वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः २२ · ३० श्लोकाःSarga 22 · 30 ślokas

श्रीरामका लक्ष्मणको समझाते हुए अपने वनवासमें दैवको ही कारण बताना और अभिषेककी सामग्रीको हटा लेनेका आदेश देना

अभिषेक-सामग्री-निवर्तन

“अभिषेक-सामग्री-निवर्तन”
॥ २ · २२ · ४–५ ॥

श्यामवर्णो मुकुटधरो रामः प्रशान्तचित्तः करेण अभिषेकसामग्रीं — सुवर्णकलशान्, श्वेतच्छत्रं, चामराणि, रत्नसिंहासनं — अपनेतुं संकेतयति; सेवकाः तानि सखेदं हरन्ति, पार्श्वे गम्भीरमुखो लक्ष्मणः निवर्तनं पश्यन् तिष्ठति।

नीले श्याम वर्णवाले मुकुटधारी श्रीराम शान्त एवं दैवको स्वीकार किये हुए भाव से हाथ बढ़ाकर राज्याभिषेककी सामग्री — सुवर्ण-कलश, श्वेत छत्र, चँवर और रत्नजटित सिंहासन — को हटा ले जानेका संकेत कर रहे हैं; सेवकगण भारी मनसे उन्हें उठाकर ले जा रहे हैं और पास ही गम्भीर, शोकाकुल भ्राता लक्ष्मण इस निवर्तनकी देख-रेख कर रहे हैं।

The blue, crown-banded Ram, serene and accepting of destiny, extends his hand to bid the coronation paraphernalia — golden water-jars, the moon-white parasol, chowries, and the gem-set throne — be borne away; attendants reluctantly carry them off, while close by his grave, heavy-hearted brother Lakshman oversees the withdrawal.

॥ २ · २२ · १ ॥
अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम्। सरोषमिव नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम्॥

atha taṁ vyathayā dīnaṁ saviśeṣamamarṣitam।
saroṣamiva nāgendraṁ roṣavisphāritekṣaṇam॥

(श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथा से बहुत दुःखी थे। उनके मन में विशेष अमर्ष भरा हुआ था। वे रोष से भरे हुए गजराज की भाँति क्रोध से आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे।

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॥ २ · २२ · २ ॥
आसाद्य रामः सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम्। उवाचेदं धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान्॥

āsādya rāmaḥ saumitriṁ suhṛdaṁ bhrātaraṁ priyam।
uvācedaṁ sa dhairyeṇa dhārayan sattvamātmavān॥

अपने मन को वश में रखनेवाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्त को निर्विकाररूप से काबू में रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मण के पास जाकर इस प्रकार बोले—

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॥ २ · २२ · ३ ॥
निगृह्य रोषं शोकं धैर्यमाश्रित्य केवलम्। अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम्॥

nigṛhya roṣaṁ śokaṁ ca dhairyamāśritya kevalam।
avamānaṁ nirasyainaṁ gṛhītvā harṣamuttamam॥

‘लक्ष्मण! केवल धैर्य का आश्रय लेकर अपने मन के क्रोध और शोक को दूर करो, चित्त से अपमान की भावना निकाल दो और हृदय में भलीभाँति हर्ष भरकर

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॥ २ · २२ · ४ ॥
उपक्लृप्तं यदेतन्मे अभिषेकार्थमुत्तमम्। सर्वं निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम्॥

upaklṛptaṁ yadetanme abhiṣekārthamuttamam।
sarvaṁ nivartaya kṣipraṁ kuru kāryaṁ niravyayam॥

मेरे अभिषेक के लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमन में बाधा उपस्थित न हो

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॥ २ · २२ · ५ ॥
सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रमः। अभिषेकनिवृत्त्यर्थं सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रमः॥

saumitre yo'bhiṣekārthe mama sambhārasambhramaḥ।
abhiṣekanivṛttyarthaṁ so'stu sambhārasambhramaḥ॥

