वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ६० · २३ श्लोकाःSarga 60 · 23 ślokas

कौसल्याका विलाप और सारथि सुमन्त्रका उन्हें समझाना

सुमन्त्र-सान्त्वना

“सुमन्त्र-सान्त्वना”
॥ २ · ६० · ४–५ ॥

पुत्रवियोगशोकार्ता कौसल्या पर्यङ्के उपविष्टा साश्रुनयना ऊर्ध्वम् ईक्षते; पार्श्वे वृद्धः सूतः सुमन्त्रः प्राञ्जलिः 'त्यज शोकम्' इति गद्गदया मधुरया वाचा तां सान्त्वयति।

दीपककी मंद स्वर्ण-आभासे भरे राजभवनके कक्षमें पुत्र-वियोगसे व्याकुल महारानी कौसल्या धूसर-सुनहरी रेशमी साड़ीमें पर्यंकपर बैठी हैं — माँगमें सिंदूर, गलेमें मंगलसूत्र, पर उत्सवके आभूषण उतरे हुए; अश्रुसे भीगा मुख ऊपर उठाए किसी क्षीण सांत्वनाकी ओर ताक रही हैं। उनके पास खड़े वृद्ध सारथि सुमन्त्र सिरपर सूर्य-चिह्नित पगड़ी बाँधे, हाथ जोड़े, गद्गद कंठसे उन्हें समझा रहे हैं — 'शोक, मोह और व्याकुलता छोड़िये' — रामकी धीरता और सीताकी वन-प्रसन्नताका स्मरण कराते हुए।

In a palace chamber warmed by the soft gold of an oil lamp, Queen Kausalya — worn with grief for her exiled son — sits upon a couch in dull-gold silk, her festive ornaments laid aside yet the sindoor in her parting and the marriage-thread still bright; tear-streaked, she lifts her eyes toward a faint solace. Beside her stands the aged charioteer Sumantra, a sun-emblem on his turban and a violet-gold shawl across his shoulder, his palms folded in entreaty, consoling her in a voice choked with tears — 'Let go of your grief' — recounting Ram's steadfast courage and Sita's contentment in the forest.

॥ २ · ६० · १ ॥
ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुनः पुनः। धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत्

tato bhūtopasṛṣṭeva vepamānā punaḥ punaḥ।
dharaṇyāṁ gatasattveva kausalyā sūtamabravīt ॥

तदनन्तर जैसे उनमें भूत का आवेश हो गया हो, इस प्रकार कौसल्या देवी बारंबार काँपने लगीं और अचेत-सी होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। उसी अवस्था में उन्होंने सारथि से कहा—

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॥ २ · ६० · २ ॥
नय मां यत्र काकुत्स्थः सीता यत्र लक्ष्मणः। तान् विना क्षणमप्यद्य जीवितुं नोत्सहे ह्यहम्

naya māṁ yatra kākutsthaḥ sītā yatra ca lakṣmaṇaḥ।
tān vinā kṣaṇamapyadya jīvituṁ notsahe hyaham ॥

‘सुमन्त्र! जहाँ श्रीराम हैं, जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहाँ मुझे भी पहुँचा दो। मैं उनके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती

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॥ २ · ६० · ३ ॥
निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि। अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम्

nivartaya rathaṁ śīghraṁ daṇḍakān naya māmapi।
atha tān nānugacchāmi gamiṣyāmi yamakṣayam ॥

‘जल्दी रथ लौटाओ और मुझे भी दण्डकारण्य में ले चलो। यदि मैं उनके पास न जा सकी तो यमलोक की यात्रा करूँगी’

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॥ २ · ६० · ४ ॥
बाष्पवेगोपहतया वाचा सज्जमानया। इदमाश्वासयन् देवीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्

bāṣpavegopahatayā sa vācā sajjamānayā।
idamāśvāsayan devīṁ sūtaḥ prāñjalirabravīt ॥

