वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६१ · २७ श्लोकाःSarga 61 · 27 ślokas

कौसल्याका विलापपूर्वक राजा दशरथको उपालम्भ देना

कौसल्या-उपालम्भ

“कौसल्या-उपालम्भ”
॥ २ · ६१ · १ ॥

मन्ददीपालोके अन्तःपुरे शय्यागतः शोकार्तो वृद्धो राजा दशरथः; पार्श्वे पीताम्बरा कौसल्या अश्रुसिक्तमुखी हस्तमुद्यम्य पतिं सोपालम्भं विलपति।

मन्द दीपक की सुनहरी आभा से भरे अन्तःपुर में शय्या पर शोक से टूटे, पीले पड़े वृद्ध राजा दशरथ अधलेटे पड़े हैं, दृष्टि ऊपर उठी हुई; उनके पास खड़ी पीत-वर्ण रेशमी वस्त्रों में सुमंगली कौसल्या — राम के वनगमन से विदीर्ण — एक हाथ उठाकर आँसुओं से भीगे मुख से पति को व्यथित उपालम्भ दे रही हैं; उनके मुख पर वेदना और तीखा शोक साथ-साथ झलकते हैं।

In a dim royal bedchamber lit by warm golden lamplight, the aged King Dasharath lies sunk in grief upon his couch, pale and stricken, his gaze lifted; beside him stands Queen Kausalya in ochre and dull-gold silk, her cheeks wet with tears, one hand raised in impassioned words as she pours out a mother's bitter reproach for the banished Ram — sorrow and sharp accusation mingled in her weeping face.

॥ २ · ६१ · १ ॥
वनं गते धर्मरते रामे रमयतां वरे। कौसल्या रुदती चार्ता भर्तारमिदमब्रवीत्

vanaṁ gate dharmarate rāme ramayatāṁ vare।
kausalyā rudatī cārtā bhartāramidamabravīt ॥

प्रजाजनों को आनन्द प्रदान करनेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मपरायण श्रीराम के वन में चले जाने पर आर्त होकर रोती हुई कौसल्या ने अपने पति से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ६१ · २ ॥
यद्यपि त्रिषु लोकेषु प्रथितं ते महद् यशः। सानुक्रोशो वदान्यश्च प्रियवादी राघवः

yadyapi triṣu lokeṣu prathitaṁ te mahad yaśaḥ।
sānukrośo vadānyaśca priyavādī ca rāghavaḥ ॥

‘महाराज! यद्यपि तीनों लोकों में आपका महान् यश फैला हुआ है,—सब लोग यही जानते हैं कि—रघुकुलनरेश दशरथ बड़े दयालु, उदार और प्रिय वचन बोलनेवाले हैं

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॥ २ · ६१ · ३ ॥
कथं नरवरश्रेष्ठ पुत्रौ तौ सह सीतया। दुःखितौ सुखसंवृद्धौ वने दुःखं सहिष्यतः

kathaṁ naravaraśreṣṭha putrau tau saha sītayā।
duḥkhitau sukhasaṁvṛddhau vane duḥkhaṁ sahiṣyataḥ ॥

‘नरेशों में श्रेष्ठ आर्यपुत्र! तथापि आपने इस बात का विचार नहीं किया कि सुख में पले हुए आपके वे दोनों पुत्र सीता के साथ वनवास का कष्ट कैसे सहन करेंगे

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॥ २ · ६१ · ४ ॥
सा नूनं तरुणी श्यामा सुकुमारी सुखोचिता। कथमुष्णं शीतं मैथिली विसहिष्यते

sā nūnaṁ taruṇī śyāmā sukumārī sukhocitā।
kathamuṣṇaṁ ca śītaṁ ca maithilī visahiṣyate ॥

‘वह सोलह-अठारह वर्षों की सुकुमारी तरुणी मिथिलेशकुमारी सीता, जो सुख भोगने के ही योग्य है, वन में सरदी-गरमी का दुःख कैसे सहेगी ?

