वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ३० · ४७ श्लोकाःSarga 30 · 47 ślokas

सीताका वनमें चलनेके लिये अधिक आग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीरामका उन्हें साथ ले चलनेकी स्वीकृति देना, पिता-माता और गुरुजनोंकी सेवाका महत्त्व बताना तथा सीताको वनमें चलनेकी तैयारीके लिये घरकी वस्तुओंका दान करनेकी आज्ञा देना

राम-स्वीकृति

“राम-स्वीकृति”
॥ २ · ३० · ३९–४० ॥

सीताया अचलप्रेम्णाश्रुभिश्च द्रवितः श्यामवर्णो रामोऽन्ततस्तां वनं नेतुमनुमन्यते; उभौ परस्परं करं गृहीत्वा स्निग्धस्मितमुखौ तिष्ठतः—सीतायाः शोको हर्षे परिणतः, नयने आनन्देन दीप्ते; राजभूषणभूषितं दम्पती प्रेम्णः सम्मतेश्च प्रतिमा।

सीताके अटल प्रेम और अश्रुओंसे द्रवित होकर श्यामवर्ण श्रीराम अन्ततः उन्हें वनमें साथ ले चलनेकी स्वीकृति दे देते हैं; दोनों एक-दूसरेका हाथ थामे, मुखपर स्नेहमयी मुसकान लिये खड़े हैं—सीताका शोक हर्षमें बदल गया है, नेत्र आनन्दसे चमक रहे हैं। राजसी वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित यह युगल प्रेम और सम्मतिकी मूर्ति बना है।

Moved at last by Sita's unshakable love and tears, the blue-complexioned Ram consents to take her with him to the forest; the two stand hand in hand, tender smiles on their faces — her sorrow turned to joy, her eyes bright with gladness. Robed in royal finery, the couple is the very image of devotion and accord.

॥ २ · ३० · १ ॥
सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा। वनवासनिमित्तार्थं भर्तारमिदमब्रवीत्

sāntvyamānā tu rāmeṇa maithilī janakātmajā।
vanavāsanimittārthaṁ bhartāramidamabravīt ॥

श्रीराम के समझाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवास की आज्ञा प्राप्त करने के लिये अपने पति से फिर इस प्रकार बोलीं

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॥ २ · ३० · २ ॥
सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्। प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्

sā tamuttamasaṁvignā sītā vipulavakṣasam।
praṇayāccābhimānācca paricikṣepa rāghavam ॥

सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमान के कारण विशाल वक्षःस्थलवाले श्रीरामचन्द्रजी पर आक्षेप-सा करती हुई कहने लगीं—

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॥ २ · ३० · ३ ॥
किं त्वामन्यत वैदेहः पिता मे मिथिलाधिपः। राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्

kiṁ tvāmanyata vaidehaḥ pitā me mithilādhipaḥ।
rāma jāmātaraṁ prāpya striyaṁ puruṣavigraham ॥

‘श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं; कार्यकलाप से तो स्त्री ही हैं

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॥ २ · ३० · ४ ॥
अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति। तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे

anṛtaṁ bata loko'yamajñānād yadi vakṣyati।
tejo nāsti paraṁ rāme tapatīva divākare ॥

‘नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जाने पर संसार के लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगें कि सूर्य के समान तपनेवाले श्रीरामचन्द्र में तेज और पराक्रम का अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दुःख की बात होगी

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॥ २ · ३० · ५ ॥
किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते। यत् परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्

kiṁ hi kṛtvā viṣaṇṇastvaṁ kuto vā bhayamasti te।
yat parityaktukāmastvaṁ māmananyaparāyaṇām ॥

‘आप क्या सोचकर विषाद में पड़े हुए हैं अथवा किससे आपको भय हो रहा है, जिसके कारण आप अपनी पत्नी मुझ सीता का, जो एकमात्र आपके ही आश्रित है, परित्याग करना चाहते हैं

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॥ २ · ३० · ६ ॥
द्युमत्सेनसुतं वीरं सत्यवन्तमनुव्रताम्। सावित्रीमिव मां विद्धि त्वमात्मवशवर्तिनीम्

dyumatsenasutaṁ vīraṁ satyavantamanuvratām।
sāvitrīmiva māṁ viddhi tvamātmavaśavartinīm ॥

‘जैसे सावित्री द्युमत्सेनकुमार वीरवर सत्यवान् की ही अनुगामिनी थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी ही आज्ञा के अधीन समझिये

