādapānabhipedire ॥

‘पक्षियों की पाँखें ऊपर से भींग गयी थीं। वे नहा उठे थे और बड़ी कठिनाई से उन वृक्षोंतक पहुँच पाते थे, जिनकी डालियों के अग्रभाग वर्षा और वायु के झोकों से झूम रहे थे

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॥ २ · ६३ · १८ ॥
पतितेनाम्भसाऽऽच्छन्नः पतमानेन चासकृत्। आबभौ मत्तसारङ्गस्तोयराशिरिवाचलः

patitenāmbhasā''cchannaḥ patamānena cāsakṛt।
ābabhau mattasāraṅgastoyarāśirivācalaḥ ॥

‘गिरे हुए और बारंबार गिरते हुए जल से आच्छादित हुआ मतवाला हाथी तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र तथा भीगे पर्वत के समान प्रतीत होता था

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॥ २ · ६३ · १९ ॥
पाण्डुरारुणवर्णानि स्रोतांसि विमलान्यपि। सुस्रुबुर्गिरिधातुभ्यः सभस्मानि भुजंगवत्

pāṇḍurāruṇavarṇāni srotāṁsi vimalānyapi।
susruburgiridhātubhyaḥ sabhasmāni bhujaṁgavat ॥

‘पर्वतों से गिरनेवाले स्रोत या झरने निर्मल होने पर भी पर्वतीय धातुओं के सम्पर्क से श्वेत, लाल और भस्मयुक्त होकर सर्पों की भाँति कुटिल गति से बह रहे थे

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॥ २ · ६३ · २० ॥
तस्मिन्नतिसुखे काले धनुष्मानिषुमान् रथी। व्यायामकृतसंकल्पः सरयूमन्वगां नदीम्

tasminnatisukhe kāle dhanuṣmāniṣumān rathī।
vyāyāmakṛtasaṁkalpaḥ sarayūmanvagāṁ nadīm ॥

‘वर्षा ऋतु के उस अत्यन्त सुखद सुहावने समय में मैं धनुष-बाण लेकर रथ पर सवार हो शिकार खेलने के लिये सरयू नदी के तट पर गया

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॥ २ · ६३ · २१ ॥
निपाने महिषं रात्रौ गजं वाभ्यागतं मृगम्। अन्यद् वा श्वापदं किंचिज्जिघांसुरजितेन्द्रियः

nipāne mahiṣaṁ rātrau gajaṁ vābhyāgataṁ mṛgam।
anyad vā śvāpadaṁ kiṁcijjighāṁsurajitendriyaḥ ॥

‘मेरी इन्द्रियाँ मेरे वश में नहीं थीं। मैंने सोचा था कि पानी पीने के घाट पर रात के समय जब कोई उपद्रवकारी भेंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह-व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा

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॥ २ · ६३ · २२ ॥
अथान्धकारे त्वश्रौषं जले कुम्भस्य पूर्यतः। अचक्षुर्विषये घोषं वारणस्येव नर्दतः

athāndhakāre tvaśrauṣaṁ jale kumbhasya pūryataḥ।
acakṣurviṣaye ghoṣaṁ vāraṇasyeva nardataḥ ॥

‘उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था। मुझे अकस्मात् पानी में घड़ा भरने की आवाज सुनायी पड़ी। मेरी दृष्टि तो वहाँतक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथी के पानी पीते समय होनेवाले शब्द के समान जान पड़ी

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॥ २ · ६३ · २३ ॥
ततोऽहं शरमुद्धृत्य दीप्तमाशीविषोपमम्। शब्दं प्रति गजप्रेप्सुरभिलक्ष्यमपातयम्

tato'haṁ śaramuddhṛtya dīptamāśīviṣopamam।
śabdaṁ prati gajaprepsurabhilakṣyamapātayam ॥

‘तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूँड में पानी खींच रहा होगा; अतः वही मेरे बाण का निशाना बनेगा। तरकस से एक तीर निकाला और उस शब्द को लक्ष्य करके चला दिया। वह दीप्तिमान् बाण विषधर सर्प के समान भयंकर था

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॥ २ · ६३ · २४ ॥
अमुञ्चं निशितं बाणमहमाशीविषोपमम्। तत्र वागुषसि व्यक्ता प्रादुरासीद् वनौकसः

amuñcaṁ niśitaṁ bāṇamahamāśīviṣopamam।
tatra vāguṣasi vyaktā prādurāsīd vanaukasaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · २५ ॥
हा हेति पततस्तोये बाणाद् व्यथितमर्मणः। तस्मिन्निपतिते भूमौ वागभूत् तत्र मानुषी

hā heti patatastoye bāṇād vyathitamarmaṇaḥ।
tasminnipatite bhūmau vāgabhūt tatra mānuṣī ॥

