वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ३४ · ६१ श्लोकाःSarga 34 · 61 ślokas

सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका रानियोंसहित राजा दशरथके पास जाकर वनवासके लिये विदा माँगना, राजाका शोक और मूर्च्छा, श्रीरामका उन्हें समझाना तथा राजाका श्रीरामको हृदयसे लगाकर पुनः मूर्च्छित हो जाना

पितृ-विदा

“पितृ-विदा”
॥ २ · ३४ · २१–२२ ॥

दीपप्रभासिते राजभवने कृताञ्जलिः श्यामो रामः पितुर्विदामाचरति; शोकार्तो दशरथः पर्यङ्के मूर्च्छन् पुत्रं प्रति कम्पमानं करं प्रसारयति, समीपे सौम्या सीता धनुर्धरो लक्ष्मणश्च, परितश्च शोकाकुलाः कौसल्यासुमित्राकैकेय्यः।

दीपों से आलोकित राजमहल में श्यामसुन्दर राजकुमार राम शान्त मुद्रा में हाथ जोड़े पिता से वनगमन की विदा माँग रहे हैं; शोक से टूटे वृद्ध महाराज दशरथ पर्यंक पर मूर्च्छित-से ढह पड़े हैं और काँपता हाथ पुत्र की ओर बढ़ा रहे हैं, उनका मुख अश्रुओं से भीगा है। राम के समीप सौम्य सीता और धनुर्धारी लक्ष्मण खड़े हैं, तथा दुःखमग्न रानियाँ—मलिन स्वर्णाभ वस्त्रों में कौसल्या, हरित-वसना सुमित्रा और नीलाम्बरा कैकेयी—मूर्च्छित राजा को घेरे शोकविह्वल हैं।

In a lamp-lit palace chamber the blue-hued prince Ram stands with quiet composure, palms joined, taking leave of his father for the forest; the aged King Dasharath, broken by grief, has sunk swooning upon his couch, one trembling hand reaching toward his son, his face wet with tears. Close beside Ram stand the gentle Sita and the bow-bearing Lakshman, while the sorrowing queens — Kausalya in dull-gold silks, Sumitra in green, and Kaikeyi in royal blue — gather stricken around the fainting king.

॥ २ · ३४ · १ ॥
ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान्। उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति

tataḥ kamalapatrākṣaḥ śyāmo nirupamo mahān।
uvāca rāmastaṁ sūtaṁ piturākhyāhi māmiti ॥

जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीराम ने सूत सुमन्त्र से कहा—‘आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये’ तब श्रीराम की प्रेरणा से शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्र ने राजा का दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संताप से कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे

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॥ २ · ३४ · २ ॥
रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्। प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श

sa rāmapreṣitaḥ kṣipraṁ saṁtāpakaluṣendriyam।
praviśya nṛpatiṁ sūto niḥśvasantaṁ dadarśa ha ॥

जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीराम ने सूत सुमन्त्र से कहा—‘आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये’ तब श्रीराम की प्रेरणा से शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्र ने राजा का दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संताप से कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे

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॥ २ · ३४ · ३ ॥
उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्। तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम्

uparaktamivādityaṁ bhasmacchannamivānalam।
taṭākamiva nistoyamapaśyajjagatīpatim ॥

सुमन्त्र ने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राख से ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाब के समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीराम का ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूत ने महाराज को सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा

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॥ २ · ३४ · ४ ॥
आबोध्य महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम्। राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्

ābodhya ca mahāprājñaḥ paramākulacetanam।
rāmamevānuśocantaṁ sūtaḥ prāñjalirabravīt ॥

सुमन्त्र ने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राख से ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाब के समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीराम का ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूत ने महाराज को सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा

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॥ २ · ३४ · ५ ॥
तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा। भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्

taṁ vardhayitvā rājānaṁ pūrvaṁ sūto jayāśiṣā।
bhayaviklavayā vācā mandayā ślakṣṇayābravīt ॥

पहले तो सूत सुमन्त्र ने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराज की अभ्युदय-कामना की; फिर भय से व्याकुल मन्द-मधुर वाणीद्वारा यह बात कही—

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॥ २ · ३४ · ६ ॥
अयं पुरुषव्याघ्रो द्वारि तिष्ठति ते सुतः। ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सर्वं चैवोपजीविनाम्

ayaṁ sa puruṣavyāghro dvāri tiṣṭhati te sutaḥ।
brāhmaṇebhyo dhanaṁ dattvā sarvaṁ caivopajīvinām ॥

