वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ३७ · ३७ श्लोकाःSarga 37 · 37 ślokas

श्रीराम आदिका वल्कल-वस्त्र-धारण, सीताके वल्कल-धारणसे रनिवासकी स्त्रियोंको खेद तथा गुरु वसिष्ठका कैकेयीको फटकारते हुए सीताके वल्कल-धारणका अनौचित्य बताना

वल्कल-निवारण

“वल्कल-निवारण”
॥ २ · ३७ · २१–२२ ॥

अन्तःपुरे वल्कलधरौ श्यामो रामो लक्ष्मणश्च शान्तौ तिष्ठतः; मध्ये कौशेयवसना सीता वल्कलपुञ्जं पाणौ धृत्वा साश्रुनेत्रा विह्वला; समीपे श्वेतवसनो गुरुर्वसिष्ठः सबाष्पः करमुद्यम्य कमण्डलुं च दधत् कैकेयीं गर्हयन् सीताया वल्कलधारणस्यानौचित्यं वदति, नीलाम्बरा कैकेयी कठिना, समन्ताच्चान्तःपुरनार्यो मुखमाच्छाद्य रुदन्ति।

अयोध्याके अन्तःपुरमें वल्कल पहने श्यामवर्ण श्रीराम—धनुष-तरकश लिये—और लक्ष्मण शान्त, अविचल खड़े हैं; बीचमें रेशमी लाल वस्त्र और स्वर्णाभूषणोंसे सजी सुकुमारी सीता खुरदुरे वल्कलका ढेर दोनों हाथोंमें थामे, यह तपस्वी-वेश कैसे बाँधें इसी असमंजसमें अश्रुपूरित नेत्रोंसे ऊपर ताक रही हैं; उनके पास श्वेतवस्त्रधारी वृद्ध गुरु वसिष्ठ एक हाथ उठाकर तथा दूसरेमें कमण्डलु लिये कैकेयीको फटकारते हुए कह रहे हैं कि सीताको वल्कल पहनाना सर्वथा अनुचित है; नीलाम्बरा कैकेयी कठोर खड़ी है और चारों ओर रनिवासकी स्त्रियाँ मुख ढाँपे विलख रही हैं।

In the marble inner court of Ayodhya the bark-clad princes Ram — his skin the divine dusky-blue, bow and quiver in hand — and Lakshman stand calm and unshaken; between them the tender Sita, still robed in royal red silk and gold, clutches a rough bundle of bark cloth and gazes up with brimming eyes, at a loss how such ascetic dress is even wound. Beside her the venerable white-robed guru Vasishth, a water-pot in one hand, raises the other in righteous rebuke of Kaikeyi, declaring it utterly improper that Sita be made to wear bark; the queen stands hard in her blue-and-gold finery while all around the women of the harem weep, hands pressed to their faces.

॥ २ · ३७ · १ ॥
महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा। अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत्

mahāmātravacaḥ śrutvā rāmo daśarathaṁ tadā।
abhyabhāṣata vākyaṁ tu vinayajño vinītavat ॥

प्रधान मन्त्री की पूर्वोक्त बात सुनकर विनय के ज्ञाता श्रीराम ने उस समय राजा दशरथ से विनीत होकर कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २ ॥
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः। किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः

tyaktabhogasya me rājan vane vanyena jīvataḥ।
kiṁ kāryamanuyātreṇa tyaktasaṅgasya sarvataḥ ॥

राजन्! मैं भोगों का परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगल के फल-मूलों से जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओर से आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेना से क्या प्रयोजन है?

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३ ॥
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः। रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम्

yo hi dattvā dvipaśreṣṭhaṁ kakṣyāyāṁ kurute manaḥ।
rajjusnehena kiṁ tasya tyajataḥ kuñjarottamam ॥

‘जो श्रेष्ठ गजराज का दान करके उसके रस्से में मन लगाता है—लोभवश रस्से को रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथी का त्याग करनेवाले पुरुष को उसके रस्से में आसक्ति रखने की क्या आवश्यकता है?

