वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः २४ · ३८ श्लोकाःSarga 24 · 38 ślokas

विलाप करती हुई कौसल्याका श्रीरामसे अपनेको भी साथ ले चलनेके लिये आग्रह करना तथा पतिकी सेवा ही नारीका धर्म है, यह बताकर श्रीरामका उन्हें रोकना और वन जानेके लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना

कौसल्या-निवारण

“कौसल्या-निवारण”
॥ २ · २४ · १२–१९ ॥

शोकाकुला कौसल्या अश्रुमुखी उत्थाय पुत्रं रामं गाढं गृह्णाति, मृगवधूरिव वनं नेतुं याचते; शान्तः श्यामवर्णो मुकुटधारी रामस्तां पाणिना मृदु निवारयन् अन्येन हस्तेन उपदिशति यत् पत्याः शुश्रूषैव नार्याः सनातनो धर्मः।

दीपकी आभासे भरे अन्तःपुरमें शोकसे व्याकुल अश्रुमुखी माता कौसल्या उठकर अपने पुत्र श्रीरामको पकड़ रही हैं और हरिणीकी भाँति अपनेको भी वनमें साथ ले चलनेकी विनती कर रही हैं; नीलवर्णके मुकुटधारी शान्त श्रीराम एक हाथसे उन्हें कोमलतापूर्वक रोकते और दूसरा हाथ उठाकर समझा रहे हैं कि वृद्ध पति-राजकी सेवा ही नारीका सनातन धर्म है।

In a lamplit inner chamber, the grief-stricken queen-mother Kausalya, tears on her cheeks, rises and clings to her son Ram, begging like a doe to be taken with him into exile; the serene, blue-complexioned crown-banded Ram gently stays her with one hand while the other is raised in calm instruction that serving her aged husband the king is a wife's eternal dharma.

॥ २ · २४ · १ ॥
तं समीक्ष्य व्यवसितं पितुर्निर्देशपालने। कौसल्या बाष्पसंरुद्धा वचो धर्मिष्ठमब्रवीत्॥

taṁ samīkṣya vyavasitaṁ piturnirdeśapālane।
kausalyā bāṣpasaṁruddhā vaco dharmiṣṭhamabravīt॥

कौसल्या ने जब देखा कि श्रीराम ने पिता की आज्ञा के पालन का ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओं से रुँधी हुई गद्गद वाणी में धर्मात्मा श्रीराम से इस प्रकार बोलीं—

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २ ॥
अदृष्टदुःखो धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः। मयि जातो दशरथात् कथमुञ्छेन वर्तयेत्॥

adṛṣṭaduḥkho dharmātmā sarvabhūtapriyaṁvadaḥ।
mayi jāto daśarathāt kathamuñchena vartayet॥

‘हाय! जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियों से सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथ से मेरे द्वारा हुआ है, वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्ति से—खेतों में गिरे हुए अनाज के एक-एक दाने को बीनकर कैसे जीवन-निर्वाह कर सकेगा?

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३ ॥
यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते। कथं भोक्ष्यते रामो वने मूलफलान्ययम्॥

yasya bhṛtyāśca dāsāśca mṛṣṭānyannāni bhuñjate।
kathaṁ sa bhokṣyate rāmo vane mūlaphalānyayam॥

‘जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वन में फल-मूल का आहार कैसे करेंगे?

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ४ ॥
एतच्छ्रद्दधेच्छ्रुत्वा कस्य वा भवेद् भयम्। गुणवान् दयितो राज्ञः काकुत्स्थो यद्विवास्यते॥

ka etacchraddadhecchrutvā kasya vā na bhaved bhayam।
guṇavān dayito rājñaḥ kākutstho yadvivāsyate॥

‘जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथ के प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ-कुल-भूषण श्रीराम को जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इसपर विश्वास करेगा? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा?

