वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ५८ · ३७ श्लोकाःSarga 58 · 37 ślokas

महाराज दशरथकी आज्ञासे सुमन्त्रका श्रीराम और लक्ष्मणके संदेश सुनाना

सुमन्त्र-संदेश निवेदन

“सुमन्त्र-संदेश निवेदन”
॥ २ · ५८ · २–१३ ॥

मन्दालोके राजभवने सूतः सुमन्त्रः कृताञ्जलिर्जानुभ्यां निषण्णः शोकार्तस्य राज्ञो दशरथस्य पुरतो रामवचांसि निवेदयति; अश्रुपूर्णवदनो नृपः प्रणम्य शृणोति, पार्श्वे सिन्दूरशोभिता कौसल्या हृदि करं दधाना पुत्रवार्तां निशामयति।

दीपकोंकी मन्द रोशनीसे भरे राजमहलके कक्षमें सारथि सुमन्त्र घुटनोंके बल हाथ जोड़े बैठे हैं और शोकसे टूटे महाराज दशरथको श्रीरामका संदेश सुना रहे हैं; वृद्ध राजा आँखोंमें आँसू लिये आगेको झुककर हर शब्द सुनने को व्याकुल हैं, और पासमें बैठी सिन्दूर-सुशोभित रानी कौसल्या हृदयपर हाथ रखे अपने पुत्रकी एक-एक बात पी रही हैं।

In the dim, lamplit royal chamber the charioteer Sumantra kneels with folded hands and conveys Ram's parting message to the grief-broken King Dasharath; the aged, crowned king, tears streaking his face, leans forward straining to catch every word, while beside him Queen Kausalya, in her sindoor-marked finery, presses a hand to her heart and drinks in each syllable about her son.

॥ २ · ५८ · १ ॥
प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात् प्रत्यागतस्मृतिः। तदाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात्

pratyāśvasto yadā rājā mohāt pratyāgatasmṛtiḥ।
tadājuhāva taṁ sūtaṁ rāmavṛttāntakāraṇāt ॥

मूर्च्छा दूर होने पर जब राजा को चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीराम का वृत्तान्त सुनने के लिये सारथि सुमन्त्र को सामने बुलाया

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॥ २ · ५८ · २ ॥
तदा सूतो महाराजं कृताञ्जलिरुपस्थितः। राममेवानुशोचन्तं दुःखशोकसमन्वितम्

tadā sūto mahārājaṁ kṛtāñjalirupasthitaḥ।
rāmamevānuśocantaṁ duḥkhaśokasamanvitam ॥

उस समय सुमन्त्र श्रीराम के ही शोक और चिन्ता में निरन्तर डूबे रहनेवाले दुःख-शोक से व्याकुल महाराज दशरथ के पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये

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॥ २ · ५८ · ३ ॥
वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम्। विनिःश्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम्

vṛddhaṁ paramasaṁtaptaṁ navagrahamiva dvipam।
viniḥśvasantaṁ dhyāyantamasvasthamiva kuñjaram ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५८ · ४ ॥
राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम्। अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत्

rājā tu rajasā sūtaṁ dhvastāṅgaṁ samupasthitam।
aśrupūrṇamukhaṁ dīnamuvāca paramārtavat ॥

॥ ३–४ ॥

जैसे जंगल से तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराज का चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीराम के लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हींका ध्यान करते हुए अस्वस्थ-से हो गये थे। राजा ने देखा, सारथि का सारा शरीर धूल से भर गया है। यह सामने खड़ा है। इसके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है। उस अवस्था में राजा ने अत्यन्त आर्त होकर उससे पूछा—

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॥ २ · ५८ · ५ ॥
क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रितः। सोऽत्यन्तसुखितः सूत किमशिष्यति राघवः

kva nu vatsyati dharmātmā vṛkṣamūlamupāśritaḥ।
so'tyantasukhitaḥ sūta kimaśiṣyati rāghavaḥ ॥

‘सूत! धर्मात्मा श्रीराम वृक्ष की जड़ का सहारा ले कहाँ निवास करेंगे? जो अत्यन्त सुख में पले थे, वे मेरे लाडले राम वहाँ क्या खायेंगे?

