वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ४५ · ३३ श्लोकाःSarga 45 · 33 ślokas

श्रीरामका पुरवासियोंसे भरत और महाराज दशरथके प्रति प्रेम-भाव रखनेका अनुरोध करते हुए लौट जानेके लिये कहना; नगरके वृद्ध ब्राह्मणोंका श्रीरामसे लौट चलनेके लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीरामका तमसातटपर पहुँचना

पुरजन-निवर्तन

“पुरजन-निवर्तन”
॥ २ · ४५ · ६–२२ ॥

तमसातीरे सन्ध्यायां वल्कलवसनः श्यामाङ्गो रामः कृताञ्जलिः अनुगतान् पुरवासिनः निवर्तितुं भरते च स्नेहं दातुं याचते; पार्श्वयोः अलङ्कृता सीता सधनुर्लक्ष्मणश्च तिष्ठतः; प्रोत्क्षिप्तपाणयो वृद्धद्विजाः श्वेतवाजपेयच्छत्रैरग्निहोत्रेण च तं निवर्तयितुं प्रत्यनुनयन्ति।

संध्याकालीन तमसा नदी के हरे तट पर वल्कलधारी श्यामसुन्दर श्रीराम हाथ जोड़े अपने पीछे-पीछे चले आए पुरवासियों से लौट जाने और भरत तथा महाराज के प्रति प्रेम रखने का कोमल अनुरोध कर रहे हैं; एक ओर रत्नाभूषणों से सजी सीता और दूसरी ओर धनुर्धारी लक्ष्मण खड़े हैं। सामने वृद्ध ब्राह्मण हाथ उठाए, अपने श्वेत वाजपेय-छत्र शरद्-मेघों-से ताने और अग्निहोत्र की ज्वाला साथ लिए, उन्हें लौट चलने की आर्त याचना कर रहे हैं; सुनहली सांध्य आभा नदी और समूचे जनसमूह पर बिखरी है।

On the green bank of the river Tamasa at evening, the bark-clad, blue-hued Ram stands with hands folded, gently begging the townsfolk who have followed him out of the city to turn back and give their love instead to Bharat and the king; the jewel-adorned Sita stands at one side, the bow-bearing Lakshman at the other. Before him the aged brahmanas raise their hands in plea, their tall white vajapeya parasols spread like autumn clouds and a consecrated fire glowing at their feet, imploring him to return, while amber sunset light spills across the river and the crowd.

॥ २ · ४५ · १ ॥
अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्। अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः

anuraktā mahātmānaṁ rāmaṁ satyaparākramam।
anujagmuḥ prayāntaṁ taṁ vanavāsāya mānavāḥ ॥

उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वन को ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखनेवाले बहुत-से अयोध्यावासी मनुष्य वन में निवास करने के लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये

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॥ २ · ४५ · २ ॥
निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि। नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम्

nivartite'tīva balāt suhṛddharmeṇa rājani।
naiva te saṁnyavartanta rāmasyānugatā ratham ॥

‘जिसके जल्दी लौटने की कामना की जाय, उस स्वजन को दूरतक नहीं पहुँचाना चाहिये’—इत्यादि रूप से बताये गये सुहृद्धर्म के अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजी के रथ के पीछे-पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घर की ओर नहीं लौटे

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॥ २ · ४५ · ३ ॥
अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः। बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः

ayodhyānilayānāṁ hi puruṣāṇāṁ mahāyaśāḥ।
babhūva guṇasampannaḥ pūrṇacandra iva priyaḥ ॥

क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषों के लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रिय हो गये थे

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॥ २ · ४५ · ४ ॥
याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा। कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत

sa yācyamānaḥ kākutsthastābhiḥ prakṛtibhistadā।
kurvāṇaḥ pitaraṁ satyaṁ vanamevānvapadyata ॥

उन प्रजाजनों ने श्रीराम से घर लौट चलने के लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिता के सत्य की रक्षा करने के लिये वन की ओर ही बढ़ते गये

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॥ २ · ४५ · ५ ॥
अवेक्षमाणः सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव। उवाच रामः सस्नेहं ताः प्रजाः स्वाः प्रजा इव

avekṣamāṇaḥ sasnehaṁ cakṣuṣā prapibanniva।
uvāca rāmaḥ sasnehaṁ tāḥ prajāḥ svāḥ prajā iva ॥

वे प्रजाजनों को इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे मानो नेत्रों से उन्हें पी रहे हों। उस समय श्रीराम ने अपनी संतान के समान प्रिय उन प्रजाजनों से स्नेहपूर्वक कहा—