‘पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रम पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकों को अपना सारा धन देकर द्वार पर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदों से मिलकर—उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें। राजन्! अब ये विशाल वन में चले जायेंगे, अतः किरणों से युक्त सूर्य की भाँति समस्त राजोचित गुण से सम्पन्न इन श्रीराम को आप भी जी भरकर देख लीजिये’

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॥ २ · ३४ · ७ ॥
त्वां पश्यतु भद्रं ते रामः सत्यपराक्रमः। सर्वान् सुहृद आपृच्छ्य त्वां हीदानीं दिदृक्षते

sa tvāṁ paśyatu bhadraṁ te rāmaḥ satyaparākramaḥ।
sarvān suhṛda āpṛcchya tvāṁ hīdānīṁ didṛkṣate ॥

‘पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रम पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकों को अपना सारा धन देकर द्वार पर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदों से मिलकर—उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें। राजन्! अब ये विशाल वन में चले जायेंगे, अतः किरणों से युक्त सूर्य की भाँति समस्त राजोचित गुण से सम्पन्न इन श्रीराम को आप भी जी भरकर देख लीजिये’

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॥ २ · ३४ · ८ ॥
गमिष्यति महारण्यं तं पश्य जगतीपते। वृतं राजगुणैः सर्वैरादित्यमिव रश्मिभिः

gamiṣyati mahāraṇyaṁ taṁ paśya jagatīpate।
vṛtaṁ rājaguṇaiḥ sarvairādityamiva raśmibhiḥ ॥

‘पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रम पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकों को अपना सारा धन देकर द्वार पर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदों से मिलकर—उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें। राजन्! अब ये विशाल वन में चले जायेंगे, अतः किरणों से युक्त सूर्य की भाँति समस्त राजोचित गुण से सम्पन्न इन श्रीराम को आप भी जी भरकर देख लीजिये’

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॥ २ · ३४ · ९ ॥
सत्यवाक्यो धर्मात्मा गाम्भीर्यात् सागरोपमः। आकाश इव निष्पङ्को नरेन्द्रः प्रत्युवाच तम्

sa satyavākyo dharmātmā gāmbhīryāt sāgaropamaḥ।
ākāśa iva niṣpaṅko narendraḥ pratyuvāca tam ॥

यह सुनकर समुद्र के समान गम्भीर तथा आकाश की भाँति निर्मल, सत्यवादी धर्मात्मा महाराज दशरथ ने उन्हें उत्तर दिया—

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॥ २ · ३४ · १० ॥
सुमन्त्रानय मे दारान् ये केचिदिह मामकाः। दारैः परिवृतः सर्वैर्द्रष्टुमिच्छामि राघवम्

sumantrānaya me dārān ye kecidiha māmakāḥ।
dāraiḥ parivṛtaḥ sarvairdraṣṭumicchāmi rāghavam ॥

‘सुमन्त्र! यहाँ जो कोई भी मेरी स्त्रियाँ हैं, उन सबको बुलाओ। उन सबके साथ मैं श्रीराम को देखना चाहता हूँ’

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॥ २ · ३४ · ११ ॥
सोऽन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यमब्रवीत्। आर्यो ह्वयति वो राजा गम्यतां तत्र मा चिरम्

so'ntaḥpuramatītyaiva striyastā vākyamabravīt।
āryo hvayati vo rājā gamyatāṁ tatra mā ciram ॥

तब सुमन्त्र ने बड़े वेग से अन्तःपुर में जाकर सब स्त्रियों से कहा—‘देवियो! आपलोगों को महाराज बुला रहे हैं, अतः वहाँ शीघ्र चलें’

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॥ २ · ३४ · १२ ॥
एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञया। प्रचक्रमुस्तद् भवनं भर्तुराज्ञाय शासनम्

evamuktāḥ striyaḥ sarvāḥ sumantreṇa nṛpājñayā।
pracakramustad bhavanaṁ bharturājñāya śāsanam ॥

राजा की आज्ञा से सुमन्त्र के ऐसा कहने पर वे सब रानियाँ स्वामी का आदेश समझकर उस भवन की ओर चलीं

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॥ २ · ३४ · १३ ॥
अर्धसप्तशतास्तत्र प्रमदास्ताम्रलोचनाः। कौसल्यां परिवार्याथ शनैर्जग्मुर्धृतव्रताः

ardhasaptaśatāstatra pramadāstāmralocanāḥ।
kausalyāṁ parivāryātha śanairjagmurdhṛtavratāḥ ॥

कुछ-कुछ लाल नेत्रोंवाली साढ़े तीन सौ पतिव्रता युवती स्त्रियाँ महारानी कौसल्या को सब ओर से घेरकर धीरे-धीरे उस भवन में गयीं

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॥ २ · ३४ · १४ ॥
आगतेषु दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः। उवाच राजा तं सूतं सुमन्त्रानय मे सुतम्

