वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ३५ · ३७ श्लोकाःSarga 35 · 37 ślokas

सुमन्त्रके समझाने और फटकारनेपर भी कैकेयीका टस-से-मस न होना

सुमन्त्र-धिक्कार

“सुमन्त्र-धिक्कार”
॥ २ · ३५ · ४–३७ ॥

स्वर्णाभेऽन्तःपुरे वृद्धः सूतः सुमन्त्रः उद्यततर्जनिः वाक्शरैः कैकेयीं धिक्करोति; सा तु निम्नस्वर्णपीठस्था कोपरक्तलोचना कठिनहृदया निर्विकारमुखी अश्ममयीव निश्चला तिष्ठति।

स्वर्णाभ राजमहलमें श्वेत पगड़ी और सुनहरी किनारीवाले वस्त्र धारण किये वृद्ध सारथि-मन्त्री सुमन्त्र खड़े होकर एक हाथ ऊँचा उठाये तर्जनी दिखाते हुए रानी कैकेयीको फटकार रहे हैं; उनका मुख शोक और तिरस्कारसे तना हुआ है, वचन मानो तीखे बाण हृदयके मर्मको बींध रहे हों। किन्तु नीली-सुनहरी रेशमी साड़ी, मुकुट और स्वर्णाभूषणोंसे सज्जित कैकेयी नीचे सोने-जड़े आसनपर बैठी मुख फेरे हुए है — आँखें क्रोधसे कुछ लाल, ठोड़ी अकड़ी हुई, पत्थरकी भाँति अविचल और निर्विकार; पीछे कुछ परिचारिकाएँ स्तब्ध होकर यह दृश्य देख रही हैं।

In a golden palace chamber the aged charioteer-minister Sumantra stands and rebukes Queen Kaikeyi — one hand raised with a pointing finger, his noble face taut with grief and reproach, his words like sharpened arrows piercing her every vital point. But seated below on a low gilded seat, resplendent in blue-and-gold silk, a jewelled tiara and heavy gold ornaments, she turns her face aside, eyes reddened with anger and jaw set, unmoved and unchanged as stone; behind them a few attendant women look on in hushed dismay.

॥ २ · ३५ · १ ॥
ततो निधूय सहसा शिरो निःश्वस्य चासकृत्। पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य

tato nidhūya sahasā śiro niḥśvasya cāsakṛt।
pāṇiṁ pāṇau viniṣpiṣya dantān kaṭakaṭāyya ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३५ · २ ॥
लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत्। कोपाभिभूतः सहसा संतापमशुभं गतः

locane kopasaṁrakte varṇaṁ pūrvocitaṁ jahat।
kopābhibhūtaḥ sahasā saṁtāpamaśubhaṁ gataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३५ · ३ ॥
मनः समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च। कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरैः शितैः

manaḥ samīkṣamāṇaśca sūto daśarathasya ca।
kampayanniva kaikeyyā hṛdayaṁ vākśaraiḥ śitaiḥ ॥

॥ १–३ ॥

तदनन्तर होश में आने पर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये। उनके मन में बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था। वे क्रोध के मारे काँपने लगे। उनके शरीर और मुख की पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी। वे क्रोध से आँखें लाल करके दोनों हाथों से सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर, हाथ-से-हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथ के मन की वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणों से कैकेयी के हृदय को कम्पित-सा करने लगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ४ ॥
वाक्यवज्रैरनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः। कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत

vākyavajrairanupamairnirbhindanniva cāśubhaiḥ।
kaikeyyāḥ sarvamarmāṇi sumantraḥ pratyabhāṣata ॥

अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्र से कैकेयी के सारे मर्मस्थानों को विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्र ने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ५ ॥
यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथः स्वयम्। भर्ता सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य

yasyāstava patistyakto rājā daśarathaḥ svayam।
bhartā sarvasya jagataḥ sthāvarasya carasya ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३५ · ६ ॥
नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते। पततिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलघ्नीमपि चान्ततः

nahyakāryatamaṁ kiṁcittava devīha vidyate।
patatighnīṁ tvāmahaṁ manye kulaghnīmapi cāntataḥ ॥