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॥ २ · ३० · ७ ॥
त्वहं मनसा त्वन्यं द्रष्टास्मि त्वदृतेऽनघ। त्वया राघव गच्छेयं यथान्या कुलपांसनी

na tvahaṁ manasā tvanyaṁ draṣṭāsmi tvadṛte'nagha।
tvayā rāghava gaccheyaṁ yathānyā kulapāṁsanī ॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! जैसी दूसरी कोई कुलकलङ्किनी स्त्री परपुरुष पर दृष्टि रखती है, वैसी मैं नहीं हूँ। मैं तो आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष को मन से भी नहीं देख सकती। इसलिये आपके साथ ही चलूँगी (आपके बिना अकेली यहाँ नहीं रहूँगी)

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॥ २ · ३० · ८ ॥
स्वयं तु भार्यां कौमारीं चिरमध्युषितां सतीम्। शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि

svayaṁ tu bhāryāṁ kaumārīṁ ciramadhyuṣitāṁ satīm।
śailūṣa iva māṁ rāma parebhyo dātumicchasi ॥

‘श्रीराम! जिसका कुमारावस्था में ही आपके साथ विवाह हुआ है और जो चिरकालतक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ अपनी सती-साध्वी पत्नी को आप औरत की कमाई खानेवाले नट की भाँति दूसरों के हाथ में सौंपना चाहते हैं?

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॥ २ · ३० · ९ ॥
यस्य पथ्यंचरामात्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे। त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदानघ

yasya pathyaṁcarāmāttha yasya cārthe'varudhyase।
tvaṁ tasya bhava vaśyaśca vidheyaśca sadānagha ॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! आप मुझे जिसके अनुकूल चलने की शिक्षा दे रहे हैं और जिसके लिये आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया है, उस भरत के सदा ही वशवर्ती और आज्ञापालक बनकर आप ही रहिये, मैं नहीं रहूँगी

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॥ २ · ३० · १० ॥
मामनादाय वनं त्वं प्रस्थितुमर्हसि। तपो वा यदि वारण्यं स्वर्गो वा स्यात् त्वया सह

sa māmanādāya vanaṁ na tvaṁ prasthitumarhasi।
tapo vā yadi vāraṇyaṁ svargo vā syāt tvayā saha ॥

‘इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वन की ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है। यदि तपस्या करनी हो, वन में रहना हो अथवा स्वर्ग में जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ

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॥ २ · ३० · ११ ॥
मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रमः। पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव

na ca me bhavitā tatra kaścit pathi pariśramaḥ।
pṛṣṭhatastava gacchantyā vihāraśayaneṣviva ॥

‘जैसे बगीचे में घूमने और पलंग पर सोने में कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे-पीछे वन के मार्ग पर चलने में भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा

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॥ २ · ३० · १२ ॥
कुशकाशशरेषीका ये कण्टकिनो द्रुमाः। तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया

kuśakāśaśareṣīkā ye ca kaṇṭakino drumāḥ।
tūlājinasamasparśā mārge mama saha tvayā ॥

‘रास्ते में जो कुश-कास, सरकंडे, सींक और काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहने से रूई और मृगचर्म के समान सुखद प्रतीत होगा

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॥ २ · ३० · १३ ॥
महावातसमुद्भूतं यन्मामवकरिष्यति। रजो रमण तन्मन्ये परार्घ्यमिव चन्दनम्

mahāvātasamudbhūtaṁ yanmāmavakariṣyati।
rajo ramaṇa tanmanye parārghyamiva candanam ॥

‘प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधी से उड़कर मेरे शरीर पर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दन के समान समझूँगी

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॥ २ · ३० · १४ ॥
शाद्वलेषु यदा शिश्ये वनान्तर्वनगोचरा। कुथास्तरणयुक्तेषु किं स्यात् सुखतरं ततः

śādvaleṣu yadā śiśye vanāntarvanagocarā।
kuthāstaraṇayukteṣu kiṁ syāt sukhataraṁ tataḥ ॥

‘जब वन के भीतर रहूँगी, तब आपके साथ घासों पर भी सो लूँगी। रंग-बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनों से युक्त पलंगों पर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है?

