वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ५० · ५१ श्लोकाःSarga 50 · 51 ślokas

श्रीरामका मार्गमें अयोध्यापुरीसे वनवासकी आज्ञा माँगना और शृङ्गवेरपुरमें गङ्गातटपर पहुँचकर रात्रिमें निवास करना, वहाँ निषादराज गुहद्वारा उनका सत्कार

गुह-आलिङ्गन

“गुह-आलिङ्गन”
॥ २ · ५० · ३५–३६ ॥

गङ्गातटे सन्ध्यारागे निषादराजो गुहः शोकार्तः श्यामं वल्कलधरं रामं सम्परिष्वजते; दक्षिणे भूषिता सीता कृताञ्जलिः, धनुर्धरो वल्कली लक्ष्मणश्च तिष्ठतः, अग्रे फलपूर्णपात्रैः निषादाः प्रणताः।

सन्ध्या की सुनहरी आभा में गङ्गा के वनतट पर निषादराज गुह अपने प्राणप्रिय सखा—वल्कलधारी श्यामवर्ण राजकुमार श्रीराम—को हृदय से लगा रहा है, और राम का कोमल हाथ उसकी बाँह पर टिका है। दाहिनी ओर रेशमी लाल-स्वर्ण साड़ी में अलंकृत सीता हाथ जोड़े और वल्कलधारी लक्ष्मण धनुष लिये खड़े हैं; आगे गुह के मल्लाह-वनवासी फलों और भेंटों से भरी टोकरियाँ लिये झुके हुए हैं।

In the golden light of evening on the wooded bank of the Ganga, the Nishad king Guha, grieved to see his friend in bark, folds the dark-hued, bark-clad prince Ram into a tender embrace, Ram's gentle hand resting on his arm. To the right, Sita stands adorned in crimson-and-gold silk with hands clasped, and Lakshman in bark holds his bow; in the foreground Guha's fisherfolk kneel and stand, bearing baskets heaped with fruit and offerings for their honoured guest.

॥ २ · ५० · १ ॥
विशालान् कोसलान् रम्यान् यात्वा लक्ष्मणपूर्वजः। अयोध्यामुन्मुखो धीमान् प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्

viśālān kosalān ramyān yātvā lakṣmaṇapūrvajaḥ।
ayodhyāmunmukho dhīmān prāñjalirvākyamabravīt ॥

इस प्रकार विशाल और रमणीय कोसलदेश की सीमा को पार करके लक्ष्मण के बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी ने अयोध्या की ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा-

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॥ २ · ५० · २ ॥
आपृच्छे त्वां पुरिश्रेष्ठे काकुत्स्थपरिपालिते। दैवतानि यानि त्वां पालयन्त्यावसन्ति

āpṛcche tvāṁ puriśreṣṭhe kākutsthaparipālite।
daivatāni ca yāni tvāṁ pālayantyāvasanti ca ॥

‘ककुत्स्थवंशी राजाओं से परिपालित पुरीशिरोमणि अयोध्ये! मैं तुमसे तथा जो-जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वन में जाने की आज्ञा चाहता हूँ

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॥ २ · ५० · ३ ॥
निवृत्तवनवासस्त्वामनृणो जगतीपतेः। पुनर्द्रक्ष्यामि मात्रा पित्रा सह संगतः

nivṛttavanavāsastvāmanṛṇo jagatīpateḥ।
punardrakṣyāmi mātrā ca pitrā ca saha saṁgataḥ ॥

‘वनवास की अवधि पूरी करके महाराज के ऋण से उऋण हो मैं पुनः लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता-पिता से भी मिलूँगा’

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॥ २ · ५० · ४ ॥
ततो रुचिरताम्राक्षो भुजमुद्यम्य दक्षिणम्। अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदं जनम्

tato ruciratāmrākṣo bhujamudyamya dakṣiṇam।
aśrupūrṇamukho dīno'bravījjānapadaṁ janam ॥