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॥ २ · ५८ · ६ ॥
दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः। भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत्

duḥkhasyānucito duḥkhaṁ sumantra śayanocitaḥ।
bhūmipālātmajo bhūmau śete kathamanāthavat ॥

‘सुमन्त्र! जो दुःख भोगने के योग्य नहीं हैं, उन्हीं श्रीराम को भारी दुःख प्राप्त हुआ है। जो राजोचित शय्या पर शयन करनेयोग्य हैं, वे राजकुमार श्रीराम अनाथ की भाँति भूमि पर कैसे सोते होंगे?

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॥ २ · ५८ · ७ ॥
यं यान्तमनुयान्ति स्म पदातिरथकुञ्जरः। वत्स्यति कथं रामो विजनं वनमाश्रितः

yaṁ yāntamanuyānti sma padātirathakuñjaraḥ।
sa vatsyati kathaṁ rāmo vijanaṁ vanamāśritaḥ ॥

‘जिनके यात्रा करते समय पीछे-पीछे पैदलों, रथियों और हाथीसवारों की सेना चलती थी, वे ही श्रीराम निर्जन वन में पहुँचकर वहाँ कैसे निवास करेंगे?

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॥ २ · ५८ · ८ ॥
व्यालैर्मृगैराचरितं कृष्णसर्पनिषेवितम्। कथं कुमारौ वैदेह्या सार्धं वनमुपाश्रितौ

vyālairmṛgairācaritaṁ kṛṣṇasarpaniṣevitam।
kathaṁ kumārau vaidehyā sārdhaṁ vanamupāśritau ॥

‘जहाँ अजगर और व्याघ्र-सिंह आदि हिंसक पशु विचरते हैं तथा काले सर्प जिसका सेवन करते हैं, उसी वन का आश्रय लेनेवाले मेरे दोनों कुमार सीता के साथ वहाँ कैसे रहेंगे?

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॥ २ · ५८ · ९ ॥
सुकुमार्या तपस्विन्या सुमन्त्र सह सीतया। राजपुत्रौ कथं पादैरवरुह्य रथाद् गतौ

sukumāryā tapasvinyā sumantra saha sītayā।
rājaputrau kathaṁ pādairavaruhya rathād gatau ॥

‘सुमन्त्र! परम सुकुमारी तपस्विनी सीता के साथ वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण रथ से उतरकर पैदल कैसे गये होंगे?

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॥ २ · ५८ · १० ॥
सिद्धार्थः खलु सूत त्वं येन दृष्टौ ममात्मजौ। वनान्तं प्रविशन्तौ तावश्विनाविव मन्दरम्

siddhārthaḥ khalu sūta tvaṁ yena dṛṣṭau mamātmajau।
vanāntaṁ praviśantau tāvaśvināviva mandaram ॥

‘सारथे! तुम कृतकृत्य हो गये; क्योंकि जैसे दोनों अश्विनीकुमार मन्दराचल के वन में जाते हैं, उसी प्रकार वन के भीतर प्रवेश करते हुए मेरे दोनों पुत्रों को तुमने अपनी आँखों से देखा है

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॥ २ · ५८ · ११ ॥
किमुवाच वचो रामः किमुवाच लक्ष्मणः। सुमन्त्र वनमासाद्य किमुवाच मैथिली

kimuvāca vaco rāmaḥ kimuvāca ca lakṣmaṇaḥ।
sumantra vanamāsādya kimuvāca ca maithilī ॥

‘सुमन्त्र! वन में पहुँचकर श्रीराम ने तुमसे क्या कहा? लक्ष्मण ने भी क्या कहा? तथा मिथिलेशकुमारी सीता ने क्या संदेश दिया?