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ५ ॥
नूनं तु बलवाँल्लोके कृतान्तः सर्वमादिशन्। लोके रामाभिरामस्त्वं वनं यत्र गमिष्यसि॥

nūnaṁ tu balavām̐lloke kṛtāntaḥ sarvamādiśan।
loke rāmābhirāmastvaṁ vanaṁ yatra gamiṣyasi॥

‘श्रीराम! निश्चय ही इस जगत् में दैव सबसे बड़ा बलवान् है। उसकी आज्ञा सबके ऊपर चलती है—वही सबको सुख-दुःख से संयुक्त करता है; क्योंकि उसीके प्रभाव में आकर तुम्हारे-जैसा लोकप्रिय मनुष्य भी वन में जाने को उद्यत है

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ६ ॥
अयं तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारुतः। विलापदुःखसमिधो रुदिताश्रुहुताहुतिः॥

ayaṁ tu māmātmabhavastavādarśanamārutaḥ।
vilāpaduḥkhasamidho ruditāśruhutāhutiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २४ · ७ ॥
चिन्ताबाष्पमहाधूमस्तवागमनचिन्तजः। कर्शयित्वाधिकं पुत्र निःश्वासायाससम्भवः॥

cintābāṣpamahādhūmastavāgamanacintajaḥ।
karśayitvādhikaṁ putra niḥśvāsāyāsasambhavaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २४ · ८ ॥
त्वया विहीनामिह मां शोकाग्निरतुलो महान्। प्रधक्ष्यति यथा कक्ष्यं चित्रभानुर्हिमात्यये॥

tvayā vihīnāmiha māṁ śokāgniratulo mahān।
pradhakṣyati yathā kakṣyaṁ citrabhānurhimātyaye॥

॥ ६–८ ॥

‘परंतु बेटा! तुमसे बिछुड़ जाने पर यहाँ मुझे शोक की अनुपम एवं बहुत बढ़ी हुई आग उसी तरह जलाकर भस्म कर डालेगी, जैसे ग्रीष्मऋतु में दावानल सूखी लकड़ियों और घास-फूस को जला डालता है। शोक की यह आग मेरे अपने ही मन में प्रकट हुई है, तुम्हें न देख पाने की सम्भावना ही वायु बनकर इस अग्नि को उद्दीप्त कर रही है। विलापजनित दुःख ही इसमें ईंधन का काम कर रहे हैं। रोने से जो अश्रुपात होते हैं, वे ही मानो इसमें दी हुई घी की आहुति हैं। चिन्ता के कारण जो गरम-गरम उच्छ्वास उठ रहा है, वही इसका महान् धूम है। तुम दूर देश में जाकर फिर किस तरह आओगे—इस प्रकार की चिन्ता ही इस शोकाग्नि को जन्म दे रही है। साँस लेने का जो प्रयत्न है, उसीसे इस आग की प्रतिक्षण वृद्धि हो रही है। तुम्हीं इसे बुझाने के लिये जल हो। तुम्हारे बिना यह आग मुझे अधिक सुखाकर जला डालेगी

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ९ ॥
कथं हि धेनुः स्वं वत्सं गच्छन्तमनुगच्छति। अहं त्वानुगमिष्यामि यत्र वत्स गमिष्यसि॥

kathaṁ hi dhenuḥ svaṁ vatsaṁ gacchantamanugacchati।
ahaṁ tvānugamiṣyāmi yatra vatsa gamiṣyasi॥

‘वत्स! धेनु आगे जाते हुए अपने बछड़े के पीछे-पीछे कैसे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारे पीछे-पीछे चली चलूँगी’

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १० ॥
यथा निगदितं मात्रा तद् वाक्यं पुरुषर्षभः। श्रुत्वा रामोऽब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम्॥

yathā nigaditaṁ mātrā tad vākyaṁ puruṣarṣabhaḥ।
śrutvā rāmo'bravīd vākyaṁ mātaraṁ bhṛśaduḥkhitām॥

