वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ४९ · १८ श्लोकाःSarga 49 · 18 ślokas

ग्रामवासियोंकी बातें सुनते हुए श्रीरामका कोसल जनपदको लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दिका नदियोंको पार करके सुमन्त्रसे कुछ कहना

नदी-सन्तरण

“नदी-सन्तरण”
॥ २ · ४९ · १०–१२ ॥

सुमन्त्रचालितः काञ्चनरथः चतुर्भिः श्वेताश्वैः निर्मलां नदीम् उत्तरति; धनुर्धरः श्यामो रामः, रत्नालंकृता सीता, वल्कलधरो लक्ष्मणश्च दूरस्थामयोध्यामवलोकयन्ति, तीरे हंसाः पद्मानि च।

स्वच्छ उथले जल में चार श्वेत अश्वों से खिंचता स्वर्णिम रथ नदी पार कर रहा है; आगे बैठे वृद्ध सारथि सुमन्त्र श्वेत पगड़ी और राजसी अंगरखे में बागडोर थामे हैं। उनके पीछे श्याम-वर्ण धनुर्धारी राम वल्कल में, समीप रत्नाभूषणों से सजी सीता और वल्कलधारी लक्ष्मण — तीनों एक बार पीछे मुड़कर क्षितिज पर दूर छूटती अयोध्या की मीनारों की ओर देखते हैं; तट पर बगुले और गुलाबी कमल, चारों ओर कोसल की हरी-भरी धरती फैली है — धीर पर विषादमय तीर्थयात्रा का भाव।

Through bright, shallow water a golden chariot drawn by four white horses fords the river; at the reins sits the aged charioteer Sumantra in white turban and royal court robe. Behind him the dark-hued, bow-bearing Ram stands in bark garments beside the jewel-adorned Sita and the bark-clad Lakshman — the travellers glance back once toward the domes of distant Ayodhya on the horizon, while herons and pink lotuses line the bank and the green land of Kosala stretches beyond, in a mood of resolute, sorrowful pilgrimage.

॥ २ · ४९ · १ ॥
रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम्। जगाम पुरुषव्याघ्रः पितुराज्ञामनुस्मरन्

rāmo'pi rātriśeṣeṇa tenaiva mahadantaram।
jagāma puruṣavyāghraḥ piturājñāmanusmaran ॥

उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिता की आज्ञा का बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रि में ही बहुत दूर निकल गये

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॥ २ · ४९ · २ ॥
तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद् रजनी शिवा। उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत

tathaiva gacchatastasya vyapāyād rajanī śivā।
upāsya tu śivāṁ saṁdhyāṁ viṣayānatyagāhata ॥

उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी। सबेरा होने पर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदों को लाँघते हुए चल दिये

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॥ २ · ४९ · ३ ॥
ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च। पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमैः

grāmān vikṛṣṭasīmāntān puṣpitāni vanāni ca।
paśyannatiyayau śīghraṁ śanairiva hayottamaiḥ ॥

जिनकी सीमा के पास की भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलों से सुशोभित वनों को देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर-दृश्यों के देखने में तन्मय रहने के कारण उन्हें उस रथ की गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी

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॥ २ · ४९ · ४ ॥
शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्। राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम्

śṛṇvan vāco manuṣyāṇāṁ grāmasaṁvāsavāsinām।
rājānaṁ dhig daśarathaṁ kāmasya vaśamāsthitam ॥

मार्ग में जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करनेवाले मनुष्यों की निम्नाङ्कित बातें उनके कानों में पड़ रही थीं—‘अहो! काम के वश में पड़े हुए राजा दशरथ को धिक्कार है

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॥ २ · ४९ · ५ ॥
हा नृशंसाद्य कैकेयी पापा पापानुबन्धिनी। तीक्ष्णा सम्भिन्नमर्यादा तीक्ष्णकर्मणि वर्तते

hā nṛśaṁsādya kaikeyī pāpā pāpānubandhinī।
tīkṣṇā sambhinnamaryādā tīkṣṇakarmaṇi vartate ॥

‘हाय! हाय! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादा का त्याग करनेवाली कैकेयी को तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर्म में ही लगी रहती है

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॥ २ · ४९ · ६ ॥
या पुत्रमीदृशं राज्ञः प्रवासयति धार्मिकम्। वनवासे महाप्राज्ञं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम्

yā putramīdṛśaṁ rājñaḥ pravāsayati dhārmikam।
vanavāse mahāprājñaṁ sānukrośaṁ jitendriyam ॥

‘जिसने महाराज के ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु और जितेन्द्रिय पुत्र को वनवास के लिये घर से निकलवा दिया है

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॥ २ · ४९ · ७ ॥
कथं नाम महाभागा सीता जनकनन्दिनी। सदा सुखेष्वभिरता दुःखान्यनुभविष्यति

kathaṁ nāma mahābhāgā sītā janakanandinī।
sadā sukheṣvabhiratā duḥkhānyanubhaviṣyati ॥

‘जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखों में ही रत रहती थीं, अब वनवास के दुःख कैसे भोग सकेगी ?