देवी कौसल्या की बात सुनकर सारथि सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर उन्हें समझाते हुए आँसुओं के वेग से अवरुद्ध हुई गद्गदवाणी में कहा—

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॥ २ · ६० · ५ ॥
त्यज शोकं मोहं सम्भ्रमं दुःखजं तथा। व्यवधूय संतापं वने वत्स्यति राघवः

tyaja śokaṁ ca mohaṁ ca sambhramaṁ duḥkhajaṁ tathā।
vyavadhūya ca saṁtāpaṁ vane vatsyati rāghavaḥ ॥

‘महारानी! यह शोक, मोह और दुःखजनित व्याकुलता छोड़िये। श्रीरामचन्द्रजी इस समय सारा संताप भूलकर वन में निवास करते हैं

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॥ २ · ६० · ६ ॥
लक्ष्मणश्चापि रामस्य पादौ परिचरन् वने। आराधयति धर्मज्ञः परलोकं जितेन्द्रियः

lakṣmaṇaścāpi rāmasya pādau paricaran vane।
ārādhayati dharmajñaḥ paralokaṁ jitendriyaḥ ॥

‘धर्मज्ञ एवं जितेन्द्रिय लक्ष्मण भी उस वन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की सेवा करते हुए अपना परलोक बना रहे हैं

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॥ २ · ६० · ७ ॥
विजनेऽपि वने सीता वासं प्राप्य गृहेष्विव। विस्रम्भं लभतेऽभीता रामे विन्यस्तमानसा

vijane'pi vane sītā vāsaṁ prāpya gṛheṣviva।
visrambhaṁ labhate'bhītā rāme vinyastamānasā ॥

‘सीता का मन भगवान् श्रीराम में ही लगा हुआ है। इसलिये निर्जन वन में रहकर भी घर की ही भाँति प्रेम एवं प्रसन्नता पाती तथा निर्भय रहती हैं

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॥ २ · ६० · ८ ॥
नास्या दैन्यं कृतं किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्ष्यते। उचितेव प्रवासानां वैदेही प्रतिभाति मे

nāsyā dainyaṁ kṛtaṁ kiṁcit susūkṣmamapi lakṣyate।
uciteva pravāsānāṁ vaidehī pratibhāti me ॥

‘वन में रहने के कारण उनके मन में कुछ थोड़ा-सा भी दुःख नहीं दिखायी देता। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो विदेहराजकुमारी सीता को परदेश में रहने का पहले से ही अभ्यास हो

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॥ २ · ६० · ९ ॥
नगरोपवनं गत्वा यथा स्म रमते पुरा। तथैव रमते सीता निर्जनेषु वनेष्वपि

nagaropavanaṁ gatvā yathā sma ramate purā।
tathaiva ramate sītā nirjaneṣu vaneṣvapi ॥

‘जैसे यहाँ नगर के उपवन में जाकर वे पहले घूमा करती थीं, उसी प्रकार निर्जन वन में भी सीता सानन्द विचरती हैं

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॥ २ · ६० · १० ॥
बालेव रमते सीताबालचन्द्रनिभानना। रामा रामे ह्यदीनात्मा विजनेऽपि वने सती

bāleva ramate sītābālacandranibhānanā।
rāmā rāme hyadīnātmā vijane'pi vane satī ॥

‘पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली रमणी-शिरोमणि उदारहृदया सती-साध्वी सीता उस निर्जन वन में भी श्रीराम के समीप बालिका के समान खेलती और प्रसन्न रहती हैं

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॥ २ · ६० · ११ ॥
तद्गतं हृदयं यस्यास्तदधीनं जीवितम्। अयोध्या हि भवेदस्या रामहीना तथा वनम्

tadgataṁ hṛdayaṁ yasyāstadadhīnaṁ ca jīvitam।
ayodhyā hi bhavedasyā rāmahīnā tathā vanam ॥

‘उनका हृदय श्रीराम में ही लगा हुआ है। उनका जीवन भी श्रीराम के ही अधीन है, अतः राम के बिना अयोध्या भी उनके लिये वन के समान ही होगी (और श्रीराम के साथ रहने पर वे वन में भी अयोध्या के समान ही सुख का अनुभव करेंगी)

