वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः २८ · २६ श्लोकाःSarga 28 · 26 ślokas

श्रीरामका वनवासके कष्टका वर्णन करते हुए सीताको वहाँ चलनेसे मना करना

राम-निवारण

“राम-निवारण”
॥ २ · २८ · ६–८ ॥

दीपालोकिते अन्तःपुरे श्यामवर्णो रामः प्रियां सीतां समीपे निषद्य करं समुद्यम्य वनस्य दुःखानि—सिंहनादान् हिंस्रमृगान् कण्टकपथान् क्षुधां शीतं च—वर्णयन् तां वनवासान्निवर्तयितुम् इच्छति; राजवस्त्राभरणभूषिता सीता साश्रुनयना अपि निश्चला भर्तुरनुगमने कृतनिश्चया शृणोति।

दीपशिखाओंसे आलोकित अन्तःपुरमें श्यामवर्ण राजकुमार श्रीराम अपनी प्रिया सीताके समीप बैठे कोमल हाथ उठाकर वनके कष्टों—सिंहगर्जना, हिंस्र पशुओं, काँटोंभरे मार्गों, भूख और शीत—का वर्णन करते हुए उन्हें वनवाससे रोकना चाहते हैं; राजसी वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित सीता नेत्रोंमें आँसू लिये भी अटल भावसे, मन-ही-मन साथ चलनेका निश्चय किये सुन रही हैं।

In a lamplit chamber the blue-complexioned prince Ram sits close to his beloved Sita and, raising a gentle hand, describes the hardships of the forest — the roar of lions, savage beasts, thorn-strewn paths, hunger and cold — seeking to dissuade her from exile; robed in royal finery, Sita listens with tears in her eyes yet an unshaken calm, already resolved within to follow him.

॥ २ · २८ · १ ॥
एवं ब्रुवतीं सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सलः। नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दुःखानि चिन्तयन्॥

sa evaṁ bruvatīṁ sītāṁ dharmajñāṁ dharmavatsalaḥ।
na netuṁ kurute buddhiṁ vane duḥkhāni cintayan॥

धर्म को जाननेवाली सीता के इस प्रकार कहने पर भी धर्मवत्सल श्रीराम ने वन में होनेवाले दुःखों को सोचकर उन्हें साथ ले जाने का विचार नहीं किया

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॥ २ · २८ · २ ॥
सान्त्वयित्वा ततस्तां तु बाष्पदूषितलोचनाम्। निवर्तनार्थं धर्मात्मा वाक्यमेतदुवाच ह॥

sāntvayitvā tatastāṁ tu bāṣpadūṣitalocanām।
nivartanārthaṁ dharmātmā vākyametaduvāca ha॥

सीता के नेत्रों में आँसू भरे हुए थे। धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले-

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॥ २ · २८ · ३ ॥
सीते महाकुलीनासि धर्मे निरता सदा। इहाचरस्व धर्मं त्वं यथा मे मनसः सुखम्॥

sīte mahākulīnāsi dharme ca niratā sadā।
ihācarasva dharmaṁ tvaṁ yathā me manasaḥ sukham॥

‘सीते! तुम अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो और सदा धर्म के आचरण में ही लगी रहती हो; अतः यहीं रहकर धर्म का पालन करो, जिससे मेरे मन को संतोष हो

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॥ २ · २८ · ४ ॥
सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले। वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे॥

sīte yathā tvāṁ vakṣyāmi tathā kāryaṁ tvayābale।
vane doṣā hi bahavo vasatastān nibodha me॥

‘सीते! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम अबला हो, वन में निवास करनेवाले मनुष्य को बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो

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॥ २ · २८ · ५ ॥
सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मतिः। बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते॥

sīte vimucyatāmeṣā vanavāsakṛtā matiḥ।
bahudoṣaṁ hi kāntāraṁ vanamityabhidhīyate॥

‘सीते! वनवास के लिये चलने का यह विचार छोड़ दो, वन को अनेक प्रकार के दोषों से व्याप्त और दुर्गम बताया जाता है