‘सुमित्रानन्दन! अबतक अभिषेक के लिये सामग्री जुटाने में जो तुम्हारा उत्साह था, वह इसे रोकने और मेरे वन जाने की तैयारी करने में होना चाहिये

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॥ २ · २२ · ६ ॥
यस्या मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यते। माता नः सा यथा स्यात् सविशङ्का तथा कुरु॥

yasyā madabhiṣekārthe mānasaṁ paritapyate।
mātā naḥ sā yathā na syāt saviśaṅkā tathā kuru॥

‘मेरे अभिषेक के कारण जिसके चित्त में संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकेयी को जिससे किसी तरह की शङ्का न रह जाय, वही काम करो

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॥ २ · २२ · ७ ॥
तस्याः शङ्कामयं दुःखं मुहूर्तमपि नोत्सहे। मनसि प्रतिसंजातं सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम्॥

tasyāḥ śaṅkāmayaṁ duḥkhaṁ muhūrtamapi notsahe।
manasi pratisaṁjātaṁ saumitre'hamupekṣitum॥

‘लक्ष्मण! उसके मन में संदेह के कारण दुःख उत्पन्न हो, इस बात को मैं दो घड़ी के लिये भी नहीं सह सकता और न इसकी उपेक्षा ही कर सकता हूँ।

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॥ २ · २२ · ८ ॥
बुद्धिपूर्वं नाबुद्धं स्मरामीह कदाचन। मातॄणां वा पितुर्वाहं कृतमल्पं विप्रियम्॥

na buddhipūrvaṁ nābuddhaṁ smarāmīha kadācana।
mātṝṇāṁ vā piturvāhaṁ kṛtamalpaṁ ca vipriyam॥

‘मैंने यहाँ कभी जान-बूझकर या अनजान में माताओं का अथवा पिताजी का कोई छोटा-सा भी अपराध किया हो, ऐसा याद नहीं आता

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॥ २ · २२ · ९ ॥
सत्यः सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रमः। परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम॥

satyaḥ satyābhisaṁdhaśca nityaṁ satyaparākramaḥ।
paralokabhayād bhīto nirbhayo'stu pitā mama॥

‘पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं। वे परलोक के भय से सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजी का पारलौकिक भय दूर हो जाय

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॥ २ · २२ · १० ॥
तस्यापि हि भवेदस्मिन् कर्मण्यप्रतिसंहृते। सत्यं नेति मनस्तापस्तस्य तापस्तपेच्च माम्॥

tasyāpi hi bhavedasmin karmaṇyapratisaṁhṛte।
satyaṁ neti manastāpastasya tāpastapecca mām॥

‘यदि इस अभिषेकसम्बन्धी कार्य को रोक नहीं दिया गया तो पिताजी को भी मन-ही-मन यह सोचकर संताप होगा कि मेरी बात सच्ची नहीं हुई और उनका वह मनस्ताप मुझे सदा संतत करता रहेगा

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॥ २ · २२ · ११ ॥
अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण। अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमितः पुरः॥

abhiṣekavidhānaṁ tu tasmāt saṁhṛtya lakṣmaṇa।
anvagevāhamicchāmi vanaṁ gantumitaḥ puraḥ॥

‘लक्ष्मण! इन्हीं सब कारणों से मैं अपने अभिषेक का कार्य रोककर शीघ्र ही इस नगर से वन को चला जाना चाहता हूँ

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॥ २ · २२ · १२ ॥
मम प्रव्राजनादद्य कृतकृत्या नृपात्मजा। सुतं भरतमव्यग्रमभिषेचयतां ततः॥

mama pravrājanādadya kṛtakṛtyā nṛpātmajā।
sutaṁ bharatamavyagramabhiṣecayatāṁ tataḥ॥