॥ २४–२५ ॥

‘वह उषःकाल की वेला थी। विषैले सर्प के सदृश उस तीखे बाण को मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही वहाँ पानी में गिरते हुए किसी वनवासी का हाहाकार मुझे स्पष्टरूप से सुनायी दिया। मेरे बाण से उसके मर्म में बड़ी पीड़ा हो रही थी। उस पुरुष के धराशायी हो जाने पर वहाँ यह मानव-वाणी प्रकट हुई-सुनायी देने लगी—

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॥ २ · ६३ · २६ ॥
कथमस्मद्विधे शस्त्रं निपतेच्च तपस्विनि। प्रविविक्तां नदीं रात्रावुदाहारोऽहमागतः

kathamasmadvidhe śastraṁ nipatecca tapasvini।
praviviktāṁ nadīṁ rātrāvudāhāro'hamāgataḥ ॥

‘आह! मेरे-जैसे तपस्वी पर शस्त्र का प्रहार कैसे सम्भव हुआ? मैं तो नदी के इस एकान्त तट पर रात में पानी लेने के लिये आया था

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॥ २ · ६३ · २७ ॥
इषुणाभिहतः केन कस्य वापकृतं मया। ऋषेर्हि न्यस्तदण्डस्य वने वन्येन जीवतः

iṣuṇābhihataḥ kena kasya vāpakṛtaṁ mayā।
ṛṣerhi nyastadaṇḍasya vane vanyena jīvataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · २८ ॥
कथं नु शस्त्रेण वधो मद्विधस्य विधीयते। जटाभारधरस्यैव वल्कलाजिनवाससः

kathaṁ nu śastreṇa vadho madvidhasya vidhīyate।
jaṭābhāradharasyaiva valkalājinavāsasaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · २९ ॥
को वधेन ममार्थी स्यात् किं वास्यापकृतं मया। एवं निष्फलमारब्धं केवलानर्थसंहितम्

ko vadhena mamārthī syāt kiṁ vāsyāpakṛtaṁ mayā।
evaṁ niṣphalamārabdhaṁ kevalānarthasaṁhitam ॥

॥ २७–२९ ॥

‘किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसका क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवों को पीड़ा देने की वृत्ति का त्याग करके ऋषि-जीवन बिताता था, वन में रहकर जंगली फल-मूलों से ही जीविका चलाता था। मुझ-जैसे निरपराध मनुष्य का शस्त्र से वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहननेवाला जटाधारी तपस्वी हूँ। मेरा वध करने में किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारनेवाले का क्या अपराध किया था? मेरी हत्या का प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया! इससे किसीको कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा

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॥ २ · ६३ · ३० ॥
क्वचित् साधु मन्येत यथैव गुरुतल्पगम्। नेमं तथानुशोचामि जीवितक्षयमात्मनः

na kvacit sādhu manyeta yathaiva gurutalpagam।
nemaṁ tathānuśocāmi jīvitakṣayamātmanaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ३१ ॥
मातरं पितरं चोभावनुशोचामि मद्वधे। तदेतन्मिथुनं वृद्धं चिरकालभृतं मया

mātaraṁ pitaraṁ cobhāvanuśocāmi madvadhe।
tadetanmithunaṁ vṛddhaṁ cirakālabhṛtaṁ mayā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ३२ ॥
मयि पञ्चत्वमापन्ने कां वृत्तिं वर्तयिष्यति। वृद्धौ मातापितरावहं चैकेषुणा हतः केन स्म निहताः सर्वे सुबालेनाकृतात्मना।

mayi pañcatvamāpanne kāṁ vṛttiṁ vartayiṣyati।
vṛddhau ca mātāpitarāvahaṁ caikeṣuṇā hataḥ ॥
kena sma nihatāḥ sarve subālenākṛtātmanā।

॥ ३०–३२ ॥

‘इस हत्यारे को संसार में कहीं भी कोई उसी तरह अच्छा नहीं समझेगा, जैसे गुरुपत्नीगामी को। मुझे अपने इस जीवन के नष्ट होने की उतनी चिन्ता नहीं है; मेरे मारे जाने से मेरे माता-पिता को जो कष्ट होगा, उसीके लिये मुझे बारंबार शोक हो रहा है। मैंने इन दोनों वृद्धों का बहुत समय से पालन-पोषण किया है; अब मेरे शरीर के न रहने पर ये किस प्रकार जीवन-निर्वाह करेंगे? घातक ने एक ही बाण से मुझे और मेरे बूढ़े माता-पिता को भी मौत के मुख में डाल दिया। किस विवेकहीन और अजितेन्द्रिय पुरुष ने हम सब लोगों का एक साथ ही वध कर डाला?’