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॥ २ · ४९ · ८ ॥
अहो दशरथो राजा निःस्नेहः स्वसुतं प्रति। प्रजानामनघं रामं परित्यक्तुमिहेच्छति

aho daśaratho rājā niḥsnehaḥ svasutaṁ prati।
prajānāmanaghaṁ rāmaṁ parityaktumihecchati ॥

‘अहो! क्या राजा दशरथ अपने पुत्र के प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओं के प्रति कोई अपराध न करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी का यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं’

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॥ २ · ४९ · ९ ॥
एता वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्। शृण्वन्नतिययौ वीरः कोसलान् कोसलेश्वरः

etā vāco manuṣyāṇāṁ grāmasaṁvāsavāsinām।
śṛṇvannatiyayau vīraḥ kosalān kosaleśvaraḥ ॥

छोटे-बड़े गाँवों में रहनेवाले मनुष्यों की ये बातें सुनते हुए वीर कोसलपति श्रीराम कोसल जनपद की सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये

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॥ २ · ४९ · १० ॥
ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम्। उत्तीर्याभिमुखः प्रायादगस्त्याध्युषितां दिशम्

tato vedaśrutiṁ nāma śivavārivahāṁ nadīm।
uttīryābhimukhaḥ prāyādagastyādhyuṣitāṁ diśam ॥

तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहानेवाली वेदश्रुति नामक नदी को पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण-दिशा की ओर बढ़ गये

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॥ २ · ४९ · ११ ॥
गत्वा तु सुचिरं कालं ततः शीतवहां नदीम्। गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम्

gatvā tu suciraṁ kālaṁ tataḥ śītavahāṁ nadīm।
gomatīṁ goyutānūpāmatarat sāgaraṅgamām ॥

दीर्घकालतक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदी को पार किया, जो शीतल जल का स्रोत बहाती थी। उसके कछार में बहुत-सी गौएँ विचरती थीं

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॥ २ · ४९ · १२ ॥
गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः। मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम्

gomatīṁ cāpyatikramya rāghavaḥ śīghragairhayaiḥ।
mayūrahaṁsābhirutāṁ tatāra syandikāṁ nadīm ॥

शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा गोमती नदी को लाँघ करके श्रीरघुनाथजी ने मोरों और हंसों के कलरवों से व्याप्त स्यन्दिका नामक नदी को भी पार किया

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॥ २ · ४९ · १३ ॥
महीं मनुना राज्ञा दत्तामिक्ष्वाकवे पुरा। स्फीतां राष्ट्रवृतां रामो वैदेहीमन्वदर्शयत्

sa mahīṁ manunā rājñā dattāmikṣvākave purā।
sphītāṁ rāṣṭravṛtāṁ rāmo vaidehīmanvadarśayat ॥

वहाँ जाकर श्रीराम ने धन-धान्य से सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदों से घिरी हुई भूमि का सीता को दर्शन कराया, जिसे पूर्वकाल में राजा मनु ने इक्ष्वाकु को दिया था

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॥ २ · ४९ · १४ ॥
सूत इत्येव चाभाष्य सारथिं तमभीक्ष्णशः। हंसमत्तस्वरः श्रीमानुवाच पुरुषोत्तमः

sūta ityeva cābhāṣya sārathiṁ tamabhīkṣṇaśaḥ।
haṁsamattasvaraḥ śrīmānuvāca puruṣottamaḥ ॥

फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीराम ने ‘सूत!’ कहकर सारथि को बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंस के समान मधुर स्वर में इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ४९ · १५ ॥
कदाहं पुनरागम्य सरय्वाः पुष्पिते वने। मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा संगतः

kadāhaṁ punarāgamya sarayvāḥ puṣpite vane।
mṛgayāṁ paryaṭiṣyāmi mātrā pitrā ca saṁgataḥ ॥

‘सूत! मैं कब पुनः लौटकर माता-पिता से मिलूँगा और सरयू के पार्श्ववर्ती पुष्पित वन में मृगया के लिये भ्रमण करूँगा?

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॥ २ · ४९ · १६ ॥
नात्यर्थमभिकांक्षामि मृगयां सरयूवने। रतिर्ह्येषातुला लोके राजर्षिगणसम्मता

nātyarthamabhikāṁkṣāmi mṛgayāṁ sarayūvane।
ratirhyeṣātulā loke rājarṣigaṇasammatā ॥

‘मैं सरयू के वन में शिकार खेलने की बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता। यह लोक में एक प्रकार की अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियों के समुदाय को अभिमत है

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॥ २ · ४९ · १७ ॥
राजर्षीणां हि लोकेऽस्मिन् रत्यर्थं मृगया वने। काले कृतां तां मनुजैर्धन्विनामभिकांक्षिताम्

rājarṣīṇāṁ hi loke'smin ratyarthaṁ mṛgayā vane।
kāle kṛtāṁ tāṁ manujairdhanvināmabhikāṁkṣitām ॥

‘इस लोक में वन में जाकर शिकार खेलना राजर्षियों की क्रीड़ा के लिये प्रचलित हुआ था। अतः मनुपुत्रोंद्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरा को भी अभीष्ट हुई’

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॥ २ · ४९ · १८ ॥
तमध्वानमैक्ष्वाकः सूतं मधुरया गिरा। तं तमर्थमभिप्रेत्य ययौ वाक्यमुदीरयन्

sa tamadhvānamaikṣvākaḥ sūtaṁ madhurayā girā।
taṁ tamarthamabhipretya yayau vākyamudīrayan ॥

इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयों को लेकर सूत से मधुर वाणी में उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्ग पर बढ़ते चले गये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४९ ॥