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॥ २ · ६० · १२ ॥
परिपृच्छति वैदेही ग्रामांश्च नगराणि च। गतिं दृष्ट्वा नदीनां पादपान् विविधानपि

paripṛcchati vaidehī grāmāṁśca nagarāṇi ca।
gatiṁ dṛṣṭvā nadīnāṁ ca pādapān vividhānapi ॥

‘विदेहनन्दिनी सीता मार्ग में मिलनेवाले गाँवों, नगरों, नदियों के प्रवाहों और नाना प्रकार के वृक्षों को देखकर उनका परिचय पूछा करती हैं

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॥ २ · ६० · १३ ॥
रामं वा लक्ष्मणं वापि दृष्ट्वा जानाति जानकी। अयोध्या क्रोशमात्रे तु विहारमिव साश्रिता

rāmaṁ vā lakṣmaṇaṁ vāpi dṛṣṭvā jānāti jānakī।
ayodhyā krośamātre tu vihāramiva sāśritā ॥

‘श्रीराम और लक्ष्मण को अपने पास देखकर जानकी को यही जान पड़ता है कि मैं अयोध्या से एक कोस की दूरी पर मानो घूमने-फिरने के लिये ही आयी हूँ

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॥ २ · ६० · १४ ॥
इदमेव स्मराम्यस्याः सहसैवोपजल्पितम्। कैकेयीसंश्रितं जल्पं नेदानीं प्रतिभाति माम्

idameva smarāmyasyāḥ sahasaivopajalpitam।
kaikeyīsaṁśritaṁ jalpaṁ nedānīṁ pratibhāti mām ॥

‘सीता के सम्बन्ध में मुझे इतना ही स्मरण है। उन्होंने कैकेयी को लक्ष्य करके जो सहसा कोई बात कह दी थी, वह इस समय मुझे याद नहीं आ रही है’

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॥ २ · ६० · १५ ॥
ध्वंसयित्वा तु तद् वाक्यं प्रमादात् पर्युपस्थितम्। ह्लादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत्

dhvaṁsayitvā tu tad vākyaṁ pramādāt paryupasthitam।
hlādanaṁ vacanaṁ sūto devyā madhuramabravīt ॥

इस प्रकार भूल से निकली हुई कैकेयीविषयक उस बात को पलटकर सारथि सुमन्त्र ने देवी कौसल्या के हृदय को आह्लाद प्रदान करनेवाला मधुर वचन कहा—

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॥ २ · ६० · १६ ॥
अध्वना वातवेगेन सम्भ्रमेणातपेन च। विगच्छति वैदेह्याश्चन्द्रांशुसदृशी प्रभा

adhvanā vātavegena sambhrameṇātapena ca।
na vigacchati vaidehyāścandrāṁśusadṛśī prabhā ॥

‘मार्ग में चलने की थकावट, वायु के वेग, भयदायक वस्तुओं को देखने के कारण होनेवाली घबराहट तथा धूप से भी विदेहराजकुमारी की चन्द्रकिरणों के समान कमनीय कान्ति उनसे दूर नहीं होती है

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॥ २ · ६० · १७ ॥
सदृशं शतपत्रस्य पूर्णचन्द्रोपमप्रभम्। वदनं तद् वदान्याया वैदेह्या विकम्पते

sadṛśaṁ śatapatrasya pūrṇacandropamaprabham।
vadanaṁ tad vadānyāyā vaidehyā na vikampate ॥

‘उदारहृदया सीता का विकसित कमल के समान सुन्दर तथा पूर्ण चन्द्रमा के समान आनन्ददायक कान्ति से युक्त मुख कभी मलिन नहीं होता है

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॥ २ · ६० · १८ ॥
अलक्तरसरक्ताभावलक्तरसवर्जितौ। अद्यापि चरणौ तस्याः पद्मकोशसमप्रभौ

alaktarasaraktābhāvalaktarasavarjitau।
adyāpi caraṇau tasyāḥ padmakośasamaprabhau ॥

