वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः २५ · ४७ श्लोकाःSarga 25 · 47 ślokas

कौसल्याका श्रीरामकी वनयात्राके लिये मङ्गलकामनापूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीरामका उन्हें प्रणाम करके सीताके भवनकी ओर जाना

कौसल्या-रक्षाबन्धन

“कौसल्या-रक्षाबन्धन”
॥ २ · २५ · ३७–३८ ॥

मातृभावेन कौसल्या रामस्य ललाटे चन्दनमक्षतांश्च निदधाति, हस्ते च रक्षाकरीमौषधीं बध्नाति मन्त्रान् जपन्ती; पार्श्वे वृद्धो ब्राह्मणो वेद्यां होमाग्निं परिचरति।

शोकको धैर्यमें बदलकर माता कौसल्या श्रीरामके मस्तकपर चन्दन और अक्षत लगाकर मन्त्र पढ़ती हुई उनकी कलाईपर रक्षाकारिणी विशल्यकरणी औषधि बाँध रही हैं, उनके नेत्र स्नेहाश्रुसे भरे हैं; पास ही एक वृद्ध ब्राह्मण वेदीपर प्रज्वलित होमाग्निमें आहुति दे रहे हैं और श्वेत पुष्प, घृत तथा कुश सजे हुए हैं।

Her grief mastered into devotion, the queen-mother Kausalya marks the brow of the blue-complexioned Ram with sandal and sacred rice and, murmuring mantras with tear-bright eyes, binds a protective herb-amulet upon his wrist; beside them an aged brahmana tends the oblation on a small fire-altar arrayed with white flowers, ghee and kusha-grass.

॥ २ · २५ · १ ॥
सा विनीय तमायासमुपस्पृश्य जलं शुचि। चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनी॥

sā vinīya tamāyāsamupaspṛśya jalaṁ śuci।
cakāra mātā rāmasya maṅgalāni manasvinī॥

तदनन्तर उस क्लेशजनक शोक को मन से निकालकर श्रीराम की मनस्विनी माता कौसल्या ने पवित्र जल से आचमन किया, फिर वे यात्राकालिक मङ्गलकृत्यों का अनुष्ठान करने लगीं

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २ ॥
शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम। शीघ्रं विनिवर्तस्व वर्तस्व सतां क्रमे॥

na śakyase vārayituṁ gacchedānīṁ raghūttama।
śīghraṁ ca vinivartasva vartasva ca satāṁ krame॥

(इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं—) ‘रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३ ॥
यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या नियमेन च। वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥

yaṁ pālayasi dharmaṁ tvaṁ prītyā ca niyamena ca।
sa vai rāghavaśārdūla dharmastvāmabhirakṣatu॥

‘रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नता के साथ जिस धर्म का पालन करते हो, वही सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४ ॥
येभ्यः प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च। ते त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभिः॥

yebhyaḥ praṇamase putra deveṣvāyataneṣu ca।
te ca tvāmabhirakṣantu vane saha maharṣibhiḥ॥

‘बेटा! देवस्थानों और मन्दिरों में जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियों के साथ वन में तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ५ ॥
यानि दत्तानि तेऽस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता। तानि त्वामभिरक्षन्तु गुणैः समुदितं सदा॥

yāni dattāni te'strāṇi viśvāmitreṇa dhīmatā।
tāni tvāmabhirakṣantu guṇaiḥ samuditaṁ sadā॥

‘तुम सद्गुणों से प्रकाशित हो, बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने तुम्हें जो-जो अस्त्र दिये हैं, वे सब-के-सब सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ६ ॥
पितृशुश्रूषया पुत्र मातृशुश्रूषया तथा। सत्येन महाबाहो चिरं जीवाभिरक्षितः॥

pitṛśuśrūṣayā putra mātṛśuśrūṣayā tathā।
satyena ca mahābāho ciraṁ jīvābhirakṣitaḥ॥

‘महाबाहु पुत्र! तुम पिता की शुश्रूषा, माता की सेवा तथा सत्य के पालन से सुरक्षित होकर चिरंजीवी बने रहो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ७ ॥
समित्कुशपवित्राणि वेद्यश्चायतनानि च। स्थण्डिलानि विप्राणां शैला वृक्षाः क्षुपा ह्रदाः। पतङ्गाः पन्नगाः सिंहास्त्वां रक्षन्तु नरोत्तम॥

samitkuśapavitrāṇi vedyaścāyatanāni ca।
sthaṇḍilāni ca viprāṇāṁ śailā vṛkṣāḥ kṣupā hradāḥ।
pataṅgāḥ pannagāḥ siṁhāstvāṁ rakṣantu narottama॥