‘आज मेरे चले जाने से कृतकृत्य हुई राजकुमारी कैकेयी अपने पुत्र भरत का निर्भय एवं निश्चिन्त होकर अभिषेक करावे

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॥ २ · २२ · १३ ॥
मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि। गतेऽरण्यं कैकेय्या भविष्यति मनः सुखम्॥

mayi cīrājinadhare jaṭāmaṇḍaladhāriṇi।
gate'raṇyaṁ ca kaikeyyā bhaviṣyati manaḥ sukham॥

‘मैं वल्कल और मृगचर्म धारण करके सिर पर जटाजूट बाँधे जब वन को चला जाऊँगा, तभी कैकेयी के मन को सुख प्राप्त होगा

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॥ २ · २२ · १४ ॥
बुद्धिः प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम्। तं नु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम्॥

buddhiḥ praṇītā yeneyaṁ manaśca susamāhitam।
taṁ nu nārhāmi saṁkleṣṭuṁ pravrajiṣyāmi mā ciram॥

‘जिस विधाता ने कैकेयी को ऐसी बुद्धि प्रदान की है तथा जिसकी प्रेरणा से उसका मन मुझे वन भेजने में अत्यन्त दृढ़ हो गया है, उसे विफलमनोरथ करके कष्ट देना मेरे लिये उचित नहीं है

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॥ २ · २२ · १५ ॥
कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने। राज्यस्य वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने॥

kṛtānta eva saumitre draṣṭavyo matpravāsane।
rājyasya ca vitīrṇasya punareva nivartane॥

‘सुमित्राकुमार! मेरे इस प्रवास में तथा पिताद्वारा दिये हुए राज्य के फिर हाथ से निकल जाने में दैव को ही कारण समझना चाहिये

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॥ २ · २२ · १६ ॥
कैकेय्याः प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने। यदि तस्या भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत्॥

kaikeyyāḥ pratipattirhi kathaṁ syānmama vedane।
yadi tasyā na bhāvo'yaṁ kṛtāntavihito bhavet॥

‘मेरी समझ से कैकेयी का यह विपरीत मनोभाव दैव का ही विधान है। यदि ऐसा न होता तो वह मुझे वन में भेजकर पीड़ा देने का विचार क्यों करती

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॥ २ · २२ · १७ ॥
जानासि हि यथा सौम्य मातृषु ममान्तरम्। भूतपूर्वं विशेषो वा तस्या मयि सुतेऽपि वा॥

jānāsi hi yathā saumya na mātṛṣu mamāntaram।
bhūtapūrvaṁ viśeṣo vā tasyā mayi sute'pi vā॥

‘सौम्य! तुम तो जानते ही हो कि मेरे मन में पहले भी कभी माताओं के प्रति भेदभाव नहीं हुआ और कैकेयी भी पहले मुझमें या अपने पुत्र में कोई अन्तर नहीं समझती थी

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॥ २ · २२ · १८ ॥
सोऽभिषेकनिवृत्त्यर्थैः प्रवासार्थैश्च दुर्वचैः। उग्रैर्वाक्यैरहं तस्या नान्यद् दैवात् समर्थये॥

so'bhiṣekanivṛttyarthaiḥ pravāsārthaiśca durvacaiḥ।
ugrairvākyairahaṁ tasyā nānyad daivāt samarthaye॥

‘मेरे अभिषेक को रोकने और मुझे वन में भेजने के लिये उसने राजा को प्रेरित करने के निमित्त जिन भयंकर और कटुवचनों का प्रयोग किया है, उन्हें साधारण मनुष्यों के लिये भी मुँह से निकालना कठिन है। उसकी ऐसी चेष्टा में मैं दैव के सिवा दूसरे किसी कारण का समर्थन नहीं करता

