वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ५२ · १०२ श्लोकाःSarga 52 · 102 ślokas

श्रीरामको आज्ञासे गुहका नाव मँगाना, श्रीरामका सुमन्त्रको समझा-बुझाकर अयोध्यापुरी लौट जानेके लिये आज्ञा देना और माता-पिता आदिसे कहनेके लिये संदेश सुनाना, सुमन्त्रके वनमें ही चलनेके लिये आग्रह करनेपर श्रीरामका उन्हें युक्तिपूर्वक समझाकर लौटनेके लिये विवश करना, फिर तीनोंका नावपर बैठना, सीताकी गङ्गाजीसे प्रार्थना, नावसे पार उतरकर श्रीराम आदिका वत्सदेशमें पहुँचना और सायंकालमें एक वृक्षके नीचे रहनेके लिये जाना

गङ्गापार · सुमन्त्र-विदा

“गङ्गापार · सुमन्त्र-विदा”
॥ २ · ५२ · ११–२० ॥

प्रभाते विशालायां देदीप्यमानायां गङ्गायां गुहस्य नावि वल्कलधरौ श्यामो रामो धन्वी लक्ष्मणश्च भूषिता सीता च पारमभियान्ति, कर्णधारौ नावं वहतः; अस्मिंस्तीरे प्राञ्जलिः सारथिः सुमन्त्रो दूरगतं रामं साश्रुनयनो निरीक्षमाणो रोदिति, पार्श्वे च निषादराजो गुहस्तिष्ठति।

प्रभात की सुनहली आभा में फैली विशाल गङ्गा के जल पर निषादराज गुह की नाव, खिवैया के डाँड़ चलाते हुए, दूर के वनाच्छादित तट की ओर बढ़ रही है; उसमें वल्कलधारी श्यामवर्ण श्रीराम, धनुष थामे लक्ष्मण और रत्नाभूषणों से सजी सीता खड़े हैं। इस पार के किनारे पर वृद्ध सारथि सुमन्त्र हाथ जोड़े, गालों पर आँसू लिये दूर जाती नाव को अपलक निहार रहे हैं, और उनके समीप मोरपंख धारण किये निषादराज गुह खड़े हैं — बिछोह का करुण क्षण।

On the broad, sunlit waters of the Ganga at dawn, the Nishad king Guha's boat is rowed by its boatmen toward the distant forested shore, bearing the bark-clad, blue-hued Ram, Lakshman gripping his bow, and the richly adorned Sita; on the near bank the aged charioteer Sumantra stands with folded hands and tears streaming down his cheeks, gazing after the receding boat, while Guha, crowned with a peacock plume, stands beside him — the aching instant of parting.

॥ २ · ५२ · १ ॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशाः। उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्

prabhātāyāṁ tu śarvaryāṁ pṛthuvakṣā mahāyaśāḥ।
uvāca rāmaḥ saumitriṁ lakṣmaṇaṁ śubhalakṣaṇam ॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीराम ने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ५२ · २ ॥
भास्करोदयकालोऽसौ गता भगवती निशा। असौ सुकृष्णो विहगः कोकिलस्तात कूजति

bhāskarodayakālo'sau gatā bhagavatī niśā।
asau sukṛṣṇo vihagaḥ kokilastāta kūjati ॥

‘तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी। अब सूर्योदय का समय आ पहुँचा है। वह अत्यन्त काले रंग का पक्षी कोकिल कुहू-कुहू बोल रहा है

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॥ २ · ५२ · ३ ॥
बर्हिणानां निर्घोषः श्रूयते नदतां वने। तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम्

barhiṇānāṁ ca nirghoṣaḥ śrūyate nadatāṁ vane।
tarāma jāhnavīṁ saumya śīghragāṁ sāgaraṅgamām ॥

‘वन में अव्यक्त शब्द करनेवाले मयूरों की केका वाणी भी सुनायी देती है; अतः सौम्य! अब हमें तीव्र गति से बहनेवाली समुद्रगामिनी गङ्गाजी के पार उतरना चाहिये’

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॥ २ · ५२ · ४ ॥
विज्ञाय रामस्य वचः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः। गुहमामन्त्र्य सूतं सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रतः

vijñāya rāmasya vacaḥ saumitrirmitranandanaḥ।
guhamāmantrya sūtaṁ ca so'tiṣṭhad bhrāturagrataḥ ॥

मित्रों को आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के कथन का अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्र को बुलाकर पार उतरने की व्यवस्था करने के लिये कहा और स्वयं वे भाई के सामने आकर खड़े हो गये

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॥ २ · ५२ · ५ ॥
तु रामस्य वचनं निशम्य प्रतिगृह्य च। स्थपतिस्तूर्णमाहूय सचिवानिदमब्रवीत्

sa tu rāmasya vacanaṁ niśamya pratigṛhya ca।
sthapatistūrṇamāhūya sacivānidamabravīt ॥

श्रीरामचन्द्रजी का वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराज ने तुरंत अपने सचिवों को बुलाया और इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ५२ · ६ ॥
अस्यवाहनसंयुक्तां कर्णग्राहवतीं शुभाम्। सुप्रतारां दृढां तीर्थे शीघ्रं नावमुपाहर

asyavāhanasaṁyuktāṁ karṇagrāhavatīṁ śubhām।
supratārāṁ dṛḍhāṁ tīrthe śīghraṁ nāvamupāhara ॥

‘तुम घाट पर शीघ्र ही एक ऐसी नाव ले आओ, जो मजबूत होने के साथ ही सुगमतापूर्वक खेनेयोग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखने में सुन्दर हो’

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॥ २ · ५२ · ७ ॥
तं निशम्य गुहादेशं गुहामात्यो गतो महान्। उपोह्य रुचिरां नावं गुहाय प्रत्यवेदयत्

taṁ niśamya guhādeśaṁ guhāmātyo gato mahān।
upohya rucirāṁ nāvaṁ guhāya pratyavedayat ॥

निषादराज गुह का वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाट पर पहुँचाकर उसने गुह को इसकी सूचना दी

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॥ २ · ५२ · ८ ॥
ततः प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो राघवमब्रवीत्। उपस्थितेयं नौर्देव भूयः किं करवाणि ते

tataḥ sa prāñjalirbhūtvā guho rāghavamabravīt।
upasthiteyaṁ naurdeva bhūyaḥ kiṁ karavāṇi te ॥

तब गुह ने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजी से कहा— ‘देव! यह नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय आपकी और क्या सेवा करूँ ?