इसके बाद सुन्दर एवं अरुण नेत्रवाले श्रीराम ने दाहिनी भुजा उठाकर नेत्रों से आँसू बहाते हुए दुःखी होकर जनपद के लोगों से कहा-

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॥ २ · ५० · ५ ॥
अनुक्रोशो दया चैव यथार्हं मयि वः कृतः। चिरं दुःखस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये

anukrośo dayā caiva yathārhaṁ mayi vaḥ kṛtaḥ।
ciraṁ duḥkhasya pāpīyo gamyatāmarthasiddhaye ॥

‘आपने मुझपर बड़ी कृपा की और यथोचित दया दिखायी। मेरे लिये आपलोगों ने बहुत देरतक कष्ट सहन किया। इस तरह आपका देरतक दुःख में पड़े रहना अच्छा नहीं है; इसलिये अब आपलोग अपना-अपना कार्य करने के लिये जाइये’

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॥ २ · ५० · ६ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। विलपन्तो नरा घोरं व्यतिष्ठंश्च क्वचित् क्वचित्

te'bhivādya mahātmānaṁ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam।
vilapanto narā ghoraṁ vyatiṣṭhaṁśca kvacit kvacit ॥

यह सुनकर उन मनुष्यों ने महात्मा श्रीराम को प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और घोर विलाप करते हुए वे जहाँ-तहाँ खड़े हो गये

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॥ २ · ५० · ७ ॥
तथा विलपतां तेषामतृप्तानां राघवः। अचक्षुर्विषयं प्रायाद् यथार्कः क्षणदामुखे

tathā vilapatāṁ teṣāmatṛptānāṁ ca rāghavaḥ।
acakṣurviṣayaṁ prāyād yathārkaḥ kṣaṇadāmukhe ॥

उनकी आँखें अभी श्रीराम के दर्शन से तृप्त नहीं हुई थीं और वे पूर्वोक्त रूप से विलाप कर ही रहे थे, इतनेमें श्रीरघुनाथजी उनकी दृष्टि से ओझल हो गये, जैसे सूर्य प्रदोषकाल में छिप जाते हैं

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॥ २ · ५० · ८ ॥
ततो धान्यधनोपेतान् दानशीलजनान् शिवान्। अकुतश्चिद्भयान् रम्यांश्चैत्ययूपसमावृतान्

tato dhānyadhanopetān dānaśīlajanān śivān।
akutaścidbhayān ramyāṁścaityayūpasamāvṛtān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · ९ ॥
उद्यानाम्रवणोपेतान् सम्पन्नसलिलाशयान्। तुष्टपुष्टजनाकीर्णान् गोकुलाकुलसेवितान्

udyānāmravaṇopetān sampannasalilāśayān।
tuṣṭapuṣṭajanākīrṇān gokulākulasevitān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · १० ॥
रक्षणीयान् नरेन्द्राणां ब्रह्मघोषाभिनादितान्। रथेन पुरुषव्याघ्रः कोसलानत्यवर्तत

rakṣaṇīyān narendrāṇāṁ brahmaghoṣābhināditān।
rathena puruṣavyāghraḥ kosalānatyavartata ॥

॥ ८–१० ॥

इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथ के द्वारा ही उस कोसल जनपद को लाँघ गये, जो धन-धान्य से सम्पन्न और सुखदायक था। वहाँ के सब लोग दानशील थे। उस जनपद में कहीं से कोई भय नहीं था। वहाँ के भूभाग रमणीय एवं चैत्य-वृक्षों तथा यज्ञ-सम्बन्धी यूपों से व्याप्त थे। बहुत-से उद्यान और आमों के वन उस जनपद की शोभा बढ़ाते थे। वहाँ जल से भरे हुए बहुत-से जलाशय सुशोभित थे। सारा जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरा था; गौओं के समूहों से व्याप्त और सेवित था। वहाँ के ग्रामों की बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रों की ध्वनि गूँजती रहती थी