माता कौसल्या ने जैसे जो कुछ कहा, उस वचन को सुनकर पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यन्त दुःख में डूबी हुई अपनी माँ से पुनः इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ११ ॥
कैकेय्या वञ्चितो राजा मयि चारण्यमाश्रिते। भवत्या परित्यक्तो नूनं वर्तयिष्यति॥

kaikeyyā vañcito rājā mayi cāraṇyamāśrite।
bhavatyā ca parityakto na nūnaṁ vartayiṣyati॥

‘माँ! कैकेयी ने राजा के साथ धोखा किया है। इधर मैं वन को चला जा रहा हूँ। इस दशा में यदि तुम भी उनका परित्याग कर दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रह सकेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १२ ॥
भर्तुः किल परित्यागो नृशंसः केवलं स्त्रियाः। भवत्या कर्तव्यो मनसापि विगर्हितः॥

bhartuḥ kila parityāgo nṛśaṁsaḥ kevalaṁ striyāḥ।
sa bhavatyā na kartavyo manasāpi vigarhitaḥ॥

‘पति का परित्याग नारी के लिये बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कर्म है। सत्पुरुषों ने इसकी बड़ी निन्दा की है; अतः तुम्हें तो ऐसी बात कभी मन में भी नहीं लानी चाहिये

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १३ ॥
यावज्जीवति काकुत्स्थः पिता मे जगतीपतिः। शुश्रूषा क्रियतां तावत् हि धर्मः सनातनः॥

yāvajjīvati kākutsthaḥ pitā me jagatīpatiḥ।
śuśrūṣā kriyatāṁ tāvat sa hi dharmaḥ sanātanaḥ॥

‘मेरे पिता ककुत्स्थकुल-भूषण महाराज दशरथ जबतक जीवित हैं, तबतक तुम उन्हींकी सेवा करो। पति की सेवा ही स्त्री के लिये सनातन धर्म है’

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १४ ॥
एवमुक्ता तु रामेण कौसल्या शुभदर्शना। तथेत्युवाच सुप्रीता राममक्लिष्टकारिणम्॥

evamuktā tu rāmeṇa kausalyā śubhadarśanā।
tathetyuvāca suprītā rāmamakliṣṭakāriṇam॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर शुभ कर्मों पर दृष्टि रखनेवाली देवी कौसल्या ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम से कहा—‘अच्छा बेटा! ऐसा ही करूँगी’

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १५ ॥
एवमुक्तस्तु वचनं रामो धर्मभृतां वरः। भूयस्तामब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम्॥

evamuktastu vacanaṁ rāmo dharmabhṛtāṁ varaḥ।
bhūyastāmabravīd vākyaṁ mātaraṁ bhṛśaduḥkhitām॥

माँ के इस प्रकार स्वीकृतिसूचक बात कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने अत्यन्त दुःख में पड़ी हुई अपनी माता से पुनः इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १६ ॥
मया चैव भवत्या कर्तव्यं वचनं पितुः। राजा भर्ता गुरुः श्रेष्ठः सर्वेषामीश्वरः प्रभुः॥

mayā caiva bhavatyā ca kartavyaṁ vacanaṁ pituḥ।
rājā bhartā guruḥ śreṣṭhaḥ sarveṣāmīśvaraḥ prabhuḥ॥

‘माँ! पिताजी की आज्ञा का पालन करना मेरा और तुम्हारा—दोनों का कर्तव्य है; क्योंकि राजा हम सब लोगों के स्वामी, श्रेष्ठ गुरु, ईश्वर एवं प्रभु हैं

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १७ ॥
इमानि तु महारण्ये विहृत्य नव पञ्च च। वर्षाणि परमप्रीत्या स्थास्यामि वचने तव॥

imāni tu mahāraṇye vihṛtya nava pañca ca।
varṣāṇi paramaprītyā sthāsyāmi vacane tava॥

‘इन चौदह वर्षोंतक मैं विशाल वन में घूम-फिरकर लौट आऊँगा और बड़े प्रेम से तुम्हारी आज्ञा का पालन करता रहूँगा’