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॥ २ · ६३ · ३३ ॥
तां गिरं करुणं श्रुत्वा मम धर्मानुकांक्षिणः

tāṁ giraṁ karuṇaṁ śrutvā mama dharmānukāṁkṣiṇaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ३४ ॥
कराभ्यां सशरं चापं व्यथितस्यापतद् भुवि। तस्याहं करुणं श्रुत्वा ऋषेर्विलपतो निशि सम्भ्रान्तः शोकवेगेन भृशमासं विचेतनः।

karābhyāṁ saśaraṁ cāpaṁ vyathitasyāpatad bhuvi।
tasyāhaṁ karuṇaṁ śrutvā ṛṣervilapato niśi ॥
sambhrāntaḥ śokavegena bhṛśamāsaṁ vicetanaḥ।

॥ ३३–३४ ॥

‘ये करुणाभरे वचन सुनकर मेरे मन में बड़ी व्यथा हुई। कहाँ तो मैं धर्म की अभिलाषा रखनेवाला था और कहाँ यह अधर्म का कार्य बन गया। उस समय मेरे हाथों से धनुष और बाण छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़े। रात में विलाप करते हुए ऋषि का वह करुण वचन सुनकर मैं शोक के वेग से घबरा उठा। मेरी चेतना अत्यन्त विलुप्त-सी होने लगी

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॥ २ · ६३ · ३५ ॥
तं देशमहमागम्य दीनसत्त्वः सुदुर्मनाः

taṁ deśamahamāgamya dīnasattvaḥ sudurmanāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ३६ ॥
अपश्यमिषुणा तीरे सरय्वास्तापसं हतम्। अवकीर्णजटाभारं प्रविद्धकलशोदकम्

apaśyamiṣuṇā tīre sarayvāstāpasaṁ hatam।
avakīrṇajaṭābhāraṁ praviddhakalaśodakam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ३७ ॥
पांसुशोणितदिग्धाङ्गं शयानं शल्यवेधितम्। मामुद्वीक्ष्य नेत्राभ्यां त्रस्तमस्वस्थचेतनम् इत्युवाच वचः क्रूरं दिधक्षन्निव तेजसा।

pāṁsuśoṇitadigdhāṅgaṁ śayānaṁ śalyavedhitam।
sa māmudvīkṣya netrābhyāṁ trastamasvasthacetanam ॥
ityuvāca vacaḥ krūraṁ didhakṣanniva tejasā।

॥ ३५–३७ ॥

‘मेरे हृदय में दीनता छा गयी, मन बहुत दुःखी हो गया। सरयू के किनारे उस स्थान पर जाकर मैंने देखा—एक तपस्वी बाण से घायल होकर पड़े हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़े का जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खून में सना हुआ है। वे बाण से बिंधे हुए पड़े थे। उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था। उन्होंने दोनों नेत्रों से मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेज से मुझे भस्म कर देना चाहते हों। वे कठोर वाणी में यों बोले—

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॥ २ · ६३ · ३८ ॥
किं तवापकृतं राजन् वने निवसता मया जिहीर्षुरम्भो गुर्वर्थं यदहं ताडितस्त्वया।

kiṁ tavāpakṛtaṁ rājan vane nivasatā mayā ॥
jihīrṣurambho gurvarthaṁ yadahaṁ tāḍitastvayā।

‘राजन्! वन में रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन-सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता-पिता के लिये पानी लेने की इच्छा से यहीं आया था

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॥ २ · ६३ · ३९ ॥
एकेन खलु बाणेन मर्मण्यभिहते मयि द्वावन्धौ निहतौ वृद्धौ माता जनयिता मे।

ekena khalu bāṇena marmaṇyabhihate mayi ॥
dvāvandhau nihatau vṛddhau mātā janayitā ca me।

‘तुमने एक ही बाण से मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अन्धे और बूढ़े माता-पिता को भी मार डाला

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॥ २ · ६३ · ४० ॥
तौ नूनं दुर्बलावन्धौ मत्प्रतीक्षौ पिपासितौ चिरमाशां कृतां कष्टां तृष्णां संधारयिष्यतः।

tau nūnaṁ durbalāvandhau matpratīkṣau pipāsitau ॥
ciramāśāṁ kṛtāṁ kaṣṭāṁ tṛṣṇāṁ saṁdhārayiṣyataḥ।