āgateṣu ca dāreṣu samavekṣya mahīpatiḥ।
uvāca rājā taṁ sūtaṁ sumantrānaya me sutam ॥

उन सबके आ जाने पर उन्हें देखकर पृथ्वीपति राजा दशरथ ने सूत से कहा—‘सुमन्त्र! अब मेरे पुत्र को ले आओ’

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॥ २ · ३४ · १५ ॥
सूतो राममादाय लक्ष्मणं मैथिलीं तथा। जगामाभिमुखस्तूर्णं सकाशं जगतीपतेः

sa sūto rāmamādāya lakṣmaṇaṁ maithilīṁ tathā।
jagāmābhimukhastūrṇaṁ sakāśaṁ jagatīpateḥ ॥

आज्ञा पाकर सुमन्त्र गये और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता को साथ लेकर शीघ्र ही महाराज के पास लौट आये

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॥ २ · ३४ · १६ ॥
राजा पुत्रमायान्तं दृष्ट्वा चारात् कृताञ्जलिम्। उत्पपातासनात् तूर्णमार्तः स्त्रीजनसंवृतः

sa rājā putramāyāntaṁ dṛṣṭvā cārāt kṛtāñjalim।
utpapātāsanāt tūrṇamārtaḥ strījanasaṁvṛtaḥ ॥

महाराज दूर से ही अपने पुत्र को हाथ जोड़कर आते देख सहसा अपने आसन से उठ खड़े हुए। उस समय स्त्रियों से घिरे हुए वे नरेश शोक से आर्त हो रहे थे

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॥ २ · ३४ · १७ ॥
सोऽभिदुद्राव वेगेन रामं दृष्ट्वा विशाम्पतिः। तमसम्प्राप्य दुःखार्तः पपात भुवि मूर्च्छितः

so'bhidudrāva vegena rāmaṁ dṛṣṭvā viśāmpatiḥ।
tamasamprāpya duḥkhārtaḥ papāta bhuvi mūrcchitaḥ ॥

श्रीराम को देखते ही वे प्रजापालक महाराज बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े, किंतु उनके पास पहुँचने के पहले ही दुःख से व्याकुल हो पृथ्वी पर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये

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॥ २ · ३४ · १८ ॥
तं रामोऽभ्यपतत् क्षिप्रं लक्ष्मणश्च महारथः। विसंज्ञमिव दुःखेन सशोकं नृपतिं तथा

taṁ rāmo'bhyapatat kṣipraṁ lakṣmaṇaśca mahārathaḥ।
visaṁjñamiva duḥkhena saśokaṁ nṛpatiṁ tathā ॥

उस समय श्रीराम और महारथी लक्ष्मण बड़ी तेजी से चलकर दुःख के कारण अचेत-से हुए शोकमग्न महाराज के पास जा पहुँचे

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॥ २ · ३४ · १९ ॥
स्त्रीसहस्रनिनादश्च संजज्ञे राजवेश्मनि। हा हा रामेति सहसा भूषणध्वनिमिश्रितः

strīsahasraninādaśca saṁjajñe rājaveśmani।
hā hā rāmeti sahasā bhūṣaṇadhvanimiśritaḥ ॥

इतनेही में उस राजभवन के भीतर सहसा आभूषणों की ध्वनि के साथ सहस्रों स्त्रियों का ‘हा राम! हा राम!’ यह आर्तनाद गूँज उठा

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॥ २ · ३४ · २० ॥
तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तावुभौ रामलक्ष्मणौ। पर्यङ्के सीतया सार्धं रुदन्तः समवेशयन्

taṁ pariṣvajya bāhubhyāṁ tāvubhau rāmalakṣmaṇau।
paryaṅke sītayā sārdhaṁ rudantaḥ samaveśayan ॥

श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई भी सीता के साथ रो पड़े और उन तीनोंने महाराज को दोनों भुजाओं से उठाकर पलंग पर बिठा दिया

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॥ २ · ३४ · २१ ॥
अथ रामो मुहूर्तस्य लब्धसंज्ञं महीपतिम्। उवाच प्राञ्जलिर्बाष्पशोकार्णवपरिप्लुतम्

atha rāmo muhūrtasya labdhasaṁjñaṁ mahīpatim।
uvāca prāñjalirbāṣpaśokārṇavapariplutam ॥

शोकाश्रु के सागर में डूबे हुए महाराज दशरथ को दो घड़ी में जब फिर चेत हुआ, तब श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनसे कहा—

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॥ २ · ३४ · २२ ॥
आपृच्छे त्वां महाराज सर्वेषामीश्वरोऽसि नः। प्रस्थितं दण्डकारण्यं पश्य त्वं कुशलेन माम्