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॥ २ · ५८ · १२ ॥
आसितं शयितं भुक्तं सूत रामस्य कीर्तय। जीविष्याम्ययमेतेन ययातिरिव साधुषु

āsitaṁ śayitaṁ bhuktaṁ sūta rāmasya kīrtaya।
jīviṣyāmyayametena yayātiriva sādhuṣu ॥

‘सूत! तुम श्रीराम के बैठने, सोने और खाने-पीने से सम्बन्ध रखनेवाली बातें बताओ। जैसे स्वर्ग से गिरे हुए राजा ययाति सत्पुरुषों के बीच में उपस्थित होने पर सत्संग के प्रभाव से पुनः सुखी हो गये थे, उसी प्रकार तुम-जैसे साधुपुरुष के मुख से पुत्र का वृत्तान्त सुनने से मैं सुखपूर्वक जीवन धारण कर सकूँगा’

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॥ २ · ५८ · १३ ॥
इति सूतो नरेन्द्रेण चोदितः सज्जमानया। उवाच वाचा राजानं बाष्पपरिबद्धया

iti sūto narendreṇa coditaḥ sajjamānayā।
uvāca vācā rājānaṁ sa bāṣpaparibaddhayā ॥

महाराज के इस प्रकार पूछने पर सारथि सुमन्त्र ने आँसुओं से रँधी हुई गद्गद वाणीद्वारा उनसे कहा—

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॥ २ · ५८ · १४ ॥
अब्रवीन्मे महाराज धर्ममेवानुपालयन्। अञ्जलिं राघवः कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य

abravīnme mahārāja dharmamevānupālayan।
añjaliṁ rāghavaḥ kṛtvā śirasābhipraṇamya ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५८ · १५ ॥
सूत मद्वचनात् तस्य तातस्य विदितात्मनः। शिरसा वन्दनीयस्य वन्द्यौ पादौ महात्मनः

sūta madvacanāt tasya tātasya viditātmanaḥ।
śirasā vandanīyasya vandyau pādau mahātmanaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५८ · १६ ॥
सर्वमन्तःपुरं वाच्यं सूत मद्वचनात् त्वया। आरोग्यमविशेषेण यथार्हमभिवादनम्

sarvamantaḥpuraṁ vācyaṁ sūta madvacanāt tvayā।
ārogyamaviśeṣeṇa yathārhamabhivādanam ॥

॥ १४–१६ ॥

‘महाराज! श्रीरामचन्द्रजी ने धर्म का ही निरन्तर पालन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर कहा है—‘सूत! तुम मेरी ओर से आत्मज्ञानी तथा वन्दनीय मेरे महात्मा पिता के दोनों चरणों में प्रणाम कहना तथा अन्तःपुर में सभी माताओं को मेरे आरोग्य का समाचार देते हुए उनसे विशेषरूप से मेरा यथोचित प्रणाम निवेदन करना

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॥ २ · ५८ · १७ ॥
माता मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम्। अप्रमादं वक्तव्या ब्रूयाश्चैनामिदं वचः

mātā ca mama kausalyā kuśalaṁ cābhivādanam।
apramādaṁ ca vaktavyā brūyāścaināmidaṁ vacaḥ ॥

‘इसके बाद मेरी माता कौसल्या से मेरा प्रणाम करके बताना कि ‘मैं कुशल से हूँ और धर्मपालन में सावधान रहता हूँ।’ फिर उनको मेरा यह संदेश सुनाना कि ‘माँ!