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ४ ॥
तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते। सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे

tathā mama satāṁ śreṣṭha kiṁ dhvajinyā jagatpate।
sarvāṇyevānujānāmi cīrāṇyevānayantu me ॥

‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरत को अर्पित करने की अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो (माता कैकेयी की दासियाँ) चीर (चिथड़े या वल्कल-वस्त्र) ला देँ

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ५ ॥
खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छत। चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम

khanitrapiṭake cobhe samānayata gacchata।
caturdaśa vane vāsaṁ varṣāṇi vasato mama ॥

‘दासियो! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ। चौदह वर्षोंतक वन में रहने के लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं’

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ६ ॥
अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम्। उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा

atha cīrāṇi kaikeyī svayamāhṛtya rāghavam।
uvāca paridhatsveti janaughe nirapatrapā ॥

कैकेयी लाज-संकोच छोड़ चुकी थी। वह स्वयं ही जाकर बहुत-सी चीर ले आयी और जनसमुदाय में श्रीरामचन्द्रजी से बोली, ‘लो, पहन लो’

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ७ ॥
चीरे पुरुषव्याघ्रः कैकेय्याः प्रतिगृह्य ते। सूक्ष्मवस्त्रमवक्षिप्य मुनिवस्त्राण्यवस्त

sa cīre puruṣavyāghraḥ kaikeyyāḥ pratigṛhya te।
sūkṣmavastramavakṣipya munivastrāṇyavasta ha ॥

पुरुषसिंह श्रीराम ने कैकेयी के हाथ से दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियोंके-से वस्त्र धारण कर लिये

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ८ ॥
लक्ष्मणश्चापि तत्रैव विहाय वसने शुभे। तापसाच्छादने चैव जग्राह पितुरग्रतः

lakṣmaṇaścāpi tatraiva vihāya vasane śubhe।
tāpasācchādane caiva jagrāha pituragrataḥ ॥

इसी प्रकार लक्ष्मण ने भी अपने पिता के सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियोंके-से वल्कल-वस्त्र पहन लिये

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ९ ॥
अथात्मपरिधानार्थं सीता कौशेयवासिनी। सम्प्रेक्ष्य चीरं संत्रस्ता पृषती वागुरामिव

athātmaparidhānārthaṁ sītā kauśeyavāsinī।
samprekṣya cīraṁ saṁtrastā pṛṣatī vāgurāmiva ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३७ · १० ॥
सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य सुदुर्मनाः। कैकेय्याः कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा

sā vyapatrapamāṇeva pragṛhya ca sudurmanāḥ।
kaikeyyāḥ kuśacīre te jānakī śubhalakṣaṇā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३७ · ११ ॥
अश्रुसम्पूर्णनेत्रा धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी। गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत्

aśrusampūrṇanetrā ca dharmajñā dharmadarśinī।
gandharvarājapratimaṁ bhartāramidamabravīt ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३७ · १२ ॥
कथं नु चीरं बध्नन्ति मुनयो वनवासिनः। इति ह्यकुशला सीता सा मुमोह मुहुर्मुहुः

kathaṁ nu cīraṁ badhnanti munayo vanavāsinaḥ।
iti hyakuśalā sītā sā mumoha muhurmuhuḥ ॥

॥ ९–१२ ॥

तदनन्तर रेशमी-वस्त्र पहनने और धर्म पर ही दृष्टि रखनेवाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहनने के लिये भी चीरवस्त्र को प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जाल को देखकर भयभीत हो जाती है। वे कैकेयी के हाथ से दो वल्कल-वस्त्र लेकर लज्जित-सी हो गयीं। उनके मन में बड़ा दुःख हुआ और नेत्रों में आँसू भर आये। उस समय उन्होंने गन्धर्वराज के समान तेजस्वी पतिसे इस प्रकार पूछा—‘नाथ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं?’ यह कहकर उसे धारण करने में कुशल न होने के कारण सीता बारम्बार मोहमें पड़ जाती थीं—भूल कर बैठती थीं

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १३ ॥
कृत्वा कण्ठे स्म सा चीरमेकमादाय पाणिना। तस्थौ ह्याकुशला तत्र व्रीडिता जनकात्मजा

kṛtvā kaṇṭhe sma sā cīramekamādāya pāṇinā।
tasthau hyākuśalā tatra vrīḍitā janakātmajā ॥

चीर-धारण में कुशल न होने से जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गले में डाल दूसरा हाथ में लेकर चुपचाप खड़ी रहीं

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १४ ॥
तस्यास्तत् क्षिप्रमागत्य रामो धर्मभृतां वरः। चीरं बबन्ध सीतायाः कौशेयस्योपरि स्वयम्

tasyāstat kṣipramāgatya rāmo dharmabhṛtāṁ varaḥ।
cīraṁ babandha sītāyāḥ kauśeyasyopari svayam ॥

