वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६२ · २० श्लोकाःSarga 62 · 20 ślokas

दुःखी हुए राजा दशरथका कौसल्याको हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्याका उनके चरणोंमें पड़कर क्षमा माँगना

क्षमा-याचना

“क्षमा-याचना”
॥ २ · ६२ · ६–१२ ॥

स्वर्णदीपप्रभया दीप्ते शयनागारे वृद्धो राजा दशरथः सजलनयनोऽञ्जलिं बद्ध्वा प्रियां कौसल्यां प्रसादयति; पीताम्बरा पश्चात्तप्ता सा तस्य जान्वोः करं निधाय चरणयोर्निपतिता क्षमां याचते — परस्परस्नेहेन शमितः शोकः।

स्वर्णिम दीपकके मन्द प्रकाशसे भरे राजकीय शयनागारमें वृद्ध, अश्रुपूरित नेत्रोंवाले महाराज दशरथ पलंगपर बैठे हाथ जोड़कर अपनी प्रिया कौसल्याको मनाते हैं; और पश्चात्तापसे भरी, धूसर-सुनहरी रेशमी साड़ी ओढ़े कौसल्या उनके चरणोंमें झुककर, एक हाथ उनके घुटनेपर रखे, अपने कठोर वचनोंके लिये क्षमा माँगती हैं — दोनोंके मुख आँसुओंसे भीगे हैं और परस्पर स्नेहसे शोक शान्त होता प्रतीत होता है।

In the royal bedchamber, washed in soft golden lamplight, the aged King Dasharath — his eyes brimming with tears — sits upon the couch and folds his hands toward his beloved queen in humble appeal; and Kausalya, in dull-gold silk, her anger dissolved into remorse, sinks to his feet with a hand upon his knee, begging forgiveness for her bitter words. Both faces stream with tears as their grief is quieted by mutual love.

॥ २ · ६२ · १ ॥
एवं तु क्रुद्धया राजा राममात्रा सशोकया। श्रावितः परुषं वाक्यं चिन्तयामास दुःखितः

evaṁ tu kruddhayā rājā rāmamātrā saśokayā।
śrāvitaḥ paruṣaṁ vākyaṁ cintayāmāsa duḥkhitaḥ ॥

शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराममाता कौसल्या ने जब राजा दशरथ को इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्ता में पड़ गये

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॥ २ · ६२ · २ ॥
चिन्तयित्वा नृपो मोहव्याकुलितेन्द्रियः। अथ दीर्घेण कालेन संज्ञामाप परंतपः

cintayitvā sa ca nṛpo mohavyākulitendriyaḥ।
atha dīrgheṇa kālena saṁjñāmāpa paraṁtapaḥ ॥

चिन्तित होने के कारण राजा की सारी इन्द्रियाँ मोह से आच्छन्न हो गयीं। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् शत्रुओं को संताप देनेवाले राजा दशरथ को चेत हुआ

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॥ २ · ६२ · ३ ॥
संज्ञामुपलभ्यैव दीर्घमुष्णं निःश्वसन्। कौसल्यां पार्श्वतो दृष्ट्वा ततश्चिन्तामुपागमत्

sa saṁjñāmupalabhyaiva dīrghamuṣṇaṁ ca niḥśvasan।
kausalyāṁ pārśvato dṛṣṭvā tataścintāmupāgamat ॥

होश में आने पर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौसल्या को बगल में बैठी हुई देख वे फिर चिन्ता में पड़ गये

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॥ २ · ६२ · ४ ॥
तस्य चिन्तयमानस्य प्रत्यभात् कर्म दुष्कृतम्। यदनेन कृतं पूर्वमज्ञानाच्छब्दवेधिना

tasya cintayamānasya pratyabhāt karma duṣkṛtam।
yadanena kṛtaṁ pūrvamajñānācchabdavedhinā ॥

चिन्ता में पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलानेवाले नरेश के द्वारा पहले अनजान में बन गया था

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॥ २ · ६२ · ५ ॥
अमनास्तेन शोकेन रामशोकेन प्रभुः। द्वाभ्यामपि महाराजः शोकाभ्यामभितप्यते

amanāstena śokena rāmaśokena ca prabhuḥ।
dvābhyāmapi mahārājaḥ śokābhyāmabhitapyate ॥

