वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ४२ · ३५ श्लोकाःSarga 42 · 35 ślokas

राजा दशरथका पृथ्वीपर गिरना, श्रीरामके लिये विलाप करना, कैकेयीको अपने पास आनेसे मना करना और उसे त्याग देना, कौसल्या और सेवकोंकी सहायतासे उनका कौसल्याके भवनमें आना और वहाँ भी श्रीरामके लिये दुःखका ही अनुभव करना

कैकेयी-त्याग

“कैकेयी-त्याग”
॥ २ · ४२ · ५–६ ॥

भूमौ निषण्णो जीर्णो राजा दशरथः पुत्रविरहशोकार्तः, विमुखः पाणिमुद्यम्य कैकेय्याः स्पर्शं निवारयन् 'मा स्प्राक्षीः' इति निषेधति; नीलवसना सुमध्यमा कैकेयी कठिना निश्चला तिष्ठति, सेवकास्तु ग्लानं नृपमुत्थापयन्ति।

स्वर्णमुकुटधारी वृद्ध राजा दशरथ पुत्र-वियोगके शोकसे टूटकर संगमरमरके फर्शपर बैठ गये हैं; मुख फेरकर उन्होंने एक हाथ ऊँचा उठाकर पास आती कैकेयीको रोक दिया है—मानो कह रहे हों 'मुझे मत छू, तुझे देखना भी नहीं चाहता।' नीली-सुनहरी साड़ीमें सजी सुन्दरी कैकेयी कठोर और निर्लज्ज भावसे ठिठकी खड़ी है, जबकि पगड़ीधारी सेवक झुककर मूर्च्छित-से राजाको सँभाल रहे हैं; पीछे रानियाँ शोकमग्न होकर यह दृश्य देख रही हैं।

Broken by grief for his exiled son, the aged, crowned King Dasharath has sunk to the marble floor; turning his face away, he flings up a forbidding hand to check Kaikeyi as she approaches — 'Do not touch me; I do not even wish to see you.' In her blue-and-gold silks the beautiful queen stands halted, hard and unrepentant, while turbaned attendants stoop to raise the failing king and grieving women look on from the shadows.

॥ २ · ४२ · १ ॥
यावत्‌ तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत। नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत्‌ संजहारात्मचक्षुषी

yāvat‌ tu niryatastasya rajorūpamadṛśyata।
naivekṣvākuvarastāvat‌ saṁjahārātmacakṣuṣī ॥

वन की ओर जाते हुए श्रीराम के रथ की धूल जबतक दिखायी देती रही, तबतक इक्ष्वाकुवंश के स्वामी राजा दशरथ ने उधर से अपनी आँखें नहीं हटायीं

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॥ २ · ४२ · २ ॥
यावद्‌ राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम्‌। तावद्‌ व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने

yāvad‌ rājā priyaṁ putraṁ paśyatyatyantadhārmikam‌।
tāvad‌ vyavardhatevāsya dharaṇyāṁ putradarśane ॥

वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्र को जबतक देखते रहे, तबतक पुत्र को देखने के लिये उनका शरीर मानो पृथ्वी पर बढ़ रहा था—वे ऊँचे उठ-उठकर उनकी ओर निहार रहे थे

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॥ २ · ४२ · ३ ॥
पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिपः। तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले

na paśyati rajo'pyasya yadā rāmasya bhūmipaḥ।
tadārtaśca niṣaṇṇaśca papāta dharaṇītale ॥

जब राजा को श्रीराम के रथ की धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषादग्रस्त हो पृथ्वी पर गिर पड़े

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॥ २ · ४२ · ४ ॥
तस्य दक्षिणमन्वागात्‌ कौसल्या बाहुमङ्गना। परं चास्यान्वगात्‌ पार्श्वं कैकेयी सा सुमध्यमा

tasya dakṣiṇamanvāgāt‌ kausalyā bāhumaṅganā।
paraṁ cāsyānvagāt‌ pārśvaṁ kaikeyī sā sumadhyamā ॥

उस समय उन्हें सहारा देने के लिये उनकी धर्मपत्नी कौसल्या देवी दाहिनी बाँह के पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभाग में जा पहुँचीं