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॥ २ · ५२ · ९ ॥
तवामरसुतप्रख्य तर्तुं सागरगामिनीम्। नौरियं पुरुषव्याघ्र शीघ्रमारोह सुव्रत

tavāmarasutaprakhya tartuṁ sāgaragāminīm।
nauriyaṁ puruṣavyāghra śīghramāroha suvrata ॥

‘देवकुमार के समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रत का पालन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम! समुद्रगामिनी गङ्गानदी को पार करने के लिये आपकी सेवा में यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र इसपर आरूढ़ होइये’

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॥ २ · ५२ · १० ॥
अथोवाच महातेजा रामो गुहमिदं वचः। कृतकामोऽस्मि भवता शीघ्रमारोप्यतामिति

athovāca mahātejā rāmo guhamidaṁ vacaḥ।
kṛtakāmo'smi bhavatā śīghramāropyatāmiti ॥

तब महातेजस्वी श्रीराम गुह से इस प्रकार बोले— ‘सखे! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया, अब शीघ्र ही सब सामान नाव पर चढ़ाओ’

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॥ २ · ५२ · ११ ॥
ततः कलापान् संनह्य खड्गौ बध्वा धन्विनौ। जग्मतुर्येन तां गङ्गां सीतया सह राघवौ

tataḥ kalāpān saṁnahya khaḍgau badhvā ca dhanvinau।
jagmaturyena tāṁ gaṅgāṁ sītayā saha rāghavau ॥

यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मण ने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्ग से सब लोग घाट पर जाया करते थे, उसीसे सीता के साथ गङ्गाजी के तट पर गये

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॥ २ · ५२ · १२ ॥
राममेवं तु धर्मज्ञमुपागत्य विनीतवत्। किमहं करवाणीति सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्

rāmamevaṁ tu dharmajñamupāgatya vinītavat।
kimahaṁ karavāṇīti sūtaḥ prāñjalirabravīt ॥

उस समय धर्म के ज्ञाता भगवान् श्रीराम के पास जाकर सारथि सुमन्त्र ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर पूछा— ‘प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?’

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॥ २ · ५२ · १३ ॥
ततोऽब्रवीद् दाशरथिः सुमन्त्रं स्पृशन् करेणोत्तमदक्षिणेन। सुमन्त्र शीघ्रं पुनरेव याहि राज्ञः सकाशे भव चाप्रमत्तः

tato'bravīd dāśarathiḥ sumantraṁ spṛśan kareṇottamadakṣiṇena।
sumantra śīghraṁ punareva yāhi rājñaḥ sakāśe bhava cāpramattaḥ ॥

तब दशरथनन्दन श्रीराम ने सुमन्त्र को उत्तम दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए कहा— ‘सुमन्त्रजी! अब आप शीघ्र ही पुनः महाराज के पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये’

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॥ २ · ५२ · १४ ॥
निवर्तस्वेत्युवाचैनमेतावद्धि कृतं मम। रथं विहाय पद्भ्यां तु गमिष्यामो महावनम्

nivartasvetyuvācainametāvaddhi kṛtaṁ mama।
rathaṁ vihāya padbhyāṁ tu gamiṣyāmo mahāvanam ॥

उन्होंने फिर कहा— ‘इतनी दूरतक महाराज की आज्ञा से मैंने रथद्वारा यात्रा की है, अब हमलोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वन की यात्रा करेंगे; अतः आप लौट जाइये’

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॥ २ · ५२ · १५ ॥
आत्मानं त्वभ्यनुज्ञातमवेक्ष्यार्तः सारथिः। सुमन्त्रः पुरुषव्याघ्रमैक्ष्वाकमिदमब्रवीत्

ātmānaṁ tvabhyanujñātamavekṣyārtaḥ sa sārathiḥ।
sumantraḥ puruṣavyāghramaikṣvākamidamabravīt ॥

अपनेको घर लौटने की आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोक से व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीराम से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ५२ · १६ ॥
नातिक्रान्तमिदं लोके पुरुषेणेह केनचित्। तव सभ्रातृभार्यस्य वासः प्राकृतवद् वने

nātikrāntamidaṁ loke puruṣeṇeha kenacit।
tava sabhrātṛbhāryasya vāsaḥ prākṛtavad vane ॥

‘रघुनन्दन! जिसकी प्रेरणा से आपको भाई और पत्नी के साथ साधारण मनुष्यों की भाँति वन में रहने को विवश होना पड़ा है, उस दैव का इस संसार में किसी भी पुरुष ने उल्लङ्घन नहीं किया

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॥ २ · ५२ · १७ ॥
मन्ये ब्रह्मचर्ये वा स्वधीते वा फलोदयः। मार्दवार्जवयोर्वापि त्वां चेद् व्यसनमागतम्

na manye brahmacarye vā svadhīte vā phalodayaḥ।
mārdavārjavayorvāpi tvāṁ ced vyasanamāgatam ॥

‘जब आप-जैसे महान् पुरुष पर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य-पालन, वेदों के स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलता में भी किसी फल की सिद्धि नहीं है

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॥ २ · ५२ · १८ ॥
सह राघव वैदेह्या भ्रात्रा चैव वने वसन्। त्वं गतिं प्राप्स्यसे वीर त्रींल्लोकांस्तु जयन्निव

saha rāghava vaidehyā bhrātrā caiva vane vasan।
tvaṁ gatiṁ prāpsyase vīra trīṁllokāṁstu jayanniva ॥

‘वीर रघुनन्दन! (इस प्रकार पिता के सत्य की रक्षा के लिये) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में निवास करते हुए आप तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करनेवाले महापुरुष नारायण की भाँति उत्कर्ष (महान् यश) प्राप्त करेंगे

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॥ २ · ५२ · १९ ॥
वयं खलु हता राम ये त्वया ह्युपवञ्चिताः। कैकेय्या वशमेष्यामः पापाया दुःखभागिनः

vayaṁ khalu hatā rāma ye tvayā hyupavañcitāḥ।
kaikeyyā vaśameṣyāmaḥ pāpāyā duḥkhabhāginaḥ ॥

‘श्रीराम! निश्चय ही हमलोग हर तरह से मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियों को अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुख से वञ्चित कर दिया। अब हम पापिनी कैकेयी के वश में पड़ेंगे और दुःख भोगते रहेंगे’

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॥ २ · ५२ · २० ॥
इति ब्रुवन्नात्मसमं सुमन्त्रः सारथिस्तदा। दृष्ट्वा दूरगतं रामं दुःखार्तो रुरुदे चिरम्

iti bruvannātmasamaṁ sumantraḥ sārathistadā।
dṛṣṭvā dūragataṁ rāmaṁ duḥkhārto rurude ciram ॥

आत्मा के समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजी से ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जाने को उद्यत देख सारथि सुमन्त्र दुःख से व्याकुल होकर देरतक रोते रहे

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॥ २ · ५२ · २१ ॥
ततस्तु विगते बाष्पे सूतं स्पृष्ट्वोदकं शुचिम्। रामस्तु मधुरं वाक्यं पुनः पुनरुवाच तम्

tatastu vigate bāṣpe sūtaṁ spṛṣṭvodakaṁ śucim।
rāmastu madhuraṁ vākyaṁ punaḥ punaruvāca tam ॥

आँसुओं का प्रवाह रुकने पर आचमन करके पवित्र हुए सारथि से श्रीरामचन्द्रजी ने बारंबार मधुर वाणी में कहा—

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॥ २ · ५२ · २२ ॥
इक्ष्वाकूणां त्वया तुल्यं सुहृदं नोपलक्षये। यथा दशरथो राजा मां शोचेत् तथा कुरु

ikṣvākūṇāṁ tvayā tulyaṁ suhṛdaṁ nopalakṣaye।
yathā daśaratho rājā māṁ na śocet tathā kuru ॥

‘सुमन्त्रजी! मेरी दृष्टि में इक्ष्वाकुवंशियों का हित करनेवाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथ को मेरे लिये शोक न हो

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॥ २ · ५२ · २३ ॥
शोकोपहतचेताश्च वृद्धश्च जगतीपतिः। कामभारावसन्नश्च तस्मादेतद् ब्रवीमि ते