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॥ २ · ४५ · ६ ॥
या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम्। मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम्

yā prītirbahumānaśca mayyayodhyānivāsinām।
matpriyārthaṁ viśeṣeṇa bharate sā vidhīyatām ॥

‘अयोध्यानिवासियों का मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नता के लिये भरत के प्रति और अधिक रूप में होना चाहिये

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॥ २ · ४५ · ७ ॥
हि कल्याणचारित्रः कैकेय्यानन्दवर्धनः। करिष्यति यथावद् वः प्रियाणि हितानि

sa hi kalyāṇacāritraḥ kaikeyyānandavardhanaḥ।
kariṣyati yathāvad vaḥ priyāṇi ca hitāni ca ॥

‘उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करनेवाला है। कैकेयी का आनन्द बढ़ानेवाले भरत आप लोगों का यथावत् प्रिय और हित करेंगे

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॥ २ · ४५ · ८ ॥
ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वितः। अनुरूपः वो भर्ता भविष्यति भयापहः

jñānavṛddho vayobālo mṛdurvīryaguṇānvitaḥ।
anurūpaḥ sa vo bhartā bhaviṣyati bhayāpahaḥ ॥

‘वे अवस्था में छोटे होने पर भी ज्ञान में बड़े हैं। पराक्रमोचित गुणों से सम्पन्न होने पर भी स्वभाव के बड़े कोमल हैं। वे आपलोगों के लिये योग्य राजा होंगे और प्रजा के भय का निवारण करेंगे

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॥ २ · ४५ · ९ ॥
हि राजगुणैर्युक्तो युवराजः समीक्षितः। अपि चापि मया शिष्टैः कार्यं वो भर्तृशासनम्

sa hi rājaguṇairyukto yuvarājaḥ samīkṣitaḥ।
api cāpi mayā śiṣṭaiḥ kāryaṁ vo bhartṛśāsanam ॥

‘वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणों से युक्त हैं, इसीलिये महाराज ने उन्हें युवराज बनाने का निश्चय किया है; अतः आपलोगों को अपने स्वामी भरत की आज्ञा का सदा पालन करना चाहिये

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॥ २ · ४५ · १० ॥
संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि। महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया

na saṁtapyed yathā cāsau vanavāsaṁ gate mayi।
mahārājastathā kāryo mama priyacikīrṣayā ॥

‘मेरे वन में चले जाने पर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोक से संतप्त न होने पायें, इस बात के लिये आपलोग सदा चेष्टा रखें। मेरा प्रिय करने की इच्छा से आपको मेरी इस प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देना चाहिये’

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॥ २ · ४५ · ११ ॥
यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत्। तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन्

yathā yathā dāśarathirdharmamevāśrito bhavet।
tathā tathā prakṛtayo rāmaṁ patimakāmayan ॥

दशरथनन्दन श्रीराम ने ज्यों-ज्यों धर्म का आश्रय लेने के लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों-ही-त्यों प्रजाजनों के मन में उन्हींको अपना स्वामी बनाने की इच्छा प्रबल होती गयी

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॥ २ · ४५ · १२ ॥
बाष्पेण पिहितं दीनं रामः सौमित्रिणा सह। चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम्

bāṣpeṇa pihitaṁ dīnaṁ rāmaḥ saumitriṇā saha।
cakarṣeva guṇairbaddhaṁ janaṁ puranivāsinam ॥

समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मणसहित श्रीराम मानो अपने गुणों में बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे

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॥ २ · ४५ · १३ ॥
ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा। वयःप्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वचः

te dvijāstrividhaṁ vṛddhā jñānena vayasaujasā।
vayaḥprakampaśiraso dūrādūcuridaṁ vacaḥ ॥

उनमें बहुत-से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल—तीनों ही दृष्टियों से बड़े थे। वृद्धावस्था के कारण कितनों के तो सिर काँप रहे थे। वे दूर से ही इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ४५ · १४ ॥
वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमाः। निवर्तध्वं गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि

vahanto javanā rāmaṁ bho bho jātyāsturaṁgamāḥ।
nivartadhvaṁ na gantavyaṁ hitā bhavata bhartari ॥

‘अरे! ओ तेज चलनेवाले अच्छी जाति के घोड़ो! तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीराम को वन की ओर लिये जा रहे हो, लौटो! अपने स्वामी के हितैषी बनो! तुम्हें वन में नहीं जाना चाहिये

