वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ४१ · २१ श्लोकाःSarga 41 · 21 ślokas

श्रीरामके वनगमनसे रनवासकी स्त्रियोंका विलाप तथा नगरनिवासियोंकी शोकाकुल अवस्था

अन्तःपुर-विलाप

“अन्तःपुर-विलाप”
॥ २ · ४१ · १–७ ॥

रामे वनं प्रव्रजिते शून्येऽन्तःपुरे महारानी कौसल्या सुमित्रा च सान्तःपुरनार्यो महता आर्तनादेन विलपन्ति; काश्चिद् बाहू उद्यम्य क्रन्दन्ति, काश्चित् परस्परमालिङ्ग्य रुदन्ति, वामतश्च रिक्तं काञ्चनासनं तूष्णीं तिष्ठति।

श्रीराम के वनगमन से सूने पड़े रनवास के भव्य कक्ष में महारानी कौसल्या — मरून-स्वर्ण साड़ी, माँग में सिंदूर, गालों पर ढुलकते अश्रु — शोकमग्न बैठी हैं; उनके कंधे से टिककर सुनहरे आँचलवाली एक तरुणी उनकी बाँह थामे सिसक रही है। पीछे रानी सुमित्रा एक विलखती स्त्री को सँभाल रही हैं, और सारा अन्तःपुर हाहाकार में डूबा है — कोई बाँहें उठाए ऊँचे स्वर से क्रन्दन करती, कोई एक-दूसरे से लिपटकर रोती; बायीं ओर सूना स्वर्ण-सिंहासन इस उजड़े वैभव का मूक साक्षी खड़ा है।

In the great hall of the royal women's quarters, emptied of its prince, Queen Kausalya sits in grief-dulled maroon and gold, sindoor at her parting and tears sliding down her cheeks; a young woman in a golden veil sinks against her shoulder, clutching her arm and sobbing. Behind them Queen Sumitra steadies another weeping woman, while the whole inner palace breaks into open lament — one with arms flung up in a wail, others clinging to one another — and on the left a vacant gilded seat stands as the mute witness of an abandoned splendour.

॥ २ · ४१ · १ ॥
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ। आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे महान्

tasmiṁstu puruṣavyāghre niṣkrāmati kṛtāñjalau।
ārtaśabdo hi saṁjajñe strīṇāmantaḥpure mahān ॥

पुरुषसिंह श्रीराम ने माताओंसहित पिता के लिये दूर से ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्था में जब वे रथद्वारा नगर से बाहर निकलने लगे, उस समय रनवास की रानियाँ में बड़ा हाहाकार मच गया

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॥ २ · ४१ · २ ॥
अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः। यो गतिः शरणं चासीत् नाथः क्व नु गच्छति

anāthasya janasyāsya durbalasya tapasvinaḥ।
yo gatiḥ śaraṇaṁ cāsīt sa nāthaḥ kva nu gacchati ॥

वे रोती हुई कहने लगीं—‘हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनों की गति (सब सुखों की प्राप्ति करानेवाले) और शरण (समस्त आपत्तियों से रक्षा करनेवाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करनेवाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं?

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॥ २ · ४१ · ३ ॥
क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्। क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति

na krudhyatyabhiśasto'pi krodhanīyāni varjayan।
kruddhān prasādayan sarvān samaduḥkhaḥ kva gacchati ॥

‘जो किसीके द्वारा झूठा कलंक लगाये जाने पर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलानेवाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगों को मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरों के दुःख में समवेदना प्रकट करनेवाले राम कहाँ जा रहे हैं?

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॥ २ · ४१ · ४ ॥
कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते। तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति

kausalyāyāṁ mahātejā yathā mātari vartate।
tathā yo vartate'smāsu mahātmā kva nu gacchati ॥

‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्या के साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं?

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॥ २ · ४१ · ५ ॥
कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा संचोदितो वनम्। परित्राता जनस्यास्य जगतः क्व नु गच्छति

kaikeyyā kliśyamānena rājñā saṁcodito vanam।
paritrātā janasyāsya jagataḥ kva nu gacchati ॥

‘केकेयी के द्वारा क्लेश में डाले गये महाराज के वन जाने के लिये कहने पर हमलोगों की अथवा समस्त जगत् की रक्षा करनेवाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं?

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॥ २ · ४१ · ६ ॥
अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य संक्षयम्। धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति

aho niścetano rājā jīvalokasya saṁkṣayam।
dharmyaṁ satyavrataṁ rāmaṁ vanavāse pravatsyati ॥

‘अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीव-जगत् के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीराम को वनवास के लिये देशनिकाला दे रहे हैं’

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॥ २ · ४१ · ७ ॥
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः। रुरूदुश्चैव दुःखार्ताः सस्वरं विचुक्रुशुः

iti sarvā mahiṣyastā vivatsā iva dhenavaḥ।
rurūduścaiva duḥkhārtāḥ sasvaraṁ ca vicukruśuḥ ॥

इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ों से बिछुड़ी हुई गौओं की तरह दुःख से आर्त होकर रोने और उच्चस्वर से क्रन्दन करने लगीं

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॥ २ · ४१ · ८ ॥
तमन्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः। पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा चासीत् सुदुःखितः

sa tamantaḥpure ghoramārtaśabdaṁ mahīpatiḥ।
putraśokābhisaṁtaptaḥ śrutvā cāsīt suduḥkhitaḥ ॥

अन्तःपुर में वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोक से संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुःखी हो गये