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॥ २ · २२ · १९ ॥
कथं प्रकृतिसम्पन्ना राजपुत्री तथागुणा। ब्रूयात् सा प्राकृतेव स्त्री मत्पीडार्थं भर्तृसंनिधौ॥

kathaṁ prakṛtisampannā rājaputrī tathāguṇā।
brūyāt sā prākṛteva strī matpīḍārthaṁ bhartṛsaṁnidhau॥

‘यदि ऐसी बात न होती तो वैसे उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमारी कैकेयी एक साधारण स्त्री की भाँति अपने पति के समीप मुझे पीड़ा देनेवाली बात कैसे कहती—मुझे कष्ट देने के लिये राम को वन में भेजने का प्रस्ताव कैसे उपस्थित करती

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॥ २ · २२ · २० ॥
यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि हन्यते। व्यक्तं मयि तस्यां पतितो हि विपर्ययः॥

yadacintyaṁ tu tad daivaṁ bhūteṣvapi na hanyate।
vyaktaṁ mayi ca tasyāṁ ca patito hi viparyayaḥ॥

‘जिसके विषय में कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैव का विधान है। प्राणियों में अथवा उनके अधिष्ठाता देवताओं में भी कोई ऐसा नहीं है, जो उस दैव के विधान को मेट सके; अतः निश्चय ही उसीकी प्रेरणा से मुझमें और कैकेयी में यह भारी उलट-फेर हुआ है (मेरे हाथ में आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयी की बुद्धि बदल गयी)

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॥ २ · २२ · २१ ॥
कश्च दैवेन सौमित्रे योद्धुमुत्सहते पुमान्। यस्य नु ग्रहणं किंचित् कर्मणोऽन्यन्न दृश्यते॥

kaśca daivena saumitre yoddhumutsahate pumān।
yasya nu grahaṇaṁ kiṁcit karmaṇo'nyanna dṛśyate॥

‘सुमित्रानन्दन! कर्म के सुख-दुःखादिरूप फल प्राप्त होने पर ही जिसका ज्ञान होता है, कर्मफल से अन्यत्र कहीं भी जिसका पता नहीं चलता, उस दैव के साथ कौन पुरुष युद्ध कर सकता है?

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॥ २ · २२ · २२ ॥
सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ। यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत्॥

sukhaduḥkhe bhayakrodhau lābhālābhau bhavābhavau।
yasya kiṁcit tathābhūtaṁ nanu daivasya karma tat॥

‘सुख-दुःख, भय-क्रोध (क्षोभ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकार के और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता, वे सब दैव के ही कर्म हैं

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॥ २ · २२ · २३ ॥
ऋषयोऽप्युग्रतपसो दैवेनाभिप्रचोदिताः। उत्सृज्य नियमांस्तीव्रान् भ्रश्यन्ते काममन्युभिः॥

ṛṣayo'pyugratapaso daivenābhipracoditāḥ।
utsṛjya niyamāṁstīvrān bhraśyante kāmamanyubhiḥ॥

‘उग्र तपस्वी ऋषि भी दैव से प्रेरित होकर अपने तीव्र नियमों को छोड़ बैठते और काम-क्रोध के द्वारा विवश हो मर्यादा से भ्रष्ट हो जाते हैं

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॥ २ · २२ · २४ ॥
असंकल्पितमेवेह यदकस्मात् प्रवर्तते। निवर्त्यारब्धमारम्भैन्नु दैवस्य कर्म तत्॥

asaṁkalpitameveha yadakasmāt pravartate।
nivartyārabdhamārambhainnu daivasya karma tat॥

‘जो बात बिना सोचे-विचारे अकस्मात् सिर पर आ पड़ती है और प्रयत्नोंद्वारा आरम्भ किये हुए कार्य को रोककर एक नया ही काण्ड उपस्थित कर देती है, अवश्य वह दैव का ही विधान है

