वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ५५ · ३३ श्लोकाःSarga 55 · 33 ślokas

भरद्वाजजीका श्रीराम आदिके लिये स्वस्तिवाचन करके उन्हें चित्रकूटका मार्ग बताना, उन सबका अपने ही बनाये हुए बेड़ेसे यमुनाजीको पार करना, सीताकी यमुना और श्यामवटसे प्रार्थना, तीनोंका यमुनाके किनारेके मार्गसे एक कोसतक जाकर वनमें घूमना-फिरना, यमुनाजीके समतल तटपर रात्रिमें निवास करना

यमुना-वन्दना

“यमुना-वन्दना”
॥ २ · ५५ · १९–२० ॥

कालिन्दीमध्ये काष्ठप्लवे स्थिता कृताञ्जलिर्वैदेही यमुनादेवीं प्रणमति क्षेमप्रत्यागमनं याचमाना; वामे श्यामो रामः सशरचापः, दक्षिणे वल्कली लक्ष्मणः प्लवं धारयन्; जलान्निर्गता पद्महस्ता सरिद्देवी तां वन्दनां प्रतिगृह्णाति।

सुनहरी सांध्य-आभा में यमुना की विशाल धारा के बीच, अपने ही हाथों बनाये लकड़ी के बेड़े पर तीनों खड़े हैं; बीच में रेशमी लाल-सुनहरे वस्त्र और आभूषणों से सज्जी सीता दोनों हाथ जोड़कर नदी-देवी को प्रणाम करती हुई सकुशल लौटने की मनौती माँग रही हैं; बायीं ओर श्यामवर्ण राम धनुष-बाण लिये शान्त खड़े हैं और दायीं ओर वल्कलधारी लक्ष्मण बल्ली से बेड़े को थामे हैं; जल से निकलकर कमल थामे मुकुटधारिणी यमुनादेवी उनकी प्रार्थना ग्रहण कर रही हैं, तट पर दीप-पुष्प का थाल लिये एक स्त्री और हाथ जोड़े एक भक्त, तथा दूर पार श्यामवट की सघन छाया।

In the golden light of dusk, midway across the broad Yamuna on a raft of logs they have lashed together with their own hands, Sita stands at the centre in red-and-gold silk and ornaments, palms joined, bowing to the river goddess and vowing her offerings for a safe return; to her left the shyama-hued Ram stands serene with his great bow and quiver, and to her right the bark-clad Lakshman steadies the raft with a pole; crowned and lotus in hand, the goddess Yamuna rises from the water to receive the prayer, while on the near bank a woman offers a tray of lamp and flowers and a devotee folds his hands, and the dense shade of the great banyan waits on the far shore.

॥ २ · ५५ · १ ॥
उषित्वा रजनीं तत्र राजपुत्रावरिंदमौ। महर्षिमभिवाद्याथ जग्मतुस्तं गिरिं प्रति

uṣitvā rajanīṁ tatra rājaputrāvariṁdamau।
maharṣimabhivādyātha jagmatustaṁ giriṁ prati ॥

उस आश्रम में रातभर रहकर शत्रुओं का दमन करनेवाले वे दोनों राजकुमार महर्षि को प्रणाम करके चित्रकूट पर्वत पर जाने को उद्यत हुए

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २ ॥
तेषां स्वस्त्ययनं चैव महर्षिः चकार ह। प्रस्थितान् प्रेक्ष्य तांश्चैव पिता पुत्रानिवौरसान्

teṣāṁ svastyayanaṁ caiva maharṣiḥ sa cakāra ha।
prasthitān prekṣya tāṁścaiva pitā putrānivaurasān ॥

उन तीनोंको प्रस्थान करते देख महर्षि ने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रों को यात्रा करते देख उनके लिये मङ्गलसूचक आशीर्वाद देता है

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ३ ॥
ततः प्रचक्रमे वक्तुं वचनं महामुनिः। भरद्वाजो महातेजा रामं सत्यपराक्रमम्

tataḥ pracakrame vaktuṁ vacanaṁ sa mahāmuniḥ।
bharadvājo mahātejā rāmaṁ satyaparākramam ॥

तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाज ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ४ ॥
गङ्गायमुनयोः संधिमासाद्य मनुजर्षभौ। कालिन्दीमनुगच्छेतां नदीं पश्चान्मुखाश्रिताम्

gaṅgāyamunayoḥ saṁdhimāsādya manujarṣabhau।
kālindīmanugacchetāṁ nadīṁ paścānmukhāśritām ॥