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॥ २ · ५० · ११ ॥
मध्येन मुदितं स्फीतं रम्योद्यानसमाकुलम्। राज्यं भोज्यं नरेन्द्राणां ययौ धृतिमतां वरः

madhyena muditaṁ sphītaṁ ramyodyānasamākulam।
rājyaṁ bhojyaṁ narendrāṇāṁ yayau dhṛtimatāṁ varaḥ ॥

कोसलदेश से आगे बढ़ने पर धैर्यवानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यमार्ग से ऐसे राज्य में होकर निकले, जो सुख-सुविधा से युक्त, धन-धान्य से सम्पन्न, रमणीय उद्यानों से व्याप्त तथा सामन्त नरेशों के उपभोग में आनेवाला था

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॥ २ · ५० · १२ ॥
तत्र त्रिपथगां दिव्यां शीततोयामशैवलाम्। ददर्श राघवो गङ्गां रम्यामृषिनिषेविताम्

tatra tripathagāṁ divyāṁ śītatoyāmaśaivalām।
dadarśa rāghavo gaṅgāṁ ramyāmṛṣiniṣevitām ॥

उस राज्य में श्रीरघुनाथजी ने त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गङ्गा का दर्शन किया, जो शीतल जल से भरी हुई, सेवारों से रहित तथा रमणीय थीं। बहुत-से महर्षि उनका सेवन करते थे

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॥ २ · ५० · १३ ॥
आश्रमैरविदूरस्थैः श्रीमद्भिः समलंकृताम्। कालेऽप्सरोभिर्हृष्टाभिः सेविताम्भोहृदां शिवाम्

āśramairavidūrasthaiḥ śrīmadbhiḥ samalaṁkṛtām।
kāle'psarobhirhṛṣṭābhiḥ sevitāmbhohṛdāṁ śivām ॥

उनके तट पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर बहुत-से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदी की शोभा बढ़ाते थे। समय-समय पर हर्षभरी अप्सराएँ भी उतरकर उनके जलकुण्ड का सेवन करती हैं। वे गङ्गा सबका कल्याण करनेवाली हैं

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॥ २ · ५० · १४ ॥
देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभिताम्। नागगन्धर्वपत्नीभिः सेवितां सततं शिवाम्

devadānavagandharvaiḥ kiṁnarairupaśobhitām।
nāgagandharvapatnībhiḥ sevitāṁ satataṁ śivām ॥

देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथी की शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गन्धर्वों की पत्नियाँ उनके जल का सदा सेवन करती हैं

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॥ २ · ५० · १५ ॥
देवाक्रीडशताकीर्णां देवोद्यानयुतां नदीम्। देवार्थमाकाशगतां विख्यातां देवपद्मिनीम्

devākrīḍaśatākīrṇāṁ devodyānayutāṁ nadīm।
devārthamākāśagatāṁ vikhyātāṁ devapadminīm ॥

गङ्गा के दोनों तटों पर देवताओं के सैकड़ों पर्वतीय क्रीड़ास्थल हैं। उनके किनारे देवताओं के बहुत-से उद्यान भी हैं। वे देवताओं की क्रीड़ा के लिये आकाश में भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनी के रूप में विख्यात हैं

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॥ २ · ५० · १६ ॥
जलाघाताट्टहासोग्रां फेननिर्मलहासिनीम्। क्वचिद् वेणीकृतजलां क्वचिदावर्तशोभिताम्

jalāghātāṭṭahāsogrāṁ phenanirmalahāsinīm।
kvacid veṇīkṛtajalāṁ kvacidāvartaśobhitām ॥

प्रस्तरखण्डों से गङ्गा के जल के टकराने से जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है। जल से जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदी का निर्मल हास है। कहीं तो उनका जल वेणी के आकार का है और कहीं वे भँवरों से सुशोभित होती हैं

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॥ २ · ५० · १७ ॥
क्वचित् स्तिमितगम्भीरं क्वचिद् वेगसमाकुलाम्। क्वचिद् गम्भीरनिर्घोषां क्वचिद् भैरवनिःस्वनाम्

kvacit stimitagambhīraṁ kvacid vegasamākulām।
kvacid gambhīranirghoṣāṁ kvacid bhairavaniḥsvanām ॥

कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है। कहीं वे महान् वेग से व्याप्त हैं। कहीं उनके जल से मृदङ्ग आदि के समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदि के समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है

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॥ २ · ५० · १८ ॥
देवसंघाप्लुतजलां निर्मलोत्पलसंकुलाम्। क्वचिदाभोगपुलिनां क्वचिन्निर्मलवालुकाम्

devasaṁghāplutajalāṁ nirmalotpalasaṁkulām।
kvacidābhogapulināṁ kvacinnirmalavālukām ॥

उनके जल में देवताओं के समुदाय गोते लगाते हैं। कहीं-कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदों से आच्छादित होता है। कहीं विशाल पुलिन का दर्शन होता है तो कहीं निर्मल बालुका-राशि का

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॥ २ · ५० · १९ ॥
हंससारससंघुष्टां चक्रवाकोपशोभिताम्। सदामत्तैश्च विहगैरभिपन्नामनिन्दिताम्

haṁsasārasasaṁghuṣṭāṁ cakravākopaśobhitām।
sadāmattaiśca vihagairabhipannāmaninditām ॥

हंसों और सारसों के कलरव वहाँ गूँजते रहते हैं। चकवे उन देवनदी की शोभा बढ़ाते हैं। सदा मदमत्त रहनेवाले विहंगम उनके जल पर मँडराते रहते हैं। वे उत्तम शोभा से सम्पन्न हैं

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॥ २ · ५० · २० ॥
क्वचित् तीररुहैर्वृक्षैर्मालाभिरिव शोभिताम्। क्वचित् फुल्लोत्पलच्छन्नां क्वचित् पद्मवनाकुलाम्

kvacit tīraruhairvṛkṣairmālābhiriva śobhitām।
kvacit phullotpalacchannāṁ kvacit padmavanākulām ॥

कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलों से आच्छादित है और कहीं कमलवनों से व्याप्त

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॥ २ · ५० · २१ ॥
क्वचित् कुमुदखण्डैश्च कुड्मलैरुपशोभिताम्। नानापुष्परजोध्वस्तां समदामिव क्वचित्

kvacit kumudakhaṇḍaiśca kuḍmalairupaśobhitām।
nānāpuṣparajodhvastāṁ samadāmiva ca kvacit ॥

कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं। कहीं नाना प्रकार के पुष्पों के परागों से व्याप्त होकर वे मदमत्त नारी के समान प्रतीत होती हैं

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॥ २ · ५० · २२ ॥
व्यपेतमलसंघातां मणिनिर्मलदर्शनाम्। दिशागजैर्वनगजैर्मत्तैश्च वरवारणैः देवराजोपवाह्यैश्च संनादितवनान्तराम्।

vyapetamalasaṁghātāṁ maṇinirmaladarśanām।
diśāgajairvanagajairmattaiśca varavāraṇaiḥ ॥
devarājopavāhyaiśca saṁnāditavanāntarām।

वे मलसमूह (पापराशि) दूर कर देती हैं। उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणि के समान निर्मल दिखायी देता है। उनके तटवर्ती वन का भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराज की सवारी में आनेवाले श्रेष्ठ गजराजों से कोलाहलपूर्ण बना रहता है

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॥ २ · ५० · २३ ॥
प्रमदामिव यत्नेन भूषितां भूषणोत्तमैः

pramadāmiva yatnena bhūṣitāṁ bhūṣaṇottamaiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · २४ ॥
फलपुष्पैः किसलयैर्वृतां गुल्मैर्द्विजैस्तथा। विष्णुपादच्युतां दिव्यामपापां पापनाशिनीम्

phalapuṣpaiḥ kisalayairvṛtāṁ gulmairdvijaistathā।
viṣṇupādacyutāṁ divyāmapāpāṁ pāpanāśinīm ॥