॥ ५–६ ॥

‘देवि! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत् के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथ का ही त्याग कर दिया, तब इस जगत् में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पति की हत्या करनेवाली तो हो ही; अन्ततः कुलघातिनी भी हो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ७ ॥
यन्महेन्द्रमिवाजय्यं दुष्प्रकम्प्यमिवाचलम्। महोदधिमिवाक्षोभ्यं संतापयसि कर्मभिः

yanmahendramivājayyaṁ duṣprakampyamivācalam।
mahodadhimivākṣobhyaṁ saṁtāpayasi karmabhiḥ ॥

‘ओह! जो देवराज इन्द्र के समान अजेय, पर्वत के समान अकम्पनीय और महासागर के समान क्षोभरहित हैं, उन महाराज दशरथ को भी तुम अपने कर्मों से संतप्त कर रही हो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ८ ॥
मावमंस्था दशरथं भर्तारं वरदं पतिम्। भर्तुरिच्छा हि नारीणां पुत्रकोट्या विशिष्यते

māvamaṁsthā daśarathaṁ bhartāraṁ varadaṁ patim।
bharturicchā hi nārīṇāṁ putrakoṭyā viśiṣyate ॥

राजा दशरथ तुम्हारे पति, पालक और वरदाता हैं। तुम इनका अपमान न करो। नारियों के लिये पति की इच्छा का महत्त्व करोड़ों पुत्रों से भी अधिक है

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ९ ॥
यथावयो हि राज्यानि प्राप्नुवन्ति नृपक्षये। इक्ष्वाकुकुलनाथेऽस्मिंस्तं लोपयितुमिच्छसि

yathāvayo hi rājyāni prāpnuvanti nṛpakṣaye।
ikṣvākukulanāthe'smiṁstaṁ lopayitumicchasi ॥

‘इस कुल में राजा का परलोकवास हो जाने पर उसके पुत्रों की अवस्था का विचार करके जो ज्येष्ठ पुत्र होते हैं, वे ही राज्य पाते हैं। राजकुल के इस परम्परागत आचार को तुम इन इक्ष्वाकुवंश के स्वामी महाराज दशरथ के जीते-जी ही मिटा देना चाहती हो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १० ॥
राजा भवतु ते पुत्रो भरतः शास्तु मेदिनीम्। वयं तत्र गमिष्यामो यत्र रामो रमिष्यति

rājā bhavatu te putro bharataḥ śāstu medinīm।
vayaṁ tatra gamiṣyāmo yatra rāmo ramiṣyati ॥

‘तुम्हारे पुत्र भरत राजा हो जायँ और इस पृथ्वी का शासन करें; किंतु हमलोग तो वहीं चले जायँगे जहाँ श्रीराम जायँगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ११ ॥
ते विषये कश्चिद् ब्राह्मणो वस्तुमर्हति। तादृशं त्वममर्यादमद्य कर्म करिष्यसि

na ca te viṣaye kaścid brāhmaṇo vastumarhati।
tādṛśaṁ tvamamaryādamadya karma kariṣyasi ॥

‘तुम्हारे राज्य में कोई भी ब्राह्मण निवास नहीं करेगा; यदि तुम आज वैसा मर्यादाहीन कर्म करोगी तो निश्चय ही हम सब लोग उसी मार्ग पर चले जायेंगे, जिसका श्रीराम ने सेवन किया है

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १२ ॥
नूनं सर्वे गमिष्यामो मार्गं रामनिषेवितम्। त्यक्ता या बान्धवैः सर्वैर्ब्राह्मणैः साधुभिः सदा

nūnaṁ sarve gamiṣyāmo mārgaṁ rāmaniṣevitam।
tyaktā yā bāndhavaiḥ sarvairbrāhmaṇaiḥ sādhubhiḥ sadā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३५ · १३ ॥
का प्रीती राज्यलाभेन तव देवि भविष्यति। तादृशं त्वममर्यादं कर्म कर्तुं चिकीर्षसि

kā prītī rājyalābhena tava devi bhaviṣyati।
tādṛśaṁ tvamamaryādaṁ karma kartuṁ cikīrṣasi ॥

॥ १२–१३ ॥

‘सम्पूर्ण बन्धु-बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे। देवि! फिर इस राज्य को पाकर तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा। ओह! तुम ऐसा मर्यादाहीन कर्म करना चाहती हो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १४ ॥
आश्चर्यमिव पश्यामि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम्। आचरन्त्या विवृता सद्यो भवति मेदिनी

āścaryamiva paśyāmi yasyāste vṛttamīdṛśam।
ācarantyā na vivṛtā sadyo bhavati medinī ॥

‘मुझे तो यह देखकर आश्चर्य-सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करने पर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती?