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॥ २ · ४५ · १५ ॥
कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमाः। यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिताः

karṇavanti hi bhūtāni viśeṣeṇa turaṅgamāḥ।
yūyaṁ tasmānnivartadhvaṁ yācanāṁ prativeditāḥ ॥

‘यों तो सभी प्राणियों के कान होते हैं, परंतु घोड़ों के कान बड़े होते हैं; अतः तुम्हें हमारी याचना का ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घर की ओर लौट चलो

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॥ २ · ४५ · १६ ॥
धर्मतः विशुद्धात्मा वीरः शुभदृढव्रतः। उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्यः पुराद् वनम्

dharmataḥ sa viśuddhātmā vīraḥ śubhadṛḍhavrataḥ।
upavāhyastu vo bhartā nāpavāhyaḥ purād vanam ॥

‘तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रत का दृढ़ता से पालन करनेवाले हैं, अतः तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये—इन्हें बाहर से नगर के समीप ले चलना चाहिये। नगर से वन की ओर इनका अपवहन करना—इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है’

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॥ २ · ४५ · १७ ॥
एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान्। अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार

evamārtapralāpāṁstān vṛddhān pralapato dvijān।
avekṣya sahasā rāmo rathādavatatāra ha ॥

वृद्ध ब्राह्मणों को इस प्रकार आर्तभाव से प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथ से नीचे उतर गये

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॥ २ · ४५ · १८ ॥
पद्भ्यामेव जगामाथ ससीतः सहलक्ष्मणः। संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायणः

padbhyāmeva jagāmātha sasītaḥ sahalakṣmaṇaḥ।
saṁnikṛṣṭapadanyāso rāmo vanaparāyaṇaḥ ॥

वे सीता और लक्ष्मण के साथ पैदल ही चलने लगे। ब्राह्मणों का साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे—लंबे डग से नहीं चलते थे। वन में पहुँचना ही उनकी यात्रा का परम लक्ष्य था

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॥ २ · ४५ · १९ ॥
द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सलः। शशाक घृणाचक्षुः परिमोक्तुं रथेन सः

dvijātīn hi padātīṁstān rāmaścāritravatsalaḥ।
na śaśāka ghṛṇācakṣuḥ parimoktuṁ rathena saḥ ॥

श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र में वात्सल्य-गुण को प्रधानता थी। उनकी दृष्टि में दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथ के द्वारा चलकर उन पैदल चलनेवाले ब्राह्मण को पीछे छोड़ने का साहस न कर सके

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॥ २ · ४५ · २० ॥
गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसाः। ऊचुः परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजाः

gacchantameva taṁ dṛṣṭvā rāmaṁ sambhrāntamānasāḥ।
ūcuḥ paramasaṁtaptā rāmaṁ vākyamidaṁ dvijāḥ ॥

श्रीराम को अब भी वन की ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन-ही-मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ४५ · २१ ॥
ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति। द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्न्योऽप्यनुयान्त्वमी

brāhmaṇyaṁ kṛtsnametat tvāṁ brahmaṇyamanugacchati।
dvijaskandhādhirūḍhāstvāmagnyo'pyanuyāntvamī ॥

‘रघुनन्दन! तुम ब्राह्मणों के हितैषी हो, इसीसे यह सारा ब्राह्मण-समाज तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है। इन ब्राह्मणों के कंधों पर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं

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॥ २ · ४५ · २२ ॥
वाजपेयसमुत्थानि छत्राण्येतानि पश्य नः। पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये

vājapeyasamutthāni chatrāṇyetāni paśya naḥ।
pṛṣṭhato'nuprayātāni meghāniva jalātyaye ॥

‘वर्षा बीतने पर शरद् ऋतु में दिखायी देनेवाले सफेद बादलों के समान हमारे इन श्वेत छत्रों की ओर देखो, जो तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़े हैं। ये हमें वाजपेय-यज्ञ में प्राप्त हुए थे

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॥ २ · ४५ · २३ ॥
अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते। एभिश्छायां करिष्यामः स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकैः

anavāptātapatrasya raśmisaṁtāpitasya te।
ebhiśchāyāṁ kariṣyāmaḥ svaiśchatrairvājapeyakaiḥ ॥

‘तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेव की किरणों से संतप्त हो रहे हो। इस अवस्था में हम वाजपेय-यज्ञ में प्राप्त हुए इन अपने छत्रोंद्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे

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॥ २ · ४५ · २४ ॥
या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी। त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी

yā hi naḥ satataṁ buddhirvedamantrānusāriṇī।
tvatkṛte sā kṛtā vatsa vanavāsānusāriṇī ॥