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १८ ॥
एवमुक्ता प्रियं पुत्रं बाष्पपूर्णानना तदा। उवाच परमार्ता तु कौसल्या सुतवत्सला॥

evamuktā priyaṁ putraṁ bāṣpapūrṇānanā tadā।
uvāca paramārtā tu kausalyā sutavatsalā॥

उनके ऐसा कहने पर पुत्रवत्सला कौसल्या के मुख पर पुनः आँसुओं की धारा बह चली। वे उस समय अत्यन्त आर्त होकर अपने प्रिय पुत्र से बोलीं—

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · १९ ॥
आसां राम सपत्नीनां वस्तुं मध्ये मे क्षमम्। नय मामपि काकुत्स्थ वनं वन्यां मृगीमिव॥

āsāṁ rāma sapatnīnāṁ vastuṁ madhye na me kṣamam।
naya māmapi kākutstha vanaṁ vanyāṁ mṛgīmiva॥

‘बेटा राम! अब मुझसे इन सौतों के बीच में नहीं रहा जायगा। काकुत्स्थ! यदि पिता की आज्ञा का पालन करने की इच्छा से तुमने वन में जाने का ही निश्चय किया है तो मुझे भी वनवासिनी हरिणी की भाँति वन में ही ले चलो’

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २० ॥
यदि ते गमने बुद्धिः कृता पितरपेक्षया। तां तथा रुदतीं रामो रुदन् वचनमब्रवीत्॥

yadi te gamane buddhiḥ kṛtā pitarapekṣayā।
tāṁ tathā rudatīṁ rāmo rudan vacanamabravīt॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २४ · २१ ॥
जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता दैवतं प्रभुरेव च। भवत्या मम चैवाद्य राजा प्रभवति प्रभुः॥

jīvantyā hi striyā bhartā daivataṁ prabhureva ca।
bhavatyā mama caivādya rājā prabhavati prabhuḥ॥

॥ २०–२१ ॥

यह कहकर माता कौसल्या रोने लगीं। उन्हें उस तरह रोती देख श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले—‘माँ! स्त्री के जीते-जी उसका पति ही उसके लिये देवता और ईश्वर के समान है। महाराज तुम्हारे और मेरे दोनों के प्रभु हैं

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २२ ॥
ह्यनाथा वयं राज्ञा लोकनाथेन धीमता। भरतश्चापि धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः॥

na hyanāthā vayaṁ rājñā lokanāthena dhīmatā।
bharataścāpi dharmātmā sarvabhūtapriyaṁvadaḥ॥

‘जबतक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तबतक हमें अपने को अनाथ नहीं समझना चाहिये। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं। वे समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सदा ही धर्म में तत्पर रहनेवाले हैं; अतः वे तुम्हारा अनुसरण—तुम्हारी सेवा करेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २३ ॥
भवतीमनुवर्तेत हि धर्मरतः सदा। यथा मयि तु निष्क्रान्ते पुत्रशोकेन पार्थिवः॥

bhavatīmanuvarteta sa hi dharmarataḥ sadā।
yathā mayi tu niṣkrānte putraśokena pārthivaḥ॥

‘मेरे चले जाने पर जिस तरह भी महाराज को पुत्रशोक के कारण कोई विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानी के साथ वैसा ही प्रयत्न करना

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २४ ॥
श्रमं नावाप्नुयात् किंचिदप्रमत्ता तथा कुरु। दारुणश्चाप्ययं शोको यथैनं विनाशयेत्॥

śramaṁ nāvāpnuyāt kiṁcidapramattā tathā kuru।
dāruṇaścāpyayaṁ śoko yathainaṁ na vināśayet॥

‘कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले। जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराज के हित-साधन में लगी रहना