āpṛcche tvāṁ mahārāja sarveṣāmīśvaro'si naḥ।
prasthitaṁ daṇḍakāraṇyaṁ paśya tvaṁ kuśalena mām ॥

‘महाराज! आप हमलोगों के स्वामी हैं। मैं दण्डकारण्य को जा रहा हूँ और आपसे आज्ञा लेने आया हूँ। आप अपनी कल्याणमयी दृष्टि से मेरी ओर देखिये

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॥ २ · ३४ · २३ ॥
लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम्। कारणैर्बहुभिस्तथ्यैरवार्यमाणौ चेच्छतः

lakṣmaṇaṁ cānujānīhi sītā cānvetu māṁ vanam।
kāraṇairbahubhistathyairavāryamāṇau na cecchataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३४ · २४ ॥
अनुजानीहि सर्वान् नः शोकमुत्सृज्य मानद। लक्ष्मणं मां सीतां प्रजापतिरिवात्मजान्

anujānīhi sarvān naḥ śokamutsṛjya mānada।
lakṣmaṇaṁ māṁ ca sītāṁ ca prajāpatirivātmajān ॥

॥ २३–२४ ॥

‘मेरे साथ लक्ष्मण को भी वन में जाने की आज्ञा दीजिये। साथ ही यह भी स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वन को जाय। मैंने बहुत-से सच्चे कारण बताकर इन दोनोंको रोकने की चेष्टा की है, परंतु ये यहाँ रहना नहीं चाहते हैं; अतः दूसरों को मान देनेवाले नरेश! आप शोक छोड़कर हम सबको—मुझको, लक्ष्मण को और सीता को भी उसी तरह वन में जाने की आज्ञा दीजिये, जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्र सनकादिकों को तप के लिये वन में जाने की अनुमति दी थी’

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॥ २ · ३४ · २५ ॥
प्रतीक्षमाणमव्यग्रमनुज्ञां जगतीपतेः। उवाच राजा सम्प्रेक्ष्य वनवासाय राघवम्

pratīkṣamāṇamavyagramanujñāṁ jagatīpateḥ।
uvāca rājā samprekṣya vanavāsāya rāghavam ॥

इस प्रकार शान्तभाव से वनवास के लिये राजा की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर महाराज ने उनसे कहा—

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॥ २ · ३४ · २६ ॥
अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः। अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम्

ahaṁ rāghava kaikeyyā varadānena mohitaḥ।
ayodhyāyāṁ tvamevādya bhava rājā nigṛhya mām ॥

‘रघुनन्दन! मैं कैकेयी को दिये हुए वर के कारण मोहमें पड़ गया हूँ। तुम मुझे कैद करके स्वयं ही अब अयोध्या के राजा बन जाओ’

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॥ २ · ३४ · २७ ॥
एवमुक्तो नृपतिना रामो धर्मभृतां वरः। प्रत्युवाचाञ्जलिं कृत्वा पितरं वाक्यकोविदः

evamukto nṛpatinā rāmo dharmabhṛtāṁ varaḥ।
pratyuvācāñjaliṁ kṛtvā pitaraṁ vākyakovidaḥ ॥

महाराज के ऐसा कहने पर बातचीत करने में कुशल धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने दोनों हाथ जोड़कर पिता को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ २ · ३४ · २८ ॥
भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पतिः। अहं त्वरण्ये वत्स्यामि मे राज्यस्य कांक्षिता

bhavān varṣasahasrāya pṛthivyā nṛpate patiḥ।
ahaṁ tvaraṇye vatsyāmi na me rājyasya kāṁkṣitā ॥

‘महाराज! आप सहस्रों वर्षोंतक इस पृथ्वी के अधिपति बने रहें। मैं तो अब वन में ही निवास करूँगा। मुझे राज्य लेने की इच्छा नहीं है

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॥ २ · ३४ · २९ ॥
नव पञ्च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते। पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप

nava pañca ca varṣāṇi vanavāse vihṛtya te।
punaḥ pādau grahīṣyāmi pratijñānte narādhipa ॥

‘नरेश्वर! चौदह वर्षोंतक वन में घूम-फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर लेने के पश्चात् मैं पुनः आपके युगल चरणों में मस्तक झुकाऊँगा’

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॥ २ · ३४ · ३० ॥
रुदन्नार्तः प्रियं पुत्रं सत्यपाशेन संयुतः। कैकेय्या चोद्यमानस्तु मिथो राजा तमब्रवीत्

rudannārtaḥ priyaṁ putraṁ satyapāśena saṁyutaḥ।
kaikeyyā codyamānastu mitho rājā tamabravīt ॥