‘नरश्रेष्ठ! समिधा, कुशा, पवित्री, वेदियाँ, मन्दिर, ब्राह्मणों के देवपूजनसम्बन्धी स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप (छोटी शाखावाले वृक्ष), जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वन में तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ८ ॥
स्वस्ति साध्याश्च विश्वे मरुतश्च महर्षिभिः। स्वस्ति धाता विधाता स्वस्ति पूषा भगोऽर्यमा॥

svasti sādhyāśca viśve ca marutaśca maharṣibhiḥ।
svasti dhātā vidhātā ca svasti pūṣā bhago'ryamā॥

‘साध्य, विश्वेदेव तथा महर्षियोंसहित मरुद्गण तुम्हारा कल्याण करें; धाता और विधाता तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों; पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ९ ॥
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥

lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā।
ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २५ · १० ॥
दिनानि मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥

dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā।
śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ॥

॥ ९–१० ॥

‘वे इन्द्र आदि समस्त लोकपाल, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और मुहूर्त सदा तुम्हारा मङ्गल करें। बेटा! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ११ ॥
स्कन्दश्च भगवान् देवः सोमश्च सबृहस्पतिः। सप्तर्षयो नारदश्च ते त्वां रक्षन्तु सर्वतः॥

skandaśca bhagavān devaḥ somaśca sabṛhaspatiḥ।
saptarṣayo nāradaśca te tvāṁ rakṣantu sarvataḥ॥

‘भगवान् स्कन्ददेव, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षिगण और नारद—ये सभी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १२ ॥
ते चापि सर्वतः सिद्धा दिशश्च सदिगीश्वराः। स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्वां पुत्र नित्यशः॥

te cāpi sarvataḥ siddhā diśaśca sadigīśvarāḥ।
stutā mayā vane tasmin pāntu tvāṁ putra nityaśaḥ॥

‘बेटा! वे प्रसिद्ध सिद्धगण, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी की हुई स्तुति से संतुष्ट हो उस वन में सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १३ ॥
शैलाः सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च। द्यौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्च सचराचरः॥

śailāḥ sarve samudrāśca rājā varuṇa eva ca।
dyaurantarikṣaṁ pṛthivī vāyuśca sacarācaraḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २५ · १४ ॥
नक्षत्राणि सर्वाणि ग्रहाश्च सह दैवतैः। अहोरात्रे तथा संध्ये पान्तु त्वां वनमाश्रितम्॥

nakṣatrāṇi ca sarvāṇi grahāśca saha daivataiḥ।
ahorātre tathā saṁdhye pāntu tvāṁ vanamāśritam॥

॥ १३–१४ ॥

‘समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, चराचर प्राणी, समस्त नक्षत्र, देवताओंसहित ग्रह, दिन और रात तथा दोनों संध्याएँ—ये सब-के-सब वन में जाने पर सदा तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १५ ॥
ऋतवश्चापि षट् चान्ये मासाः संवत्सरास्तथा। कलाश्च काष्ठाश्च तथा तव शर्म दिशन्तु ते॥

ṛtavaścāpi ṣaṭ cānye māsāḥ saṁvatsarāstathā।
kalāśca kāṣṭhāśca tathā tava śarma diśantu te॥

‘छः ऋतुएँ, अन्यान्य मास, संवत्सर, कला और काष्ठा—ये सब तुम्हें कल्याण प्रदान करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १६ ॥
महावनेऽपि चरतो मुनिवेषस्य धीमतः। तथा देवाश्च दैत्याश्च भवन्तु सुखदाः सदा॥

mahāvane'pi carato muniveṣasya dhīmataḥ।
tathā devāśca daityāśca bhavantu sukhadāḥ sadā॥

‘मुनि का वेष धारण करके उस विशाल वन में विचरते हुए तुझ बुद्धिमान् पुत्र के लिये समस्त देवता और दैत्य सदा सुखदायक हों