तब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम जल्दी से उनके पास आकर स्वयं अपने हाथों से उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर वल्कल-वस्त्र बाँधने लगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १५ ॥
रामं प्रेक्ष्य तु सीताया बध्नन्तं चीरमुत्तमम्। अन्तःपुरचरा नार्यो मुमुचुर्वारि नेत्रजम्

rāmaṁ prekṣya tu sītāyā badhnantaṁ cīramuttamam।
antaḥpuracarā nāryo mumucurvāri netrajam ॥

सीता को उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीराम को ओर देखकर रनवास की स्त्रियाँ अपने नेत्रों से आँसू बहाने लगीं

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १६ ॥
ऊचुश्च परमायत्ता रामं ज्वलिततेजसम्। वत्स नैवं नियुक्तेयं वनवासे मनस्विनी

ūcuśca paramāyattā rāmaṁ jvalitatejasam।
vatsa naivaṁ niyukteyaṁ vanavāse manasvinī ॥

वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उदीप्त तेजवाले श्रीराम से बोलीं—‘बेटा! मनस्विनी सीता को इस प्रकार वनवास की आज्ञा नहीं दी गयी है

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १७ ॥
पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम्। तावद् दर्शनमस्या नः सफलं भवतु प्रभो

piturvākyānurodhena gatasya vijanaṁ vanam।
tāvad darśanamasyā naḥ saphalaṁ bhavatu prabho ॥

‘प्रभो! तुम पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये जबतक निर्जन वन में जाकर रहोगे, तबतक इसीको देखकर हमारा जीवन सफल होने दो

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १८ ॥
लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक। नेयमर्हति कल्याणि वस्तुं तापसवद् वने

lakṣmaṇena sahāyena vanaṁ gacchasva putraka।
neyamarhati kalyāṇi vastuṁ tāpasavad vane ॥

‘बेटा! तुम लक्ष्मण को अपना साथी बनाकर उनके साथ वन को जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनि की भाँति वन में निवास करने के योग्य नहीं है

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · १९ ॥
कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी। धर्मनित्यः स्वयं स्थातुं हीदानीं त्वमिच्छसि

kuru no yācanāṁ putra sītā tiṣṭhatu bhāminī।
dharmanityaḥ svayaṁ sthātuṁ na hīdānīṁ tvamicchasi ॥

‘पुत्र! तुम हमारी यह याचना सफल करो। भामिनी सीता यहीं रहे। तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अतः स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो (परंतु सीता को तो रहने दो)’

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २० ॥
तासामेवंविधा वाचः शृण्वन् दशरथात्मजः। बबन्धैव तथा चीरं सीतया तुल्यशीलया

tāsāmevaṁvidhā vācaḥ śṛṇvan daśarathātmajaḥ।
babandhaiva tathā cīraṁ sītayā tulyaśīlayā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३७ · २१ ॥
चीरे गृहीते तु तया सबाष्पो नृपतेर्गुरुः। निवार्य सीतां कैकेयीं वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्

cīre gṛhīte tu tayā sabāṣpo nṛpaterguruḥ।
nivārya sītāṁ kaikeyīṁ vasiṣṭho vākyamabravīt ॥

॥ २०–२१ ॥

माताओं की ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथनन्दन श्रीराम ने सीता को वल्कल-वस्त्र पहना ही दिया। पति के समान शीलस्वभाववाली सीता के वल्कल धारण कर लेने पर राजा के गुरु वसिष्ठजी के नेत्रों में आँसू भर आया। उन्होंने सीता को रोककर कैकेयी से कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २२ ॥
अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि। वञ्चयित्वा तु राजानं प्रमाणेऽवतिष्ठसि

atipravṛtte durmedhe kaikeyi kulapāṁsani।
vañcayitvā tu rājānaṁ na pramāṇe'vatiṣṭhasi ॥

‘मर्यादा का उल्लङ्घन करके अधर्म की ओर पैर बढ़ानेवाली दुर्बुद्धि कैकेयी! तू केकयराज के कुल की जीती-जागती कलङ्क है। अरी! राजा को धोखा देकर अब तू सीमा के भीतर नहीं रहना चाहती है?