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॥ २ · ६१ · ५ ॥
भुक्त्वाशनं विशालाक्षी सूपदंशान्वितं शुभम्। वन्यं नैवारमाहारं कथं सीतोपभोक्ष्यते

bhuktvāśanaṁ viśālākṣī sūpadaṁśānvitaṁ śubham।
vanyaṁ naivāramāhāraṁ kathaṁ sītopabhokṣyate ॥

‘विशाललोचना सीता सुन्दर व्यञ्जनों से युक्त सुन्दर स्वादिष्ट अन्न भोजन किया करती थी, अब वह जंगल की तिन्नी के चावल का सूखा भात कैसे खायगी ?

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॥ २ · ६१ · ६ ॥
गीतवादित्रनिर्घोषं श्रुत्वा शुभसमन्विता। कथं क्रव्यादसिंहानां शब्दं श्रोष्यत्यशोभनम्

gītavāditranirghoṣaṁ śrutvā śubhasamanvitā।
kathaṁ kravyādasiṁhānāṁ śabdaṁ śroṣyatyaśobhanam ॥

‘जो माङ्गलिक वस्तुओं से सम्पन्न रहकर सदा गीत और वाद्य की मधुर ध्वनि सुना करती थी, वही जंगल में मांसभक्षी सिंहों का अशोभन (अमङ्गलकारी) शब्द कैसे सुन सकेगी ?

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॥ २ · ६१ · ७ ॥
महेन्द्रध्वजसंकाशः क्व नु शेते महाभुजः। भुजं परिघसंकाशमुपाधाय महाबलः

mahendradhvajasaṁkāśaḥ kva nu śete mahābhujaḥ।
bhujaṁ parighasaṁkāśamupādhāya mahābalaḥ ॥

‘जो इन्द्रध्वज के समान समस्त लोकों के लिये उत्सव प्रदान करनेवाले थे, वे महाबली, महाबाहु श्रीराम अपनी परिघ-जैसी मोटी बाँह का तकिया लगाकर कहाँ सोते होंगे ?

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॥ २ · ६१ · ८ ॥
पद्मवर्णं सुकेशान्तं पद्मनिःश्वासमुत्तमम्। कदा द्रक्ष्यामि रामस्य वदनं पुष्करेक्षणम्

padmavarṇaṁ sukeśāntaṁ padmaniḥśvāsamuttamam।
kadā drakṣyāmi rāmasya vadanaṁ puṣkarekṣaṇam ॥

‘जिसकी कान्ति कमल के समान है, जिसके ऊपर सुन्दर केश शोभा पाते हैं, जिसकी प्रत्येक साँस से कमलकी-सी सुगन्ध निकलती है तथा जिसमें विकसित कमल के सदृश सुन्दर नेत्र सुशोभित होते हैं, श्रीराम के उस मनोहर मुख को मैं कब देखूँगी?

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॥ २ · ६१ · ९ ॥
वज्रसारमयं नूनं हृदयं मे संशयः। अपश्यन्त्या तं यद् वै फलतीदं सहस्रधा

vajrasāramayaṁ nūnaṁ hṛdayaṁ me na saṁśayaḥ।
apaśyantyā na taṁ yad vai phalatīdaṁ sahasradhā ॥

‘मेरा हृदय निश्चय ही लोहे का बना हुआ है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि श्रीराम को न देखने पर भी मेरे इस हृदय के सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं

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॥ २ · ६१ · १० ॥
यत् त्वया करुणं कर्म व्यपोह्य मम बान्धवाः। निरस्ताः परिधावन्ति सुखार्हाः कृपणा वने

yat tvayā karuṇaṁ karma vyapohya mama bāndhavāḥ।
nirastāḥ paridhāvanti sukhārhāḥ kṛpaṇā vane ॥

‘आपने यह बड़ा ही निर्दयतापूर्ण कर्म किया है कि बिना कुछ सोच-विचार किये मेरे बान्धवों को (कैकेयी के कहने से) निकाल दिया है, जिसके कारण वे सुख भोगने के योग्य होने पर भी दीन होकर वन में दौड़ रहे हैं