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २५ ॥
राज्ञो वृद्धस्य सततं हितं चर समाहिता। व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥

rājño vṛddhasya satataṁ hitaṁ cara samāhitā।
vratopavāsaniratā yā nārī paramottamā॥

‘उत्कृष्ट गुण और जाति आदि की दृष्टि से परम उत्तम तथा व्रत-उपवास में तत्पर होकर भी जो नारी पति की सेवा नहीं करती है, उसे पापियों को मिलनेवाली गति (नरक आदि)- की प्राप्ति होती है

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २६ ॥
भर्तारं नानुवर्तेत सा पापगतिर्भवेत्। भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम्॥

bhartāraṁ nānuvarteta sā ca pāpagatirbhavet।
bhartuḥ śuśrūṣayā nārī labhate svargamuttamam॥

‘जो अन्यान्य देवताओं की वन्दना और पूजा से दूर रहती है, वह नारी भी केवल पति की सेवामात्र से उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेती है

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २७ ॥
अपि या निर्नमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्। शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥

api yā nirnamaskārā nivṛttā devapūjanāt।
śuśrūṣāmeva kurvīta bhartuḥ priyahite ratā॥

‘अतः नारी को चाहिये कि वह पति के प्रिय एवं हितसाधन में तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्री का वेद और लोक में प्रसिद्ध नित्य (सनातन) धर्म है। इसीका श्रुतियों और स्मृतियों में भी वर्णन है

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २८ ॥
एष धर्मः स्त्रिया नित्यो वेदे लोके श्रुतः स्मृतः। अग्निकार्येषु सदा सुमनोभिश्च देवताः॥

eṣa dharmaḥ striyā nityo vede loke śrutaḥ smṛtaḥ।
agnikāryeṣu ca sadā sumanobhiśca devatāḥ॥

‘देवि! तुम्हें मेरी मङ्गल-कामना से सदा अग्निहोत्र के अवसरों पर पुष्पों से देवताओं का तथा सत्कारपूर्वक ब्राह्मणों का भी पूजन करते रहना चाहिये

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · २९ ॥
पूज्यास्ते मत्कृते देवि ब्राह्मणाश्चैव सत्कृताः। एवं कालं प्रतीक्षस्व ममागमनकांक्षिणी॥

pūjyāste matkṛte devi brāhmaṇāścaiva satkṛtāḥ।
evaṁ kālaṁ pratīkṣasva mamāgamanakāṁkṣiṇī॥

‘इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमों का पालन करती हुई स्वामी की सेवा में लगी रहो और मेरे आगमन की इच्छा रखकर समय की प्रतीक्षा करो

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३० ॥
नियता नियताहारा भर्तृशुश्रूषणे रता। प्राप्स्यसे परमं कामं मयि पर्यागते सति॥

niyatā niyatāhārā bhartṛśuśrūṣaṇe ratā।
prāpsyase paramaṁ kāmaṁ mayi paryāgate sati॥

‘यदि धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आने पर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी’

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३१ ॥
यदि धर्मभृतां श्रेष्ठो धारयिष्यति जीवितम्। एवमुक्ता तु रामेण बाष्पपर्याकुलेक्षणा। कौसल्या पुत्रशोकार्ता रामं वचनमब्रवीत्॥

yadi dharmabhṛtāṁ śreṣṭho dhārayiṣyati jīvitam।
evamuktā tu rāmeṇa bāṣpaparyākulekṣaṇā।
kausalyā putraśokārtā rāmaṁ vacanamabravīt॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर कौसल्या के नेत्रों में आँसू छलक आये। वे पुत्रशोक से पीड़ित होकर श्रीरामचन्द्रजी से बोलीं—

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३२ ॥
गमने सुकृतां बुद्धिं ते शक्नोमि पुत्रक। विनिवर्तयितुं वीर नूनं कालो दुरत्ययः॥

gamane sukṛtāṁ buddhiṁ na te śaknomi putraka।
vinivartayituṁ vīra nūnaṁ kālo duratyayaḥ॥