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १७ ॥
राक्षसानां पिशाचानां रौद्राणां क्रूरकर्मणाम्। क्रव्यादानां सर्वेषां मा भूत् पुत्रक ते भयम्॥

rākṣasānāṁ piśācānāṁ raudrāṇāṁ krūrakarmaṇām।
kravyādānāṁ ca sarveṣāṁ mā bhūt putraka te bhayam॥

‘बेटा! तुम्हें भयंकर राक्षसों, क्रूरकर्मा पिशाचों तथा समस्त मांसभक्षी जन्तुओं से कभी भय न हो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १८ ॥
प्लवगा वृश्चिका दंशा मशकाश्चैव कानने। सरीसृपाः कीटाश्च मा भूवन् गहने तव॥

plavagā vṛścikā daṁśā maśakāścaiva kānane।
sarīsṛpāḥ kīṭāśca mā bhūvan gahane tava॥

‘वन में जो मेढक या वानर, बिच्छू, डाँस, मच्छर, पर्वतीय सर्प और कीड़े होते हैं, वे उस गहन वन में तुम्हारे लिये हिंसक न हों

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · १९ ॥
महाद्विपाश्च सिंहाश्च व्याघ्रा ऋक्षाश्च दंष्ट्रिणः। महिषाः शृङ्गिणो रौद्रा ते द्रुह्यन्तु पुत्रक॥

mahādvipāśca siṁhāśca vyāghrā ṛkṣāśca daṁṣṭriṇaḥ।
mahiṣāḥ śṛṅgiṇo raudrā na te druhyantu putraka॥

‘पुत्र! बड़े-बड़े हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़वाले अन्य जीव तथा विशाल सींगवाले भयंकर भैंसे वन में तुमसे द्रोह न करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २० ॥
नृमांसभोजना रौद्रा ये चान्ये सर्वजातयः। मा त्वां हिंसिषुः पुत्र मया सम्पूजितास्त्विह॥

nṛmāṁsabhojanā raudrā ye cānye sarvajātayaḥ।
mā ca tvāṁ hiṁsiṣuḥ putra mayā sampūjitāstviha॥

‘वत्स! इनके सिवा जो सभी जातियों में नरमांसभक्षी भयंकर प्राणी हैं, वे मेरे द्वारा यहाँ पूजित होकर वन में तुम्हारी हिंसा न करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २१ ॥
आगमास्ते शिवाः सन्तु सिध्यन्तु पराक्रमाः। सर्वसम्पत्तयो राम स्वस्तिमान् गच्छ पुत्रक॥

āgamāste śivāḥ santu sidhyantu ca parākramāḥ।
sarvasampattayo rāma svastimān gaccha putraka॥

‘बेटा राम! सभी मार्ग तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों। तुम्हारे पराक्रम सफल हों तथा तुम्हें सब सम्पत्तियाँ प्राप्त होती रहें। तुम सकुशल यात्रा करो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २२ ॥
स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यः पुनः पुनः। सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये ते परिपन्थिनः॥

svasti te'stvāntarikṣebhyaḥ pārthivebhyaḥ punaḥ punaḥ।
sarvebhyaścaiva devebhyo ye ca te paripanthinaḥ॥

‘तुम्हें आकाशचारी प्राणियों से, भूतल के जीव-जन्तुओं से, समस्त देवताओं से तथा जो तुम्हारे शत्रु हैं, उनसे भी सदा कल्याण प्राप्त होता रहे

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २३ ॥
शुक्रः सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा। पान्तु त्वामर्चिता राम दण्डकारण्यवासिनम्॥

śukraḥ somaśca sūryaśca dhanado'tha yamastathā।
pāntu tvāmarcitā rāma daṇḍakāraṇyavāsinam॥

‘श्रीराम! शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर तथा यम—ये मुझसे पूजित हो दण्डकारण्य में निवास करते समय सदा तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २४ ॥
अग्निर्वायुस्तथा धूमो मन्त्राश्चर्षिमुखच्युताः। उपस्पर्शनकाले तु पान्तु त्वां रघुनन्दन॥

agnirvāyustathā dhūmo mantrāścarṣimukhacyutāḥ।
upasparśanakāle tu pāntu tvāṁ raghunandana॥

‘रघुनन्दन! स्नान और आचमन के समय अग्नि, वायु, धूम तथा ऋषियों के मुख से निकले हुए मन्त्र तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २५ ॥
सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूतकर्तृ तथर्षयः। ये शेषाः सुरास्ते तु रक्षन्तु वनवासिनम्॥

sarvalokaprabhurbrahmā bhūtakartṛ tatharṣayaḥ।
ye ca śeṣāḥ surāste tu rakṣantu vanavāsinam॥