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॥ २ · ६१ · ११ ॥
यदि पञ्चदशे वर्षे राघवः पुनरेष्यति। जह्याद् राज्यं कोशं भरतो नोपलक्ष्यते

yadi pañcadaśe varṣe rāghavaḥ punareṣyati।
jahyād rājyaṁ ca kośaṁ ca bharato nopalakṣyate ॥

‘यदि पंद्रहवें वर्ष में श्रीरामचन्द्र पुनः वन से लौटें तो भरत उनके लिये राज्य और खजाना छोड़ देंगे, ऐसी सम्भावना नहीं दिखायी देती

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॥ २ · ६१ · १२ ॥
भोजयन्ति किल श्राद्धे केचित् स्वानेव बान्धवान्। ततः पश्चात् समीक्षन्ते कृतकार्या द्विजोत्तमान्

bhojayanti kila śrāddhe kecit svāneva bāndhavān।
tataḥ paścāt samīkṣante kṛtakāryā dvijottamān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ६१ · १३ ॥
तत्र ये गुणवन्तश्च विद्वांसश्च द्विजातयः। पश्चात् तेऽभिमन्यन्ते सुधामपि सुरोपमाः

tatra ye guṇavantaśca vidvāṁsaśca dvijātayaḥ।
na paścāt te'bhimanyante sudhāmapi suropamāḥ ॥

॥ १२–१३ ॥

‘कहते हैं, कुछ लोग श्राद्ध में पहले अपने बान्धवों (दौहित्र आदि)- को ही भोजन करा देते हैं, उसके बाद कृतकृत्य होकर निमन्त्रित श्रेष्ठ ब्राह्मणों की ओर ध्यान देते हैं। परंतु वहाँ जो गुणवान् एवं विद्वान् देवतुल्य उत्तम ब्राह्मण होते हैं, वे पीछे अमृत भी परोसा गया हो तो उसको स्वीकार नहीं करते हैं

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॥ २ · ६१ · १४ ॥
ब्राह्मणेष्वपि वृत्तेषु भुक्तशेषं द्विजोत्तमाः। नाभ्युपेतुमलं प्राज्ञाः शृङ्गच्छेदमिवर्षभाः

brāhmaṇeṣvapi vṛtteṣu bhuktaśeṣaṁ dvijottamāḥ।
nābhyupetumalaṁ prājñāḥ śṛṅgacchedamivarṣabhāḥ ॥

‘यद्यपि पहली पंक्ति में भी ब्राह्मण ही भोजन करके उठे होते हैं, तथापि जो श्रेष्ठ और विद्वान् ब्राह्मण हैं, वे अपमान के भय से उस भुक्तशेष अन्न को उसी तरह ग्रहण नहीं कर पाते जैसे अच्छे बैल अपने सींग कटाने को नहीं तैयार होते हैं

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॥ २ · ६१ · १५ ॥
एवं कनीयसा भ्रात्रा भुक्तं राज्यं विशाम्पते। भ्राता ज्येष्ठो वरिष्ठश्च किमर्थं नावमन्यते

evaṁ kanīyasā bhrātrā bhuktaṁ rājyaṁ viśāmpate।
bhrātā jyeṣṭho variṣṭhaśca kimarthaṁ nāvamanyate ॥

‘महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ और श्रेष्ठ भ्राता अपने छोटे भाई के भोगे हुए राज्य को कैसे ग्रहण करेंगे ? वे उसका तिरस्कार (त्याग) क्यों नहीं कर देंगे ?

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॥ २ · ६१ · १६ ॥
परेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्रः खादितुमिच्छति। एवमेव नरव्याघ्रः परलीढं मंस्यते

na pareṇāhṛtaṁ bhakṣyaṁ vyāghraḥ khāditumicchati।
evameva naravyāghraḥ paralīḍhaṁ na maṁsyate ॥

‘जैसे बाघ गीदड़ आदि दूसरे जन्तुओं के लाये या खाये हुए भक्ष्य पदार्थ (शिकार)- को खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम दूसरों के चाटे (भोगे) हुए राज्य-भोग को नहीं स्वीकार करेंगे