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॥ २ · ३० · १५ ॥
पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु। दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्

patraṁ mūlaṁ phalaṁ yattu alpaṁ vā yadi vā bahu।
dāsyase svayamāhṛtya tanme'mṛtarasopamam ॥

‘आप अपने हाथ से लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत-रस के समान होगा

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॥ २ · ३० · १६ ॥
मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि वेश्मनः। आर्तवान्युपभुञ्जाना पुष्पाणि फलानि

na māturna pitustatra smariṣyāmi na veśmanaḥ।
ārtavānyupabhuñjānā puṣpāṇi ca phalāni ca ॥

‘ऋतु के अनुकूल जो भी फल-फूल प्राप्त होंगे, उन्हें खाकर रहूँगी और माता-पिता अथवा महल को कभी याद नहीं करूँगी

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॥ २ · ३० · १७ ॥
तत्र ततः किंचिद् द्रष्टुमर्हसि विप्रियम्। मत्कृते ते शोको भविष्यामि दुर्भरा

na ca tatra tataḥ kiṁcid draṣṭumarhasi vipriyam।
matkṛte na ca te śoko na bhaviṣyāmi durbharā ॥

‘वहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे। मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। मेरा निर्वाह आपके लिये दूभर नहीं होगा

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॥ २ · ३० · १८ ॥
यस्त्वया सह स्वर्गो निरयो यस्त्वया विना। इति जानन् परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह

yastvayā saha sa svargo nirayo yastvayā vinā।
iti jānan parāṁ prītiṁ gaccha rāma mayā saha ॥

‘आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, वही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरक के समान है। श्रीराम! मेरे इस निश्चय को जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वन को चलें

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॥ २ · ३० · १९ ॥
अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यसे। विषमद्यैव पास्यामि मा वशं द्विषतां गमम्

atha māmevamavyagrāṁ vanaṁ naiva nayiṣyase।
viṣamadyaiva pāsyāmi mā vaśaṁ dviṣatāṁ gamam ॥

‘मुझे वनवास के कष्ट से कोई घबराहट नहीं है। यदि इस दशा में भी आप अपने साथ मुझे वन में नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूँगी, परंतु शत्रुओं के अधीन होकर नहीं रहूँगी

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॥ २ · ३० · २० ॥
पश्चादपि हि दुःखेन मम नैवास्ति जीवितम्। उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम्

paścādapi hi duḥkhena mama naivāsti jīvitam।
ujjhitāyāstvayā nātha tadaiva maraṇaṁ varam ॥

नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वन को चले जायँगे तो पीछे भी इस भारी दुःख के कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है; ऐसी दशा में मैं इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ

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॥ २ · ३० · २१ ॥
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे। किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं दुःखिता

imaṁ hi sahituṁ śokaṁ muhūrtamapi notsahe।
kiṁ punardaśa varṣāṇi trīṇi caikaṁ ca duḥkhitā ॥

‘आपके विरह का यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी। फिर मुझ दुःखिया से यह चौदह वर्षोंतक कैसे सहा जायगा?’

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॥ २ · ३० · २२ ॥
इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करुणं बहु। चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्ग्य सस्वरम्

iti sā śokasaṁtaptā vilapya karuṇaṁ bahu।
cukrośa patimāyastā bhṛśamāliṅgya sasvaram ॥

इस प्रकार बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करके शोक से संतस हुई सीता शिथिल हो अपने पति को जोर से पकड़कर—उनका गाढ़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं

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॥ २ · ३० · २३ ॥
सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना। चिरसंनियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणिः

sā viddhā bahubhirvākyairdigdhairiva gajāṅganā।
cirasaṁniyataṁ bāṣpaṁ mumocāgnimivāraṇiḥ ॥

जैसे कोई हथिनी विष में बुझे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वोक्त अनेकानेक वचनद्वारा मर्माहत हो उठी थीं; अतः जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देर से रोके हुए आँसुओं को बरसाने लगीं

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॥ २ · ३० · २४ ॥
तस्याः स्फटिकसंकाशं वारि संतापसम्भवम्। नेत्राभ्यां परिसुस्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम्

tasyāḥ sphaṭikasaṁkāśaṁ vāri saṁtāpasambhavam।
netrābhyāṁ parisusrāva paṅkajābhyāmivodakam ॥

उनके दोनों नेत्रों से स्फटिक के समान निर्मल संतापजनित अश्रुजल झर रहा था, मानो दो कमलों से जल की धारा गिर रही हो

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॥ २ · ३० · २५ ॥
तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्। पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम्

tatsitāmalacandrābhaṁ mukhamāyatalocanam।
paryaśuṣyata bāṣpeṇa jaloddhṛtamivāmbujam ॥

बड़े-बड़े नेत्रों से सुशोभित और पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान कान्तिमान् उनका वह मनोहर मुख संतापजनित ताप के कारण पानी से बाहर निकाले हुए कमल के समान सूख-सा गया था

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॥ २ · ३० · २६ ॥
तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम्। उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा

tāṁ pariṣvajya bāhubhyāṁ visaṁjñāmiva duḥkhitām।
uvāca vacanaṁ rāmaḥ pariviśvāsayaṁstadā ॥