śokopahatacetāśca vṛddhaśca jagatīpatiḥ।
kāmabhārāvasannaśca tasmādetad bravīmi te ॥

‘पृथिवीपति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर-चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोक से पीड़ित है। यही कारण है कि मैं आपको उनकी सँभाल के लिये कहता हूँ

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॥ २ · ५२ · २४ ॥
यद् यथा ज्ञापयेत् किंचित् महात्मा महीपतिः। कैकेय्याः प्रियकामार्थं कार्यं तदविकांक्षया

yad yathā jñāpayet kiṁcit sa mahātmā mahīpatiḥ।
kaikeyyāḥ priyakāmārthaṁ kāryaṁ tadavikāṁkṣayā ॥

‘वे महामनस्वी महाराज कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें— यही मेरा अनुरोध है

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॥ २ · ५२ · २५ ॥
एतदर्थं हि राज्यानि प्रशासति नराधिपाः। यदेषां सर्वकृत्येषु मनो प्रतिहन्यते

etadarthaṁ hi rājyāni praśāsati narādhipāḥ।
yadeṣāṁ sarvakṛtyeṣu mano na pratihanyate ॥

‘राजालोग इसीलिये राज्य का पालन करते हैं कि किसी भी कार्य में इनके मन की इच्छा-पूर्ति में विघ्न न डाला जाय

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॥ २ · ५२ · २६ ॥
यद् यथा महाराजो नालीकमधिगच्छति। ताम्यति शोकेन सुमन्त्र कुरु तत् तथा

yad yathā sa mahārājo nālīkamadhigacchati।
na ca tāmyati śokena sumantra kuru tat tathā ॥

‘सुमन्त्रजी! जिस किसी भी कार्य में जिस किसी तरह भी महाराज को अप्रिय बात से खिन्न होने का अवसर न आवे तथा वे शोक से दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये

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॥ २ · ५२ · २७ ॥
अदृष्टदुःखं राजानं वृद्धमार्यं जितेन्द्रियम्। ब्रूयास्त्वमभिवाद्यैव मम हेतोरिदं वचः

adṛṣṭaduḥkhaṁ rājānaṁ vṛddhamāryaṁ jitendriyam।
brūyāstvamabhivādyaiva mama hetoridaṁ vacaḥ ॥

‘जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराज को मेरी ओर से प्रणाम करके यह बात कहियेगा

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॥ २ · ५२ · २८ ॥
चाहमनुशोचामि लक्ष्मणो शोचति। अयोध्यायाश्च्युताश्चेति वने वत्स्यामहेति वा

na cāhamanuśocāmi lakṣmaṇo na ca śocati।
ayodhyāyāścyutāśceti vane vatsyāmaheti vā ॥

‘हमलोग अयोध्या से निकल गये अथवा हमें वन में रहना पड़ेगा, इस बात को लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मण को ही इसका शोक है

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॥ २ · ५२ · २९ ॥
चतुर्दशसु वर्षेषु निवृत्तेषु पुनः पुनः। लक्ष्मणं मां सीतां द्रक्ष्यसे शीघ्रमागतान्

caturdaśasu varṣeṣu nivṛtteṣu punaḥ punaḥ।
lakṣmaṇaṁ māṁ ca sītāṁ ca drakṣyase śīghramāgatān ॥

‘चौदह वर्ष समाप्त होने पर हम पुनः शीघ्र ही लौट आयँगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मण को और सीता को भी फिर देखेंगे

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॥ २ · ५२ · ३० ॥
एवमुक्त्वा तु राजानं मातरं सुमन्त्र मे। अन्याश्च देवीः सहिताः कैकेयीं पुनः पुनः

evamuktvā tu rājānaṁ mātaraṁ ca sumantra me।
anyāśca devīḥ sahitāḥ kaikeyīṁ ca punaḥ punaḥ ॥

‘सुमन्त्रजी! महाराज से ऐसा कहकर आप मेरी मातासे, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों (माताओं) से तथा कैकेयी से भी बारंबार मेरा कुशल-समाचार कहियेगा

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॥ २ · ५२ · ३१ ॥
आरोग्यं ब्रूहि कौसल्यामथ पादाभिवन्दनम्। सीताया मम चार्यस्य वचनाल्लक्ष्मणस्य

ārogyaṁ brūhi kausalyāmatha pādābhivandanam।
sītāyā mama cāryasya vacanāllakṣmaṇasya ca ॥

‘माता कौसल्या से कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है। इसके बाद सीता की ओरसे, मुझ ज्येष्ठ पुत्र की ओर से तथा लक्ष्मण की ओर से भी माता को चरणवन्दना कह दीजियेगा

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॥ २ · ५२ · ३२ ॥
ब्रूयाश्चापि महाराजं भरतं क्षिप्रमानय। आगतश्चापि भरतः स्थाप्यो नृपमते पदे

brūyāścāpi mahārājaṁ bharataṁ kṣipramānaya।
āgataścāpi bharataḥ sthāpyo nṛpamate pade ॥

‘तदनन्तर मेरी ओर से महाराज से भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरत को शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे आ जायँ, तब अपने अभीष्ट युवराजपद पर उनका अभिषेक कर दें

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॥ २ · ५२ · ३३ ॥
भरतं परिष्वज्य यौवराज्येऽभिषिच्य च। अस्मत्संतापजं दुःखं त्वामभिभविष्यति

bharataṁ ca pariṣvajya yauvarājye'bhiṣicya ca।
asmatsaṁtāpajaṁ duḥkhaṁ na tvāmabhibhaviṣyati ॥

‘भरत को छाती से लगाकर और युवराज के पद पर अभिषिक्त करके आपको हमलोगों के वियोग से होनेवाला दुःख दबा नहीं सकेगा

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॥ २ · ५२ · ३४ ॥
भरतश्चापि वक्तव्यो यथा राजनि वर्तसे। तथा मातृषु वर्तेथाः सर्वास्वेवाविशेषतः

bharataścāpi vaktavyo yathā rājani vartase।
tathā mātṛṣu vartethāḥ sarvāsvevāviśeṣataḥ ॥

‘भरत से भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराज के प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समानरूप से सभी माताओं के प्रति होना चाहिये

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॥ २ · ५२ · ३५ ॥
यथा तव कैकेयी सुमित्रा चाविशेषतः। तथैव देवी कौसल्या मम माता विशेषतः

yathā ca tava kaikeyī sumitrā cāviśeṣataḥ।
tathaiva devī kausalyā mama mātā viśeṣataḥ ॥

‘तुम्हारी दृष्टि में कैकेयी का जो स्थान है, वही समानरूप से सुमित्रा और मेरी माता कौसल्या का भी होना उचित है, इन सबमें कोई अन्तर न रखना

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॥ २ · ५२ · ३६ ॥
तातस्य प्रियकामेन यौवराज्यमवेक्षता। लोकयोरुभयोः शक्यं नित्यदा सुखमेधितुम्

tātasya priyakāmena yauvarājyamavekṣatā।
lokayorubhayoḥ śakyaṁ nityadā sukhamedhitum ॥

‘पिताजी का प्रिय करने की इच्छा से युवराजपद को स्वीकार करके यदि तुम राजकाज की देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोक में सदा ही सुख पाओगे’