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॥ २ · ४२ · ५ ॥
तां नयेन सम्पन्नो धर्मेण विनयेन च। उवाच राजा कैकेयीं समीक्ष्य व्यथितेन्द्रियः

tāṁ nayena ca sampanno dharmeṇa vinayena ca।
uvāca rājā kaikeyīṁ samīkṣya vyathitendriyaḥ ॥

कैकेयी को देखते ही नय, विनय और धर्म से सम्पन्न राजा दशरथ की समस्त इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं; वे बोल उठे—

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॥ २ · ४२ · ६ ॥
कैकेयि मामकाङ्गानि मा स्प्राक्षीः पापनिश्चये। नहि त्वां द्रष्टुमिच्छामि भार्यां बान्धवीं

kaikeyi māmakāṅgāni mā sprākṣīḥ pāpaniścaye।
nahi tvāṁ draṣṭumicchāmi na bhāryāṁ na ca bāndhavīṁ ॥

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली कैकेयि! तू मेरे अङ्ग का स्पर्श न कर। मैं तुझे देखना नहीं चाहता। तू न तो मेरी भार्या है और न बान्धवी

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॥ २ · ४२ · ७ ॥
ये त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां ते मम। केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मा त्यजाम्यहम्‌

ye ca tvāmanujīvanti nāhaṁ teṣāṁ na te mama।
kevalārthaparāṁ hi tvāṁ tyaktadharmā tyajāmyaham‌ ॥

‘जो तेरा आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं। तूने केवल धन में आसक्त होकर धर्म का त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ

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॥ २ · ४२ · ८ ॥
अगृह्णां यच्च ते पाणिमग्निं पर्यणयं यत्‌। अनुजानामि तत्‌ सर्वमस्मिंल्लोके परत्र

agṛhṇāṁ yacca te pāṇimagniṁ paryaṇayaṁ ca yat‌।
anujānāmi tat‌ sarvamasmiṁlloke paratra ca ॥

‘मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया है और तुझे साथ लेकर अग्नि की परिक्रमा की है, तेरे साथ का वह सारा सम्बन्ध इस लोक और परलोक के लिये भी त्याग देता हूँ

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॥ २ · ४२ · ९ ॥
भरतश्चेत्‌ प्रतीतः स्याद्‌ राज्यं प्राप्यैतदव्ययम्‌। यन्मे दद्यात्‌ पित्रर्थं मा मां तद्दत्तमागमत्‌

bharataścet‌ pratītaḥ syād‌ rājyaṁ prāpyaitadavyayam‌।
yanme sa dadyāt‌ pitrarthaṁ mā māṁ taddattamāgamat‌ ॥

‘तेरा पुत्र भरत भी यदि इस विघ्न-बाधा से रहित राज्य को पाकर प्रसन्न हो तो वह मेरे लिये श्राद्ध में जो कुछ पिण्ड या जल आदि दान करे, वह मुझे प्राप्त न हो’

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॥ २ · ४२ · १० ॥
अथ रेणुसमुद्ध्वस्तं समुत्थाप्य नराधिपम्‌। न्यवर्तत तदा देवी कौसल्या शोककर्शिता

atha reṇusamuddhvastaṁ samutthāpya narādhipam‌।
nyavartata tadā devī kausalyā śokakarśitā ॥

तदनन्तर शोक से कातर हुई कौसल्या देवी उस समय धरती पर लोटने के कारण धूल से व्याप्त हुए महाराज को उठाकर उनके साथ राजभवन की ओर लौटीं

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॥ २ · ४२ · ११ ॥
हत्वेव ब्राह्मणं कामात्‌ स्पृष्ट्वाग्निमिव पाणिना। अन्वतप्यत धर्मात्मा पुत्रं संचिन्त्य राघवम्‌

hatveva brāhmaṇaṁ kāmāt‌ spṛṣṭvāgnimiva pāṇinā।
anvatapyata dharmātmā putraṁ saṁcintya rāghavam‌ ॥

जैसे कोई जान-बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मण की हत्या कर डाले अथवा हाथ से प्रज्वलित अग्नि का स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदान के कारण वन में गये हुए श्रीराम का चिन्तन करके अनुतप्त हो रहे थे

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॥ २ · ४२ · १२ ॥
निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु। राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा

nivṛtyaiva nivṛtyaiva sīdato rathavartmasu।
rājño nātibabhau rūpaṁ grastasyāṁśumato yathā ॥

राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथ के मार्गों पर देखने का कष्ट उठाते थे। उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्य की भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था

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॥ २ · ४२ · १३ ॥
विललाप दुःखार्तः प्रियं पुत्रमनुस्मरन्‌। नगरान्तमनुप्राप्तं बुद्ध्वा पुत्रमथाब्रवीत्‌

vilalāpa sa duḥkhārtaḥ priyaṁ putramanusmaran‌।
nagarāntamanuprāptaṁ buddhvā putramathābravīt‌ ॥

वे अपने प्रिय पुत्र का बारंबार स्मरण करके दुःख से आतुर हो विलाप करने लगे। वे बेटे को नगर की सीमा पर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे—

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॥ २ · ४२ · १४ ॥
वाहनानां मुख्यानां वहतां तं ममात्मजम्‌। पदानि पथि दृश्यन्ते महात्मा दृश्यते

vāhanānāṁ ca mukhyānāṁ vahatāṁ taṁ mamātmajam‌।
padāni pathi dṛśyante sa mahātmā na dṛśyate ॥

‘हाय! मेरे पुत्र को वन की ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाहनों (घोड़ा) के पदचिह्न तो मार्ग में दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीराम का दर्शन नहीं हो रहा है

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॥ २ · ४२ · १५ ॥
यः सुखेनोपधानेषु शेते चन्दनरूषितः। वीज्यमानो महार्हाभिः स्त्रीभिर्मम सुतोत्तमः

yaḥ sukhenopadhāneṣu śete candanarūṣitaḥ।
vījyamāno mahārhābhiḥ strībhirmama sutottamaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ४२ · १६ ॥
नूनं क्वचिदेवाद्य वृक्षमूलमुपाश्रितः। काष्ठं वा यदि वाश्मानमुपधाय शयिष्यते

sa nūnaṁ kvacidevādya vṛkṣamūlamupāśritaḥ।
kāṣṭhaṁ vā yadi vāśmānamupadhāya śayiṣyate ॥

॥ १५–१६ ॥

‘जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दन से चर्चित हो तकियों का सहारा लेकर उत्तम शय्याओं पर सुख से सोते थे और उत्तम अलंकारों से विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्ष की जड़ का आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थर को सिर के नीचे रखकर भूमि पर ही शयन करेंगे

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॥ २ · ४२ · १७ ॥
उत्थास्यति मेदिन्याः कृपणः पांसुगुण्ठितः। विनिःश्वसन्‌ प्रस्रवणात्‌ करेणूनामिवर्षभः

utthāsyati ca medinyāḥ kṛpaṇaḥ pāṁsuguṇṭhitaḥ।
viniḥśvasan‌ prasravaṇāt‌ kareṇūnāmivarṣabhaḥ ॥

‘फिर अङ्गों में धूल लपेटे दीन की भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन-भूमि से उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरने के पास से गजराज उठता है

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॥ २ · ४२ · १८ ॥
द्रक्ष्यन्ति नूनं पुरुषा दीर्घबाहुं वनेचराः। राममुत्थाय गच्छन्तं लोकनाथमनाथवत्‌

drakṣyanti nūnaṁ puruṣā dīrghabāhuṁ vanecarāḥ।
rāmamutthāya gacchantaṁ lokanāthamanāthavat‌ ॥

‘निश्चय ही वन में रहनेवाले मनुष्य लोकनाथ महाबाहु श्रीराम को वहाँ से अनाथ की भाँति उठकर जाते हुए देखेंगे

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॥ २ · ४२ · १९ ॥
सा नूनं जनकस्येष्टा सुता सुखसदोचिता। कण्टकाक्रमणक्लान्ता वनमद्य गमिष्यति

sā nūnaṁ janakasyeṣṭā sutā sukhasadocitā।
kaṇṭakākramaṇaklāntā vanamadya gamiṣyati ॥

‘जो सदा सुख भोगने के ही योग्य है, वह जनक को प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटों पर पैर पड़ने से व्यथा का अनुभव करती हुई वन को जायगी

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॥ २ · ४२ · २० ॥
अनभिज्ञा वनानां सा नूनं भयमुपैष्यति। श्वपदानर्दितं श्रुत्वा गम्भीरं रोमहर्षणम्‌

anabhijñā vanānāṁ sā nūnaṁ bhayamupaiṣyati।
śvapadānarditaṁ śrutvā gambhīraṁ romaharṣaṇam‌ ॥