सीताजी दुःख के मारे अचेत-सी हो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें दोनों हाथों से सँभालकर हृदय से लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—

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॥ २ · ३० · २७ ॥
देवि बत दुःखेन स्वर्गमप्यभिरोचये। नहि मेऽस्ति भयं किंचित् स्वयम्भोरिव सर्वतः

na devi bata duḥkhena svargamapyabhirocaye।
nahi me'sti bhayaṁ kiṁcit svayambhoriva sarvataḥ ॥

‘देवि! तुम्हें दुःख देकर मुझे स्वर्ग का सुख मिलता हो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा। स्वयम्भू ब्रह्माजी की भाँति मुझे किसीसे किञ्चित् भी भय नहीं है

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॥ २ · ३० · २८ ॥
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने। वासं रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे

tava sarvamabhiprāyamavijñāya śubhānane।
vāsaṁ na rocaye'raṇye śaktimānapi rakṣaṇe ॥

‘शुभानने! यद्यपि वन में तुम्हारी रक्षा करने के लिये मैं सर्वथा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्राय को पूर्णरूप से जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था

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॥ २ · ३० · २९ ॥
यत् सृष्टासि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि। विहातुं मया शक्या प्रीतिरात्मवता यथा

yat sṛṣṭāsi mayā sārdhaṁ vanavāsāya maithili।
na vihātuṁ mayā śakyā prītirātmavatā yathā ॥

‘मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वन में रहने के लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता का त्याग नहीं करते

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॥ २ · ३० · ३० ॥
धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरितः पुरा। तं चाहमनुवर्तिष्ये यथा सूर्यं सुवर्चला

dharmastu gajanāsoru sadbhirācaritaḥ purā।
taṁ cāhamanuvartiṣye yathā sūryaṁ suvarcalā ॥

‘हाथी की सूँड़ के समान जाँघवाली जनककिशोरी! पूर्वकाल के सत्पुरुषों ने अपनी पत्नी के साथ रहकर जिस धर्म का आचरण किया था, उसीका मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला (संज्ञा) अपने पति सूर्य का अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो

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॥ २ · ३० · ३१ ॥
खल्वहं गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि। वचनं तन्नयति मां पितुः सत्योपबृंहितम्

na khalvahaṁ na gaccheyaṁ vanaṁ janakanandini।
vacanaṁ tannayati māṁ pituḥ satyopabṛṁhitam ॥

‘जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वन को न जाऊँ; क्योंकि पिताजी का वह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वन की ओर ले जा रहा है

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॥ २ · ३० · ३२ ॥
एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता। आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे

eṣa dharmaśca suśroṇi piturmātuśca vaśyatā।
ājñāṁ cāhaṁ vyatikramya nāhaṁ jīvitumutsahe ॥

‘सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा के अधीन रहना पुत्र का धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता

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॥ २ · ३० · ३३ ॥
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते। स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्

asvādhīnaṁ kathaṁ daivaṁ prakārairabhirādhyate।
svādhīnaṁ samatikramya mātaraṁ pitaraṁ gurum ॥

‘जो अपनी सेवा के अधीन हैं, उन प्रत्यक्ष देवता माता, पिता एवं गुरु का उल्लङ्घन करके जो सेवा के अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता दैव की विभिन्न प्रकार से किस तरह आराधना की जा सकती है

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॥ २ · ३० · ३४ ॥
यत्र त्रयं त्रयो लोकाः पवित्रं तत्समं भुवि। नान्यदस्ति शुभापाङ्गे तेनेदमभिराध्यते

yatra trayaṁ trayo lokāḥ pavitraṁ tatsamaṁ bhuvi।
nānyadasti śubhāpāṅge tenedamabhirādhyate ॥

‘सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते! जिनकी आराधना करने पर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकों की आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरु के समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतल पर नहीं है। इसीलिये भूतल के निवासी इन तीनों देवताओं की आराधना करते हैं

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॥ २ · ३० · ३५ ॥
सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः। तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता

na satyaṁ dānamānau vā yajño vāpyāptadakṣiṇāḥ।
tathā balakarāḥ sīte yathā sevā piturmatā ॥

‘सीते! पिता की सेवा करना कल्याण की प्राप्ति का जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञ ही हैं

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॥ २ · ३० · ३६ ॥
स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च। गुरुवृत्त्यनुरोधेन किंचिदपि दुर्लभम्

svargo dhanaṁ vā dhānyaṁ vā vidyā putrāḥ sukhāni ca।
guruvṛttyanurodhena na kiṁcidapi durlabham ॥