राजा दशरथ एक तो सत्य के बन्धन में बँधे हुए थे, दूसरे एकान्त में कैकेयी उन्हें श्रीराम को वन में तुरंत भेजने के लिये बाध्य कर रही थी—इस अवस्था में वे आर्तभाव से रोते हुए वहाँ अपने प्रिय पुत्र श्रीराम से बोले—

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॥ २ · ३४ · ३१ ॥
श्रेयसे वृद्धये तात पुनरागमनाय च। गच्छस्वारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम्

śreyase vṛddhaye tāta punarāgamanāya ca।
gacchasvāriṣṭamavyagraḥ panthānamakutobhayam ॥

‘तात! तुम कल्याण के लिये, वृद्धि के लिये और फिर लौट आने के लिये शान्तभाव से जाओ। तुम्हारा मार्ग विघ्न-बाधाओं से रहित और निर्भय हो

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॥ २ · ३४ · ३२ ॥
हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव। संनिवर्तयितुं बुद्धिः शक्यते रघुनन्दन

na hi satyātmanastāta dharmābhimanasastava।
saṁnivartayituṁ buddhiḥ śakyate raghunandana ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३४ · ३३ ॥
अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा। एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम्

adya tvidānīṁ rajanīṁ putra mā gaccha sarvathā।
ekāhaṁ darśanenāpi sādhu tāvaccarāmyaham ॥

॥ ३२–३३ ॥

‘बेटा रघुनन्दन! तुम सत्यस्वरूप और धर्मात्मा हो। तुम्हारे विचार को पलटना तो असम्भव है; परंतु रातभर और रह जाओ। सिर्फ एक रात के लिये सर्वथा अपनी यात्रा रोक दो। केवल एक दिन भी तो तुम्हें देखने का सुख उठा लूँ

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॥ २ · ३४ · ३४ ॥
मातरं मां सम्पश्यन् वसेमामद्य शर्वरीम्। तर्पितः सर्वकामैस्त्वं श्वः काल्ये साधयिष्यसि

mātaraṁ māṁ ca sampaśyan vasemāmadya śarvarīm।
tarpitaḥ sarvakāmaistvaṁ śvaḥ kālye sādhayiṣyasi ॥

‘अपनी माता को और मुझको इस अवस्था में देखकर आज की इस रात में यहीं रह जाओ। मेरे द्वारा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओं से तृप्त होकर कल प्रातःकाल यहाँ से जाना

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॥ २ · ३४ · ३५ ॥
दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय। त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम्

duṣkaraṁ kriyate putra sarvathā rāghava priya।
tvayā hi matpriyārthaṁ tu vanamevamupāśritam ॥

‘मेरे प्रिय पुत्र श्रीराम! तुम सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हो। मेरा प्रिय करने के लिये ही तुमने इस प्रकार वन का आश्रय लिया है

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॥ २ · ३४ · ३६ ॥
चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव। छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया

na caitanme priyaṁ putra śape satyena rāghava।
channayā calitastvasmi striyā bhasmāgnikalpayā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३४ · ३७ ॥
वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि। अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदितः

vañcanā yā tu labdhā me tāṁ tvaṁ nistartumicchasi।
anayā vṛttasādinyā kaikeyyābhipracoditaḥ ॥

॥ ३६–३७ ॥

‘परंतु बेटा रघुनन्दन! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है। मुझे तुम्हारा वन में जाना अच्छा नहीं लगता। यह मेरी स्त्री कैकेयी राख में छिपी हुई आग के समान भयंकर है। इसने अपने क्रूर अभिप्राय को छिपा रखा था। इसीने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्प से विचलित कर दिया है। कुलोचित सदाचार का विनाश करनेवाली इस कैकेयी ने मुझे वरदान के लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसीको तुम पार करना चाहते हो

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॥ २ · ३४ · ३८ ॥
चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठः सुतो मम। अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि

na caitadāścaryatamaṁ yat tvaṁ jyeṣṭhaḥ suto mama।
apānṛtakathaṁ putra pitaraṁ kartumicchasi ॥

‘पुत्र! तुम अपने पिता को सत्यवादी बनाना चाहते हो। तुम्हारे लिये यह कोई अधिक आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि तुम गुण और अवस्था दोनों ही दृष्टियों से मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो’

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॥ २ · ३४ · ३९ ॥
अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम्। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा दीनो वचनमब्रवीत्

atha rāmastadā śrutvā piturārtasya bhāṣitam।
lakṣmaṇena saha bhrātrā dīno vacanamabravīt ॥

अपने शोकाकुल पिता का यह कथन सुनकर उस समय छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीराम ने दुःखी होकर कहा—