॥ २३–२४ ॥

वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियों से आवृत होकर उत्तम आभूषणों से यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवती के समान शोभा पाती हैं। उनका प्राकट्य भगवान् विष्णु के चरणों से हुआ है। उनमें पाप का लेश भी नहीं है। वे दिव्य नदी गङ्गा जीवों के समस्त पापों का नाश कर देनेवाली हैं

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॥ २ · ५० · २५ ॥
शिंशुमारैश्च नक्रैश्च भुजंगैश्च समन्विताम्। शंकरस्य जटाजूटाद् भ्रष्टां सागरतेजसा

śiṁśumāraiśca nakraiśca bhujaṁgaiśca samanvitām।
śaṁkarasya jaṭājūṭād bhraṣṭāṁ sāgaratejasā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · २६ ॥
समुद्रमहिषीं गङ्गां सारसक्रौञ्चनादिताम्। आससाद महाबाहुः शृङ्गवेरपुरं प्रति

samudramahiṣīṁ gaṅgāṁ sārasakrauñcanāditām।
āsasāda mahābāhuḥ śṛṅgaverapuraṁ prati ॥

॥ २५–२६ ॥

उनके जल में सूँस, घड़ियाल और सर्प निवास करते हैं। सगरवंशी राजा भगीरथ के तपोमय तेज से जिनका शंकरजी के जटाजूट से अवतरण हुआ था, जो समुद्र की रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गा के पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे। गङ्गा की वह धारा शृङ्गवेरपुर में बह रही थी

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॥ २ · ५० · २७ ॥
तामूर्मिकलिलावर्तामन्ववेक्ष्य महारथः। सुमन्त्रमब्रवीत् सूतमिहैवाद्य वसामहे

tāmūrmikalilāvartāmanvavekṣya mahārathaḥ।
sumantramabravīt sūtamihaivādya vasāmahe ॥

जिनके आवर्त (भँवरें) लहरों से व्याप्त थे, उन गङ्गाजी का दर्शन करके महारथी श्रीराम ने सारथि सुमन्त्र से कहा- ‘सूत! आज हमलोग यहीं रहेंगे’

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॥ २ · ५० · २८ ॥
अविदूरादयं नद्या बहुपुष्पप्रवालवान्। सुमहानिङ्गुदीवृक्षो वसामोऽत्रैव सारथे

avidūrādayaṁ nadyā bahupuṣpapravālavān।
sumahāniṅgudīvṛkṣo vasāmo'traiva sārathe ॥

‘सारथे! गङ्गाजी के समीप ही जो यह बहुत-से फूलों और नये-नये पल्लवों से सुशोभित महान् इङ्गुदी का वृक्ष है, इसीके नीचे आज रात में हम निवास करेंगे

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॥ २ · ५० · २९ ॥
प्रेक्षामि सरितां श्रेष्ठां सम्मान्यसलिलां शिवाम्। देवमानवगन्धर्वमृगपन्नगपक्षिणाम्

prekṣāmi saritāṁ śreṣṭhāṁ sammānyasalilāṁ śivām।
devamānavagandharvamṛgapannagapakṣiṇām ॥

‘जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, सर्पों, पशुओं तथा पक्षियों के लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओं में श्रेष्ठ गङ्गाजी का भी मुझे यहाँ से दर्शन होता रहेगा’

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॥ २ · ५० · ३० ॥
लक्ष्मणश्च सुमन्त्रश्च बाढमित्येव राघवम्। उक्त्वा तमिङ्गुदीवृक्षं तदोपययतुर्हयैः

lakṣmaṇaśca sumantraśca bāḍhamityeva rāghavam।
uktvā tamiṅgudīvṛkṣaṁ tadopayayaturhayaiḥ ॥

तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजी से बहुत अच्छा कहकर अश्वोंद्वारा उस इंगुदी-वृक्ष के समीप गये