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १५ ॥
महाब्रह्मर्षिसृष्टा वा ज्वलन्तो भीमदर्शनाः। धिग्वाग्दण्डा हिंसन्ति रामप्रव्राजने स्थिताम्

mahābrahmarṣisṛṣṭā vā jvalanto bhīmadarśanāḥ।
dhigvāgdaṇḍā na hiṁsanti rāmapravrājane sthitām ॥

‘अथवा बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों के धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड (शाप) जो देखने में भयंकर और जलाकर भस्म कर देनेवाले होते हैं, श्रीराम को घर से निकालने के लिये तैयार खड़ी हुई तुम-जैसी पाषाणहृदया का सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं?

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १६ ॥
आम्रं छित्त्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत् तु कः। यश्चैनं पयसा सिञ्चेन्नैवास्य मधुरो भवेत्

āmraṁ chittvā kuṭhāreṇa nimbaṁ paricaret tu kaḥ।
yaścainaṁ payasā siñcennaivāsya madhuro bhavet ॥

‘भला आम को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी जगह नीम का सेवन कौन करेगा? जो आम की जगह नीम को ही दूध से सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता (अतः वरदान के बहाने श्रीराम को वनवास देकर कैकेयी के चित्त को संतुष्ट करना राजा के लिये कभी सुखद परिणाम का जनक नहीं हो सकता)

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १७ ॥
आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च। हि निम्बात् स्रवेत् क्षौद्रं लोके निगदितं वचः

ābhijātyaṁ hi te manye yathā mātustathaiva ca।
na hi nimbāt sravet kṣaudraṁ loke nigaditaṁ vacaḥ ॥

‘कैकेयि! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल के अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोक में कही जानेवाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु नहीं टपकता

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १८ ॥
तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्। पितुस्ते वरदः कश्चिद् ददौ वरमनुत्तमम्

tava māturasadgrāhaṁ vidma pūrvaṁ yathā śrutam।
pituste varadaḥ kaścid dadau varamanuttamam ॥

‘तुम्हारी माता के दुराग्रह की बात भी हम जानते हैं। इसके विषय में पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है। एक समय किसी वर देनेवाले साधु ने तुम्हारे पिता को अत्यन्त उत्तम वर दिया था

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · १९ ॥
सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिपः। तेन तिर्यग्गतानां भूतानां विदितं वचः

sarvabhūtarutaṁ tasmāt saṁjajñe vasudhādhipaḥ।
tena tiryaggatānāṁ ca bhūtānāṁ viditaṁ vacaḥ ॥

‘उस वर के प्रभाव से केकयनरेश समस्त प्राणियों की बोली समझने लगे। तिर्यक् योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनकी समझ में आ जाती थीं

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २० ॥
ततो जृम्भस्य शयने विरुताद् भूरिवर्चसः। पितुस्ते विदितो भावः तत्र बहुधाहसत्

tato jṛmbhasya śayane virutād bhūrivarcasaḥ।
pituste vidito bhāvaḥ sa tatra bahudhāhasat ॥

‘एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्या पर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज उनके कानों में पड़ी। उसकी बोली का अभिप्राय उनकी समझ में आ गया। अतः वे वहाँ कई बार हँसे

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २१ ॥
तत्र ते जननी क्रुद्धा मृत्युपाशमभीप्सती। हासं ते नृपते सौम्य जिज्ञासामीति चाब्रवीत्

tatra te jananī kruddhā mṛtyupāśamabhīpsatī।
hāsaṁ te nṛpate saumya jijñāsāmīti cābravīt ॥

‘उसी शय्या पर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गले में मौत की फाँसी लगाने की इच्छा रखती हुई बोली—‘सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसने का क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ’

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २२ ॥
नृपश्चोवाच तां देवीं हासं शंसामि ते यदि। ततो मे मरणं सद्यो भविष्यति संशयः

nṛpaścovāca tāṁ devīṁ hāsaṁ śaṁsāmi te yadi।
tato me maraṇaṁ sadyo bhaviṣyati na saṁśayaḥ ॥