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २३ ॥
गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते। अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम्

na gantavyaṁ vanaṁ devyā sītayā śīlavarjite।
anuṣṭhāsyati rāmasya sītā prakṛtamāsanam ॥

‘शील का परित्याग करनेवाली दुष्टे! देवी सीता वन में नहीं जायँगी। राम के लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासन पर ये ही बैठेंगी

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २४ ॥
आत्मा हि दाराः सर्वेषां दारसंग्रहवर्तिनाम्। आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम्

ātmā hi dārāḥ sarveṣāṁ dārasaṁgrahavartinām।
ātmeyamiti rāmasya pālayiṣyati medinīm ॥

‘सम्पूर्ण गृहस्थों की पत्नियाँ उनका आधा अङ्ग हैं। इस तरह सीता देवी भी श्रीराम की आत्मा हैं; अतः उनकी जगह ये ही इस राज्य का पालन करेंगी

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २५ ॥
अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण संगता। वयमत्रानुयास्यामः पुरं चेदं गमिष्यति

atha yāsyati vaidehī vanaṁ rāmeṇa saṁgatā।
vayamatrānuyāsyāmaḥ puraṁ cedaṁ gamiṣyati ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३७ · २६ ॥
अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघवः। सहोपजीव्यं राष्ट्रं पुरं सपरिच्छदम्

antapālāśca yāsyanti sadāro yatra rāghavaḥ।
sahopajīvyaṁ rāṣṭraṁ ca puraṁ ca saparicchadam ॥

॥ २५–२६ ॥

‘यदि विदेहनन्दिनी सीता श्रीराम के साथ वन में जायँगी तो हमलोग भी इनके साथ चले जायँगे। यह सारा नगर भी चला जायगा और अन्तःपुर के रक्षक भी चले जायँगे। अपनी पत्नी के साथ श्रीरामचन्द्रजी जहाँ निवास करेंगे, वहीं इस राज्य और नगर के लोग भी धन-दौलत और आवश्यक सामान लेकर चले जायँगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २७ ॥
भरतश्च सशत्रुघ्नश्चीरवासा वनेचरः। वने वसन्तं काकुत्स्थमनुवत्स्यति पूर्वजम्

bharataśca saśatrughnaścīravāsā vanecaraḥ।
vane vasantaṁ kākutsthamanuvatsyati pūrvajam ॥

‘भरत और शत्रुघ्न भी चीरवस्त्र धारण करके वन में रहेंगे और वहाँ निवास करनेवाले अपने बड़े भाई श्रीराम की सेवा करेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २८ ॥
ततः शून्यां गतजनां वसुधां पादपैः सह। त्वमेका शाधि दुर्वृत्ता प्रजानामहिते स्थिता

tataḥ śūnyāṁ gatajanāṁ vasudhāṁ pādapaiḥ saha।
tvamekā śādhi durvṛttā prajānāmahite sthitā ॥

‘फिर तू वृक्षों के साथ अकेली रहकर इस निर्जन एवं सूनी पृथ्वी का राज्य करना। तू बड़ी दुराचारिणी है और प्रजा का अहित करने में लगी हुई है

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · २९ ॥
हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो भूपतिः। तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति

na hi tad bhavitā rāṣṭraṁ yatra rāmo na bhūpatiḥ।
tad vanaṁ bhavitā rāṣṭraṁ yatra rāmo nivatsyati ॥

‘याद रख, श्रीराम जहाँ के राजा न होंगे, वह राज्य राज्य नहीं रह जायगा—जंगल हो जायगा तथा श्रीराम जहाँ निवास करेंगे, वह वन एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन जायगा

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३० ॥
ह्यदत्तां महीं पित्रा भरतः शास्तुमिच्छति। त्वयि वा पुत्रवद् वस्तुं यदि जातो महीपतेः

na hyadattāṁ mahīṁ pitrā bharataḥ śāstumicchati।
tvayi vā putravad vastuṁ yadi jāto mahīpateḥ ॥

‘यदि भरत राजा दशरथ से पैदा हुए हैं तो पिता के प्रसन्नतापूर्वक दिये बिना इस राज्य को कदापि लेना नहीं चाहेंगे तथा तेरे साथ पुत्रवत् बर्ताव करने के लिये भी यहाँ बैठे रहने की इच्छा नहीं करेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३१ ॥
यद्यपि त्वं क्षितितलाद् गगनं चोत्पतिष्यसि। पितृवंशचरित्रज्ञः सोऽन्यथा करिष्यति

yadyapi tvaṁ kṣititalād gaganaṁ cotpatiṣyasi।
pitṛvaṁśacaritrajñaḥ so'nyathā na kariṣyati ॥