‘नरश्रेष्ठ! तुम दोनों भाई गङ्गा और यमुना के संगम पर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुना के निकट जाना

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ५ ॥
अथासाद्य तु कालिन्दीं प्रतिस्रोतःसमागताम्। तस्यास्तीर्थं प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव। तत्र यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमतीं नदीम्

athāsādya tu kālindīṁ pratisrotaḥsamāgatām।
tasyāstīrthaṁ pracaritaṁ prakāmaṁ prekṣya rāghava।
tatra yūyaṁ plavaṁ kṛtvā taratāṁśumatīṁ nadīm ॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर गङ्गाजी के जल के वेग से अपने प्रवाह के प्रतिकूल दिशा में मुड़ी हुई यमुना के पास पहुँचकर लोगों के आने-जाने के कारण उनके पदचिह्नों से चिह्नित हुए अवतरण-प्रदेश (पार उतरने के लिये उपयोगी घाट) को अच्छी तरह देख-भालकर वहाँ जाना और एक बेड़ा बनाकर उसी के द्वारा सूर्यकन्या यमुना के उस पार उतर जाना

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ६ ॥
ततो न्यग्रोधमासाद्य महान्तं हरितच्छदम्। परीतं बहुभिर्वृक्षैः श्यामं सिद्धोपसेवितम्

tato nyagrodhamāsādya mahāntaṁ haritacchadam।
parītaṁ bahubhirvṛkṣaiḥ śyāmaṁ siddhopasevitam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५५ · ७ ॥
तस्मिन् सीताञ्जलिं कृत्वा प्रयुञ्जीताशिषां क्रियाम्। समासाद्य तं वृक्षं वसेद् वातिक्रमेत वा

tasmin sītāñjaliṁ kṛtvā prayuñjītāśiṣāṁ kriyām।
samāsādya ca taṁ vṛkṣaṁ vased vātikrameta vā ॥

॥ ६–७ ॥

‘तत्पश्चात् आगे जाने पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष मिलेगा, जिसके पत्ते हरे रंग के हैं। वह चारों ओर से बहुसंख्यक दूसरे वृक्षोंद्वारा घिरा हुआ है। उस वृक्ष का नाम श्यामवट है। उसकी छाया के नीचे बहुत-से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ पहुँचकर सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करें। यात्री की इच्छा हो तो उस वृक्ष के पास जाकर कुछ कालतक वहाँ निवास करे अथवा वहाँ से आगे बढ़ जाय

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ८ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा नीलं प्रेक्ष्य काननम्। सल्लकीबदरीमिश्रं रम्यं वंशैश्च यामुनैः

krośamātraṁ tato gatvā nīlaṁ prekṣya ca kānanam।
sallakībadarīmiśraṁ ramyaṁ vaṁśaiśca yāmunaiḥ ॥

‘श्यामवट से एक कोस दूर जाने पर तुम्हें नीलवन का दर्शन होगा; वहाँ सल्लकी (चीड़) और बेर के भी पेड़ मिले हुए हैं। यमुना के तट पर उत्पन्न हुए बाँसों के कारण वह और भी रमणीय दिखायी देता है

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ९ ॥
पन्थाश्चित्रकूटस्य गतस्य बहुशो मया। रम्यो मार्दवयुक्तश्च दावैश्चैव विवर्जितः

sa panthāścitrakūṭasya gatasya bahuśo mayā।
ramyo mārdavayuktaśca dāvaiścaiva vivarjitaḥ ॥

‘यह वही स्थान है जहाँ से चित्रकूट को रास्ता जाता है। मैं उस मार्ग से कई बार गया हूँ। वहाँ की भूमि कोमल और दृश्य रमणीय है। उधर कभी दावानल का भय नहीं होता है’

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १० ॥
इति पन्थानमादिश्य महर्षिः संन्यवर्तत। अभिवाद्य तथेत्युक्त्वा रामेण विनिवर्तितः

iti panthānamādiśya maharṣiḥ saṁnyavartata।
abhivādya tathetyuktvā rāmeṇa vinivartitaḥ ॥

इस प्रकार मार्ग बताकर जब महर्षि भरद्वाज लौटने लगे, तब श्रीराम ने ‘तथास्तु’ कहकर उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा—‘अब आप आश्रम को लौट जाइये’

