वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ३८ · १७ श्लोकाःSarga 38 · 17 ślokas

राजा दशरथका सीताको वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयीको फटकारना और श्रीरामका उनसे कौसल्यापर कृपादृष्टि रखनेके लिये अनुरोध करना

कौसल्या-कृपा-याचना

“कौसल्या-कृपा-याचना”
॥ २ · ३८ · १४–१५ ॥

राजसभायां वल्कलवसनः श्यामाङ्गो रामो बद्धाञ्जलिर्जानुनी न्यस्य शोकमग्नं वृद्धं पितरं दशरथमभियाचते — मम मातरं कौसल्यां सदा सम्मानयेति; समीपे सालङ्कारा सीता, पृष्ठे विषण्णा जनाः।

स्वर्णस्तम्भों से सजी राजसभा में वल्कल पहने श्यामवर्ण राजकुमार राम घुटनों के बल बैठे, हाथ जोड़े, शोक से टूटे अपने वृद्ध पिता दशरथ से अन्तिम विनती कर रहे हैं कि उनके वनगमन के बाद माता कौसल्या पर सदा कृपादृष्टि बनाए रखें; सिंहासन पर धँसे राजा सिर झुकाए, नेत्र मूँदे बैठे हैं। पीछे खड़ी लाल-सुनहरी साड़ी में सिन्दूर-सजी कौसल्या का हाथ पुत्र के कंधे पर टिका है, वे संयत रहते हुए भी सजल हैं; बायीं ओर राजसी रेशम और आभूषणों में सजी सीता करुण दृष्टि से देख रही हैं, और पृष्ठभूमि में सभासद-नागरिकों का समूह व्यथित मुख से यह दृश्य निहार रहा है।

In a golden pillared hall, the bark-clad, blue-hued prince Ram kneels with folded hands, a quiver at his back, making his last tender plea to his grief-broken old father, King Dasharath, who slumps on the throne with eyes cast down; Ram begs the king to keep a loving, gracious watch over his mother Kausalya once he is gone. Behind him stands Kausalya in crimson-and-gold silk, vermilion on her brow, her hand resting on her son's shoulder, sorrowful yet composed; to the left the richly adorned Sita looks on, and a throng of dismayed courtiers and citizens witnesses the parting.

॥ २ · ३८ · १ ॥
तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत्। प्रचुक्रोश जनः सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति

tasyāṁ cīraṁ vasānāyāṁ nāthavatyāmanāthavat।
pracukrośa janaḥ sarvo dhik tvāṁ daśarathaṁ tviti ॥

सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथ की भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे—‘राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’

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॥ २ · ३८ · २ ॥
तेन तत्र प्रणादेन दुःखितः महीपतिः। चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मनः

tena tatra praṇādena duḥkhitaḥ sa mahīpatiḥ।
ciccheda jīvite śraddhāṁ dharme yaśasi cātmanaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३८ · ३ ॥
निःश्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत्। कैकेयि कुशचीरेण सीता गन्तुमर्हति

sa niḥśvasyoṣṇamaikṣvākastāṁ bhāryāmidamabravīt।
kaikeyi kuśacīreṇa na sītā gantumarhati ॥

॥ २–३ ॥

वहाँ होनेवाले उस कोलाहल से दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ ने अपने जीवन, धर्म और यश की उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयी से इस प्रकार बोले—‘कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वन में जाने के योग्य नहीं है

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॥ २ · ३८ · ४ ॥
सुकुमारी बाला सततं सुखोचिता। नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम

sukumārī ca bālā ca satataṁ ca sukhocitā।
neyaṁ vanasya yogyeti satyamāha gururmama ॥

‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखों में ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वन में जाने योग्य नहीं है

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॥ २ · ३८ · ५ ॥
इयं हि कस्यापि करोति किंचित् तपस्विनी राजवरस्य पुत्री। या चीरमासाद्य जनस्य मध्ये स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित्

iyaṁ hi kasyāpi karoti kiṁcit
tapasvinī rājavarasya putrī।
yā cīramāsādya janasya madhye
sthitā visaṁjñā śramaṇīva kācit ॥

‘राजाओं में श्रेष्ठ जनक को यह तपस्विनी पुत्री क्या किसीका भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जन-समुदाय के बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकी के समान चीर धारण करके खड़ी है?

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॥ २ · ३८ · ६ ॥
या चीराण्यपास्याज्जनकस्य कन्या नेयं प्रतिज्ञा मम दत्तपूर्वा। यथासुखं गच्छतु राजपुत्री वनं समग्रा सह सर्वरत्नैः

yā cīrāṇyapāsyājjanakasya kanyā
neyaṁ pratijñā mama dattapūrvā।
yathāsukhaṁ gacchatu rājaputrī
vanaṁ samagrā saha sarvaratnaiḥ ॥

‘जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले। ‘यह इस रूप में वन जाय’ ऐसी कोई प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसीको इस तरह का वचन ही दिया है। अतः राजकुमारी सीता सम्पूर्ण स्त्रालंकारों से सम्पन्न हो सब प्रकार के रत्नों के साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वन को जा सकती है

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॥ २ · ३८ · ७ ॥
अजीवनार्हेण मया नृशंसा कृता प्रतिज्ञा नियमेन तावत्। त्वया हि बाल्यात् प्रतिपन्नमेतत् तन्मा दहेद् वेणुमिवात्मपुष्पम्

ajīvanārheṇa mayā nṛśaṁsā
kṛtā pratijñā niyamena tāvat।
tvayā hi bālyāt pratipannametat
tanmā dahed veṇumivātmapuṣpam ॥