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॥ २ · ५८ · १८ ॥
धर्मनित्या यथाकालमग्न्यगारपरा भव। देवि देवस्य पादौ देववत् परिपालय

dharmanityā yathākālamagnyagāraparā bhava।
devi devasya pādau ca devavat paripālaya ॥

तुम सदा धर्म में तत्पर रहकर यथासमय अग्निशाला के सेवन (अग्निहोत्र-कार्य) में संलग्न रहना। देवि! महाराज को देवता के समान मानकर उनके चरणों की सेवा करना

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॥ २ · ५८ · १९ ॥
अभिमानं मानं त्यक्त्वा वर्तस्व मातृषु। अनुराजानमार्या कैकेयीमम्ब कारय

abhimānaṁ ca mānaṁ ca tyaktvā vartasva mātṛṣu।
anurājānamāryā ca kaikeyīmamba kāraya ॥

‘अभिमान* और मान** को त्यागकर सभी माताओं के प्रति समान बर्ताव करना—उनके साथ हिल-मिलकर रहना। अम्बे! जिसमें राजा का अनुराग है, उस कैकेयी को भी श्रेष्ठ मानकर उसका सत्कार करना

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॥ २ · ५८ · २० ॥
कुमारे भरते वृत्तिर्वर्तितव्या राजवत्। अप्यज्येष्ठा हि राजानो राजधर्ममनुस्मर

kumāre bharate vṛttirvartitavyā ca rājavat।
apyajyeṣṭhā hi rājāno rājadharmamanusmara ॥

‘कुमार भरत के प्रति राजोचित बर्ताव करना। राजा छोटी उम्र के हों तो भी वे आदरणीय ही होते हैं—इस राजधर्म को याद रखना’

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॥ २ · ५८ · २१ ॥
भरतः कुशलं वाच्यो वाच्यो मद्वचनेन च। सर्वास्वेव यथान्यायं वृत्तिं वर्तस्व मातृषु

bharataḥ kuśalaṁ vācyo vācyo madvacanena ca।
sarvāsveva yathānyāyaṁ vṛttiṁ vartasva mātṛṣu ॥

‘कुमार भरत से भी मेरा कुशल-समाचार बताकर उनसे मेरी ओर से कहना—‘भैया! तुम सभी माताओं के प्रति न्यायोचित बर्ताव करते रहना

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॥ २ · ५८ · २२ ॥
वक्तव्यश्च महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः। पितरं यौवराज्यस्थो राज्यस्थमनुपालय

vaktavyaśca mahābāhurikṣvākukulanandanaḥ।
pitaraṁ yauvarājyastho rājyasthamanupālaya ॥

‘इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु भरत से यह भी कहना चाहिये कि युवराजपद पर अभिषिक्त होने के बाद भी तुम राज्यसिंहासन पर विराजमान पिताजी की रक्षा एवं सेवा में संलग्न रहना

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॥ २ · ५८ · २३ ॥
अतिक्रान्तवया राजा मा स्मैनं व्यपरोरुधः। कुमारराज्ये जीवस्व तस्यैवाज्ञाप्रवर्तनात्

atikrāntavayā rājā mā smainaṁ vyaparorudhaḥ।
kumārarājye jīvasva tasyaivājñāpravartanāt ॥

‘राजा बहुत बूढ़े हो गये हैं—ऐसा मानकर तुम उनका विरोध न करना—उन्हें राजसिंहासन से न उतारना। युवराज-पद पर ही प्रतिष्ठित रहकर उनकी आज्ञा का पालन करते हुए ही जीवन-निर्वाह करना

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॥ २ · ५८ · २४ ॥
अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन्। मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी

abravīccāpi māṁ bhūyo bhṛśamaśrūṇi vartayan।
māteva mama mātā te draṣṭavyā putragardhinī ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५८ · २५ ॥
इत्येवं मां महाबाहुर्ब्रुवन्नेव महायशाः। रामो राजीवपत्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत्

ityevaṁ māṁ mahābāhurbruvanneva mahāyaśāḥ।
rāmo rājīvapatrākṣo bhṛśamaśrūṇyavartayat ॥

॥ २४–२५ ॥

‘फिर उन्होंने नेत्रों से बहुत आँसू बहाते हुए मुझसे भरत से कहने के लिये ही यह संदेश दिया—‘भरत! मेरी पुत्रवत्सला माता को अपनी ही माता के समान समझना।’ मुझसे इतना ही कहकर महाबाहु महायशस्वी कमलनयन श्रीराम बड़े वेग से आँसुओं की वर्षा करने लगे