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ११ ॥
उपावृत्ते मुनौ तस्मिन् रामो लक्ष्मणमब्रवीत्। कृतपुण्याः स्म भद्रं ते मुनिर्यन्नोऽनुकम्पते

upāvṛtte munau tasmin rāmo lakṣmaṇamabravīt।
kṛtapuṇyāḥ sma bhadraṁ te muniryanno'nukampate ॥

उन महर्षि के लौट जाने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। ये मुनि हमारे ऊपर जो इतनी कृपा रखते हैं, इससे जान पड़ता है कि हमलोगोंने पहले कभी महान् पुण्य किया है’

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १२ ॥
इति तौ पुरुषव्याघ्रौ मन्त्रयित्वा मनस्विनौ। सीतामेवाग्रतः कृत्वा कालिन्दीं जग्मतुर्नदीम्

iti tau puruṣavyāghrau mantrayitvā manasvinau।
sītāmevāgrataḥ kṛtvā kālindīṁ jagmaturnadīm ॥

इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मनस्वी पुरुषसिंह सीता को ही आगे करके यमुना नदी के तट पर गये

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १३ ॥
अथासाद्य तु कालिन्दीं शीघ्रस्रोतस्विनीं नदीम्। चिन्तामापेदिरे सद्यो नदीजलतितीर्षवः

athāsādya tu kālindīṁ śīghrasrotasvinīṁ nadīm।
cintāmāpedire sadyo nadījalatitīrṣavaḥ ॥

वहाँ कालिन्दी का स्रोत बड़ी तीव्रगति से प्रवाहित हो रहा था; वहाँ पहुँचकर वे इस चिन्ता में पड़े कि कैसे नदी को पार किया जाय; क्योंकि वे तुरंत ही यमुनाजी के जल को पार करना चाहते थे

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १४ ॥
तौ काष्ठसंघाटमथो चक्रतुः सुमहाप्लवम्। शुष्कैर्वंशैः समाकीर्णमुशीरैश्च समावृतम्

tau kāṣṭhasaṁghāṭamatho cakratuḥ sumahāplavam।
śuṣkairvaṁśaiḥ samākīrṇamuśīraiśca samāvṛtam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५५ · १५ ॥
ततो वैतसशाखाश्च जम्बुशाखाश्च वीर्यवान्। चकार लक्ष्मणश्छित्त्वा सीतायाः सुखमासनम्

tato vaitasaśākhāśca jambuśākhāśca vīryavān।
cakāra lakṣmaṇaśchittvā sītāyāḥ sukhamāsanam ॥

॥ १४–१५ ॥

फिर उन दोनों भाइयों ने जंगल के सूखे काठ बटोरकर उन्हींके द्वारा एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार किया। वह बेड़ा सूखे बाँसों से व्याप्त था और उसके ऊपर खस बिछाया गया था। तदनन्तर पराक्रमी लक्ष्मण ने बेंत और जामुन की टहनियों को काटकर सीता के बैठने के लिये एक सुखद आसन तैयार किया

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १६ ॥
तत्र श्रियमिवाचिन्त्यां रामो दाशरथिः प्रियाम्। ईषत्सलज्जमानां तामध्यारोपयत प्लवम्

tatra śriyamivācintyāṁ rāmo dāśarathiḥ priyām।
īṣatsalajjamānāṁ tāmadhyāropayata plavam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५५ · १७ ॥
पार्श्वे तत्र वैदेह्या वसने भूषणानि च। प्लवे कठिनकाजं रामश्चक्रे समाहितः

pārśve tatra ca vaidehyā vasane bhūṣaṇāni ca।
plave kaṭhinakājaṁ ca rāmaścakre samāhitaḥ ॥

॥ १६–१७ ॥

दशरथनन्दन श्रीराम ने लक्ष्मी के समान अचिन्त्य ऐश्वर्यवाली अपनी प्रिया सीता को जो कुछ लज्जित-सी हो रही थीं, उस बेड़े पर चढ़ा दिया और उनके बगल में वस्त्र एवं आभूषण रख दिये; फिर श्रीराम ने बड़ी सावधानी के साथ खन्ती (कुदारी) और बकरे के चमड़े से मढ़ी हुई पिटारी को भी बेड़े पर ही रखा

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १८ ॥
आरोप्य सीतां प्रथमं संघाटं परिगृह्य तौ। ततः प्रतेरतुर्यत्तौ प्रीतौ दशरथात्मजौ