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॥ २ · ५० · ३१ ॥
रामोऽभियाय तं रम्यं वृक्षमिक्ष्वाकुनन्दनः। रथादवतरत् तस्मात् सभार्यः सहलक्ष्मणः

rāmo'bhiyāya taṁ ramyaṁ vṛkṣamikṣvākunandanaḥ।
rathādavatarat tasmāt sabhāryaḥ sahalakṣmaṇaḥ ॥

उस रमणीय वृक्ष के पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ रथ से उतर गये

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॥ २ · ५० · ३२ ॥
सुमन्त्रोऽप्यवतीर्याथ मोचयित्वा हयोत्तमान्। वृक्षमूलगतं राममुपतस्थे कृताञ्जलिः

sumantro'pyavatīryātha mocayitvā hayottamān।
vṛkṣamūlagataṁ rāmamupatasthe kṛtāñjaliḥ ॥

फिर सुमन्त्र ने भी उतरकर उत्तम घोड़ों को खोल दिया और वृक्ष की जड़ पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये

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॥ २ · ५० · ३३ ॥
तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा। निषादजात्यो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुतः

tatra rājā guho nāma rāmasyātmasamaḥ sakhā।
niṣādajātyo balavān sthapatiśceti viśrutaḥ ॥

शृङ्गवेरपुर में गुहनामका राजा राज्य करता था। वह श्रीरामचन्द्रजी का प्राणों के समान प्रिय मित्र था। उसका जन्म निषादकुल में हुआ था। वह शारीरिक शक्ति और सैनिक शक्ति की दृष्टि से भी बलवान् था तथा वहाँ के निषादों का सुविख्यात राजा था

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॥ २ · ५० · ३४ ॥
श्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं रामं विषयमागतम्। वृद्धैः परिवृतोऽमात्यैर्ज्ञातिभिश्चाप्युपागतः

sa śrutvā puruṣavyāghraṁ rāmaṁ viṣayamāgatam।
vṛddhaiḥ parivṛto'mātyairjñātibhiścāpyupāgataḥ ॥

उसने जब सुना कि पुरुषसिंह श्रीराम मेरे राज्य में पधारे हैं, तब वह बूढ़े मन्त्रियों और बन्धु-बान्धवों से घिरा हुआ वहाँ आया

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॥ २ · ५० · ३५ ॥
ततो निषादाधिपतिं दृष्ट्वा दूरादुपस्थितम्। सह सौमित्रिणा रामः समागच्छद् गुहेन सः

tato niṣādādhipatiṁ dṛṣṭvā dūrādupasthitam।
saha saumitriṇā rāmaḥ samāgacchad guhena saḥ ॥

निषादराज को दूर से आया हुआ देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ आगे बढ़कर उससे मिले

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॥ २ · ५० · ३६ ॥
तमार्तः सम्परिष्वज्य गुहो राघवमब्रवीत्। यथायोध्या तथेदं ते राम किं करवाणि ते ईदृशं हि महाबाहो कः प्राप्स्यत्यतिथिं प्रियम्।

tamārtaḥ sampariṣvajya guho rāghavamabravīt।
yathāyodhyā tathedaṁ te rāma kiṁ karavāṇi te ॥
īdṛśaṁ hi mahābāho kaḥ prāpsyatyatithiṁ priyam।

श्रीरामचन्द्रजी को वल्कल आदि धारण किये देख गुह को बड़ा दुःख हुआ। उसने श्रीरघुनाथजी को हृदय से लगाकर कहा- ‘श्रीराम! आपके लिये जैसे अयोध्या का राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? महाबाहो! आप-जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा?’