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॥ २ · ३४ · ४० ॥
प्राप्स्यामि यानद्य गुणान् को मे श्वस्तान् प्रदास्यति। अपक्रमणमेवातः सर्वकामैरहं वृणे

prāpsyāmi yānadya guṇān ko me śvastān pradāsyati।
apakramaṇamevātaḥ sarvakāmairahaṁ vṛṇe ॥

‘महाराज! आज यात्रा करके मैं जिन गुणों (लाभों) को पाऊँगा, उन्हें कल कौन मुझे देगा? अतः मैं सम्पूर्ण कामनाओं के बदले आज यहाँ से निकल जाना ही अच्छा समझता हूँ और इसीका वरण करता हूँ

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॥ २ · ३४ · ४१ ॥
इयं सराष्ट्रा सजना धनधान्यसमाकुला। मया विसृष्टा वसुधा भरताय प्रदीयताम्

iyaṁ sarāṣṭrā sajanā dhanadhānyasamākulā।
mayā visṛṣṭā vasudhā bharatāya pradīyatām ॥

‘राष्ट्र और यहाँ के निवासी मनुष्योंसहित धनधान्य से सम्पन्न यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप इसे भरत को दे दें

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॥ २ · ३४ · ४२ ॥
वनवासकृता बुद्धिर्न मेऽद्य चलिष्यति। यस्तु युद्धे वरो दत्तः कैकेय्यै वरद त्वया

vanavāsakṛtā buddhirna ca me'dya caliṣyati।
yastu yuddhe varo dattaḥ kaikeyyai varada tvayā ॥

‘मेरा वनवासविषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा। वरदायक नरेश! आपने देवासुर-संग्राम में कैकेयी को जो वर देने की प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूप से दीजिये और सत्यवादी बनिये

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॥ २ · ३४ · ४३ ॥
दीयतां निखिलेनैव सत्यस्त्वं भव पार्थिव। अहं निदेशं भवतो यथोक्तमनुपालयन्

dīyatāṁ nikhilenaiva satyastvaṁ bhava pārthiva।
ahaṁ nideśaṁ bhavato yathoktamanupālayan ॥

‘मेरा वनवासविषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा। वरदायक नरेश! आपने देवासुर-संग्राम में कैकेयी को जो वर देने की प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूप से दीजिये और सत्यवादी बनिये

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॥ २ · ३४ · ४४ ॥
चतुर्दश समा वत्स्ये वने वनचरैः सह। मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम्

caturdaśa samā vatsye vane vanacaraiḥ saha।
mā vimarśo vasumatī bharatāya pradīyatām ॥

‘मैं आपकी उक्त आज्ञा का पालन करता हुआ चौदह वर्षोंतक वन में वनचारी प्राणियों के साथ निवास करूँगा। आपके मन में कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आप यह सारी पृथ्वी भरत को दे दीजिये

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॥ २ · ३४ · ४५ ॥
नहि मे कांक्षितं राज्यं सुखमात्मनि वा प्रियम्। यथानिदेशं कर्तुं वै तवैव रघुनन्दन

nahi me kāṁkṣitaṁ rājyaṁ sukhamātmani vā priyam।
yathānideśaṁ kartuṁ vai tavaiva raghunandana ॥

‘रघुनन्दन! मैंने अपने मन को सुख देने अथवा स्वजनों का प्रिय करने के उद्देश्य से राज्य लेने की इच्छा नहीं की थी। आपकी आज्ञा का यथावत्‌रूप से पालन करने के लिये ही मैंने उसे ग्रहण करने की अभिलाषा की थी

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॥ २ · ३४ · ४६ ॥
अपगच्छतु ते दुःखं मा भूर्बाष्पपरिप्लुतः। नहि क्षुभ्यति दुर्धर्षः समुद्रः सरितां पतिः

apagacchatu te duḥkhaṁ mā bhūrbāṣpapariplutaḥ।
nahi kṣubhyati durdharṣaḥ samudraḥ saritāṁ patiḥ ॥

‘आपका दुःख दूर हो जाय, आप इस प्रकार आँसू न बहावें। सरिताओं का स्वामी दुर्धर्ष समुद्र क्षुब्ध नहीं होता है—अपनी मर्यादा का त्याग नहीं करता है (इसी तरह आपको भी क्षुब्ध नहीं होना चाहिये)

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॥ २ · ३४ · ४७ ॥
नैवाहं राज्यमिच्छामि सुखं मेदिनीम्। नैव सर्वानिमान् कामान् स्वर्गं जीवितुम्

naivāhaṁ rājyamicchāmi na sukhaṁ na ca medinīm।
naiva sarvānimān kāmān na svargaṁ na ca jīvitum ॥