‘वे दोनों बहुत दुबले और अन्धे हैं। निश्चय ही प्यास से पीड़ित होकर वे मेरी प्रतीक्षा में बैठे होंगे। वे देरतक मेरे आगमन की आशा लगाये दुःखदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे

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॥ २ · ६३ · ४१ ॥
नूनं तपसो वास्ति फलयोगः श्रुतस्य वा पिता यन्मां जानीते शयानं पतितं भुवि।

na nūnaṁ tapaso vāsti phalayogaḥ śrutasya vā ॥
pitā yanmāṁ na jānīte śayānaṁ patitaṁ bhuvi।

‘अवश्य ही मेरी तपस्या अथवा शास्त्रज्ञान का कोई फल यहाँ प्रकट नहीं हो रहा है; क्योंकि पिताजी को यह नहीं मालूम है कि मैं पृथ्वी पर गिरकर मृत्युशय्या पर पड़ा हुआ हूँ

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॥ २ · ६३ · ४२ ॥
जानन्नपि किं कुर्यादशक्तश्चापरिक्रमः भिद्यमानमिवाशक्तस्त्रातुमन्यो नगो नगम्।

jānannapi ca kiṁ kuryādaśaktaścāparikramaḥ ॥
bhidyamānamivāśaktastrātumanyo nago nagam।

‘यदि जान भी लें तो क्या कर सकते हैं; क्योंकि असमर्थ हैं और चल-फिर भी नहीं सकते हैं। जैसे वायु आदि के द्वारा तोड़े जाते हुए वृक्ष को कोई दूसरा वृक्ष नहीं बचा सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी मेरी रक्षा नहीं कर सकते

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॥ २ · ६३ · ४३ ॥
पितुस्त्वमेव मे गत्वा शीघ्रमाचक्ष्व राघव त्वामनुदहेत् क्रुद्धो वनमग्निरिवैधितः।

pitustvameva me gatvā śīghramācakṣva rāghava ॥
na tvāmanudahet kruddho vanamagnirivaidhitaḥ।

‘अतः रघुकुलनरेश! अब तुम्हीं जाकर शीघ्र ही मेरे पिता को यह समाचार सुना दो। (यदि स्वयं कह दोगे तो) जैसे प्रज्वलित अग्नि समूचे वन को जला डालती है, उस प्रकार वे क्रोध में भरकर तुमको भस्म नहीं करेंगे

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॥ २ · ६३ · ४४ ॥
इयमेकपदी राजन् यतो मे पितुराश्रमः तं प्रसादय गत्वा त्वं त्वा संकुपितः शपेत्।

iyamekapadī rājan yato me piturāśramaḥ ॥
taṁ prasādaya gatvā tvaṁ na tvā saṁkupitaḥ śapet।

‘राजन्! यह पगडंडी उधर ही गयी है, जहाँ मेरे पिता का आश्रम है। तुम जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे कुपित होकर तुम्हें शाप न दें

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॥ २ · ६३ · ४५ ॥
विशल्यं कुरु मां राजन् मर्म मे निशितः शरः रुणद्धि मृदु सोत्सेधं तीरमम्बुरयो यथा।

viśalyaṁ kuru māṁ rājan marma me niśitaḥ śaraḥ ॥
ruṇaddhi mṛdu sotsedhaṁ tīramamburayo yathā।

‘राजन्! मेरे शरीर से इस बाण को निकाल दो। यह तीखा बाण मेरे मर्मस्थान को उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे नदी के जल का वेग उसके कोमल बालुकामय ऊँचे तट को छिन्न-भिन्न कर देता है’

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॥ २ · ६३ · ४६ ॥
सशल्यः क्लिश्यते प्राणैर्विशल्यो विनशिष्यति

saśalyaḥ kliśyate prāṇairviśalyo vinaśiṣyati ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ४७ ॥
इति मामविशच्चिन्ता तस्य शल्यापकर्षणे। दुःखितस्य दीनस्य मम शोकातुरस्य लक्षयामास ऋषिश्चिन्तां मुनिसुतस्तदा।

iti māmaviśaccintā tasya śalyāpakarṣaṇe।
duḥkhitasya ca dīnasya mama śokāturasya ca ॥
lakṣayāmāsa sa ṛṣiścintāṁ munisutastadā।