उस शोक से तथा श्रीराम के शोक से भी राजा के मन में बड़ी वेदना हुई। उन दोनों ही शोकों से महाराज संतप्त होने लगे

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॥ २ · ६२ · ६ ॥
दह्यमानस्तु शोकाभ्यां कौसल्यामाह दुःखितः। वेपमानोऽञ्जलिं कृत्वा प्रसादार्थमवाङ्मुखः

dahyamānastu śokābhyāṁ kausalyāmāha duḥkhitaḥ।
vepamāno'ñjaliṁ kṛtvā prasādārthamavāṅmukhaḥ ॥

उन दोनों शोकों से दग्ध होते हुए दुःखी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर-थर काँपने लगे और कौसल्या को मनाने के लिये हाथ जोड़कर बोले—

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॥ २ · ६२ · ७ ॥
प्रसादये त्वां कौसल्ये रचितोऽयं मयाञ्जलिः। वत्सला चानृशंसा त्वं हि नित्यं परेष्वपि

prasādaye tvāṁ kausalye racito'yaṁ mayāñjaliḥ।
vatsalā cānṛśaṁsā ca tvaṁ hi nityaṁ pareṣvapi ॥

‘कौसल्ये! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ। देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं। तुम तो दूसरों पर भी सदा वात्सल्य और दया दिखानेवाली हो (फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयी?)

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॥ २ · ६२ · ८ ॥
भर्ता तु खलु नारीणां गुणवान् निर्गुणोऽपि वा। धर्मं विमृशमानानां प्रत्यक्षं देवि दैवतम्

bhartā tu khalu nārīṇāṁ guṇavān nirguṇo'pi vā।
dharmaṁ vimṛśamānānāṁ pratyakṣaṁ devi daivatam ॥

‘देवि! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्म का विचार करनेवाली सती नारियों के लिये वह प्रत्यक्ष देवता है

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॥ २ · ६२ · ९ ॥
सा त्वं धर्मपरा नित्यं दृष्टलोकपरावरा। नार्हसे विप्रियं वक्तुं दुःखितापि सुदुःखितम्

sā tvaṁ dharmaparā nityaṁ dṛṣṭalokaparāvarā।
nārhase vipriyaṁ vaktuṁ duḥkhitāpi suduḥkhitam ॥

‘तुम तो सदा धर्म में तत्पर रहनेवाली और लोक में भले-बुरे को समझनेवाली हो। यद्यपि तुम भी दुःखित हो तथापि मैं भी महान् दुःख में पड़ा हुआ हूँ, अतः तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये’

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॥ २ · ६२ · १० ॥
तद्वाक्यं करुणं राज्ञः श्रुत्वा दीनस्य भाषितम्। कौसल्या व्यसृजद् बाष्पं प्रणालीव नवोदकम्

tadvākyaṁ karuṇaṁ rājñaḥ śrutvā dīnasya bhāṣitam।
kausalyā vyasṛjad bāṣpaṁ praṇālīva navodakam ॥

दुःखी हुए राजा दशरथ के मुख से कहे गये उस करुणाजनक वचन को सुनकर कौसल्या अपने नेत्रों से आँसू बहाने लगीं, मानो छत की नाली से नूतन (वर्षा का) जल गिर रहा हो

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॥ २ · ६२ · ११ ॥
सा मूर्ध्नि बद्ध्वा रुदती राज्ञः पद्ममिवाञ्जलिम्। सम्भ्रमादब्रवीत् त्रस्ता त्वरमाणाक्षरं वचः

sā mūrdhni baddhvā rudatī rājñaḥ padmamivāñjalim।
sambhramādabravīt trastā tvaramāṇākṣaraṁ vacaḥ ॥

वे अधर्म के भय से रो पड़ीं और राजा के जुड़े हुए कमलसदृश हाथों को अपने सिर से सटाकर घबराहट के कारण शीघ्रतापूर्वक एक-एक अक्षर का उच्चारण करती हुई बोलीं—

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॥ २ · ६२ · १२ ॥
प्रसीद शिरसा याचे भूमौ निपतितास्मि ते। याचितास्मि हता देव क्षन्तव्याहं नहि त्वया

prasīda śirasā yāce bhūmau nipatitāsmi te।
yācitāsmi hatā deva kṣantavyāhaṁ nahi tvayā ॥