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॥ २ · ५० · ३७ ॥
ततो गुणवदन्नाद्यमुपादाय पृथग्विधम्

tato guṇavadannādyamupādāya pṛthagvidham ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · ३८ ॥
अर्घ्यं चोपानयच्छीघ्रं वाक्यं चेदमुवाच ह। स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही

arghyaṁ copānayacchīghraṁ vākyaṁ cedamuvāca ha।
svāgataṁ te mahābāho taveyamakhilā mahī ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · ३९ ॥
वयं प्रेष्या भवान् भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि नः। भक्ष्यं भोज्यं पेयं लेह्यं चैतदुपस्थितम्। शयनानि मुख्यानि वाजिनां खादनं ते

vayaṁ preṣyā bhavān bhartā sādhu rājyaṁ praśādhi naḥ।
bhakṣyaṁ bhojyaṁ ca peyaṁ ca lehyaṁ caitadupasthitam।
śayanāni ca mukhyāni vājināṁ khādanaṁ ca te ॥

॥ ३७–३९ ॥

फिर भाँति-भाँति का उत्तम अन्न लेकर वह सेवा में उपस्थित हुआ। उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा- ‘महाबाहो! आपका स्वागत है। यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकार में है, आपकी ही है। हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आज से आप ही हमारे इस राज्य का भलीभाँति शासन करें। यह भक्ष्य (अन्न आदि), भोज्य (खीर आदि), पेय (पानकरस आदि) तथा लेह्य (चटनी आदि) आपकी सेवा में उपस्थित है, इसे स्वीकार करें। ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ों के खाने के लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं-ये सब सामग्री ग्रहण करें’

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॥ २ · ५० · ४० ॥
गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह। अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम् पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च।

guhamevaṁ bruvāṇaṁ tu rāghavaḥ pratyuvāca ha।
arcitāścaiva hṛṣṭāśca bhavatā sarvadā vayam ॥
padbhyāmabhigamāccaiva snehasaṁdarśanena ca।

गुह के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया- ‘सखे! तुम्हारे यहाँतक पैदल आने और स्नेह दिखाने से ही हमारा सदा के लिये भलीभाँति पूजन-स्वागत-सत्कार हो गया। तुमसे मिलकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है’

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॥ २ · ५० · ४१ ॥
भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत्

bhujābhyāṁ sādhuvṛttābhyāṁ pīḍayan vākyamabravīt ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ५० · ४२ ॥
दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः। अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु वनेषु

diṣṭyā tvāṁ guha paśyāmi hyarogaṁ saha bāndhavaiḥ।
api te kuśalaṁ rāṣṭre mitreṣu ca vaneṣu ca ॥

॥ ४१–४२ ॥

फिर श्रीराम ने अपनी दोनों गोल-गोल भुजाओं से गुह का अच्छी तरह आलिङ्गन करते हुए कहा- ‘गुह! सौभाग्य की बात है कि मैं आज तुम्हें बन्धु-बान्धवों के साथ स्वस्थ एवं सानन्द देख रहा हूँ। बताओ, तुम्हारे राज्यमें, मित्रों के यहाँ तथा वनों में सर्वत्र कुशल तो है?

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॥ २ · ५० · ४३ ॥
यत्त्विदं भवता किंचित् प्रीत्या समुपकल्पितम्। सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे

yattvidaṁ bhavatā kiṁcit prītyā samupakalpitam।
sarvaṁ tadanujānāmi nahi varte pratigrahe ॥

‘तुमने प्रेमवश यह जो कुछ सामग्री प्रस्तुत की है, इसे स्वीकार करके मैं तुम्हें वापिस ले जाने की आज्ञा देता हूँ; क्योंकि इस समय दूसरों की दी हुई कोई भी वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता-अपने उपयोग में नहीं लाता

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॥ २ · ५० · ४४ ॥
कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं माम्। विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम्

kuśacīrājinadharaṁ phalamūlāśanaṁ ca mām।
viddhi praṇihitaṁ dharme tāpasaṁ vanagocaram ॥

‘वल्कल और मृगचर्म धारण करके फल-मूल का आहार करता हूँ और धर्म में स्थित रहकर तापसवेश में वन के भीतर ही विचरता हूँ। इन दिनों तुम मुझे इसी नियम में स्थित जानो