‘समस्त लोकों के स्वामी ब्रह्मा, जगत् के कारणभूत परब्रह्म, ऋषिगण तथा उनके अतिरिक्त जो देवता हैं, वे सब-के-सब वनवास के समय तुम्हारी रक्षा करें

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २६ ॥
इति माल्यैः सुरगणान् गन्धैश्चापि यशस्विनी। स्तुतिभिश्चानुरूपाभिरानर्चायतलोचना॥

iti mālyaiḥ suragaṇān gandhaiścāpi yaśasvinī।
stutibhiścānurūpābhirānarcāyatalocanā॥

ऐसा कहकर विशाललोचना यशस्विनी रानी कौसल्या ने पुष्पमाला और गन्ध आदि उपचारों से तथा अनुरूप स्तुतियोंद्वारा देवताओं का पूजन किया

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २७ ॥
ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना। हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात्॥

jvalanaṁ samupādāya brāhmaṇena mahātmanā।
hāvayāmāsa vidhinā rāmamaṅgalakāraṇāt॥

उन्होंने श्रीराम की मङ्गलकामना से अग्नि को लाकर एक महात्मा ब्राह्मण द्वारा उसमें विधिपूर्वक होम करवाया

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २८ ॥
घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्षपान्। उपसम्पादयामास कौसल्या परमाङ्गना॥

ghṛtaṁ śvetāni mālyāni samidhaścaiva sarṣapān।
upasampādayāmāsa kausalyā paramāṅganā॥

श्रेष्ठ नारी महारानी कौसल्या ने घी, श्वेत पुष्प और माला, समिधा तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मण के समीप रखवा दीं

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · २९ ॥
उपाध्यायः विधिना हुत्वा शान्तिमनामयम्। हुतहव्यावशेषेण बाह्यं बलिमकल्पयत्॥

upādhyāyaḥ sa vidhinā hutvā śāntimanāmayam।
hutahavyāvaśeṣeṇa bāhyaṁ balimakalpayat॥

पुरोहितजी ने समस्त उपद्रवों की शान्ति और आरोग्य के उद्देश्य से विधिपूर्वक अग्नि में होम करके हवन से बचे हुए हविष्य के द्वारा होम की वेदी से बाहर दसों दिशाओं में इन्द्र आदि लोकपालों के लिये बलि अर्पित की

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३० ॥
मधुदध्यक्षतघृतैः स्वस्तिवाच्य द्विजांस्ततः। वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम्॥

madhudadhyakṣataghṛtaiḥ svastivācya dvijāṁstataḥ।
vācayāmāsa rāmasya vane svastyayanakriyām॥

तदनन्तर स्वस्तिवाचन के उद्देश्य से ब्राह्मणों को मधु, दही, अक्षत और घृत अर्पित करके ‘वन में श्रीराम का सदा मङ्गल हो’ इस कामना से कौसल्याजी ने उन सबसे स्वस्त्ययनसम्बन्धी मन्त्रों का पाठ करवाया

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३१ ॥
ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी। दक्षिणां प्रददौ काम्यां राघवं चेदमब्रवीत्॥

tatastasmai dvijendrāya rāmamātā yaśasvinī।
dakṣiṇāṁ pradadau kāmyāṁ rāghavaṁ cedamabravīt॥

इसके बाद यशस्विनी श्रीराममाता ने उन विप्रवर पुरोहितजी को उनकी इच्छे के अनुसार दक्षिणा दी और श्रीरघुनाथजी से इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३२ ॥
यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते। वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

yanmaṅgalaṁ sahasrākṣe sarvadevanamaskṛte।
vṛtranāśe samabhavat tat te bhavatu maṅgalam॥

‘वृत्रासुर का नाश करने के निमित्त सर्वदेववन्दित सहस्रनेत्रधारी इन्द्र को जो मङ्गलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी हो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३३ ॥
यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा। अमृतं प्रार्थयानस्य तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

yanmaṅgalaṁ suparṇasya vinatākalpayat purā।
amṛtaṁ prārthayānasya tat te bhavatu maṅgalam॥