‘जिनमें महावर के रंग नहीं लग रहे हैं, सीता के वे दोनों चरण आज भी महावर के समान ही लाल तथा कमलकोश के समान कान्तिमान् हैं

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॥ २ · ६० · १९ ॥
नूपुरोत्कृष्टलीलेव खेलं गच्छति भामिनी। इदानीमपि वैदेही तद्रागान्यस्तभूषणा

nūpurotkṛṣṭalīleva khelaṁ gacchati bhāminī।
idānīmapi vaidehī tadrāgānyastabhūṣaṇā ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अनुराग के कारण उन्हींकी प्रसन्नता के लिये जिन्होंने आभूषणों का परित्याग नहीं किया है, वे विदेहराजकुमारी भामिनी सीता इस समय भी अपने नूपुरों की झनकार से हंसों के कलनाद का तिरस्कार-सा करती हुई लीलाविलासयुक्त गति से चलती हैं

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॥ २ · ६० · २० ॥
गजं वा वीक्ष्य सिंहं वा व्याघ्रं वा वनमाश्रिता। नाहारयति संत्रासं बाहू रामस्य संश्रिता

gajaṁ vā vīkṣya siṁhaṁ vā vyāghraṁ vā vanamāśritā।
nāhārayati saṁtrāsaṁ bāhū rāmasya saṁśritā ॥

‘वे श्रीरामचन्द्रजी के बाहुबल का भरोसा करके वन में रहती हैं और हाथी, बाघ अथवा सिंह को भी देखकर कभी भय नहीं मानती हैं

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॥ २ · ६० · २१ ॥
शोच्यास्ते चात्मा ते शोच्यो नापि जनाधिपः। इदं हि चरितं लोके प्रतिष्ठास्यति शाश्वतम्

na śocyāste na cātmā te śocyo nāpi janādhipaḥ।
idaṁ hi caritaṁ loke pratiṣṭhāsyati śāśvatam ॥

‘अतः आप श्रीराम, लक्ष्मण अथवा सीता के लिये शोक न करें, अपने और महाराज के लिये भी चिन्ता छोड़ें। श्रीरामचन्द्रजी का यह पावन चरित्र संसार में सदा ही स्थिर रहेगा

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॥ २ · ६० · २२ ॥
विधूय शोकं परिहृष्टमानसा महर्षियाते पथि सुव्यवस्थिताः। वने रता वन्यफलाशनाः पितुः शुभां प्रतिज्ञां प्रतिपालयन्ति ते

vidhūya śokaṁ parihṛṣṭamānasā
maharṣiyāte pathi suvyavasthitāḥ।
vane ratā vanyaphalāśanāḥ pituḥ
śubhāṁ pratijñāṁ pratipālayanti te ॥

‘वे तीनों ही शोक छोड़कर प्रसन्नचित्त हो महर्षियों के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक स्थित हैं और वन में रहकर फल-मूल का भोजन करते हुए पिता को उत्तम प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं’

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॥ २ · ६० · २३ ॥
तथापि सूतेन सुयुक्तवादिना निवार्यमाणा सुतशोककर्शिता। चैव देवी विरराम कूजितात् प्रियेति पुत्रेति राघवेति

tathāpi sūtena suyuktavādinā
nivāryamāṇā sutaśokakarśitā।
na caiva devī virarāma kūjitāt
priyeti putreti ca rāghaveti ca ॥

इस प्रकार युक्तियुक्त वचन कहकर सारथि सुमन्त्र ने पुत्रशोक से पीड़ित हुई कौसल्या को चिन्ता करने और रोने से रोका तो भी देवी कौसल्या विलाप से विरत न हुईं। वे ‘हा प्यारे!’ ‘हा पुत्र!’ और ‘हा रघुनन्दन!’ की रट लगाती हुई करुण क्रन्दन करती ही रहीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