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॥ २ · ४१ · ९ ॥
नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिनः। अकुर्वन् प्रजाः कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत

nāgnihotrāṇyahūyanta nāpacan gṛhamedhinaḥ।
akurvan na prajāḥ kāryaṁ sūryaścāntaradhīyata ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ४१ · १० ॥
व्यसृजन् कवलान् नागा गावो वत्सान् पाययन्। पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत

vyasṛjan kavalān nāgā gāvo vatsān na pāyayan।
putraṁ prathamajaṁ labdhvā jananī nābhyanandata ॥

॥ ९–१० ॥

उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थों के घर भोजन नहीं बना, प्रजाओं ने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये, हाथियों ने मुँह में लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओं ने बछड़ों को दूध नहीं पिलाया और पहले-पहल पुत्र को जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई

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॥ २ · ४१ · ११ ॥
त्रिशङ्कुर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि। दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः

triśaṅkurlohitāṅgaśca bṛhaspatibudhāvapi।
dāruṇāḥ somamabhyetya grahāḥ sarve vyavasthitāḥ ॥

त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रात में वक्रगति से चन्द्रमा के पास पहुँचकर दारुण (क्रूरकान्तियुक्त) होकर स्थित हो गये

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॥ २ · ४१ · १२ ॥
नक्षत्राणि गतार्चीषि ग्रहाश्च गततेजसः। विशाखाश्च सधूमाश्च नभसि प्रचकाशिरे

nakṣatrāṇi gatārcīṣi grahāśca gatatejasaḥ।
viśākhāśca sadhūmāśca nabhasi pracakāśire ॥

नक्षत्रों की कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब-के-सब आकाश में विपरीत मार्ग पर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे

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॥ २ · ४१ · १३ ॥
कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थितः। रामे वनं प्रब्रजिते नगरं प्रचचाल तत्

kālikānilavegena mahodadhirivotthitaḥ।
rāme vanaṁ prabrajite nagaraṁ pracacāla tat ॥

आकाश में छायी हुई मेघमाला वायु के वेग से उमड़े हुए समुद्र के समान प्रतीत होती थी। श्रीराम के वन को जाते समय वह सारा नगर जोर-जोर से हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया)

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॥ २ · ४१ · १४ ॥
दिशः पर्याकुलाः सर्वास्तिमिरेणेव संवृताः। ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे किंचन

diśaḥ paryākulāḥ sarvāstimireṇeva saṁvṛtāḥ।
na graho nāpi nakṣatraṁ pracakāśe na kiṁcana ॥

समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार-सा छा गया। न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र

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॥ २ · ४१ · १५ ॥
अकस्मान्नागरः सर्वो जनो दैन्यमुपागमत्। आहारे वा विहारे वा कश्चिदकरोन्मनः

akasmānnāgaraḥ sarvo jano dainyamupāgamat।
āhāre vā vihāre vā na kaścidakaronmanaḥ ॥

सहसा सारे नागरिक दीन-दशा को प्राप्त हो गये। किसीने भी आहार या विहार में मन नहीं लगाया

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॥ २ · ४१ · १६ ॥
शोकपर्यायसंतप्तः सततं दीर्घमुच्छ्वसन्। अयोध्यायां जनः सर्वश्चुक्रोश जगतीपतिम्

śokaparyāyasaṁtaptaḥ satataṁ dīrghamucchvasan।
ayodhyāyāṁ janaḥ sarvaścukrośa jagatīpatim ॥

अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परा से संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथ को कोसने लगे

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॥ २ · ४१ · १७ ॥
बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः। हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्वः शोकपरायणः

bāṣpaparyākulamukho rājamārgagato janaḥ।
na hṛṣṭo labhyate kaścit sarvaḥ śokaparāyaṇaḥ ॥

सड़क पर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था। सबका मुख आँसुओं से भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे

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॥ २ · ४१ · १८ ॥
वाति पवनः शीतो शशी सौम्यदर्शनः। सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत्

na vāti pavanaḥ śīto na śaśī saumyadarśanaḥ।
na sūryastapate lokaṁ sarvaṁ paryākulaṁ jagat ॥

शीतल वायु नहीं चलती थी। चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था। सूर्य भी जगत् को उचित मात्रा में ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था। सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था

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॥ २ · ४१ · १९ ॥
अनर्थिनः सुताः स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा। सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन्

anarthinaḥ sutāḥ strīṇāṁ bhartāro bhrātarastathā।
sarve sarvaṁ parityajya rāmamevānvacintayan ॥

बालक माँ-बाप को भूल गये। पतियों को स्त्रियों की याद नहीं आती थी और भाई भाई का स्मरण नहीं करते थे—सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीराम का ही चिन्तन करने लगे

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॥ २ · ४१ · २० ॥
ये तु रामस्य सुहृदः सर्वे ते मूढचेतसः। शोकभारेण चाक्रान्ताः शयनं नैव भेजिरे

ye tu rāmasya suhṛdaḥ sarve te mūḍhacetasaḥ।
śokabhāreṇa cākrāntāḥ śayanaṁ naiva bhejire ॥

जो श्रीराम के मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। शोक के भार से आक्रान्त होने के कारण वे रात में सोयेतक नहीं

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॥ २ · ४१ · २१ ॥
ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना पुरन्दरेणेव मही सपर्वता। चचाल घोरं भयशोकदीपिता सनागयोधाश्वगणा ननाद

tatastvayodhyā rahitā mahātmanā
purandareṇeva mahī saparvatā।
cacāla ghoraṁ bhayaśokadīpitā
sanāgayodhāśvagaṇā nanāda ca ॥

इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीराम से रहित होकर भय और शोक से प्रज्वलित-सी होकर उसी प्रकार घोर हलचल में पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्र से रहित हुई मेरु-पर्वतसहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है। हाथी, घोड़े और सैनिकोंसहित उस नगरी में भयंकर आर्तनाद होने लगा

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४१ ॥