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॥ २ · ५२ · ३७ ॥
निवर्त्यमानो रामेण सुमन्त्रः प्रतिबोधितः। तत्सर्वं वचनं श्रुत्वा स्नेहात् काकुत्स्थमब्रवीत्

nivartyamāno rāmeṇa sumantraḥ pratibodhitaḥ।
tatsarvaṁ vacanaṁ śrutvā snehāt kākutsthamabravīt ॥

श्रीरामचन्द्रजी ने सुमन्त्र को लौटाते हुए जब इस प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीराम से स्नेहपूर्वक बोले—

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॥ २ · ५२ · ३८ ॥
यदहं नोपचारेण ब्रूयां स्नेहादविक्लवम्। भक्तिमानिति तत् तावद् वाक्यं त्वं क्षन्तुमर्हसि

yadahaṁ nopacāreṇa brūyāṁ snehādaviklavam।
bhaktimāniti tat tāvad vākyaṁ tvaṁ kṣantumarhasi ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५२ · ३९ ॥
कथं हि त्वद्विहीनोऽहं प्रतियास्यामि तां पुरीम्। तव तात वियोगेन पुत्रशोकातुरामिव

kathaṁ hi tvadvihīno'haṁ pratiyāsyāmi tāṁ purīm।
tava tāta viyogena putraśokāturāmiva ॥

॥ ३८–३९ ॥

‘तात! सेवक का स्वामी के प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुख से स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ‘यह मेरा भक्त है’ ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा। जो आपके वियोग से पुत्रशोक से आतुर हुई माता की भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरी में मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा ?

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॥ २ · ५२ · ४० ॥
सराममपि तावन्मे रथं दृष्ट्वा तदा जनः। विना रामं रथं दृष्ट्वा विदीर्येतापि सा पुरी

sarāmamapi tāvanme rathaṁ dṛṣṭvā tadā janaḥ।
vinā rāmaṁ rathaṁ dṛṣṭvā vidīryetāpi sā purī ॥

‘आते समय लोगों ने मेरे रथ में श्रीराम को विराजमान देखा था, अब इस रथ को श्रीराम से रहित देखकर उन लोगों का और उस अयोध्यापुरी का भी हृदय विदीर्ण हो जायगा

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॥ २ · ५२ · ४१ ॥
दैन्यं हि नगरी गच्छेद् दृष्ट्वा शून्यमिमं रथम्। सूतावशेषं स्वं सैन्यं हतवीरमिवाहवे

dainyaṁ hi nagarī gacched dṛṣṭvā śūnyamimaṁ ratham।
sūtāvaśeṣaṁ svaṁ sainyaṁ hatavīramivāhave ॥

‘जैसे युद्ध में अपने स्वामी वीर रथी के मारे जाने पर जिसमें केवल सारथि शेष रह गया हो ऐसे रथ को देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्था में पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथ को आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशा को प्राप्त हो जायगी

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॥ २ · ५२ · ४२ ॥
दूरेऽपि निवसन्तं त्वां मानसेनाग्रतः स्थितम्। चिन्तयन्तोऽद्य नूनं त्वां निराहाराः कृताः प्रजाः

dūre'pi nivasantaṁ tvāṁ mānasenāgrataḥ sthitam।
cintayanto'dya nūnaṁ tvāṁ nirāhārāḥ kṛtāḥ prajāḥ ॥

‘आप दूर रहकर भी प्रजा के हृदय में निवास करने के कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते हैं। निश्चय ही इस समय प्रजावर्ग के सब लोगों ने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना-पीना छोड़ दिया होगा

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॥ २ · ५२ · ४३ ॥
दृष्टं तद् वै त्वया राम यादृशं त्वत्प्रवासने। प्रजानां संकुलं वृत्तं त्वच्छोकक्लान्तचेतसाम्

dṛṣṭaṁ tad vai tvayā rāma yādṛśaṁ tvatpravāsane।
prajānāṁ saṁkulaṁ vṛttaṁ tvacchokaklāntacetasām ॥

‘श्रीराम! जिस समय आप वन को आने लगे, उस समय आपके शोक से व्याकुलचित्त हुई प्रजा ने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था

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॥ २ · ५२ · ४४ ॥
आर्तनादो हि यः पौरैरुन्मुक्तस्त्वत्प्रवासने। सरथं मां निशाम्यैव कुर्युः शतगुणं ततः

ārtanādo hi yaḥ paurairunmuktastvatpravāsane।
sarathaṁ māṁ niśāmyaiva kuryuḥ śataguṇaṁ tataḥ ॥

‘आपके अयोध्या से निकलते समय पुरवासियों ने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे

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॥ २ · ५२ · ४५ ॥
अहं किं चापि वक्ष्यामि देवीं तव सुतो मया। नीतोऽसौ मातुलकुलं संतापं मा कृथा इति

ahaṁ kiṁ cāpi vakṣyāmi devīṁ tava suto mayā।
nīto'sau mātulakulaṁ saṁtāpaṁ mā kṛthā iti ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५२ · ४६ ॥
असत्यमपि नैवाहं ब्रूयां वचनमीदृशम्। कथमप्रियमेवाहं ब्रूयां सत्यमिदं वचः

asatyamapi naivāhaṁ brūyāṁ vacanamīdṛśam।
kathamapriyamevāhaṁ brūyāṁ satyamidaṁ vacaḥ ॥

॥ ४५–४६ ॥

‘क्या मैं महारानी कौसल्या से जाकर कहूँगा कि मैंने आपके बेटे को मामा के घर पहुँचा दिया है ? इसलिये आप संताप न करें, यह बात प्रिय होने पर भी असत्य है, अतः ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता। फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्र को वन में पहुँचा आया

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॥ २ · ५२ · ४७ ॥
मम तावन्नियोगस्थास्त्वद्बन्धुजनवाहिनः। कथं रथं त्वया हीनं प्रवाहन्ति हयोत्तमाः

mama tāvanniyogasthāstvadbandhujanavāhinaḥ।
kathaṁ rathaṁ tvayā hīnaṁ pravāhanti hayottamāḥ ॥

‘ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञा के अधीन रहकर आपके बन्धुजनों का भार वहन करते हैं (आपके बन्धुजनों से हीन रथ का ये वहन नहीं करते हैं), ऐसी दशा में आपसे सूने रथ को ये कैसे खींच सकेंगे ?