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॥ २ · ५८ · २६ ॥
लक्ष्मणस्तु सुसंक्रुद्धो निःश्वसन् वाक्यमब्रवीत्। केनायमपराधेन राजपुत्रो विवासितः

lakṣmaṇastu susaṁkruddho niḥśvasan vākyamabravīt।
kenāyamaparādhena rājaputro vivāsitaḥ ॥

‘परंतु लक्ष्मण उस समय अत्यन्त कुपित हो लंबी साँस खींचते हुए बोले—‘सुमन्त्रजी! किस अपराध के कारण महाराज ने इन राजकुमार श्रीराम को देशनिकाला दे दिया है?

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॥ २ · ५८ · २७ ॥
राज्ञा तु खलु कैकेय्या लघु चाश्रुत्य शासनम्। कृतं कार्यमकार्यं वा वयं येनाभिपीडिताः

rājñā tu khalu kaikeyyā laghu cāśrutya śāsanam।
kṛtaṁ kāryamakāryaṁ vā vayaṁ yenābhipīḍitāḥ ॥

‘राजा ने कैकेयी का आदेश सुनकर झट से उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली। उनका यह कार्य उचित हो या अनुचित, परंतु हमलोगोंको उसके कारण कष्ट भोगना ही पड़ता है

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॥ २ · ५८ · २८ ॥
यदि प्रव्राजितो रामो लोभकारणकारितम्। वरदाननिमित्तं वा सर्वथा दुष्कृतं कृतम्

yadi pravrājito rāmo lobhakāraṇakāritam।
varadānanimittaṁ vā sarvathā duṣkṛtaṁ kṛtam ॥

‘श्रीराम को वनवास देना कैकेयी के लोभ के कारण हुआ हो अथवा राजा के दिये हुए वरदान के कारण, मेरी दृष्टि में यह सर्वथा पाप ही किया गया है

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॥ २ · ५८ · २९ ॥
इदं तावद् यथाकाममीश्वरस्य कृते कृतम्। रामस्य तु परित्यागे हेतुमुपलक्षये

idaṁ tāvad yathākāmamīśvarasya kṛte kṛtam।
rāmasya tu parityāge na hetumupalakṣaye ॥

‘यह श्रीराम को वनवास देने का कार्य राजा की स्वेच्छाचारिता के कारण किया गया हो अथवा ईश्वर की प्रेरणा से, परंतु मुझे श्रीराम के परित्याग का कोई समुचित कारण नहीं दिखायी देता है

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॥ २ · ५८ · ३० ॥
असमीक्ष्य समारब्धं विरुद्धं बुद्धिलाघवात्। जनयिष्यति संक्रोशं राघवस्य विवासनम्

asamīkṣya samārabdhaṁ viruddhaṁ buddhilāghavāt।
janayiṣyati saṁkrośaṁ rāghavasya vivāsanam ॥

‘बुद्धि की कमी अथवा तुच्छता के कारण उचित-अनुचित का विचार किये बिना ही जो यह राम-वनवासरूपी शास्त्रविरुद्ध कार्य आरम्भ किया गया है, यह अवश्य ही निन्दा और दुःख का जनक होगा

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॥ २ · ५८ · ३१ ॥
अहं तावन्महाराजे पितृत्वं नोपलक्षये। भ्राता भर्ता बन्धुश्च पिता मम राघवः

ahaṁ tāvanmahārāje pitṛtvaṁ nopalakṣaye।
bhrātā bhartā ca bandhuśca pitā ca mama rāghavaḥ ॥

‘मुझे इस समय महाराज में पिता का भाव नहीं दिखायी देता। अब तो रघुकुलनन्दन श्रीराम ही मेरे भाई, स्वामी, बन्धु-बान्धव तथा पिता हैं