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॥ २ · ६१ · १७ ॥
हविराज्यं पुरोडाशः कुशा यूपाश्च खादिराः। नैतानि यातयामानि कुर्वन्ति पुनरध्वरे

havirājyaṁ puroḍāśaḥ kuśā yūpāśca khādirāḥ।
naitāni yātayāmāni kurvanti punaradhvare ॥

‘हविष्य, घृत, पुरोडाश, कुश और खदिर (खैर)- के यूप—ये एक यज्ञ के उपयोग में आ जाने पर ‘यातयाम’ (उपभुक्त) हो जाते हैं; इसलिये विद्वान् इनका फिर दूसरे यज्ञ में उपयोग नहीं करते हैं

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॥ २ · ६१ · १८ ॥
तथा ह्यात्तमिदं राज्यं हृतसारां सुरामिव। नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्वरम्

tathā hyāttamidaṁ rājyaṁ hṛtasārāṁ surāmiva।
nābhimantumalaṁ rāmo naṣṭasomamivādhvaram ॥

‘इसी प्रकार निःसार सुरा और भुक्तावशिष्ट यज्ञसम्बन्धी सोमरस की भाँति इस भोगे हुए राज्य को श्रीराम नहीं ग्रहण कर सकते

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॥ २ · ६१ · १९ ॥
नैवंविधमसत्कारं राघवो मर्षयिष्यति। बलवानिव शार्दूलो वालधेरभिमर्शनम्

naivaṁvidhamasatkāraṁ rāghavo marṣayiṣyati।
balavāniva śārdūlo vāladherabhimarśanam ॥

‘जैसे बलवान् शेर किसीके द्वारा अपनी पूँछ का पकड़ा जाना नहीं सह सकता, उसी प्रकार श्रीराम ऐसे अपमान को नहीं सह सकेंगे

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॥ २ · ६१ · २० ॥
नैतस्य सहिता लोका भयं कुर्युर्महामृधे। अधर्मं त्विह धर्मात्मा लोकं धर्मेण योजयेत्

naitasya sahitā lokā bhayaṁ kuryurmahāmṛdhe।
adharmaṁ tviha dharmātmā lokaṁ dharmeṇa yojayet ॥

‘समस्त लोक एक साथ होकर यदि महासमर में आ जायँ तो भी वे श्रीरामचन्द्रजी के मन में भय उत्पन्न नहीं कर सकते, तथापि इस तरह राज्य लेने में अधर्म मानकर उन्होंने इस पर अधिकार नहीं किया। जो धर्मात्मा समस्त जगत् को धर्म में लगाते हैं, वे स्वयं अधर्म कैसे कर सकते हैं ?

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॥ २ · ६१ · २१ ॥
नन्वसौ काञ्चनैर्बाणैर्महावीर्यो महाभुजः। युगान्त इव भूतानि सागरानपि निर्दहेत्

nanvasau kāñcanairbāṇairmahāvīryo mahābhujaḥ।
yugānta iva bhūtāni sāgarānapi nirdahet ॥

‘वे महापराक्रमी महाबाहु श्रीराम अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा सारे समुद्र को भी उसी प्रकार दग्ध कर सकते हैं, जैसे संवर्तक अग्निदेव प्रलयकाल में सम्पूर्ण प्राणियों को भस्म कर डालते हैं

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॥ २ · ६१ · २२ ॥
तादृशः सिंहबलो वृषभाक्षो नरर्षभः। स्वयमेव हतः पित्रा जलजेनात्मजो यथा

sa tādṛśaḥ siṁhabalo vṛṣabhākṣo nararṣabhaḥ।
svayameva hataḥ pitrā jalajenātmajo yathā ॥

‘सिंह के समान बल और बैल के समान बड़े-बड़े नेत्रवाला वैसा नरश्रेष्ठ वीर पुत्र स्वयं अपने पिता के ही हाथोंद्वारा मारा गया (राज्य से वञ्चित कर दिया गया)। ठीक उसी तरह, जैसे मत्स्य का बच्चा अपने पिता मत्स्य के द्वारा ही खा लिया जाता है