‘वत्स! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रों के पीछे चलती थी—उन्हींके चिन्तन में लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवास का अनुसरण करनेवाली हो गयी है

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॥ २ · ४५ · २५ ॥
हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम्। वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः

hṛdayeṣvavatiṣṭhante vedā ye naḥ paraṁ dhanam।
vatsyantyapi gṛheṣveva dārāścāritrarakṣitāḥ ॥

‘जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयों में स्थित हैं। हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबल से सुरक्षित रहकर घरों में ही रहेंगी

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॥ २ · ४५ · २६ ॥
पुनर्न निश्चयः कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मतिः। त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम्

punarna niścayaḥ kāryastvadgatau sukṛtā matiḥ।
tvayi dharmavyapekṣe tu kiṁ syād dharmapathe sthitam ॥

‘अब हमें अपने कर्तव्य के विषय में पुनः कुछ निश्चय नहीं करना है। हमने तुम्हारे साथ जाने का विचार स्थिर कर लिया है। तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि ‘जब तुम ही ब्राह्मण की आज्ञा के पालनरूपी धर्म की ओर से निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्ग पर स्थित रह सकेगा

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॥ २ · ४५ · २७ ॥
याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहैः। शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलैः

yācito no nivartasva haṁsaśuklaśiroruhaiḥ।
śirobhirnibhṛtācāra mahīpatanapāṁsulaiḥ ॥

‘सदाचार का पोषण करनेवाले श्रीराम! हमारे सिर के बाल पककर हंस के समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वी पर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करने से इनमें धूल भर गयी है। हम अपने ऐसे मस्तकों को झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घर को लौट चलो (वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। इसीलिये उनका श्रीराम के प्रति प्रणाम करना दोष की बात नहीं है)

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॥ २ · ४५ · २८ ॥
बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां इहागताः। तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने

bahūnāṁ vitatā yajñā dvijānāṁ ya ihāgatāḥ।
teṣāṁ samāptirāyattā tava vatsa nivartane ॥

‘(इतने पर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण बोले—) वत्स! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत-से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया है; अब इनके यज्ञों की समाप्ति तुम्हारे लौटने पर ही निर्भर है

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॥ २ · ४५ · २९ ॥
भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च। याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय

bhaktimantīha bhūtāni jaṅgamājaṅgamāni ca।
yācamāneṣu teṣu tvaṁ bhaktiṁ bhakteṣu darśaya ॥

‘संसार के स्थावर और जङ्गम सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं। वे सब तुमसे लौट चलने को प्रार्थना कर रहे हैं। अपने उन भक्तों पर तुम अपना स्नेह दिखाओ

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॥ २ · ४५ · ३० ॥
अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः। उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः

anugantumaśaktāstvāṁ mūlairuddhataveginaḥ।
unnatā vāyuvegena vikrośantīva pādapāḥ ॥

‘ये वृक्ष अपनी जड़ों के कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसीसे तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायु के वेग से इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं—तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं

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॥ २ · ४५ · ३१ ॥
निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षैकस्थाननिश्चिताः। पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम्

niśceṣṭāhārasaṁcārā vṛkṣaikasthānaniścitāḥ।
pakṣiṇo'pi prayācante sarvabhūtānukampinam ॥

‘जो सब प्रकार की चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगने के लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चितरूप से वृक्ष के एक स्थान पर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलने के लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियों पर कृपा करनेवाले हो’

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॥ २ · ४५ · ३२ ॥
एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने। ददृशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम्

evaṁ vikrośatāṁ teṣāṁ dvijātīnāṁ nivartane।
dadṛśe tamasā tatra vārayantīva rāghavam ॥

इस प्रकार श्रीराम से लौटने के लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणों पर मानो कृपा करने के लिये मार्ग में तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक्-प्रवाह (तिरछी धारा) से श्रीरघुनाथजी को रोकती हुई-सी प्रतीत होती थी

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॥ २ · ४५ · ३३ ॥
ततः सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम्। पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गानचारयद् वै तमसाविदूरे

tataḥ sumantro'pi rathād vimucya tān hayān samparivartya śīghram।
pītodakāṁstoyapariplutāṅgānacārayad vai tamasāvidūre ॥

वहाँ पहुँचने पर सुमन्त्र ने भी थके हुए घोड़ों को शीघ्र ही रथ से खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसा के निकट ही चरने के लिये छोड़ दिया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४५ ॥