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॥ २ · ५८ · ३२ ॥
सर्वलोकप्रियं त्यक्त्वा सर्वलोकहिते रतम्। सर्वलोकोऽनुरज्येत कथं चानेन कर्मणा

sarvalokapriyaṁ tyaktvā sarvalokahite ratam।
sarvaloko'nurajyeta kathaṁ cānena karmaṇā ॥

‘जो सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर होने के कारण सब लोगों के प्रिय हैं, उन श्रीराम का परित्याग करके राजा ने जो यह क्रूरतापूर्ण पापकृत्य किया है, इसके कारण अब सारा संसार उनमें कैसे अनुरक्त रह सकता है? (अब उनमें राजोचित गुण कहाँ रह गया है?)

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॥ २ · ५८ · ३३ ॥
सर्वप्रजाभिरामं हि रामं प्रव्रज्य धार्मिकम्। सर्वलोकविरोधेन कथं राजा भविष्यति

sarvaprajābhirāmaṁ hi rāmaṁ pravrajya dhārmikam।
sarvalokavirodhena kathaṁ rājā bhaviṣyati ॥

‘जिनमें समस्त प्रजा का मन रमता है, उन धर्मात्मा श्रीराम को देशनिकाला देकर समस्त लोकों का विरोध करने के कारण अब वे कैसे राजा हो सकेंगे?

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॥ २ · ५८ · ३४ ॥
जानकी तु महाराज निःश्वसन्ती तपस्विनी। भूतोपहतचित्तेव विष्ठिता विस्मृता स्थिता

jānakī tu mahārāja niḥśvasantī tapasvinī।
bhūtopahatacitteva viṣṭhitā vismṛtā sthitā ॥

‘महाराज! तपस्विनी जनकनन्दिनी सीता तो लंबी साँस खींचती हुई इस प्रकार निश्चेष्ट खड़ी थीं, मानो उनमें किसी भूत का आवेश हो गया हो। वे भूली-सी जान पड़ती थीं

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॥ २ · ५८ · ३५ ॥
अदुष्टपूर्वव्यसना राजपुत्री यशस्विनी। तेन दुःखेन रुदती नैव मां किंचिदब्रवीत्

aduṣṭapūrvavyasanā rājaputrī yaśasvinī।
tena duḥkhena rudatī naiva māṁ kiṁcidabravīt ॥

‘उन यशस्विनी राजकुमारी ने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा था। वे पति के ही दुःख से दुःखी होकर रो रही थीं। उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा

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॥ २ · ५८ · ३६ ॥
उद्वीक्षमाणा भर्तारं मुखेन परिशुष्यता। मुमोच सहसा बाष्पं प्रयान्तमुपवीक्ष्य सा

udvīkṣamāṇā bhartāraṁ mukhena pariśuṣyatā।
mumoca sahasā bāṣpaṁ prayāntamupavīkṣya sā ॥

‘मुझे इधर आने के लिये उद्यत देख वे सूखे मुँह से पति की ओर देखती हुई सहसा आँसू बहाने लगी थीं

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॥ २ · ५८ · ३७ ॥
तथैव रामोऽश्रुमुखः कृताञ्जलिः स्थितोऽब्रवील्लक्ष्मणबाहुपालितः। तथैव सीता रुदती तपस्विनी निरीक्षते राजरथं तथैव माम्

tathaiva rāmo'śrumukhaḥ kṛtāñjaliḥ sthito'bravīllakṣmaṇabāhupālitaḥ।
tathaiva sītā rudatī tapasvinī nirīkṣate rājarathaṁ tathaiva mām ॥

‘इसी प्रकार लक्ष्मण की भुजाओं से सुरक्षित श्रीराम उस समय हाथ जोड़े खड़े थे। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। मनस्विनी सीता भी रोती हुई कभी आपके इस रथ की ओर देखती थीं और कभी मेरी ओर’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