āropya sītāṁ prathamaṁ saṁghāṭaṁ parigṛhya tau।
tataḥ prateraturyattau prītau daśarathātmajau ॥

इस प्रकार पहले सीता को चढ़ाकर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उस बेड़े को पकड़कर खेने लगे। उन्होंने बड़े प्रयत्न और प्रसन्नता के साथ नदी को पार करना आरम्भ किया

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · १९ ॥
कालिन्दीमध्यमायाता सीता त्वेनामवन्दत। स्वस्ति देवि तरामि त्वां पारयेन्मे पतिर्द्रुतम्

kālindīmadhyamāyātā sītā tvenāmavandata।
svasti devi tarāmi tvāṁ pārayenme patirdrutam ॥

यमुना की बीच धारा में आने पर सीता ने उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘देवि! इस बेड़े द्वारा मैं आपके पार जा रही हूँ। आप ऐसी कृपा करें, जिससे हमलोग सकुशल पार हो जायँ और मेरे पतिदेव अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा को निर्विघ्न पूर्ण करें

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २० ॥
यक्ष्ये त्वां गोसहस्रेण सुराघटशतेन च। स्वस्ति प्रत्यागते रामे पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम्

yakṣye tvāṁ gosahasreṇa surāghaṭaśatena ca।
svasti pratyāgate rāme purīmikṣvākupālitām ॥

‘इक्ष्वाकुवंशी वीरोंद्वारा पालित अयोध्यापुरी में श्रीरघुनाथजी के सकुशल लौट आने पर मैं आपके किनारे एक सहस्र गौओं का दान करूँगी और सैकड़ों देवदुर्लभ पदार्थ अर्पित करके आपकी पूजा सम्पन्न करूँगी’

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २१ ॥
कालिन्दीमथ सीता तु याचमाना कृताञ्जलिः। तीरमेवाभिसम्प्राप्ता दक्षिणं वरवर्णिनी

kālindīmatha sītā tu yācamānā kṛtāñjaliḥ।
tīramevābhisamprāptā dakṣiṇaṁ varavarṇinī ॥

इस प्रकार सुन्दरी सीता हाथ जोड़कर यमुनाजी से प्रार्थना कर रही थीं, इतनेहीमें वे दक्षिण तट पर जा पहुँचीं

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २२ ॥
ततः प्लवेनांशुमतीं शीघ्रगामूर्मिमालिनीम्। तीरजैर्बहुभिर्वृक्षैः संतेरुर्यमुनां नदीम्

tataḥ plavenāṁśumatīṁ śīghragāmūrmimālinīm।
tīrajairbahubhirvṛkṣaiḥ saṁteruryamunāṁ nadīm ॥

इस तरह उन तीनोंने उसी बेड़ेद्वारा बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षों से सुशोभित और तरङ्गमालाओं से अलंकृत शीघ्रगामिनी सूर्य-कन्या यमुना नदी को पार किया

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २३ ॥
ते तीर्णाः प्लवमुत्सृज्य प्रस्थाय यमुनावनात्। श्यामं न्यग्रोधमासेदुः शीतलं हरितच्छदम्

te tīrṇāḥ plavamutsṛjya prasthāya yamunāvanāt।
śyāmaṁ nyagrodhamāseduḥ śītalaṁ haritacchadam ॥

पार उतरकर उन्होंने बेड़े को तो वहीं तट पर छोड़ दिया और यमुना-तटवर्ती वन से प्रस्थान करके वे हरे-हरे पत्तों से सुशोभित शीतल छायावाले श्यामवट के पास जा पहुँचे

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २४ ॥
न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत। नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिर्व्रतम्

nyagrodhaṁ samupāgamya vaidehī cābhyavandata।
namaste'stu mahāvṛkṣa pārayenme patirvratam ॥

वट के समीप पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीता ने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार कहा—‘महावृक्ष! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवास-विषयक व्रत को पूर्ण करें

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २५ ॥
कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां यशस्विनीम्। इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी

kausalyāṁ caiva paśyema sumitrāṁ ca yaśasvinīm।
iti sītāñjaliṁ kṛtvā paryagacchanmanasvinī ॥

‘तथा हमलोग वन से सकुशल लौटकर माता कौसल्या तथा यशस्विनी सुमित्रादेवी का दर्शन कर सकें।’ इस प्रकार कहकर मनस्विनी सीता ने हाथ जोड़े हुए उस वृक्ष की परिक्रमा की