‘मुझे न तो इस राज्य की, न सुख की, न पृथ्वी की, न इन सम्पूर्ण भोगों की, न स्वर्ग की और न जीवन की ही इच्छा है

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॥ २ · ३४ · ४८ ॥
त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ। प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन ते शपे

tvāmahaṁ satyamicchāmi nānṛtaṁ puruṣarṣabha।
pratyakṣaṁ tava satyena sukṛtena ca te śape ॥

‘पुरुषशिरोमणे! मेरे मन में यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी बनें। आपका वचन मिथ्या न होने पावे। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभ कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ

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॥ २ · ३४ · ४९ ॥
शक्यं मया तात स्थातुं क्षणमपि प्रभो। शोकं धारयस्वेमं नहि मेऽस्ति विपर्ययः

na ca śakyaṁ mayā tāta sthātuṁ kṣaṇamapi prabho।
sa śokaṁ dhārayasvemaṁ nahi me'sti viparyayaḥ ॥

‘तात! प्रभो! अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। अतः आप इस शोक को अपने भीतर ही दबा लें। मैं अपने निश्चय के विपरीत कुछ नहीं कर सकता

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॥ २ · ३४ · ५० ॥
अर्थितो ह्यस्मि कैकेय्या वनं गच्छेति राघव। मया चोक्तं व्रजामीति तत्सत्यमनुपालये

arthito hyasmi kaikeyyā vanaṁ gaccheti rāghava।
mayā coktaṁ vrajāmīti tatsatyamanupālaye ॥

‘रघुनन्दन! कैकेयी ने मुझसे यह याचना की कि ‘राम! तुम वन को चले जाओ’ मैंने वचन दिया था कि ‘अवश्य जाऊँगा’ उस सत्य का मुझे पालन करना है

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॥ २ · ३४ · ५१ ॥
मा चोत्कण्ठां कृथा देव वने रंस्यामहे वयम्। प्रशान्तहरिणाकीर्णे नानाशकुनिनादिते

mā cotkaṇṭhāṁ kṛthā deva vane raṁsyāmahe vayam।
praśāntahariṇākīrṇe nānāśakuninādite ॥

‘देव! बीच में हमें देखने या हमसे मिलने के लिये आप उत्कण्ठित न होंगे। शान्तस्वभाववाले मृगों से भरे हुए और भाँति-भाँति के पक्षियों के कलरवों से गूँजते हुए उस वन में हमलोग बड़े आनन्द से रहेंगे

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॥ २ · ३४ · ५२ ॥
पिता हि दैवतं तात देवतानामपि स्मृतम्। तस्माद् दैवतमित्येव करिष्यामि पितुर्वचः

pitā hi daivataṁ tāta devatānāmapi smṛtam।
tasmād daivatamityeva kariṣyāmi piturvacaḥ ॥

‘तात! पिता देवताओं के भी देवता माने गये हैं। अतः मैं देवता समझकर ही पिता (आप) की आज्ञा का पालन करूँगा

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॥ २ · ३४ · ५३ ॥
चतुर्दशसु वर्षेषु गतेषु नृपसत्तम। पुनर्द्रक्ष्यसि मां प्राप्तं संतापोऽयं विमुच्यताम्

caturdaśasu varṣeṣu gateṣu nṛpasattama।
punardrakṣyasi māṁ prāptaṁ saṁtāpo'yaṁ vimucyatām ॥

‘नृपश्रेष्ठ! अब यह संताप छोड़िये। चौदह वर्ष बीत जाने पर आप फिर मुझे आया हुआ देखेंगे

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॥ २ · ३४ · ५४ ॥
येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जनः। त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गतः

yena saṁstambhanīyo'yaṁ sarvo bāṣpakalo janaḥ।
sa tvaṁ puruṣaśārdūla kimarthaṁ vikriyāṁ gataḥ ॥

‘पुरुषसिंह! यहाँ जितने लोग आँसू बहा रहे हैं, इन सबको धैर्य बँधाना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं ही इतने विकल कैसे हो रहे हैं?