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॥ २ · ५२ · ४८ ॥
तन्न शक्ष्याम्यहं गन्तुमयोध्यां त्वदृतेऽनघ। वनवासानुयानाय मामनुज्ञातुमर्हसि

tanna śakṣyāmyahaṁ gantumayodhyāṁ tvadṛte'nagha।
vanavāsānuyānāya māmanujñātumarhasi ॥

‘अतः निष्पाप रघुनन्दन! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा। मुझे भी वन में चलने की ही आज्ञा दीजिये

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॥ २ · ५२ · ४९ ॥
यदि मे याचमानस्य त्यागमेव करिष्यसि। सरथोऽग्निं प्रवेक्ष्यामि त्यक्तमात्र इह त्वया

yadi me yācamānasya tyāgameva kariṣyasi।
saratho'gniṁ pravekṣyāmi tyaktamātra iha tvayā ॥

‘यदि इस तरह याचना करने पर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथसहित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा

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॥ २ · ५२ · ५० ॥
भविष्यन्ति वने यानि तपोविघ्नकराणि ते। रथेन प्रतिबाधिष्ये तानि सर्वाणि राघव

bhaviṣyanti vane yāni tapovighnakarāṇi te।
rathena pratibādhiṣye tāni sarvāṇi rāghava ॥

‘रघुनन्दन! वन में आपकी तपस्या में विघ्न डालनेवाले जो-जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथ के द्वारा उन सबको दूर भगा दूँगा

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॥ २ · ५२ · ५१ ॥
त्वत्कृतेन मया प्राप्तं रथचर्याकृतं सुखम्। आशंसे त्वत्कृतेनाहं वनवासकृतं सुखम्

tvatkṛtena mayā prāptaṁ rathacaryākṛtaṁ sukham।
āśaṁse tvatkṛtenāhaṁ vanavāsakṛtaṁ sukham ॥

‘श्रीराम! आपकी कृपा से मुझे आपको रथ पर बिठाकर यहाँतक लाने का सुख प्राप्त हुआ। अब आपके ही अनुग्रह से मैं आपके साथ वन में रहने का सुख भी पाने की आशा करता हूँ

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॥ २ · ५२ · ५२ ॥
प्रसीदेच्छामि तेऽरण्ये भवितुं प्रत्यनन्तरः। प्रीत्याभिहितमिच्छामि भव मे प्रत्यनन्तरः

prasīdecchāmi te'raṇye bhavituṁ pratyanantaraḥ।
prītyābhihitamicchāmi bhava me pratyanantaraḥ ॥

‘आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये। मैं वन में आपके पास ही रहना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वन में मेरे साथ ही रहो

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॥ २ · ५२ · ५३ ॥
इमेऽपि हया वीर यदि ते वनवासिनः। परिचर्यां करिष्यन्ति प्राप्स्यन्ति परमां गतिम्

ime'pi ca hayā vīra yadi te vanavāsinaḥ।
paricaryāṁ kariṣyanti prāpsyanti paramāṁ gatim ॥

‘वीर! ये घोड़े भी यदि वन में रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगति की प्राप्ति होगी

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॥ २ · ५२ · ५४ ॥
तव शुश्रूषणं मूर्ध्ना करिष्यामि वने वसन्। अयोध्यां देवलोकं वा सर्वथा प्रजहाम्यहम्

tava śuśrūṣaṇaṁ mūrdhnā kariṣyāmi vane vasan।
ayodhyāṁ devalokaṁ vā sarvathā prajahāmyaham ॥

‘प्रभो! मैं वन में रहकर अपने सिर से (सारे शरीरसे) आपकी सेवा करूँगा और इस सुख के आगे अयोध्या तथा देवलोक का भी सर्वथा त्याग कर दूँगा

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॥ २ · ५२ · ५५ ॥
नहि शक्या प्रवेष्टुं सा मयायोध्या त्वया विना। राजधानी महेन्द्रस्य यथा दुष्कृतकर्मणा

nahi śakyā praveṣṭuṁ sā mayāyodhyā tvayā vinā।
rājadhānī mahendrasya yathā duṣkṛtakarmaṇā ॥

‘जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्र की राजधानी स्वर्ग में नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरी में नहीं जा सकता

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॥ २ · ५२ · ५६ ॥
वनवासे क्षयं प्राप्ते ममैष हि मनोरथः। यदनेन रथेनैव त्वां वहेयं पुरीं पुनः

vanavāse kṣayaṁ prāpte mamaiṣa hi manorathaḥ।
yadanena rathenaiva tvāṁ vaheyaṁ purīṁ punaḥ ॥

‘मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवास को अवधि समाप्त हो जाय, तब फिर इसी रथ पर बिठाकर आपको अयोध्यापुरी में ले चलूँ

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॥ २ · ५२ · ५७ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि सहितस्य त्वया वने। क्षणभूतानि यास्यन्ति शतसंख्यानि चान्यथा

caturdaśa hi varṣāṇi sahitasya tvayā vane।
kṣaṇabhūtāni yāsyanti śatasaṁkhyāni cānyathā ॥

‘वन में आपके साथ रहने से ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणों के समान बीत जायँगे। अन्यथा चौदह सौ वर्षों के समान भारी जान पड़ेंगे

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॥ २ · ५२ · ५८ ॥
भृत्यवत्सल तिष्ठन्तं भर्तृपुत्रगते पथि। भक्तं भृत्यं स्थितं स्थित्या मां त्वं हातुमर्हसि

bhṛtyavatsala tiṣṭhantaṁ bhartṛputragate pathi।
bhaktaṁ bhṛtyaṁ sthitaṁ sthityā na māṁ tvaṁ hātumarhasi ॥

‘अतः भक्तवत्सल! आप मेरे स्वामी के पुत्र हैं। आप जिस पथ पर चल रहे हैं, उसीपर आपकी सेवा के लिये साथ चलने को मैं भी तैयार खड़ा हूँ। मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादा के भीतर स्थित हूँ; अतः आप मेरा परित्याग न करें’

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॥ २ · ५२ · ५९ ॥
एवं बहुविधं दीनं याचमानं पुनः पुनः। रामो भृत्यानुकम्पी तु सुमन्त्रमिदमब्रवीत्

evaṁ bahuvidhaṁ dīnaṁ yācamānaṁ punaḥ punaḥ।
rāmo bhṛtyānukampī tu sumantramidamabravīt ॥

इस तरह अनेक प्रकार से दीन वचन कहकर बारंबार याचना करनेवाले सुमन्त्र से सेवकों पर कृपा करनेवाले श्रीराम ने इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ५२ · ६० ॥
जानामि परमां भक्तिमहं ते भर्तृवत्सल। शृणु चापि यदर्थं त्वां प्रेषयामि पुरीमितः

jānāmi paramāṁ bhaktimahaṁ te bhartṛvatsala।
śṛṇu cāpi yadarthaṁ tvāṁ preṣayāmi purīmitaḥ ॥

‘सुमन्त्रजी! आप स्वामी के प्रति स्नेह रखनेवाले हैं। मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्य के लिये मैं आपको यहाँ से अयोध्यापुरी में भेज रहा हूँ, उसे सुनिये

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॥ २ · ५२ · ६१ ॥
नगरीं त्वां गतं दृष्ट्वा जननी मे यवीयसी। कैकेयी प्रत्ययं गच्छेदिति रामो वनं गतः

nagarīṁ tvāṁ gataṁ dṛṣṭvā jananī me yavīyasī।
kaikeyī pratyayaṁ gacchediti rāmo vanaṁ gataḥ ॥

‘जब आप नगर को लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयी को यह विश्वास हो जायगा कि राम वन को चले गये

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॥ २ · ५२ · ६२ ॥
विपरीते तुष्टिहीना वनवासं गते मयि। राजानं नातिशङ्केत मिथ्यावादीति धार्मिकम्

viparīte tuṣṭihīnā vanavāsaṁ gate mayi।
rājānaṁ nātiśaṅketa mithyāvādīti dhārmikam ॥

‘इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा। मेरे वनवासी हो जाने पर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथ के प्रति मिथ्यावादी होने का संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता