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २६ ॥
अवलोक्य ततः सीतामायाचन्तीमनिन्दिताम्। दयितां विधेयां रामो लक्ष्मणमब्रवीत्

avalokya tataḥ sītāmāyācantīmaninditām।
dayitāṁ ca vidheyāṁ ca rāmo lakṣmaṇamabravīt ॥

सदा अपनी आज्ञा के अधीन रहनेवाली प्राणप्यारी सती-साध्वी सीता को श्यामवट से आशीर्वाद की याचना करती देख श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २७ ॥
सीतामादाय गच्छ त्वमग्रतो भरतानुज। पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सायुधो द्विपदां वर

sītāmādāya gaccha tvamagrato bharatānuja।
pṛṣṭhato'nugamiṣyāmi sāyudho dvipadāṁ vara ॥

‘भरत के छोटे भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम सीता को साथ लेकर आगे-आगे चलो और मैं धनुष धारण किये पीछे से तुमलोगों की रक्षा करता हुआ चलूँगा

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २८ ॥
यद्यत् फलं प्रार्थयते पुष्पं वा जनकात्मजा। तत्तत् प्रयच्छ वैदेह्या यत्रास्या रमते मनः

yadyat phalaṁ prārthayate puṣpaṁ vā janakātmajā।
tattat prayaccha vaidehyā yatrāsyā ramate manaḥ ॥

‘विदेहकुलनन्दिनी जनकदुलारी सीता जो-जो फल या फूल माँगें अथवा जिस वस्तु को पाकर इनका मन प्रसन्न रहे, वह सब इन्हें देते रहो’

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · २९ ॥
एकैकं पादपं गुल्मं लतां वा पुष्पशालिनीम्। अदृष्टरूपां पश्यन्ती रामं पप्रच्छ साऽबला

ekaikaṁ pādapaṁ gulmaṁ latāṁ vā puṣpaśālinīm।
adṛṣṭarūpāṁ paśyantī rāmaṁ papraccha sā'balā ॥

अबला सीता एक-एक वृक्ष, झाड़ी अथवा पहले की न देखी हुई पुष्पशोभित लता को देखकर उसके विषय में श्रीरामचन्द्रजी से पूछती थीं

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ३० ॥
रमणीयान् बहुविधान् पादपान् कुसुमोत्करान्। सीतावचनसंरब्ध आनयामास लक्ष्मणः

ramaṇīyān bahuvidhān pādapān kusumotkarān।
sītāvacanasaṁrabdha ānayāmāsa lakṣmaṇaḥ ॥

तथा लक्ष्मण सीता के कथनानुसार तुरंत ही भाँति-भाँति के वृक्षों की मनोहर शाखाएँ और फूलों के गुच्छे ला-लाकर उन्हें देते थे

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ३१ ॥
विचित्रवालुकजलां हंससारसनादिताम्। रेमे जनकराजस्य सुता प्रेक्ष्य तदा नदीम्

vicitravālukajalāṁ haṁsasārasanāditām।
reme janakarājasya sutā prekṣya tadā nadīm ॥

उस समय जनकराजकिशोरी सीता विचित्र वालुका और जलराशि से सुशोभित तथा हंस और सारसों के कलनाद से मुखरित यमुना नदी को देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ३२ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ। बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनावने

krośamātraṁ tato gatvā bhrātarau rāmalakṣmaṇau।
bahūn medhyān mṛgān hatvā ceraturyamunāvane ॥

इस तरह एक कोस की यात्रा करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण (प्राणियों के हित के लिये) मार्ग में मिले हुए हिंसक पशुओं का वध करते हुए यमुना-तटवर्ती वन में विचरने लगे

English translation coming soon.

॥ २ · ५५ · ३३ ॥
विहृत्य ते बर्हिणपूगनादिते शुभे वने वारणवानरायुते। समं नदीवप्रमुपेत्य सत्वरं निवासमाजग्मुरदीनदर्शनाः

vihṛtya te barhiṇapūganādite śubhe vane vāraṇavānarāyute।
samaṁ nadīvapramupetya satvaraṁ nivāsamājagmuradīnadarśanāḥ ॥

उदार दृष्टिवाले वे सीता, लक्ष्मण और श्रीराम मोरों के झुंडों की मीठी बोली से गूँजते तथा हाथियों और वानरों से भरे हुए उस सुन्दर वन में घूम-फिरकर शीघ्र ही यमुनानदी के समतल तट पर आ गये और रात में उन्होंने वहीं निवास किया

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