‘देव! मैं आपके सामने पृथ्वी पर पड़ी हूँ। आपके चरणों में मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न हों। यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो मैं मारी गयी। मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे क्षमा पाने के योग्य हूँ, प्रहार पाने के नहीं

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॥ २ · ६२ · १३ ॥
नैषा हि सा स्त्री भवति श्लाघनीयेन धीमता। उभयोर्लोकयोर्लोके पत्या या सम्प्रसाद्यते

naiṣā hi sā strī bhavati ślāghanīyena dhīmatā।
ubhayorlokayorloke patyā yā samprasādyate ॥

‘पति अपनी स्त्री के लिये इहलोक और परलोक में भी स्पृहणीय है। इस जगत् में जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पति के द्वारा मनायी जाती है, वह कुल-स्त्री कहलाने के योग्य नहीं है

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॥ २ · ६२ · १४ ॥
जानामि धर्मं धर्मज्ञ त्वां जाने सत्यवादिनम्। पुत्रशोकार्तया तत्तु मया किमपि भाषितम्

jānāmi dharmaṁ dharmajña tvāṁ jāne satyavādinam।
putraśokārtayā tattu mayā kimapi bhāṣitam ॥

‘धर्मज्ञ महाराज! मैं स्त्री-धर्म को जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं। इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोक से पीड़ित होने के कारण मेरे मुख से निकल गयी है

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॥ २ · ६२ · १५ ॥
शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम्। शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः

śoko nāśayate dhairyaṁ śoko nāśayate śrutam।
śoko nāśayate sarvaṁ nāsti śokasamo ripuḥ ॥

‘शोक धैर्य का नाश कर देता है। शोक शास्त्रज्ञान को भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अतः शोक के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है

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॥ २ · ६२ · १६ ॥
शक्यमापतितः सोढुं प्रहारो रिपुहस्ततः। सोढुमापतितः शोकः सुसूक्ष्मोऽपि शक्यते

śakyamāpatitaḥ soḍhuṁ prahāro ripuhastataḥ।
soḍhumāpatitaḥ śokaḥ susūkṣmo'pi na śakyate ॥

‘शत्रु के हाथ से अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रों का प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी शोक नहीं सहा जा सकता

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॥ २ · ६२ · १७ ॥
वनवासाय रामस्य पञ्चरात्रोऽत्र गण्यते। यः शोकहतहर्षायाः पञ्चवर्षोपमो मम

vanavāsāya rāmasya pañcarātro'tra gaṇyate।
yaḥ śokahataharṣāyāḥ pañcavarṣopamo mama ॥

‘श्रीराम को वन में गये आज पाँच रातें बीत गयीं। मैं यही गिनती रहती हूँ। शोक ने मेरे हर्ष को नष्ट कर दिया है, अतः ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षों के समान प्रतीत हुई हैं

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॥ २ · ६२ · १८ ॥
तं हि चिन्तयमानायाः शोकोऽयं हृदि वर्धते। नदीनामिव वेगेन समुद्रसलिलं महत्

taṁ hi cintayamānāyāḥ śoko'yaṁ hṛdi vardhate।
nadīnāmiva vegena samudrasalilaṁ mahat ॥

‘श्रीराम का ही चिन्तन करने के कारण मेरे हृदय का यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियों के वेग से समुद्र का जल बहुत बढ़ जाता है’

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॥ २ · ६२ · १९ ॥
एवं हि कथयन्त्यास्तु कौसल्यायाः शुभं वचः। मन्दरश्मिरभूत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत

evaṁ hi kathayantyāstu kausalyāyāḥ śubhaṁ vacaḥ।
mandaraśmirabhūt sūryo rajanī cābhyavartata ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६२ · २० ॥
अथ प्रह्लादितो वाक्यैर्देव्या कौसल्यया नृपः। शोकेन समाक्रान्तो निद्राया वशमेयिवान्

atha prahlādito vākyairdevyā kausalyayā nṛpaḥ।
śokena ca samākrānto nidrāyā vaśameyivān ॥

॥ १९–२० ॥

कौसल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं कि सूर्य की किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ पहुँचा। देवी कौसल्या की इन बातों से राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही वे श्रीराम के शोक से भी पीड़ित थे। इस हर्ष और शोक की अवस्था में उन्हें नींद आ गयी

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६२ ॥