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॥ २ · ५० · ४५ ॥
अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित्। एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः

aśvānāṁ khādanenāhamarthī nānyena kenacit।
etāvatātra bhavatā bhaviṣyāmi supūjitaḥ ॥

‘इन सामग्रियों में जो घोड़ों के खाने-पीने की वस्तु है, उसीकी इस समय मुझे आवश्यकता है, दूसरी किसी वस्तु की नहीं। घोड़ों को खिला-पिला देनेमात्र से तुम्हारे द्वारा मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा

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॥ २ · ५० · ४६ ॥
एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे। एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः

ete hi dayitā rājñaḥ piturdaśarathasya me।
etaiḥ suvihitairaśvairbhaviṣyāmyahamarcitaḥ ॥

‘ये घोड़े मेरे पिता महाराज दशरथ को बहुत प्रिय हैं। इनके खाने-पीने का सुन्दर प्रबन्ध कर देने से मेरा भलीभाँति पूजन हो जायगा’

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॥ २ · ५० · ४७ ॥
अश्वानां प्रतिपानं खादनं चैव सोऽन्वशात्। गुहस्तत्रैव पुरुषांस्त्वरितं दीयतामिति

aśvānāṁ pratipānaṁ ca khādanaṁ caiva so'nvaśāt।
guhastatraiva puruṣāṁstvaritaṁ dīyatāmiti ॥

तब गुह ने अपने सेवकों को उसी समय यह आज्ञा दी कि तुम घोड़ों के खाने-पीने के लिये आवश्यक वस्तुएँ शीघ्र लाकर दो

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॥ २ · ५० · ४८ ॥
ततश्चीरोत्तरासङ्गः संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्। जलमेवाददे भोज्यं लक्ष्मणेनाहृतं स्वयम्

tataścīrottarāsaṅgaḥ saṁdhyāmanvāsya paścimām।
jalamevādade bhojyaṁ lakṣmaṇenāhṛtaṁ svayam ॥

तत्पश्चात् वल्कल का उत्तरीय-वस्त्र धारण करनेवाले श्रीराम ने सायंकाल की संध्योपासना करके भोजन के नाम पर स्वयं लक्ष्मण का लाया हुआ केवल जलमात्र पी लिया

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॥ २ · ५० · ४९ ॥
तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः। सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमुपाश्रितः

tasya bhūmau śayānasya pādau prakṣālya lakṣmaṇaḥ।
sabhāryasya tato'bhyetya tasthau vṛkṣamupāśritaḥ ॥

फिर पत्नीसहित श्रीराम भूमि पर ही तृण की शय्या बिछाकर सोये। उस समय लक्ष्मण उनके दोनों चरणों को धो-पोंछकर वहाँ से कुछ दूर पर हट आये और एक वृक्ष का सहारा लेकर बैठ गये

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॥ २ · ५० · ५० ॥
गुहोऽपि सह सूतेन सौमित्रिमनुभाषयन्। अन्वजाग्रत् ततो राममप्रमत्तो धनुर्धरः

guho'pi saha sūtena saumitrimanubhāṣayan।
anvajāgrat tato rāmamapramatto dhanurdharaḥ ॥

गुह भी सावधानी के साथ धनुष धारण करके सुमन्त्र के साथ बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बातचीत करता हुआ श्रीराम की रक्षा के लिये रातभर जागता रहा

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॥ २ · ५० · ५१ ॥
तथा शयानस्य ततो यशस्विनो मनस्विनो दाशरथेर्महात्मनः। अदृष्टदुःखस्य सुखोचितस्य सा तदा व्यतीता सुचिरेण शर्वरी

tathā śayānasya tato yaśasvino manasvino dāśarathermahātmanaḥ।
adṛṣṭaduḥkhasya sukhocitasya sā tadā vyatītā sucireṇa śarvarī ॥

इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन तथा जो सुख भोगने के ही योग्य थे, वह रात उस समय महात्मा श्रीरामकी, जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा था (नींद न आने के कारण) बहुत देर के बाद व्यतीत हुई

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५० ॥