‘बेटा! मैं तुम्हारे वन में जाने के निश्चित विचार को नहीं पलट सकती। वीर! निश्चय ही काल की आज्ञा का उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३३ ॥
गच्छ पुत्र त्वमेकाग्रो भद्रं तेऽस्तु सदा विभो। पुनस्त्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतक्लमा॥

gaccha putra tvamekāgro bhadraṁ te'stu sadā vibho।
punastvayi nivṛtte tu bhaviṣyāmi gataklamā॥

‘सामर्थ्यशाली पुत्र! अब तुम निश्चिन्त होकर वन को जाओ, तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। जब फिर तुम वन से लौट आओगे, उस समय मेरे सारे क्लेश—सब संताप दूर हो जायँगे

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३४ ॥
प्रत्यागते महाभागे कृतार्थे चरितव्रते। पितुरानृण्यतां प्राप्ते स्वपिष्ये परमं सुखम्॥

pratyāgate mahābhāge kṛtārthe caritavrate।
piturānṛṇyatāṁ prāpte svapiṣye paramaṁ sukham॥

‘बेटा! जब तुम वनवास का महान् व्रत पूर्ण करके कृतार्थ एवं महान् सौभाग्यशाली होकर लौट आओगे और ऐसा करके पिता के ऋण से उऋण हो जाओगे, तभी मैं उत्तम सुख की नींद सो सकूँगी

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३५ ॥
कृतान्तस्य गतिः पुत्र दुर्विभाव्या सदा भुवि। यस्त्वां संचोदयति मे वच आविध्य राघव॥

kṛtāntasya gatiḥ putra durvibhāvyā sadā bhuvi।
yastvāṁ saṁcodayati me vaca āvidhya rāghava॥

‘बेटा रघुनन्दन! इस भूतल पर दैव की गति को समझना बहुत ही कठिन है, जो मेरी बात काटकर तुम्हें वन जाने के लिये प्रेरित कर रहा है

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३६ ॥
गच्छेदानीं महाबाहो क्षेमेण पुनरागतः। नन्दयिष्यसि मां पुत्र साम्ना श्लक्ष्णेन चारुणा॥

gacchedānīṁ mahābāho kṣemeṇa punarāgataḥ।
nandayiṣyasi māṁ putra sāmnā ślakṣṇena cāruṇā॥

‘बेटा! महाबाहो! इस समय जाओ, फिर कुशलपूर्वक लौटकर सान्त्वनाभरे मधुर एवं मनोहर वचनों से मुझे आनन्दित करना

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३७ ॥
अपीदानीं कालः स्याद् वनात् प्रत्यागतं पुनः। यत् त्वां पुत्रक पश्येयं जटावल्कलधारिणम्॥

apīdānīṁ sa kālaḥ syād vanāt pratyāgataṁ punaḥ।
yat tvāṁ putraka paśyeyaṁ jaṭāvalkaladhāriṇam॥

‘वत्स! क्या वह समय अभी आ सकता है, जब कि जटा-वल्कल धारण किये वन से लौटकर आये हुए तुमको फिर देख सकूँगी

English translation coming soon.

॥ २ · २४ · ३८ ॥
तथा हि रामं वनवासनिश्चितं ददर्श देवी परमेण चेतसा। उवाच रामं शुभलक्षणं वचो बभूव स्वस्त्ययनाभिकांक्षिणी॥

tathā hi rāmaṁ vanavāsaniścitaṁ
dadarśa devī parameṇa cetasā।
uvāca rāmaṁ śubhalakṣaṇaṁ vaco
babhūva ca svastyayanābhikāṁkṣiṇī॥

देवी कौसल्या ने जब देखा कि इस प्रकार श्रीराम वनवास का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, तब वे परम आदरयुक्त हृदय से उनको शुभसूचक आशीर्वाद देने और उनके लिये स्वस्तिवाचन कराने की इच्छा करने लगीं

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २४ ॥