प्रातःकाल उठनेपर पुरवासियोंका विलाप करना और निराश होकर नगरको लौटना
“राम-विहीन प्रभात”
॥ २ · ४७ · १–२ ॥
तमसातटे धूसरप्रभाते प्रबुद्धाः पौराः राघवं विना शोकोपहताः; श्वेतकेशो द्विजः ऊर्ध्वबाहुः व्याकुलया दृशा व्योम निरीक्षते, काचिद् वनिता वाससा मुखं पिधाय रोदिति, अन्ये रथचक्रलेखां निर्दिशन्तो निराशा नगरीं प्रति निवर्तन्ते।
तमसा नदीके सूने तटपर धूसर शीतल प्रभातमें अयोध्यावासी जागकर देखते हैं कि श्रीराम जा चुके — बालूपर केवल रथकी लीक शेष है। अग्रभागमें श्वेतकेश ब्राह्मण दोनों हाथ फैलाये आकाशकी ओर व्याकुल दृष्टि उठाये खड़ा है; समीप ही मरून साड़ीमें एक स्त्री अपना आँचल थामे स्तब्ध, और हरी साड़ीवाली एक स्त्री भूमिपर बैठी मुँह ढाँपे रो रही है; एक पुरुष गालपर हाथ धरे विषादमें डूबा है, तो दायीं ओर खड़ा एक जन दोनों बाँहें फैलाकर विलीन पथकी ओर असहाय संकेत करता है। पीछे भीड़ रथकी लीककी ओर उँगली उठाये, कुछ लोग शिर झुकाये दूर नगरको लौटते — सारा दृश्य वियोग और टूटी आशासे भरा है।
On the deserted bank of the river Tamasa, in a cold grey dawn, the people of Ayodhya wake to find Ram gone — only the wheel-tracks of his chariot remain in the sand. In the foreground a white-bearded brahmin flings his hands open and lifts a stricken gaze to the sky; beside him a woman in a maroon sari clutches her veil in shock, while another in green sinks to the ground and weeps into her hands, and a seated man rests his cheek on his hand in dejection. To the right a man throws his arms wide, gesturing helplessly toward the vanished trail, as the crowd behind points at the tracks or turns back toward the distant city with bowed heads — the whole scene steeped in bereavement and lost hope.
prabhātāyāṁ tu śarvaryāṁ paurāste rāghavaṁ vinā।
śokopahataniśceṣṭā babhūvurhatacetasaḥ ॥
इधर रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजी को न देखकर अचेत हो गये। शोक से व्याकुल होने के कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी
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śokajāśruparidyūnā vīkṣamāṇāstatastataḥ।
ālokamapi rāmasya na paśyanti sma duḥkhitāḥ ॥
वे शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर-उधर उनकी खोज करने लगे। परंतु उन दुःखी पुरवासियों को श्रीराम किधर गये, इस बात का पता देनेवाला कोई चिह्नतक नहीं दिखायी दिया
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te viṣādārtavadanā rahitāstena dhīmatā।
kṛpaṇāḥ karuṇā vāco vadanti sma manīṣiṇaḥ ॥
बुद्धिमान् श्रीराम से विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये। उनके मुख पर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी। वे मनीषी पुरवासी करुणाभरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे—
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dhigastu khalu nidrāṁ tāṁ yayāpahatacetasaḥ।
nādya paśyāmahe rāmaṁ pṛthūraskaṁ mahābhujam ॥
‘हाय! हमारी उस निद्रा को धिक्कार है, जिससे अचेत हो जाने के कारण हम उस समय विशाल वक्षवाले महाबाहु श्रीराम के दर्शन से वञ्चित हो गये हैं
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kathaṁ rāmo mahābāhuḥ sa tathāvitathakriyaḥ।
bhaktaṁ janamabhityajya pravāsaṁ tāpaso gataḥ ॥
‘जिनकी कोई भी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती, वे तापसवेषधारी महाबाहु श्रीराम हम भक्तजनों को छोड़कर परदेश (वन) में कैसे चले गये ?
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yo naḥ sadā pālayati pitā putrānivaurasān।
kathaṁ raghūṇāṁ sa śreṣṭhastyaktvā no vipinaṁ gataḥ ॥
‘जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का पालन करता है, उसी प्रकार जो सदा हमारी रक्षा करते थे, वे ही रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम आज हमें छोड़कर वन को क्यों चले गये ?
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ihaiva nidhanaṁ yāma mahāprasthānameva vā।
rāmeṇa rahitānāṁ no kimarthaṁ jīvitaṁ hitam ॥
‘अब हमलोग यहीं प्राण दे दें या मरने का निश्चय करके उत्तर दिशा की ओर चल दें। श्रीराम से रहित होकर हमारा जीवन-धारण किसलिये हितकर हो सकता है ?