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॥ २ · ३४ · ५५ ॥
पुरं राष्ट्रं मही केवला मया विसृष्टा भरताय दीयताम्। अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन् वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम्

puraṁ ca rāṣṭraṁ ca mahī ca kevalā
mayā visṛṣṭā bharatāya dīyatām।
ahaṁ nideśaṁ bhavato'nupālayan
vanaṁ gamiṣyāmi cirāya sevitum ॥

‘यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप यह सब कुछ भरत को दे दीजिये। अब मैं आपके आदेश का पालन करता हुआ दीर्घकालतक वन में निवास करने के लिये यहाँ से यात्रा कर रहा हूँ

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॥ २ · ३४ · ५६ ॥
मया विसृष्टां भरतो महीमिमां सशैलखण्डां सपुरोपकाननाम्। शिवासु सीमास्वनुशास्तु केवलं त्वया यदुक्तं नृपते तथास्तु तत्

mayā visṛṣṭāṁ bharato mahīmimāṁ
saśailakhaṇḍāṁ sapuropakānanām।
śivāsu sīmāsvanuśāstu kevalaṁ
tvayā yaduktaṁ nṛpate tathāstu tat ॥

‘मेरी छोड़ी हुई पर्वतखण्डों, नगरों और उपवनोंसहित इस सारी पृथ्वी का भरत कल्याणकारिणी मर्यादाओं में स्थित रहकर पालन करें। नरेश्वर! आपने जो वचन दिया है, वह पूर्ण हो

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॥ २ · ३४ · ५७ ॥
मे तथा पार्थिव धीयते मनो महत्सु कामेषु चात्मनः प्रिये। यथा निदेशे तव शिष्टसम्मते व्यपैतु दुःखं तव मत्कृतेऽनघ

na me tathā pārthiva dhīyate mano
mahatsu kāmeṣu na cātmanaḥ priye।
yathā nideśe tava śiṣṭasammate
vyapaitu duḥkhaṁ tava matkṛte'nagha ॥

‘पृथ्वीनाथ! निष्पाप महाराज! सत्पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञा का पालन करने में मेरा मन जैसा लगता है, वैसा बड़े-बड़े भोगों में तथा अपने किसी प्रिय पदार्थ में भी नहीं लगता; अतः मेरे लिये आपके मन में जो दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये

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॥ २ · ३४ · ५८ ॥
तदद्य नैवानघ राज्यमव्ययं सर्वकामान् वसुधां मैथिलीम्। चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन् वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा

tadadya naivānagha rājyamavyayaṁ
na sarvakāmān vasudhāṁ na maithilīm।
na cintitaṁ tvāmanṛtena yojayan
vṛṇīya satyaṁ vratamastu te tathā ॥

‘निष्पाप नरेश! आज आपको मिथ्यावादी बनाकर मैं अक्षय राज्य, सब प्रकार के भोग, वसुधा का आधिपत्य, मिथिलेशकुमारी सीता तथा अन्य किसी अभिलषित पदार्थ को भी स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि ‘आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो’

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॥ २ · ३४ · ५९ ॥
फलानि मूलानि भक्षयन् वने गिरींश्च पश्यन् सरितः सरांसि च। वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः

phalāni mūlāni ca bhakṣayan vane
girīṁśca paśyan saritaḥ sarāṁsi ca।
vanaṁ praviśyaiva vicitrapādapaṁ
sukhī bhaviṣyāmi tavāstu nirvṛtiḥ ॥

‘मैं विचित्र वृक्षों से युक्त वन में प्रवेश करके फल-मूल का भोजन करता हुआ वहाँ के पर्वतों, नदियों और सरोवरों को देख-देखकर सुखी होऊँगा; इसलिये आप अपने मन को शान्त कीजिये’

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॥ २ · ३४ · ६० ॥
एवं राजा व्यसनाभिपन्न- स्तापेन दुःखेन पीड्यमानः। आलिङ्ग्य पुत्रं सुविनष्टसंज्ञो भूमिं गतो नैव चिचेष्ट किंचित्

evaṁ sa rājā vyasanābhipanna-
stāpena duḥkhena ca pīḍyamānaḥ।
āliṅgya putraṁ suvinaṣṭasaṁjño
bhūmiṁ gato naiva ciceṣṭa kiṁcit ॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर पुत्र-बिछोह के संकट में पड़े हुए राजा दशरथ ने दुःख और संताप से पीड़ित हो उन्हें छाती से लगाया और फिर अचेत होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय उनका शरीर जड़ की भाँति कुछ भी चेष्टा न कर सका

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॥ २ · ३४ · ६१ ॥
देव्यः समस्ता रुरुदुः समेता- स्तां वर्जयित्वा नरदेवपत्नीम्। रुदन् सुमन्त्रोऽपि जगाम मूर्च्छां हाहाकृतं तत्र बभूव सर्वम्

devyaḥ samastā ruruduḥ sametā-
stāṁ varjayitvā naradevapatnīm।
rudan sumantro'pi jagāma mūrcchāṁ
hāhākṛtaṁ tatra babhūva sarvam ॥

यह देख राजरानी कैकेयी को छोड़कर वहाँ एकत्र हुई अन्य सभी रानियाँ रो पड़ीं। सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्छित हो गये तथा वहाँ सब ओर हाहाकार मच गया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