‘वह वन के कष्टों से अनभिज्ञ है। वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं का गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जन-तर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायगी

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॥ २ · ४२ · २१ ॥
सकामा भव कैकेयि विधवा राज्यमावस। नहि तं पुरुषव्याघ्रं विना जीवितुमुत्सहे

sakāmā bhava kaikeyi vidhavā rājyamāvasa।
nahi taṁ puruṣavyāghraṁ vinā jīvitumutsahe ॥

‘अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग। मैं पुरुषसिंह श्रीराम के बिना जीवित नहीं रह सकता’

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॥ २ · ४२ · २२ ॥
इत्येवं विलपन्‌ राजा जनौघेनाभिसंवृतः। अपस्नात इवारिष्टं प्रविवेश गृहोत्तमम्‌

ityevaṁ vilapan‌ rājā janaughenābhisaṁvṛtaḥ।
apasnāta ivāriṣṭaṁ praviveśa gṛhottamam‌ ॥

इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथ ने मरघट से नहाकर आये हुए पुरुष की भाँति मनुष्यों की भारी भीड़ से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवन में प्रवेश किया

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॥ २ · ४२ · २३ ॥
शून्यचत्वरवेश्मान्तां संवृतापणवेदिकाम्‌। क्लान्तदुर्बलदुःखार्तां नात्याकीर्णमहापथाम्‌

śūnyacatvaraveśmāntāṁ saṁvṛtāpaṇavedikām‌।
klāntadurbaladuḥkhārtāṁ nātyākīrṇamahāpathām‌ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ४२ · २४ ॥
तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन्‌। विलपन्‌ प्राविशद्‌ राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम्‌

tāmavekṣya purīṁ sarvāṁ rāmamevānucintayan‌।
vilapan‌ prāviśad‌ rājā gṛhaṁ sūrya ivāmbudam‌ ॥

॥ २३–२४ ॥

उन्होंने देखा, अयोध्यापुरी के प्रत्येक घर का बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। (क्योंकि उन घरों के सब लोग श्रीराम के पीछे चले गये थे।) बाजार-हाट बंद है। जो लोग नगर में हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दुःख से आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कों पर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगर की यह अवस्था देखकर श्रीराम के लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महल के भीतर गये, जैसे सूर्य मेघों की घटा में छिप जाते हैं

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॥ २ · ४२ · २५ ॥
महाहृदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम्‌। रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन

mahāhṛdamivākṣobhyaṁ suparṇena hṛtoragam‌।
rāmeṇa rahitaṁ veśma vaidehyā lakṣmaṇena ca ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीता से रहित वह राजभवन उस महान्‌ अक्षोभ्य जलाशय के समान जान पड़ता था, जिसके भीतर के नाग को गरुड़ उठा ले गये हों

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॥ २ · ४२ · २६ ॥
अथ गद्गदशब्दस्तु विलपन्‌ वसुधाधिपः। उवाच मृदु मन्दार्थं वचनं दीनमस्वरम्‌

atha gadgadaśabdastu vilapan‌ vasudhādhipaḥ।
uvāca mṛdu mandārthaṁ vacanaṁ dīnamasvaram‌ ॥

उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथ ने गद्गद वाणी में द्वारपालों से यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वर से रहित बात कही—

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॥ २ · ४२ · २७ ॥
कौसल्याया गृहं शीघ्रं राममातुर्नयन्तु माम्‌। नह्यन्यत्र ममाश्वासो हृदयस्य भविष्यति

kausalyāyā gṛhaṁ śīghraṁ rāmamāturnayantu mām‌।
nahyanyatra mamāśvāso hṛdayasya bhaviṣyati ॥

‘मुझे शीघ्र ही श्रीराम-माता कौसल्या के घर में पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदय को और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती’

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॥ २ · ४२ · २८ ॥
इति ब्रुवन्तं राजानमनयन्‌ द्वारदर्शिनः। कौसल्याया गृहं तत्र न्यवेस्यत विनीतवत्‌

iti bruvantaṁ rājānamanayan‌ dvāradarśinaḥ।
kausalyāyā gṛhaṁ tatra nyavesyata vinītavat‌ ॥

ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथ को द्वारपालों ने बड़ी विनय के साथ रानी कौसल्या के भवन में पहुँचाया और पलंग पर सुला दिया

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॥ २ · ४२ · २९ ॥
ततस्तत्र प्रविष्टस्य कौसल्याया निवेशनम्‌। अधिरुह्यापि शयनं बभूव लुलितं मनः

tatastatra praviṣṭasya kausalyāyā niveśanam‌।
adhiruhyāpi śayanaṁ babhūva lulitaṁ manaḥ ॥

वहाँ कौसल्या के भवन में प्रवेश करके पलंग पर आरूढ़ हो जाने पर भी राजा दशरथ का मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा

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॥ २ · ४२ · ३० ॥
पुत्रद्वयविहीनं स्नुषया विवर्जितम्‌। अपश्यद्‌ भवनं राजा नष्टचन्द्रमिवाम्बरम्‌

putradvayavihīnaṁ ca snuṣayā ca vivarjitam‌।
apaśyad‌ bhavanaṁ rājā naṣṭacandramivāmbaram‌ ॥

दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीता से रहित वह भवन राजा को चन्द्रहीन आकाश की भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा

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॥ २ · ४२ · ३१ ॥
तच्च दृष्ट्वा महाराजो भुजमुद्यम्य वीर्यवान्‌। उच्चैःस्वरेण प्राक्रोशद्धा राम विजहासि नौ

tacca dṛṣṭvā mahārājo bhujamudyamya vīryavān‌।
uccaiḥsvareṇa prākrośaddhā rāma vijahāsi nau ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ४२ · ३२ ॥
सुखिता बत तं कालं जीविष्यन्ति नरोत्तमाः। परिष्वजन्तो ये रामं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्‌

sukhitā bata taṁ kālaṁ jīviṣyanti narottamāḥ।
pariṣvajanto ye rāmaṁ drakṣyanti punarāgatam‌ ॥

॥ ३१–३२ ॥

उसे देखकर पराक्रमी महाराज ने एक बाँह ऊपर उठाकर उच्चस्वर से विलाप करते हुए कहा—‘हा राम! तुम हम दोनों माता-पिता को त्याग दे रहे हो। जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षों की अवधितक जीवित रहेंगे और अयोध्या में पुनः लौटे हुए श्रीराम को हृदय से लगाकर देखेंगे, वे ही वास्तव में सुखी होंगे’

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॥ २ · ४२ · ३३ ॥
अथ रात्र्यां प्रपन्नायां कालरात्र्यामिवात्मनः। अर्धरात्रे दशरथः कौसल्यामिदमब्रवीत्‌

atha rātryāṁ prapannāyāṁ kālarātryāmivātmanaḥ।
ardharātre daśarathaḥ kausalyāmidamabravīt‌ ॥

तदनन्तर अपनी कालरात्रि के समान वह रात्रि आने पर राजा दशरथ ने आधी रात होने पर कौसल्या से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ४२ · ३४ ॥
त्वां पश्यामि कौसल्ये साधु मां पाणिना स्पृश। रामं मेऽनुगता दृष्टिरद्यापि निवर्तते

na tvāṁ paśyāmi kausalye sādhu māṁ pāṇinā spṛśa।
rāmaṁ me'nugatā dṛṣṭiradyāpi na nivartate ॥

‘कौसल्ये! मेरी दृष्टि श्रीराम के ही साथ चली गयी और वह अबतक नहीं लौटी है; अतः मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। एक बार अपने हाथ से मेरे शरीर का स्पर्श तो करो’

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॥ २ · ४२ · ३५ ॥
तं राममेवानुविचिन्तयन्तं समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम्‌। उपोपविश्याधिकमार्तरूपा विनिश्वसन्तं विललाप कृच्छ्रम्‌

taṁ rāmamevānuvicintayantaṁ
samīkṣya devī śayane narendram‌।
upopaviśyādhikamārtarūpā
viniśvasantaṁ vilalāpa kṛcchram‌ ॥

शय्या पर पड़े हुए महाराज दशरथ को श्रीराम का ही चिन्तन करते और लंबी साँस खींचते देख देवी कौसल्या अत्यन्त व्यथित हो उनके पास आ बैठीं और बड़े कष्ट से विलाप करने लगीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