‘तू पृथ्वी छोड़कर आसमान में उड़ जाय तो भी अपने पितृकुल के आचार-व्यवहार को जाननेवाले भरत उसके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३२ ॥
तत् त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम्। लोके नहि विद्येत यो राममनुव्रतः

tat tvayā putragardhinyā putrasya kṛtamapriyam।
loke nahi sa vidyeta yo na rāmamanuvrataḥ ॥

‘तूने पुत्र का प्रिय करने की इच्छा से वास्तव में उसका अप्रिय ही किया है; क्योंकि संसार में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो श्रीराम का भक्त न हो

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३३ ॥
द्रक्ष्यस्यद्यैव कैकेयि पशुव्यालमृगद्विजान्। गच्छतः सह रामेण पादपांश्च तदुन्मुखान्

drakṣyasyadyaiva kaikeyi paśuvyālamṛgadvijān।
gacchataḥ saha rāmeṇa pādapāṁśca tadunmukhān ॥

‘कैकेयि! तू आज ही देखेगी कि वन को जाते हुए श्रीराम के साथ पशु, सर्प, मृग और पक्षी भी चले जा रहे हैं। औरों की तो बात ही क्या, वृक्ष भी उनके साथ जाने को उत्सुक हैं

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३४ ॥
अथोत्तमान्याभरणानि देवि देहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम्। चीरमस्याः प्रविधीयतेति न्यवारयत् तद् वसनं वसिष्ठः

athottamānyābharaṇāni devi dehi snuṣāyai vyapanīya cīram।
na cīramasyāḥ pravidhīyateti nyavārayat tad vasanaṁ vasiṣṭhaḥ ॥

‘देवि! सीता तेरी पुत्रवधू हैं। इनके शरीर से वल्कल-वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहनने के लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे। इनके लिये वल्कल-वस्त्र देना कदापि उचित नहीं है।’ ऐसा कहकर वसिष्ठ ने उसे जानकी को वल्कल-वस्त्र पहनाने से मना किया

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३५ ॥
एकस्य रामस्य वने निवासस्त्वया वृतः केकयराजपुत्रि। प्रतिकर्मनित्या वसत्वरण्ये सह राघवेण

ekasya rāmasya vane nivāsastvayā vṛtaḥ kekayarājaputri।
pratikarmanityā vasatvaraṇye saha rāghaveṇa ॥

वे फिर बोले—‘केकयराजकुमारी! तूने अकेले श्रीराम के लिये ही वनवास का वर माँगा है (सीता के लिये नहीं); अतः ये राजकुमारी वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर सदा शृङ्गार धारण करके वन में श्रीरामचन्द्रजी के साथ निवास करें

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३६ ॥
यानैश्च मुख्यैः परिचारकैश्च सुसंवृता गच्छतु राजपुत्री। विभूषितेयं वस्त्रैश्च सर्वैः सहितैर्विधानैर्नेयं वृता ते वरसम्प्रदाने

yānaiśca mukhyaiḥ paricārakaiśca susaṁvṛtā gacchatu rājaputrī।
vibhūṣiteyaṁ vastraiśca sarvaiḥ sahitairvidhānairneyaṁ vṛtā te varasampradāne ॥

‘राजकुमारी सीता मुख्य-मुख्य सेवकों तथा सवारियों के साथ सब प्रकार के वस्त्रों और आवश्यक उपकरणों से सम्पन्न होकर वन की यात्रा करें। तूने वर माँगते समय पहले सीता के वनवास की कोई चर्चा नहीं की थी (अतः इन्हें वल्कल-वस्त्र नहीं पहनाया जा सकता)’

English translation coming soon.

॥ २ · ३७ · ३७ ॥
तस्मिंस्तथा जल्पति विप्रमुख्ये गुरौ नृपस्याप्रतिमप्रभावे। नैव स्म सीता विनिवृत्तभावा प्रियस्य भर्तुः प्रतिकारकामा

tasmiṁstathā jalpati vipramukhye gurau nṛpasyāpratimaprabhāve।
naiva sma sītā vinivṛttabhāvā priyasya bhartuḥ pratikārakāmā ॥

ब्राह्मणशिरोमणि अप्रतिम प्रभावशाली राजगुरु महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहने पर भी सीता अपने प्रियतम पति के समान ही वेशभूषा धारण करने की इच्छा रखकर उस चीर-धारण से विरत नहीं हुई

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३७ ॥