‘गुरुजनों की सेवा का अनुसरण करने से स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, पुत्र और सुख-कुछ भी दुर्लभ नहीं है

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॥ २ · ३० · ३७ ॥
देवगन्धर्वगोलोकान् ब्रह्मलोकांस्तथापरान्। प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः

devagandharvagolokān brahmalokāṁstathāparān।
prāpnuvanti mahātmāno mātāpitṛparāyaṇāḥ ॥

‘माता-पिता की सेवा में लगे रहनेवाले महात्मा पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा अन्य लोकों को भी प्राप्त कर लेते हैं

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॥ २ · ३० · ३८ ॥
मा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थितः। तथा वर्तितुमिच्छामि हि धर्मः सनातनः

sa mā pitā yathā śāsti satyadharmapathe sthitaḥ।
tathā vartitumicchāmi sa hi dharmaḥ sanātanaḥ ॥

‘इसीलिये सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थित रहनेवाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं, मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता हूँ; क्योंकि वह सनातनधर्म है

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॥ २ · ३० · ३९ ॥
मम सन्ना मतिः सीते नेतुं त्वां दण्डकावनम्। वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता

mama sannā matiḥ sīte netuṁ tvāṁ daṇḍakāvanam।
vasiṣyāmīti sā tvaṁ māmanuyātuṁ suniścitā ॥

‘सीते! ‘मैं आपके साथ वन में निवास करूँगी’—ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य ले चलने के सम्बन्ध में जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है

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॥ २ · ३० · ४० ॥
सा हि दिष्टानवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे। अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव

sā hi diṣṭānavadyāṅgi vanāya madirekṣaṇe।
anugacchasva māṁ bhīru sahadharmacarī bhava ॥

‘मदभरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वन में चलने के लिये आज्ञा देता हूँ। भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्म का आचरण करो

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॥ २ · ३० · ४१ ॥
सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च। व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम्

sarvathā sadṛśaṁ sīte mama svasya kulasya ca।
vyavasāyamanukrāntā kānte tvamatiśobhanam ॥

‘प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलने का जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है, यह तुम्हारे और मेरे कुल के सर्वथा योग्य ही है

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॥ २ · ३० · ४२ ॥
आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः। नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते

ārabhasva śubhaśroṇi vanavāsakṣamāḥ kriyāḥ।
nedānīṁ tvadṛte sīte svargo'pi mama rocate ॥

‘सुश्रोणि! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो। सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है

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॥ २ · ३० · ४३ ॥
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्। देहि चाशंसमानेभ्यः संत्वरस्व मा चिरम्

brāhmaṇebhyaśca ratnāni bhikṣukebhyaśca bhojanam।
dehi cāśaṁsamānebhyaḥ saṁtvarasva ca mā ciram ॥

‘ब्राह्मणों को रत्नस्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगनेवाले भिक्षुकों को भोजन दो। शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये

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॥ २ · ३० · ४४ ॥
भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च। रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः

bhūṣaṇāni mahārhāṇi varavastrāṇi yāni ca।
ramaṇīyāśca ye kecit krīḍārthāścāpyupaskarāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ३० · ४५ ॥
शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च। देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्

śayanīyāni yānāni mama cānyāni yāni ca।
dehi svabhṛtyavargasya brāhmaṇānāmanantaram ॥

॥ ४४–४५ ॥

तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण हों, जो-जो अच्छे-अच्छे वस्त्र हों, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हों तथा मनोरञ्जन की जो-जो सुन्दर सामग्रियाँ हों, मेरे और तुम्हारे उपयोग में आनेवाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियाँ तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमें से ब्राह्मणों को दान करने के पश्चात् जो बचें उन सबको अपने सेवकों को बाँट दो’

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॥ २ · ३० · ४६ ॥
अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मनः। क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे

anukūlaṁ tu sā bharturjñātvā gamanamātmanaḥ।
kṣipraṁ pramuditā devī dātumeva pracakrame ॥

‘स्वामी ने वन में मेरा जाना स्वीकार कर लिया—मेरा वनगमन उनके मन के अनुकूल हो गया’ यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुई और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओं का दान करने में जुट गयीं

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॥ २ · ३० · ४७ ॥
ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्। धनानि रत्नानि दातुमङ्गना प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी

tataḥ prahṛṣṭā pratipūrṇamānasā
yaśasvinī bharturavekṣya bhāṣitam।
dhanāni ratnāni ca dātumaṅganā
pracakrame dharmabhṛtāṁ manasvinī ॥

तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जाने से अत्यन्त हर्ष में भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामी के आदेश पर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणों को धन और रत्नों का दान करने के लिये उद्यत हो गयीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