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॥ २ · २८ · ६ ॥
हितबुद्ध्या खलु वचो मयैतदभिधीयते। सदा सुखं जानामि दुःखमेव सदा वनम्॥

hitabuddhyā khalu vaco mayaitadabhidhīyate।
sadā sukhaṁ na jānāmi duḥkhameva sadā vanam॥

‘तुम्हारे हित की भावना से ही मैं ये सब बातें कह रहा हूँ। जहाँतक मेरी जानकारी है, वन में सदा सुख नहीं मिलता। वहाँ तो सदा दुःख ही मिला करता है

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॥ २ · २८ · ७ ॥
गिरिनिर्झरसम्भूता गिरिनिर्दरिवासिनाम्। सिंहानां निनदा दुःखाः श्रोतुं दुःखमतो वनम्॥

girinirjharasambhūtā girinirdarivāsinām।
siṁhānāṁ ninadā duḥkhāḥ śrotuṁ duḥkhamato vanam॥

‘पर्वतों से गिरनेवाले झरनों के शब्द को सुनकर उन पर्वतों की कन्दराओं में रहनेवाले सिंह दहाड़ने लगते हैं। उनकी वह गर्जना सुनने में बड़ी दुःखदायिनी प्रतीत होती है, इसलिये वन दुःखमय ही है

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॥ २ · २८ · ८ ॥
क्रीडमानाश्च विस्रब्धा मत्ताः शून्ये तथा मृगाः। दृष्ट्वा समभिवर्तन्ते सीते दुःखमतो वनम्॥

krīḍamānāśca visrabdhā mattāḥ śūnye tathā mṛgāḥ।
dṛṣṭvā samabhivartante sīte duḥkhamato vanam॥

‘सीते! सूने वन में निर्भय होकर क्रीड़ा करनेवाले मतवाले जंगली पशु मनुष्य को देखते ही उसपर चारों ओर से टूट पड़ते हैं; अतः वन दुःख से भरा हुआ है

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॥ २ · २८ · ९ ॥
सग्राहाः सरितश्चैव पङ्कवत्यस्तु दुस्तराः। मत्तैरपि गजैर्नित्यमतो दुःखतरं वनम्॥

sagrāhāḥ saritaścaiva paṅkavatyastu dustarāḥ।
mattairapi gajairnityamato duḥkhataraṁ vanam॥

‘वन में जो नदियाँ होती हैं, उनके भीतर ग्राह निवास करते हैं, उनमें कीचड़ अधिक होने के कारण उन्हें पार करना अत्यन्त कठिन होता है। इसके सिवा वन में मतवाले हाथी सदा घूमते रहते हैं। इस सब कारणों से वन बहुत ही दुःखदायक होता है

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॥ २ · २८ · १० ॥
लताकण्टकसंकीर्णाः कृकवाकूपनादिताः। निरपाश्च सुदुःखाश्च मार्गा दुःखमतो वनम्॥

latākaṇṭakasaṁkīrṇāḥ kṛkavākūpanāditāḥ।
nirapāśca suduḥkhāśca mārgā duḥkhamato vanam॥

‘वन के मार्ग लताओं और काँटों से भरे रहते हैं। वहाँ जंगली मुर्गे बोला करते हैं, उन मार्गों पर चलने में बड़ा कष्ट होता है तथा वहाँ आस-पास जल नहीं मिलता, इससे वन में दुःख-ही-दुःख है

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॥ २ · २८ · ११ ॥
सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले। रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्माद् दुःखमतो वनम्॥

supyate parṇaśayyāsu svayaṁbhagnāsu bhūtale।
rātriṣu śramakhinnena tasmād duḥkhamato vanam॥

‘दिनभर के परिश्रम से थके-माँदे मनुष्य को रात में जमीन के ऊपर अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्तों के बिछौने पर सोना पड़ता है, अतः वन दुःख से भरा हुआ है

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॥ २ · २८ · १२ ॥
अहोरात्रं संतोषः कर्तव्यो नियतात्मना। फलैर्वृक्षावपतितैः सीते दुःखमतो वनम्॥

ahorātraṁ ca saṁtoṣaḥ kartavyo niyatātmanā।
phalairvṛkṣāvapatitaiḥ sīte duḥkhamato vanam॥