॥ ४६–४७ ॥

‘मुनिकुमार की यह बात सुनकर मेरे मन में यह चिन्ता समायी कि यदि बाण नहीं निकालता हूँ तो इन्हें क्लेश होता है और निकाल देता हूँ तो ये अभी प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं। इस प्रकार बाण को निकालने के विषय में मुझ दीन-दुःखी और शोकाकुल दशरथ की इस चिन्ता को उस समय मुनिकुमार ने लक्ष्य किया

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॥ २ · ६३ · ४८ ॥
ताम्यमानं मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्

tāmyamānaṁ sa māṁ kṛcchrāduvāca paramārthavit ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ४९ ॥
सीदमानो विवृत्ताङ्गोऽचेष्टमानो गतः क्षयम्। संस्तभ्य शोकं धैर्येण स्थिरचित्तो भवाम्यहम्

sīdamāno vivṛttāṅgo'ceṣṭamāno gataḥ kṣayam।
saṁstabhya śokaṁ dhairyeṇa sthiracitto bhavāmyaham ॥

॥ ४८–४९ ॥

‘यथार्थ बात को समझ लेनेवाले उन महर्षि ने मुझे अत्यन्त ग्लानि में पड़ा हुआ देख बड़े कष्ट से कहा—राजन्! मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। मेरी आँखें चढ़ गयी हैं, अङ्ग-अङ्ग में तड़पन हो रही है। मुझसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती। अब मैं मृत्यु के समीप पहुँच गया हूँ, फिर भी धैर्य के द्वारा शोक को रोककर अपने चित्त को स्थिर करता हूँ (अब मेरी बात सुनो)

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॥ २ · ६३ · ५० ॥
ब्रह्महत्याकृतं तापं हृदयादपनीयताम्। द्विजातिरहं राजन् मा भूत् ते मनसो व्यथा

brahmahatyākṛtaṁ tāpaṁ hṛdayādapanīyatām।
na dvijātirahaṁ rājan mā bhūt te manaso vyathā ॥

‘मुझसे ब्रह्महत्या हो गयी—इस चिन्ता को अपने हृदय से निकाल दो। राजन्! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, इसलिये तुम्हारे मन में ब्राह्मणवध को लेकर कोई व्यथा नहीं होनी चाहिये

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॥ २ · ६३ · ५१ ॥
शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप। इतीव वदतः कृच्छ्राद् बाणाभिहतमर्मणः

śūdrāyāmasmi vaiśyena jāto naravarādhipa।
itīva vadataḥ kṛcchrād bāṇābhihatamarmaṇaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६३ · ५२ ॥
विघूर्णतो विचेष्टस्य वेपमानस्य भूतले। तस्य त्वाताम्यमानस्य तं बाणमहमुद्धरम्। मामुद्वीक्ष्य संत्रस्तो जहौ प्राणांस्तपोधनः

vighūrṇato viceṣṭasya vepamānasya bhūtale।
tasya tvātāmyamānasya taṁ bāṇamahamuddharam।
sa māmudvīkṣya saṁtrasto jahau prāṇāṁstapodhanaḥ ॥

॥ ५१–५२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं वैश्य पिताद्वारा शूद्रजातीय माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ हूँ।’ बाण से मर्म में आघात पहुँचने के कारण वे बड़े कष्ट से इतना ही कह सके। उनकी आँखें घूम रही थीं। उनसे कोई चेष्टा नहीं बनती थी। वे पृथ्वी पर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे और अत्यन्त कष्ट का अनुभव करते थे। उस अवस्था में मैंने उनके शरीर से उस बाण को निकाल दिया। फिर तो अत्यन्त भयभीत हो उन तपोधन ने मेरी ओर देखकर अपने प्राण त्याग दिये

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॥ २ · ६३ · ५३ ॥
जलार्द्रगात्रं तु विलप्य कृच्छ्रं मर्मव्रणं संततमुच्छ्वसन्तम्। ततः सरय्वां तमहं शयानं समीक्ष्य भद्रे सुभृशं विषण्णः

jalārdragātraṁ tu vilapya kṛcchraṁ marmavraṇaṁ saṁtatamucchvasantam।
tataḥ sarayvāṁ tamahaṁ śayānaṁ samīkṣya bhadre subhṛśaṁ viṣaṇṇaḥ ॥

‘पानी में गिरने के कारण उनका सारा शरीर भीग गया था। मर्म में आघात लगने के कारण बड़े कष्ट से विलाप करके और बारंबार उच्छ्वास लेकर उन्होंने प्राणों का त्याग किया था। कल्याणी कौसल्ये! उस अवस्था में सरयू के तट पर मरे पड़े मुनिपुत्र को देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