‘पूर्वकाल में विनतादेवी ने अमृत लाने की इच्छावाले अपने पुत्र गरुड के लिये जो मङ्गलकृत्य किया था, वही मङ्गल तुम्हें भी प्राप्त हो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३४ ॥
अमृतोत्पादने दैत्यान् घ्नतो वज्रधरस्य यत्। आदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

amṛtotpādane daityān ghnato vajradharasya yat।
āditirmaṅgalaṁ prādāt tat te bhavatu maṅgalam॥

‘अमृत की उत्पत्ति के समय दैत्यों का संहार करनेवाले वज्रधारी इन्द्र के लिये माता अदितिने जो मङ्गलमय आशीर्वाद दिया था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी सुलभ हो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३५ ॥
त्रिविक्रमान् प्रक्रमतो विष्णोरतुलतेजसः। यदासीन्मङ्गलं राम तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

trivikramān prakramato viṣṇoratulatejasaḥ।
yadāsīnmaṅgalaṁ rāma tat te bhavatu maṅgalam॥

‘श्रीराम! तीन पगों को बढ़ाते हुए अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णु के लिये जो मङ्गलाशंसा की गयी थी, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी प्राप्त हो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३६ ॥
ऋषयः सागरा द्वीपा वेदा लोका दिशश्च ते। मङ्गलानि महाबाहो दिशन्तु शुभमङ्गलम्॥

ṛṣayaḥ sāgarā dvīpā vedā lokā diśaśca te।
maṅgalāni mahābāho diśantu śubhamaṅgalam॥

‘महाबाहो! ऋषि, समुद्र, द्वीप, वेद, समस्त लोक और दिशाएँ तुम्हें मङ्गल प्रदान करें। तुम्हारा सदा शुभ मङ्गल हो’

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३७ ॥
इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी। गन्धांश्चापि समालभ्य राममायतलोचना॥

iti putrasya śeṣāśca kṛtvā śirasi bhāminī।
gandhāṁścāpi samālabhya rāmamāyatalocanā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २५ · ३८ ॥
औषधीं सुसिद्धार्थां विशल्यकरणीं शुभाम्। चकार रक्षां कौसल्या मन्त्रैरभिजजाप च॥

auṣadhīṁ ca susiddhārthāṁ viśalyakaraṇīṁ śubhām।
cakāra rakṣāṁ kausalyā mantrairabhijajāpa ca॥

॥ ३७–३८ ॥

इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौसल्या ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथों को सिद्ध करनेवाली विशल्यकरणी नामक शुभ औषधि लेकर रक्षा के उद्देश्य से मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीराम के हाथ में बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लाने के लिये मन्त्र का जप भी किया

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ३९ ॥
उवाचापि प्रहृष्टेव सा दुःखवशवर्तिनी। वाङ्मात्रेण भावेन वाचा संसज्जमानया॥

uvācāpi prahṛṣṭeva sā duḥkhavaśavartinī।
vāṅmātreṇa na bhāvena vācā saṁsajjamānayā॥

तदनन्तर दुःख के अधीन हुई कौसल्या ने ऊपर से प्रसन्न-सी होकर मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण भी किया। उस समय वे वाणीमात्र से ही मन्त्रोच्चारण कर सकीं, हृदय से नहीं (क्योंकि हृदय श्रीराम के वियोग की सम्भावना से व्यथित था, इसीलिये) वे खेद से गद्गद, लड़खड़ाती हुई वाणी से मन्त्र बोल रही थीं

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४० ॥
आनन्द्य मूर्ध्नि चाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनी। अवदत् पुत्रमिष्टार्थं गच्छ राम यथासुखम्॥

ānandya mūrdhni cāghrāya pariṣvajya yaśasvinī।
avadat putramiṣṭārthaṁ gaccha rāma yathāsukham॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २५ · ४१ ॥
अरोगं सर्वसिद्धार्थमयोध्यां पुनरागतम्। पश्यामि त्वां सुखं वत्स संधितं राजवर्त्मसु॥

arogaṁ sarvasiddhārthamayodhyāṁ punarāgatam।
paśyāmi tvāṁ sukhaṁ vatsa saṁdhitaṁ rājavartmasu॥

॥ ४०–४१ ॥

इसके बाद उनके मस्तक को कुछ झुकाकर यशस्विनी माता ने सूँघा और बेटे को हृदय से लगाकर कहा—‘वत्स राम! तुम सफलमनोरथ होकर सुखपूर्वक वन को जाओ। जब पूर्णकाम होकर रोगरहित सकुशल अयोध्या में लौटोगे, उस समय तुम्हें राजमार्ग पर स्थित देखकर सुखी होऊँगी