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॥ २ · ६१ · २३ ॥
द्विजातिचरितो धर्मः शास्त्रे दृष्टः सनातनैः। यदि ते धर्मनिरते त्वया पुत्रे विवासिते

dvijāticarito dharmaḥ śāstre dṛṣṭaḥ sanātanaiḥ।
yadi te dharmanirate tvayā putre vivāsite ॥

‘आपके द्वारा धर्मपरायण पुत्र को देशनिकाला दे दिया गया, अतः यह प्रश्न उठता है कि सनातन ऋषियों ने वेद में जिसका साक्षात्कार किया है तथा श्रेष्ठ द्विज जिसे अपने आचरण में लाये हैं, वह धर्म आपकी दृष्टि में सत्य है या नहीं

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॥ २ · ६१ · २४ ॥
गतिरेका पतिर्नार्या द्वितीया गतिरात्मजः। तृतीया ज्ञातयो राजंश्चतुर्थी नैव विद्यते

gatirekā patirnāryā dvitīyā gatirātmajaḥ।
tṛtīyā jñātayo rājaṁścaturthī naiva vidyate ॥

‘राजन्! नारी के लिये एक सहारा उसका पति है, दूसरा उसका पुत्र है तथा तीसरा सहारा उसके पिता-भाई आदि बन्धु-बान्धव हैं, चौथा कोई सहारा उसके लिये नहीं है

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॥ २ · ६१ · २५ ॥
तत्र त्वं मम नैवासि रामश्च वनमाहितः। वनं गन्तुमिच्छामि सर्वथा हा हता त्वया

tatra tvaṁ mama naivāsi rāmaśca vanamāhitaḥ।
na vanaṁ gantumicchāmi sarvathā hā hatā tvayā ॥

‘इन सहारों में से आप तो मेरे हैं ही नहीं (क्योंकि आप सौत के अधीन हैं)। दूसरा सहारा श्रीराम हैं, जो वन में भेज दिये गये (और बन्धु-बान्धव भी दूर हैं। अतः तीसरा सहारा भी नहीं रहा)। आपकी सेवा छोड़कर मैं श्रीराम के पास वन में जाना नहीं चाहती हूँ, इसलिये सर्वथा आपके द्वारा मारी ही गयी

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॥ २ · ६१ · २६ ॥
हतं त्वया राष्ट्रमिदं सराज्यं हताः स्म सर्वाः सह मन्त्रिभिश्च। हता सपुत्रास्मि हताश्च पौराः सुतश्च भार्या तव प्रहृष्टौ

hataṁ tvayā rāṣṭramidaṁ sarājyaṁ hatāḥ sma sarvāḥ saha mantribhiśca।
hatā saputrāsmi hatāśca paurāḥ sutaśca bhāryā ca tava prahṛṣṭau ॥

‘आपने श्रीराम को वन में भेजकर इस राष्ट्र का तथा आस-पास के अन्य राज्यों का भी नाश कर डाला, मन्त्रियोंसहित सारी प्रजा का वध कर डाला। आपके द्वारा पुत्रसहित मैं भी मारी गयी और इस नगर के निवासी भी नष्टप्राय हो गये। केवल आपके पुत्र भरत और पत्नी कैकेयी दो ही प्रसन्न हुए हैं’

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॥ २ · ६१ · २७ ॥
इमां गिरं दारुणशब्दसंहितां निशम्य रामेति मुमोह दुःखितः। ततः शोकं प्रविवेश पार्थिवः स्वदुष्कृतं चापि पुनस्तथास्मरत्

imāṁ giraṁ dāruṇaśabdasaṁhitāṁ niśamya rāmeti mumoha duḥkhitaḥ।
tataḥ sa śokaṁ praviveśa pārthivaḥ svaduṣkṛtaṁ cāpi punastathāsmarat ॥

कौसल्या की यह कठोर शब्दों से युक्त वाणी सुनकर राजा दशरथ को बड़ा दुःख हुआ। वे ‘हा राम!’ कहकर मूर्च्छित हो गये। राजा शोक में डूब गये। फिर उसी समय उन्हें अपने एक पुराने दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जिसके कारण उन्हें यह दुःख प्राप्त हुआ था

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६१ ॥