‘तब राजा ने उस देवी से कहा—‘रानी! यदि मैं अपने हँसने का कारण बता दूँ तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जायगी, इसमें संशय नहीं है’

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २३ ॥
माता ते पितरं देवि पुनः केकयमब्रवीत्। शंस मे जीव वा मा वा मां त्वं प्रहसिष्यसि

mātā te pitaraṁ devi punaḥ kekayamabravīt।
śaṁsa me jīva vā mā vā na māṁ tvaṁ prahasiṣyasi ॥

‘देवि! यह सुनकर तुम्हारी रानी माता ने तुम्हारे पिता केकयराज से फिर कहा—‘तुम जीओ या मरो, मुझे कारण बता दो। भविष्य में तुम फिर मेरी हँसी नहीं उड़ा सकोगे’

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २४ ॥
प्रियया तथोक्तः केकयः पृथिवीपतिः। तस्मै तं वरदायार्थं कथयामास तत्त्वतः

priyayā ca tathoktaḥ sa kekayaḥ pṛthivīpatiḥ।
tasmai taṁ varadāyārthaṁ kathayāmāsa tattvataḥ ॥

‘अपनी प्यारी रानी के ऐसा कहने पर केकयनरेश ने उस वर देनेवाले साधु के पास जाकर सारा समाचार ठीक-ठीक कह सुनाया

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २५ ॥
ततः वरदः साधू राजानं प्रत्यभाषत। प्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते

tataḥ sa varadaḥ sādhū rājānaṁ pratyabhāṣata।
priyatāṁ dhvaṁsatāṁ veyaṁ mā śaṁsīstvaṁ mahīpate ॥

‘तब उस वर देनेवाले साधु ने राजा को उत्तर दिया—‘महाराज! रानी मरे या घर से निकल जाय; तुम कदापि यह बात उसे न बताना’

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २६ ॥
तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः। मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत्

sa tacchrutvā vacastasya prasannamanaso nṛpaḥ।
mātaraṁ te nirasyāśu vijahāra kuberavat ॥

‘प्रसन्न चित्तवाले उस साधु का यह वचन सुनकर केकयनरेश ने तुम्हारी माता को तुरंत घर से निकाल दिया और स्वयं कुबेर के समान विहार करने लगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २७ ॥
तथा त्वमपि राजानं दुर्जनाचरिते पथि। असद्ग्राहमिमं मोहात् कुरुषे पापदर्शिनी

tathā tvamapi rājānaṁ durjanācarite pathi।
asadgrāhamimaṁ mohāt kuruṣe pāpadarśinī ॥

‘तुम भी इसी प्रकार दुर्जनों के मार्ग पर स्थित हो पाप पर ही दृष्टि रखकर मोहवश राजा से यह अनुचित आग्रह कर रही हो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २८ ॥
सत्यश्चात्र प्रवादोऽयं लौकिकः प्रतिभाति मा। पितॄन् समनुजायन्ते नरा मातरमङ्गनाः

satyaścātra pravādo'yaṁ laukikaḥ pratibhāti mā।
pitṝn samanujāyante narā mātaramaṅganāḥ ॥

‘आज मुझे यह लोकोक्ति सोलह आने सच मालूम होती है कि पुत्र पिता के समान होते हैं और कन्याएँ माता के समान

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · २९ ॥
नैवं भव गृहाणेदं यदाह वसुधाधिपः। भर्तुरिच्छामुपास्वेह जनस्यास्य गतिर्भव

naivaṁ bhava gṛhāṇedaṁ yadāha vasudhādhipaḥ।
bharturicchāmupāsveha janasyāsya gatirbhava ॥

‘तुम ऐसी न बनो—इस लोकोक्ति को अपने जीवन में चरितार्थ न करो। राजा ने जो कुछ कहा है, उसे स्वीकार करो (श्रीराम का राज्याभिषेक होने दो)। अपने पति की इच्छा का अनुसरण करके इस जन-समुदाय को यहाँ शरण देनेवाली बनो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३० ॥
मा त्वं प्रोत्साहिता पापैर्देवराजसमप्रभम्। भर्तारं लोकभर्तारमसद्धर्ममुपादध

mā tvaṁ protsāhitā pāpairdevarājasamaprabham।
bhartāraṁ lokabhartāramasaddharmamupādadha ॥