‘सीते! वहाँ मन को वश में रखकर वृक्षों से स्वतः गिरे हुए फलों के आहार पर ही दिन-रात संतोष करना पड़ता है, अतः वन दुःख देनेवाला ही है

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॥ २ · २८ · १३ ॥
उपवासश्च कर्तव्यो यथा प्राणेन मैथिलि। जटाभारश्च कर्तव्यो वल्कलाम्बरधारणम्॥

upavāsaśca kartavyo yathā prāṇena maithili।
jaṭābhāraśca kartavyo valkalāmbaradhāraṇam॥

‘मिथिलेशकुमारी! अपनी शक्ति के अनुसार उपवास करना, सिर पर जटा का भार ढोना और वल्कल वस्त्र धारण करना-यही वहाँ की जीवनशैली है

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॥ २ · २८ · १४ ॥
देवतानां पितृणां कर्तव्यं विधिपूर्वकम्। प्राप्तानामतिथीनां नित्यशः प्रतिपूजनम्॥

devatānāṁ pitṛṇāṁ ca kartavyaṁ vidhipūrvakam।
prāptānāmatithīnāṁ ca nityaśaḥ pratipūjanam॥

‘देवताओं का, पितरों का तथा आये हुए अतिथियों का प्रतिदिन शास्त्रोक्तविधि के अनुसार पूजन करना-यह वनवासी का प्रधान कर्तव्य है

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॥ २ · २८ · १५ ॥
कार्यस्त्रिरभिषेकश्च काले काले नित्यशः। चरतां नियमेनैव तस्माद् दुःखतरं वनम्॥

kāryastrirabhiṣekaśca kāle kāle ca nityaśaḥ।
caratāṁ niyamenaiva tasmād duḥkhataraṁ vanam॥

‘वनवासी को प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों समय स्नान करना होता है। इसलिये वन बहुत ही कष्ट देनेवाला है

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॥ २ · २८ · १६ ॥
उपहारश्च कर्तव्यः कुसुमैः स्वयमाहृतैः। आर्षेण विधिना वेद्यां सीते दुःखमतो वनम्॥

upahāraśca kartavyaḥ kusumaiḥ svayamāhṛtaiḥ।
ārṣeṇa vidhinā vedyāṁ sīte duḥkhamato vanam॥

‘सीते! वहाँ स्वयं चुनकर लाये हुए फूलोंद्वारा वेदोक्त विधि से वेदी पर देवताओं की पूजा करनी पड़ती है। इसलिये वन को कष्टप्रद कहा गया है

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॥ २ · २८ · १७ ॥
यथालब्धेन कर्तव्यः संतोषस्तेन मैथिलि। यताहारैर्वनचरैः सीते दुःखमतो वनम्॥

yathālabdhena kartavyaḥ saṁtoṣastena maithili।
yatāhārairvanacaraiḥ sīte duḥkhamato vanam॥

‘मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियों को जब जैसा आहार मिल जाय उसीपर संतोष करना पड़ता है; अतः वन दुःखरूप ही है

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॥ २ · २८ · १८ ॥
अतीव वातस्तिमिरं बुभुक्षा चाति नित्यशः। भयानि महान्त्यत्र ततो दुःखतरं वनम्॥

atīva vātastimiraṁ bubhukṣā cāti nityaśaḥ।
bhayāni ca mahāntyatra tato duḥkhataraṁ vanam॥

‘वन में प्रचण्ड आँधी, घोर अन्धकार, प्रतिदिन भूख का कष्ट तथा और भी बड़े-बड़े भय प्राप्त होते हैं, अतः वन अत्यन्त कष्टप्रद है

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॥ २ · २८ · १९ ॥
सरीसृपाश्च बहवो बहुरूपाश्च भामिनि। चरन्ति पथि ते दर्पात् ततो दुःखतरं वनम्॥

sarīsṛpāśca bahavo bahurūpāśca bhāmini।
caranti pathi te darpāt tato duḥkhataraṁ vanam॥

‘भामिनि! वहाँ बहुत-से पहाड़ी सर्प, जो अनेक प्रकार के रूपवाले होते हैं, दर्पवश बीच रास्ते में विचरते रहते हैं; अतः वन अत्यन्त कष्टदायक है