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॥ २ · ५२ · ६३ ॥
एष मे प्रथमः कल्पो यदम्बा मे यवीयसी। भरतारक्षितं स्फीतं पुत्रराज्यमवाप्स्यते

eṣa me prathamaḥ kalpo yadambā me yavīyasī।
bharatārakṣitaṁ sphītaṁ putrarājyamavāpsyate ॥

‘आपको भेजने में मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरतद्वारा सुरक्षित समृद्धशाली राज्य को हस्तगत कर ले

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॥ २ · ५२ · ६४ ॥
मम प्रियार्थं राज्ञश्च सुमन्त्र त्वं पुरीं व्रज। संदिष्टश्चापि यानर्थांस्तांस्तान् ब्रूयास्तथा तथा

mama priyārthaṁ rājñaśca sumantra tvaṁ purīṁ vraja।
saṁdiṣṭaścāpi yānarthāṁstāṁstān brūyāstathā tathā ॥

‘सुमन्त्रजी! मेरा तथा महाराज का प्रिय करने के लिये आप अयोध्यापुरी को अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगों से कह दीजिये’

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॥ २ · ५२ · ६५ ॥
इत्युक्त्वा वचनं सूतं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः। गुहं वचनमक्लीबो रामो हेतुमदब्रवीत्

ityuktvā vacanaṁ sūtaṁ sāntvayitvā punaḥ punaḥ।
guhaṁ vacanamaklībo rāmo hetumadabravīt ॥

ऐसा कहकर श्रीराम ने सुमन्त्र को बारंबार सान्त्वना दी। इसके बाद उन्होंने गुह से उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही—

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॥ २ · ५२ · ६६ ॥
नेदानीं गुह योग्योऽयं वासो मे सजने वने। अवश्यमाश्रमे वासः कर्तव्यस्तद्गतो विधिः

nedānīṁ guha yogyo'yaṁ vāso me sajane vane।
avaśyamāśrame vāsaḥ kartavyastadgato vidhiḥ ॥

‘निषादराज गुह! इस समय मेरे लिये ऐसे वन में रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपद के लोगों का आना-जाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वन के आश्रम में ही वास करना होगा। इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधि का मुझे पालन करना चाहिये

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॥ २ · ५२ · ६७ ॥
सोऽहं गृहीत्वा नियमं तपस्विजनभूषणम्। हितकामः पितुर्भूयः सीताया लक्ष्मणस्य

so'haṁ gṛhītvā niyamaṁ tapasvijanabhūṣaṇam।
hitakāmaḥ piturbhūyaḥ sītāyā lakṣmaṇasya ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५२ · ६८ ॥
जटाः कृत्वा गमिष्यामि न्यग्रोधक्षीरमानय। तत्क्षीरं राजपुत्राय गुहः क्षिप्रमुपाहरत्

jaṭāḥ kṛtvā gamiṣyāmi nyagrodhakṣīramānaya।
tatkṣīraṁ rājaputrāya guhaḥ kṣipramupāharat ॥

॥ ६७–६८ ॥

‘अतः फल-मूल का आहार और पृथ्वी पर शयन आदि नियमों को ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मण की अनुमति लेकर पिता का हित करने की इच्छा से सिर पर तपस्वी जनों के आभूषणरूप जटा धारण करके यहाँ से वन को जाऊँगा। मेरे केशों को जटा का रूप देने के लिये तुम बड़ का दूध ला दो।’ गुह ने तुरंत ही बड़ का दूध लाकर श्रीराम को दिया

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॥ २ · ५२ · ६९ ॥
लक्ष्मणस्यात्मनश्चैव रामस्तेनाकरोज्जटाः। दीर्घबाहुर्नरव्याघ्रो जटिलत्वमधारयत्

lakṣmaṇasyātmanaścaiva rāmastenākarojjaṭāḥ।
dīrghabāhurnaravyāghro jaṭilatvamadhārayat ॥

श्रीराम ने उसके द्वारा लक्ष्मण की तथा अपनी जटाएँ बनायीं। महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये

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॥ २ · ५२ · ७० ॥
तौ तदा चीरसम्पन्नौ जटामण्डलधारिणौ। अशोभेतामृषिसमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ

tau tadā cīrasampannau jaṭāmaṇḍaladhāriṇau।
aśobhetāmṛṣisamau bhrātarau rāmalakṣmaṇau ॥

उस समय वे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियों के समान शोभा पाने लगे

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॥ २ · ५२ · ७१ ॥
ततो वैखानसं मार्गमास्थितः सहलक्ष्मणः। व्रतमादिष्टवान् रामः सहायं गुहमब्रवीत्

tato vaikhānasaṁ mārgamāsthitaḥ sahalakṣmaṇaḥ।
vratamādiṣṭavān rāmaḥ sahāyaṁ guhamabravīt ॥

तदनन्तर वानप्रस्थमार्ग का आश्रय लेकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने वानप्रस्थोचित व्रत को ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुह से बोले—

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॥ २ · ५२ · ७२ ॥
अप्रमत्तो बले कोशे दुर्गे जनपदे तथा। भवेथा गुह राज्यं हि दुरारक्षतमं मतम्

apramatto bale kośe durge janapade tathā।
bhavethā guha rājyaṁ hi durārakṣatamaṁ matam ॥

‘निषादराज! तुम सेना, खजाना, किला और राज्य के विषय में सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्य की रक्षा का काम बड़ा कठिन माना गया है’

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॥ २ · ५२ · ७३ ॥
ततस्तं समनुज्ञाप्य गुहमिक्ष्वाकुनन्दनः। जगाम तूर्णमव्यग्रः सभार्यः सहलक्ष्मणः

tatastaṁ samanujñāpya guhamikṣvākunandanaḥ।
jagāma tūrṇamavyagraḥ sabhāryaḥ sahalakṣmaṇaḥ ॥

गुह को इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मण के साथ तुरंत ही वहाँ से चल दिये। उस समय उनके चित्त में तनिक भी व्यग्रता नहीं थी

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॥ २ · ५२ · ७४ ॥
तु दृष्ट्वा नदीतीरे नावमिक्ष्वाकुनन्दनः। तितीर्षुः शीघ्रगां गङ्गामिदं वचनमब्रवीत्

sa tu dṛṣṭvā nadītīre nāvamikṣvākunandanaḥ।
titīrṣuḥ śīghragāṁ gaṅgāmidaṁ vacanamabravīt ॥

नदी के तट पर लगी हुई नाव को देखकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम ने शीघ्रगामी गङ्गानदी के पार जाने की इच्छा से लक्ष्मण को सम्बोधित करके कहा—

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॥ २ · ५२ · ७५ ॥
आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः। सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम्

āroha tvaṁ naravyāghra sthitāṁ nāvamimāṁ śanaiḥ।
sītāṁ cāropayānvakṣaṁ parigṛhya manasvinīm ॥

‘पुरुषसिंह! यह सामने नाव खड़ी है। तुम मनस्विनी सीता को पकड़कर धीरे से उसपर बिठा दो, फिर स्वयं भी नाव पर बैठ जाओ’

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॥ २ · ५२ · ७६ ॥
भ्रातुः शासनं श्रुत्वा सर्वमप्रतिकूलयन्। आरोप्य मैथिलीं पूर्वमारुरोहात्मवांस्ततः

sa bhrātuḥ śāsanaṁ śrutvā sarvamapratikūlayan।
āropya maithilīṁ pūrvamārurohātmavāṁstataḥ ॥