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाले लोगों के बहकावे में आकर तुम देवराज इन्द्र के तुल्य तेजस्वी अपने लोक-प्रतिपालक स्वामी को अनुचित कर्म में न लगाओ

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३१ ॥
नहि मिथ्या प्रतिज्ञातं करिष्यति तवानघः। श्रीमान् दशरथो राजा देवि राजीवलोचनः

nahi mithyā pratijñātaṁ kariṣyati tavānaghaḥ।
śrīmān daśaratho rājā devi rājīvalocanaḥ ॥

‘देवि! कमलनयन श्रीमान् राजा दशरथ पाप से दूर रहते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं करेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३२ ॥
ज्येष्ठो वदान्यः कर्मण्यः स्वधर्मस्यापि रक्षिता। रक्षिता जीवलोकस्य बली रामोऽभिषिच्यताम्

jyeṣṭho vadānyaḥ karmaṇyaḥ svadharmasyāpi rakṣitā।
rakṣitā jīvalokasya balī rāmo'bhiṣicyatām ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों में ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्म के पालक, जीवजगत् के रक्षक और बलवान् हैं। इनका इस राज्य पर अभिषेक होने दो

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३३ ॥
परिवादो हि ते देवि महाँल्लोके चरिष्यति। यदि रामो वनं याति विहाय पितरं नृपम्

parivādo hi te devi mahām̐lloke cariṣyati।
yadi rāmo vanaṁ yāti vihāya pitaraṁ nṛpam ॥

‘देवि! यदि श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ को छोड़कर वन को चले जायँगे तो संसार में तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३४ ॥
स्वराज्यं राघवः पातु भव त्वं विगतज्वरा। नहि ते राघवादन्यः क्षमः पुरवरे वसन्

svarājyaṁ rāghavaḥ pātu bhava tvaṁ vigatajvarā।
nahi te rāghavādanyaḥ kṣamaḥ puravare vasan ॥

‘अतः श्रीरामचन्द्रजी ही अपने राज्य का पालन करें और तुम निश्चिन्त होकर बैठो। श्रीराम के सिवा दूसरा कोई राजा इस श्रेष्ठ नगर में रहकर तुम्हारे अनुकूल आचरण नहीं कर सकता

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३५ ॥
रामे हि यौवराज्यस्थे राजा दशरथो वनम्। प्रवेक्ष्यति महेष्वासः पूर्ववृत्तमनुस्मरन्

rāme hi yauvarājyasthe rājā daśaratho vanam।
pravekṣyati maheṣvāsaḥ pūrvavṛttamanusmaran ॥

‘श्रीराम के युवराजपद पर प्रतिष्ठित हो जाने के बाद महाधनुर्धर राजा दशरथ पूर्वजों के वृत्तान्त का स्मरण करके स्वयं वन में प्रवेश करेंगे’

English translation coming soon.

॥ २ · ३५ · ३६ ॥
इति सान्त्वैश्च तीक्ष्णैश्च कैकेयीं राजसंसदि। भूयः संक्षोभयामास सुमन्त्रस्तु कृताञ्जलिः

iti sāntvaiśca tīkṣṇaiśca kaikeyīṁ rājasaṁsadi।
bhūyaḥ saṁkṣobhayāmāsa sumantrastu kṛtāñjaliḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३५ · ३७ ॥
नैव सा क्षुभ्यते देवी स्म परिदूयते। चास्या मुखवर्णस्य लक्ष्यते विक्रिया तदा

naiva sā kṣubhyate devī na ca sma paridūyate।
na cāsyā mukhavarṇasya lakṣyate vikriyā tadā ॥

॥ ३६–३७ ॥

इस प्रकार सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर कैकेयी को उस राजभवन में सान्त्वनापूर्ण तथा तीखे वचनों से भी बारम्बार विचलित करने की चेष्टा की; किंतु वह टस-से-मस न हुई। देवी कैकेयी के मन में न तो क्षोभ हुआ और न दुःख ही। उस समय उसके चेहरे के रंग में भी कोई फर्क पड़ता नहीं दिखायी दिया

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