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॥ २ · २२ · २५ ॥
एतया तत्त्वया बुद्ध्या संस्तभ्यात्मानमात्मना। व्याहतेऽप्यभिषेके मे परितापो विद्यते॥

etayā tattvayā buddhyā saṁstabhyātmānamātmanā।
vyāhate'pyabhiṣeke me paritāpo na vidyate॥

‘इस तात्त्विक बुद्धि के द्वारा स्वयं ही मन को स्थिर कर लेने के कारण मुझे अपने अभिषेक में विघ्न पड़ जाने पर भी दुःख या संताप नहीं हो रहा है

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॥ २ · २२ · २६ ॥
तस्मादपरितापः संस्त्वमप्यनुविधाय माम्। प्रतिसंहारय क्षिप्रमाभिषेचनिकीं क्रियाम्॥

tasmādaparitāpaḥ saṁstvamapyanuvidhāya mām।
pratisaṁhāraya kṣipramābhiṣecanikīṁ kriyām॥

‘इसी प्रकार तुम भी मेरे विचार का अनुसरण करके संतापशून्य हो राज्याभिषेक के इस आयोजन को शीघ्र बंद करा दो

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॥ २ · २२ · २७ ॥
एभिरेव घटैः सर्वैरभिषेचनसम्भृतैः। मम लक्ष्मण तापस्ये व्रतस्नानं भविष्यति॥

ebhireva ghaṭaiḥ sarvairabhiṣecanasambhṛtaiḥ।
mama lakṣmaṇa tāpasye vratasnānaṁ bhaviṣyati॥

‘लक्ष्मण! राज्याभिषेक के लिये सँजोकर रखे गये इन्हीं सब कलशोंद्वारा मेरा तापस-व्रत के संकल्प के लिये आवश्यक स्नान होगा

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॥ २ · २२ · २८ ॥
अथवा किं मयैतेन राज्यद्रव्यमयेन तु। उद्धृतं मे स्वयं तोयं व्रतादेशं करिष्यति॥

athavā kiṁ mayaitena rājyadravyamayena tu।
uddhṛtaṁ me svayaṁ toyaṁ vratādeśaṁ kariṣyati॥

‘अथवा राज्याभिषेकसम्बन्धी मङ्गल द्रव्यमय इस कलशजल की मुझे क्या आवश्यकता है? स्वयं मेरे द्वारा अपने हाथ से निकाला हुआ जल ही मेरे व्रतादेश का साधक होगा

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॥ २ · २२ · २९ ॥
मा लक्ष्मण संतापं कार्षीर्लक्ष्म्या विपर्यये। राज्यं वा वनवासो वा वनवासो महोदयः॥

mā ca lakṣmaṇa saṁtāpaṁ kārṣīrlakṣmyā viparyaye।
rājyaṁ vā vanavāso vā vanavāso mahodayaḥ॥

‘लक्ष्मण! लक्ष्मी के इस उलट-फेर के विषय में तुम कोई चिन्ता न करो। मेरे लिये राज्य अथवा वनवास दोनों समान हैं, बल्कि विशेष विचार करने पर वनवास ही महान् अभ्युदयकारी प्रतीत होता है

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॥ २ · २२ · ३० ॥
लक्ष्मणास्मिन् मम राज्यविघ्ने माता यवीयस्यभिशङ्कितव्या। दैवाभिपन्ना पिता कथंचि- ज्जानासि दैवं हि तथाप्रभावम्॥

na lakṣmaṇāsmin mama rājyavighne
mātā yavīyasyabhiśaṅkitavyā।
daivābhipannā na pitā kathaṁci-
jjānāsi daivaṁ hi tathāprabhāvam॥

‘लक्ष्मण! मेरे राज्याभिषेक में जो विघ्न आया है, इसमें मेरी सबसे छोटी माता कारण है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह दैव के अधीन थी। इसी प्रकार पिताजी भी किसी तरह इसमें कारण नहीं हैं। तुम तो दैव और उसके अद्भुत प्रभाव को जानते ही हो, वही कारण है’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २२ ॥