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santi śuṣkāṇi kāṣṭhāni prabhūtāni mahānti ca।
taiḥ prajvālya citāṁ sarve praviśāmo'thavā vayam ॥
‘अथवा यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े सूखे काठ पड़े हैं, उनसे चिता जलाकर हम सब लोग उसीमें प्रवेश कर जायँ
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kiṁ vakṣyāmo mahābāhuranasūyaḥ priyaṁvadaḥ।
nītaḥ sa rāghavo'smābhiriti vaktuṁ kathaṁ kṣamam ॥
‘(यदि हमसे कोई श्रीराम का वृत्तान्त पूछेगा तो हम उसे क्या उत्तर देंगे ?) क्या हम यह कहेंगे कि जो किसीके दोष नहीं देखते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, उन महाबाहु श्रीरघुनाथजी को हमने वन में पहुँचा दिया है? हाय! यह अयोग्य बात हमारे मुँह से कैसे निकल सकती है ?
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sā nūnaṁ nagarī dīnā dṛṣṭvāsmān rāghavaṁ vinā।
bhaviṣyati nirānandā sastrībālavayo'dhikā ॥
‘श्रीराम के बिना हमलोगों को लौटा हुआ देखकर स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारी अयोध्यानगरी निश्चय ही दीन और आनन्दहीन हो जायगी
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niryātāstena vīreṇa saha nityaṁ mahātmanā।
vihīnāstena ca punaḥ kathaṁ drakṣyāma tāṁ purīm ॥
‘हमलोग वीरवर महात्मा श्रीराम के साथ सर्वदा निवास करने के लिये निकले थे। अब उनसे बिछुड़कर हम अयोध्यापुरी को कैसे देख सकेंगे’
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itīva bahudhā vāco bāhumudyamya te janāḥ।
vilapanti sma duḥkhārtā hatavatsā ivāgryagāḥ ॥
इस प्रकार अनेक तरह की बातें कहते हुए वे समस्त पुरवासी अपनी भुजा उठाकर विलाप करने लगे। वे बछड़ों से बिछुड़ी हुई अग्रगामिनी गौओं की भाँति दुःख से व्याकुल हो रहे थे
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tato mārgānusāreṇa gatvā kiṁcit tataḥ kṣaṇam।
mārganāśād viṣādena mahatā samabhiplutāḥ ॥
फिर रास्ते पर रथ की लीक देखते हुए सब-के-सब कुछ दूरतक गये; किंतु क्षणभर में मार्ग का चिह्न न मिलने के कारण वे महान् शोक में डूब गये
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rathamārgānusāreṇa nyavartanta manasvinaḥ।
kimidaṁ kiṁ kariṣyāmo daivenopahatā iti ॥
उस समय यह कहते हुए कि ‘यह क्या हुआ? अब हम क्या करें? दैव ने हमें मार डाला’ वे मनस्वी पुरुष रथ की लीक का अनुसरण करते हुए अयोध्या की ओर लौट पड़े
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tadā yathāgatenaiva mārgeṇa klāntacetasaḥ।
ayodhyāmagaman sarve purīṁ vyathitasajjanām ॥
उनका चित्त क्लान्त हो रहा था। वे सब जिस मार्ग से गये थे, उसीसे लौटकर अयोध्यापुरी में जा पहुँचे, जहाँ के सभी सत्पुरुष श्रीराम के लिये व्यथित थे
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ālokya nagarīṁ tāṁ ca kṣayavyākulamānasāḥ।
āvartayanta te'śrūṇi nayanaiḥ śokapīḍitaiḥ ॥
उस नगरी को देखकर उनका हृदय दुःख से व्याकुल हो उठा। वे अपने शोकपीड़ित नेत्रोंद्वारा आँसुओं की वर्षा करने लगे
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eṣā rāmeṇa nagarī rahitā nātiśobhate।
āpagā garuḍeneva hṛdāduddhṛtapannagā ॥
(वे बोले—)‘जिसके गहरे कुण्ड से वहाँ का नाग गरुड़ के द्वारा निकाल लिया गया हो, वह नदी जैसे शोभाहीन हो जाती है, उसी प्रकार श्रीराम से रहित हुई यह अयोध्यानगरी अब अधिक शोभा नहीं पाती है’
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candrahīnamivākāśaṁ toyahīnamivārṇavam।
apaśyan nihatānandaṁ nagaraṁ te vicetasaḥ ॥
उन्होंने देखा, सारा नगर चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्र के समान आनन्दशून्य हो गया है। पुरी की यह दुरवस्था देख वे अचेत-से हो गये
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te tāni veśmāni mahādhanāni duḥkhena duḥkhopahatā viśantaḥ।
naiva prajagmuḥ svajanaṁ paraṁ vā nirīkṣyamāṇāḥ pravinaṣṭaharṣāḥ ॥
उनके हृदय का सारा उल्लास नष्ट हो चुका था। वे दुःख से पीड़ित हो उन महान् वैभवसम्पन्न गृहों में बड़े क्लेश के साथ प्रविष्ट हो सबको देखते हुए भी अपने और पराये की पहचान न कर सके
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४७ ॥