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॥ २ · २८ · २० ॥
नदीनिलयनाः सर्पा नदीकुटिलगामिनः। तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दुःखतरं वनम्॥

nadīnilayanāḥ sarpā nadīkuṭilagāminaḥ।
tiṣṭhantyāvṛtya panthānamato duḥkhataraṁ vanam॥

‘जो नदियों में निवास करते और नदियों के समान ही कुटिल गति से चलते हैं, ऐसे बहुसंख्यक सर्प वन में रास्ते को घेरकर पड़े रहते हैं; इसलिये वन बहुत ही कष्टदायक है

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॥ २ · २८ · २१ ॥
पतङ्गा वृश्चिकाः कीटा दंशाश्च मशकैः सह। बाधन्ते नित्यमबले सर्वं दुःखमतो वनम्॥

pataṅgā vṛścikāḥ kīṭā daṁśāśca maśakaiḥ saha।
bādhante nityamabale sarvaṁ duḥkhamato vanam॥

‘अबले! पतंगे, बिच्छू कीड़े, डाँस और मच्छर वहाँ सदा कष्ट पहुँचाते रहते हैं; अतः सारा वन दुःखरूप ही है

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॥ २ · २८ · २२ ॥
द्रुमाः कण्टकिनश्चैव कुशाः काशाश्च भामिनि। वने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दुःखमतो वनम्॥

drumāḥ kaṇṭakinaścaiva kuśāḥ kāśāśca bhāmini।
vane vyākulaśākhāgrāstena duḥkhamato vanam॥

‘भामिनि! वन में काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओं के अग्रभाग सब ओर फैले हुए होते हैं; इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है

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॥ २ · २८ · २३ ॥
कायक्लेशाश्च बहवो भयानि विविधानि च। अरण्यवासे वसतो दुःखमेव सदा वनम्॥

kāyakleśāśca bahavo bhayāni vividhāni ca।
araṇyavāse vasato duḥkhameva sadā vanam॥

‘वन में निवास करनेवाले मनुष्य को बहुत-से शारीरिक क्लेशों और नाना प्रकार के भयों का सामना करना पड़ता है, अतः वन सदा दुःखरूप ही होता है

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॥ २ · २८ · २४ ॥
क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मतिः। भेतव्यं भेतव्ये दुःखं नित्यमतो वनम्॥

krodhalobhau vimoktavyau kartavyā tapase matiḥ।
na bhetavyaṁ ca bhetavye duḥkhaṁ nityamato vanam॥

‘वहाँ क्रोध और लोभ को त्याग देना होता है, तपस्या में मन लगाना पड़ता है और जहाँ भय का स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होने की आवश्यकता होती है; अतः वन में सदा दुःख-ही-दुःख है

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॥ २ · २८ · २५ ॥
तदलं ते वनं गत्वा क्षेमं नहि वनं तव। विमृशन्निव पश्यामि बहुदोषकरं वनम्॥

tadalaṁ te vanaṁ gatvā kṣemaṁ nahi vanaṁ tava।
vimṛśanniva paśyāmi bahudoṣakaraṁ vanam॥

‘इसलिये तुम्हारा वन में जाना ठीक नहीं है। वहाँ जाकर तुम सकुशल नहीं रह सकती। मैं बहुत सोच-विचारकर देखता और समझता हूँ--कि वन में रहना अनेक दोषों का उत्पादक बहुत ही कष्टदायक है

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॥ २ · २८ · २६ ॥
वनं तु नेतुं कृता मतिर्यदा बभूव रामेण तदा महात्मना। तस्य सीता वचनं चकार तं ततोऽब्रवीद् राममिदं सुदुःखिता॥

vanaṁ tu netuṁ na kṛtā matiryadā
babhūva rāmeṇa tadā mahātmanā।
na tasya sītā vacanaṁ cakāra taṁ
tato'bravīd rāmamidaṁ suduḥkhitā॥

जब महात्मा श्रीराम ने उस समय सीता को वन में ले जाने का विचार नहीं किया, तब सीता ने भी उनकी उस बात को नहीं माना। वे अत्यन्त दुःखी होकर श्रीराम से इस प्रकार बोलीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २८ ॥