‘मैं जीवित रहनेयोग्य नहीं हूँ। मैंने तेरे वचनों में बँधकर एक तो यों ही नियम (शपथ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानी के कारण सीता को इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया। जिस प्रकार बाँस का फूल उसीको सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुई प्रतिज्ञा मुझीको भस्म किये डालती है

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॥ २ · ३८ · ८ ॥
रामेण यदि ते पापे किंचित्कृतमशोभनम्। अपकारः इह ते वैदेह्या दर्शितोऽधमे

rāmeṇa yadi te pāpe kiṁcitkṛtamaśobhanam।
apakāraḥ ka iha te vaidehyā darśito'dhame ॥

‘नीच पापिनि! यदि श्रीराम ने तेरा कोई अपराध किया है तो (उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी) विदेहनन्दिनी सीता ने ऐसा दण्ड पानेयोग्य तेरा कौन-सा अपकार कर डाला है?

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॥ २ · ३८ · ९ ॥
मृगीवोत्फुलनयना मृदुशीला मनस्विनी। अपकारं कमिव ते करोति जनकात्मजा

mṛgīvotphulanayanā mṛduśīlā manasvinī।
apakāraṁ kamiva te karoti janakātmajā ॥

‘जिसके नेत्र हरिणी के नेत्रों के समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन-सा अपराध कर रही है?

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॥ २ · ३८ · १० ॥
ननु पर्याप्तमेव ते पापे रामविवासनम्। किमेभिः कृपणैर्भूयः पातकैरपि ते कृतैः

nanu paryāptameva te pāpe rāmavivāsanam।
kimebhiḥ kṛpaṇairbhūyaḥ pātakairapi te kṛtaiḥ ॥

‘पापिनि! तूने श्रीराम को वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है। अब सीता को भी वन में भेजने और वल्कल पहनाने आदि का अत्यन्त दुःखद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है?

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॥ २ · ३८ · ११ ॥
प्रतिज्ञातं मया तावत् त्वयोक्तं देवि शृण्वता। रामं यदभिषेकाय त्वमिहागतमब्रवीः

pratijñātaṁ mayā tāvat tvayoktaṁ devi śṛṇvatā।
rāmaṁ yadabhiṣekāya tvamihāgatamabravīḥ ॥

‘देवि! श्रीराम जब अभिषेक के लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतने के लिये ही प्रतिज्ञा की थी

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॥ २ · ३८ · १२ ॥
तत्त्वेतत् समतिक्रम्य निरयं गन्तुमिच्छसि। मैथिलीमपि या हि त्वमीक्षसे चीरवासिनीम्

tattvetat samatikramya nirayaṁ gantumicchasi।
maithilīmapi yā hi tvamīkṣase cīravāsinīm ॥

‘उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकी को भी वल्कल-वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरक में ही जाने की इच्छा हो रही है’

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॥ २ · ३८ · १३ ॥
एवं ब्रुवन्तं पितरं रामः सम्प्रस्थितो वनम्। अवाक्शिरसमासीनमिदं वचनमब्रवीत्

evaṁ bruvantaṁ pitaraṁ rāmaḥ samprasthito vanam।
avākśirasamāsīnamidaṁ vacanamabravīt ॥

राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वन की ओर जाते हुए श्रीराम ने पिता से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ३८ · १४ ॥
इयं धार्मिक कौसल्या मम माता यशस्विनी। वृद्धा चाक्षुद्रशीला त्वां देव गर्हते

iyaṁ dhārmika kausalyā mama mātā yaśasvinī।
vṛddhā cākṣudraśīlā ca na ca tvāṁ deva garhate ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३८ · १५ ॥
मया विहीनां वरद प्रपन्नां शोकसागरम्। अदृष्टपूर्वव्यसनां भूयः सम्मन्तुमर्हसि

mayā vihīnāṁ varada prapannāṁ śokasāgaram।
adṛṣṭapūrvavyasanāṁ bhūyaḥ sammantumarhasi ॥

॥ १४–१५ ॥

‘धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है। देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं। इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा। वरदायक नरेश! ये मेरे न रहने से शोक के समुद्र में डूब जायँगी। अतः आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें

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॥ २ · ३८ · १६ ॥
पुत्रशोकं यथा नच्छेत् त्वया पूज्येन पूजिता। मां हि संचिन्तयन्ती सा त्वयि जीवेत् तपस्विनी

putraśokaṁ yathā nacchet tvayā pūjyena pūjitā।
māṁ hi saṁcintayantī sā tvayi jīvet tapasvinī ॥

‘आप पूज्यतम पतिसे सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोक का अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रय में ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये

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॥ २ · ३८ · १७ ॥
इमां महेन्द्रोपम जातगर्धिनीं तथा विधातुं जननीं ममार्हसि। यथा वनस्थे मयि शोककर्शिता जीवितं न्यस्य यमक्षयं व्रजेत्

imāṁ mahendropama jātagardhinīṁ
tathā vidhātuṁ jananīṁ mamārhasi।
yathā vanasthe mayi śokakarśitā
na jīvitaṁ nyasya yamakṣayaṁ vrajet ॥

‘इन्द्र के समान तेजस्वी महाराज! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए बेटे को देखने के लिये उत्सुक रहेंगी। कहीं ऐसा न हो मेरे वन में रहते समय ये शोक से कातर हो अपने प्राणों को त्याग करके यमलोक को चली जायँ। अतः आप मेरी माता को सदा ऐसी ही परिस्थिति में रखें, जिससे उक्त आशङ्का के लिये अवकाश न रह जाय’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३८ ॥