भाई का यह आदेश सुनकर मन को वश में रखनेवाले लक्ष्मण ने पूर्णतः उसके अनुकूल चलते हुए पहले मिथिलेशकुमारी श्रीसीता को नाव पर बिठाया, फिर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए

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॥ २ · ५२ · ७७ ॥
अथारुरोह तेजस्वी स्वयं लक्ष्मणपूर्वजः। ततो निषादाधिपतिर्गुहो ज्ञातीनचोदयत्

athāruroha tejasvī svayaṁ lakṣmaṇapūrvajaḥ।
tato niṣādādhipatirguho jñātīnacodayat ॥

सबके अन्त में लक्ष्मण के बड़े भाई तेजस्वी श्रीराम स्वयं नौका पर बैठे। तदनन्तर निषादराज गुह ने अपने भाई-बन्धुओं को नौका खेने का आदेश दिया

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॥ २ · ५२ · ७८ ॥
राघवोऽपि महातेजा नावमारुह्य तां ततः। ब्रह्मवत्क्षत्रवच्चैव जजाप हितमात्मनः

rāghavo'pi mahātejā nāvamāruhya tāṁ tataḥ।
brahmavatkṣatravaccaiva jajāpa hitamātmanaḥ ॥

महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी भी उस नाव पर आरूढ होने के पश्चात् अपने हित के उद्देश्य से ब्राह्मण और क्षत्रिय के जपनेयोग्य ‘दैवी नाव’ इत्यादि वैदिक मन्त्र का जप करने लगे

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॥ २ · ५२ · ७९ ॥
आचम्य यथाशास्त्रं नदीं तां सह सीतया। प्रणमत्प्रीतिसंतुष्टो लक्ष्मणश्च महारथः

ācamya ca yathāśāstraṁ nadīṁ tāṁ saha sītayā।
praṇamatprītisaṁtuṣṭo lakṣmaṇaśca mahārathaḥ ॥

फिर शास्त्रविधि के अनुसार आचमन करके सीता के साथ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर गङ्गाजी को प्रणाम किया। महारथी लक्ष्मण ने भी उन्हें मस्तक झुकाया

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॥ २ · ५२ · ८० ॥
अनुज्ञाय सुमन्त्रं सबलं चैव तं गुहम्। आस्थाय नावं रामस्तु चोदयामास नाविकान्

anujñāya sumantraṁ ca sabalaṁ caiva taṁ guham।
āsthāya nāvaṁ rāmastu codayāmāsa nāvikān ॥

इसके बाद श्रीराम ने सुमन्त्र को तथा सेनासहित गुह को भी जाने की आज्ञा दे नाव पर भलीभाँति बैठकर मल्लाहों को उसे चलाने का आदेश दिया

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॥ २ · ५२ · ८१ ॥
ततस्तैश्चालिता नौका कर्णधारसमाहिता। शुभस्फ्यवेगाभिहता शीघ्रं सलिलमत्यगात्

tatastaiścālitā naukā karṇadhārasamāhitā।
śubhasphyavegābhihatā śīghraṁ salilamatyagāt ॥

तदनन्तर मल्लाहों ने नाव चलायी। कर्णधार सावधान होकर उसका संचालन करता था। वेग से सुन्दर डाँड़ चलाने के कारण वह नाव बड़ी तेजी से पानी पर बढ़ने लगी

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॥ २ · ५२ · ८२ ॥
मध्यं तु समनुप्राप्य भागीरथ्यास्त्वनिन्दिता। वैदेही प्राञ्जलिर्भूत्वा तां नदीमिदमब्रवीत्

madhyaṁ tu samanuprāpya bhāgīrathyāstvaninditā।
vaidehī prāñjalirbhūtvā tāṁ nadīmidamabravīt ॥

भागीरथी की बीच धारा में पहुँचकर सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीता ने हाथ जोड़कर गङ्गाजी से यह प्रार्थना की—

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॥ २ · ५२ · ८३ ॥
पुत्रो दशरथस्यायं महाराजस्य धीमतः। निदेशं पालयत्वेनं गङ्गे त्वदभिरक्षितः

putro daśarathasyāyaṁ mahārājasya dhīmataḥ।
nideśaṁ pālayatvenaṁ gaṅge tvadabhirakṣitaḥ ॥

‘देवि गङ्गे! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये वन में जा रहे हैं। ये आपसे सुरक्षित होकर पिता की इस आज्ञा का पालन कर सकें— ऐसी कृपा कीजिये

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॥ २ · ५२ · ८४ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि समग्राण्युष्य कानने। भ्रात्रा सह मया चैव पुनः प्रत्यागमिष्यति

caturdaśa hi varṣāṇi samagrāṇyuṣya kānane।
bhrātrā saha mayā caiva punaḥ pratyāgamiṣyati ॥

‘वन में पूरे चौदह वर्षोंतक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाई के साथ पुनः अयोध्यापुरी को लौटेंगे

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॥ २ · ५२ · ८५ ॥
ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता। यक्ष्ये प्रमुदिता गङ्गे सर्वकामसमृद्धिनी

tatastvāṁ devi subhage kṣemeṇa punarāgatā।
yakṣye pramuditā gaṅge sarvakāmasamṛddhinī ॥

‘सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे! उस समय वन से पुनः कुशलपूर्वक लौटने पर सम्पूर्ण मनोरथों से सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ आपकी पूजा करूँगी

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॥ २ · ५२ · ८६ ॥
त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकं समक्षसे। भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन् सम्प्रदृश्यसे

tvaṁ hi tripathage devi brahmalokaṁ samakṣase।
bhāryā codadhirājasya loke'smin sampradṛśyase ॥

‘स्वर्ग, भूतल और पाताल— तीनों मार्गों पर विचरनेवाली देवि! तुम यहाँ से ब्रह्मलोकतक फैली हुई हो और इस लोक में समुद्रराज की पत्नी के रूप में दिखायी देती हो

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॥ २ · ५२ · ८७ ॥
सा त्वां देवि नमस्यामि प्रशंसामि शोभने। प्राप्तराज्ये नरव्याघ्रे शिवेन पुनरागते

sā tvāṁ devi namasyāmi praśaṁsāmi ca śobhane।
prāptarājye naravyāghre śivena punarāgate ॥

‘शोभाशालिनी देवि! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुनः वन से सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब मैं सीता पुनः आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी

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॥ २ · ५२ · ८८ ॥
गवां शतसहस्रं वस्त्राण्यन्नं पेशलम्। ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तव प्रियचिकीर्षया

gavāṁ śatasahasraṁ ca vastrāṇyannaṁ ca peśalam।
brāhmaṇebhyaḥ pradāsyāmi tava priyacikīrṣayā ॥

‘इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करने की इच्छा से ब्राह्मणों को एक लाख गौएँ, बहुत-से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी

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॥ २ · ५२ · ८९ ॥
सुराघटसहस्रेण मांसभूतौदनेन च। यक्ष्ये त्वां प्रीयतां देवि पुरीं पुनरुपागता

surāghaṭasahasreṇa māṁsabhūtaudanena ca।
yakṣye tvāṁ prīyatāṁ devi purīṁ punarupāgatā ॥