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४२ ॥
प्रणष्टदुःखसंकल्पा हर्षविद्योतितानना। द्रक्ष्यामि त्वां वनात् प्राप्तं पूर्णचन्द्रमिवोदितम्॥

praṇaṣṭaduḥkhasaṁkalpā harṣavidyotitānanā।
drakṣyāmi tvāṁ vanāt prāptaṁ pūrṇacandramivoditam॥

‘उस समय मेरे दुःखपूर्ण संकल्प मिट जायँगे, मुख पर हर्षजनित उल्लास छा जायगा और मैं वन से आये हुए तुमको पूर्णिमा की रात में उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा की भाँति देखूँगी

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४३ ॥
भद्रासनगतं राम वनवासादिहागतम्। द्रक्ष्यामि पुनस्त्वां तु तीर्णवन्तं पितुर्वचः॥

bhadrāsanagataṁ rāma vanavāsādihāgatam।
drakṣyāmi ca punastvāṁ tu tīrṇavantaṁ piturvacaḥ॥

‘श्रीराम! वनवास से यहाँ आकर पिता की प्रतिज्ञा को पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासन पर बैठोगे, उस समय मैं पुनः प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा दर्शन करूँगी

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४४ ॥
मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागतः। वध्वाश्च मम नित्यं त्वं कामान् संवर्ध याहि भोः॥

maṅgalairupasampanno vanavāsādihāgataḥ।
vadhvāśca mama nityaṁ tvaṁ kāmān saṁvardha yāhi bhoḥ॥

‘अब जाओ और वनवास से यहाँ लौटकर राजोचित मङ्गलमय वस्त्राभूषणों से विभूषित हो तुम सदा मेरी बहू सीता की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते रहो

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४५ ॥
मयार्चिता देवगणाः शिवादयो महर्षयो भूतगणाः सुरोरगाः। अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते हितानि कांक्षन्तु दिशश्च राघव॥

mayārcitā devagaṇāḥ śivādayo maharṣayo bhūtagaṇāḥ suroragāḥ।
abhiprayātasya vanaṁ cirāya te hitāni kāṁkṣantu diśaśca rāghava॥

‘रघुनन्दन! मैंने सदा जिनका पूजन और सम्मान किया है, वे शिव आदि देवता, महर्षि, भूतगण, देवोपम नाग और सम्पूर्ण दिशाएँ—ये सब-के-सब वन में जाने पर चिरकालतक तुम्हारे हितसाधन की कामना करते रहें’

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४६ ॥
अतीव चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना समाप्य स्वस्त्ययनं यथाविधि। प्रदक्षिणं चापि चकार राघवं पुनः पुनश्चापि निरीक्ष्य सस्वजे॥

atīva cāśrupratipūrṇalocanā samāpya ca svastyayanaṁ yathāvidhi।
pradakṣiṇaṁ cāpi cakāra rāghavaṁ punaḥ punaścāpi nirīkṣya sasvaje॥

इस प्रकार माता ने नेत्रों में अत्यन्त आँसू भरकर विधिपूर्वक वह स्वस्तिवाचन कर्म पूर्ण किया। फिर श्रीराम की परिक्रमा की और बारंबार उनकी ओर देखकर उन्हें छाती से लगाया

English translation coming soon.

॥ २ · २५ · ४७ ॥
तया हि देव्या कृतप्रदक्षिणो निपीड्य मातुश्चरणौ पुनः पुनः। जगाम सीतानिलयं महायशाः राघवः प्रज्वलितस्तया श्रिया॥

tayā hi devyā ca kṛtapradakṣiṇo nipīḍya mātuścaraṇau punaḥ punaḥ।
jagāma sītānilayaṁ mahāyaśāḥ sa rāghavaḥ prajvalitastayā śriyā॥

देवी कौसल्या ने जब श्रीराम की प्रदक्षिणा कर ली, तब महायशस्वी रघुनाथजी बारंबार माता के चरणों को दबाकर प्रणाम करके माता की मङ्गलकामना-जनित उत्कृष्ट शोभा से सम्पन्न हो सीताजी के महल की ओर चल दिये

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २५ ॥