‘देवि! पुनः अयोध्यापुरी में लौटने पर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थों से तथा राजकीय भाग से रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्न के द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी। आप मुझपर प्रसन्न हों’*

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॥ २ · ५२ · ९० ॥
यानि त्वत्तीरवासीनि दैवतानि सन्ति हि। तानि सर्वाणि यक्ष्यामि तीर्थान्यायतनानि

yāni tvattīravāsīni daivatāni ca santi hi।
tāni sarvāṇi yakṣyāmi tīrthānyāyatanāni ca ॥

‘आपके किनारे जो-जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी

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॥ २ · ५२ · ९१ ॥
पुनरेव महाबाहुर्मया भ्रात्रा संगतः। अयोध्यां वनवासात् तु प्रविशत्वनघोऽनघे

punareva mahābāhurmayā bhrātrā ca saṁgataḥ।
ayodhyāṁ vanavāsāt tu praviśatvanagho'naghe ॥

‘निष्पाप गङ्गे! ये महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव मेरे तथा अपने भाई के साथ वनवास से लौटकर पुनः अयोध्या नगरी में प्रवेश करें’

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॥ २ · ५२ · ९२ ॥
तथा सम्भाषमाणा सा सीता गङ्गामनिन्दिता। दक्षिणा दक्षिणं तीरं क्षिप्रमेवाभ्युपागमत्

tathā sambhāṣamāṇā sā sītā gaṅgāmaninditā।
dakṣiṇā dakṣiṇaṁ tīraṁ kṣipramevābhyupāgamat ॥

पति के अनुकूल रहनेवाली सती-साध्वी सीता इस प्रकार गङ्गाजी से प्रार्थना करती हुई शीघ्र ही दक्षिणतट पर जा पहुँचीं

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॥ २ · ५२ · ९३ ॥
तीरं तु समनुप्राप्य नावं हित्वा नरर्षभः। प्रातिष्ठत सह भ्रात्रा वैदेह्या परंतपः

tīraṁ tu samanuprāpya nāvaṁ hitvā nararṣabhaḥ।
prātiṣṭhata saha bhrātrā vaidehyā ca paraṁtapaḥ ॥

किनारे पहुँचकर शत्रुओं को संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ श्रीराम ने नाव छोड़ दी और भाई लक्ष्मण तथा विदेहनन्दिनी सीता के साथ आगे को प्रस्थान किया

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॥ २ · ५२ · ९४ ॥
अथाब्रवीन्महाबाहुः सुमित्रानन्दवर्धनम्। भव संरक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा

athābravīnmahābāhuḥ sumitrānandavardhanam।
bhava saṁrakṣaṇārthāya sajane vijane'pi vā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५२ · ९५ ॥
अवश्यं रक्षणं कार्यं मद्विधैर्विजने वने। अग्रतो गच्छ सौमित्रे सीता त्वामनुगच्छतु

avaśyaṁ rakṣaṇaṁ kāryaṁ madvidhairvijane vane।
agrato gaccha saumitre sītā tvāmanugacchatu ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५२ · ९६ ॥
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सीतां त्वां चानुपालयन्। अन्योन्यस्य हि नो रक्षा कर्तव्या पुरुषर्षभ

pṛṣṭhato'nugamiṣyāmi sītāṁ tvāṁ cānupālayan।
anyonyasya hi no rakṣā kartavyā puruṣarṣabha ॥

॥ ९४–९६ ॥

तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मण से बोले— ‘सुमित्राकुमार! अब तुम सजन या निर्जन वन में सीता की रक्षा के लिये सावधान हो जाओ। हम-जैसे लोगों को निर्जन वन में नारी की रक्षा अवश्य करनी चाहिये। अतः तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीता की तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा। पुरुषप्रवर! हमलोगों को एक-दूसरे की रक्षा करनी चाहिये

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॥ २ · ५२ · ९७ ॥
हि तावदतिक्रान्तासुकरा काचन क्रिया। अद्य दुःखं तु वैदेही वनवासस्य वेत्स्यति

na hi tāvadatikrāntāsukarā kācana kriyā।
adya duḥkhaṁ tu vaidehī vanavāsasya vetsyati ॥

‘अबतक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है— इस समय से ही कठिनाइयों का सामना आरम्भ हुआ है। आज विदेहकुमारी सीता को वनवास के वास्तविक कष्ट का अनुभव होगा

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॥ २ · ५२ · ९८ ॥
प्रणष्टजनसम्बाधं क्षेत्रारामविवर्जितम्। विषमं प्रपातं वनमद्य प्रवेक्ष्यति

praṇaṣṭajanasambādhaṁ kṣetrārāmavivarjitam।
viṣamaṁ ca prapātaṁ ca vanamadya pravekṣyati ॥

‘अब ये ऐसे वन में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदि के खेत होंगे, न टहलने के लिये बगीचे। जहाँ ऊँची-नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरने का भय रहेगा’

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॥ २ · ५२ · ९९ ॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रतस्थे लक्ष्मणोऽग्रतः। अनन्तरं सीताया राघवो रघुनन्दनः

śrutvā rāmasya vacanaṁ pratasthe lakṣmaṇo'grataḥ।
anantaraṁ ca sītāyā rāghavo raghunandanaḥ ॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े। उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीता के पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे

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॥ २ · ५२ · १०० ॥
गतं तु गङ्गापरपारमाशु रामं सुमन्त्रः सततं निरीक्ष्य। अध्वप्रकर्षाद् विनिवृत्तदृष्टिर्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी

gataṁ tu gaṅgāparapāramāśu rāmaṁ sumantraḥ satataṁ nirīkṣya।
adhvaprakarṣād vinivṛttadṛṣṭirmumoca bāṣpaṁ vyathitastapasvī ॥

श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजी के उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये देखते रहे। जब वन के मार्ग में बहुत दूर निकल जाने के कारण वे दृष्टि से ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्र के हृदय में बड़ी व्यथा हुई। वे नेत्रों से आँसू बहाने लगे

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॥ २ · ५२ · १०१ ॥
लोकपालप्रतिमप्रभावस्तीर्त्वा महात्मा वरदो महानदीम्। ततः समृद्धान् शुभसस्यमालिनः क्रमेण वत्सान् मुदितानुपागमत्

sa lokapālapratimaprabhāvastīrtvā mahātmā varado mahānadīm।
tataḥ samṛddhān śubhasasyamālinaḥ krameṇa vatsān muditānupāgamat ॥

लोकपालों के समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गा को पार करके क्रमशः समृद्धिशाली वत्सदेश (प्रयाग)- में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन-धान्य से सम्पन्न था। वहाँ के लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट थे

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॥ २ · ५२ · १०२ ॥
तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम्। आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम्

tau tatra hatvā caturo mahāmṛgān varāhamṛśyaṁ pṛṣataṁ mahārurum।
ādāya medhyaṁ tvaritaṁ bubhukṣitau vāsāya kāle yayaturvanaspatim ॥

वहाँ उन दोनों भाइयों ने मृगया-विनोद के लिये वराह, ऋष्य, पृषत् और महारुरु— इन चार महामृगों पर बाणों का प्रहार किया। तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द-मूल आदि लेकर सायंकाल के समय ठहरने के लिये (वे सीताजी के साथ) एक वृक्ष के नीचे चले गये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५२ ॥