वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः २१ · ६४ श्लोकाःSarga 21 · 64 ślokas

लक्ष्मणका रोष, उनका श्रीरामको बलपूर्वक राज्यपर अधिकार कर लेनेके लिये प्रेरित करना तथा श्रीरामका पिताकी आज्ञाके पालनको ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मणको समझाना

लक्ष्मण-रोष

“लक्ष्मण-रोष”
॥ २ · २१ · ८–२० ॥

कौसल्यायाः दीपालोकिते भवने क्रुद्धो लक्ष्मणः मत्तगज इव रोषाक्षः धनुर्गृहीत्वा बलाद् राज्यग्रहणाय रामं प्रेरयति; शान्तः श्यामवर्णो रामः धैर्यहस्तं भ्रातरि निधाय तं निवारयति; पार्श्वे शोकार्ता माता कौसल्या रुदती रामं ग्रहीतुम् इच्छति।

कौसल्याके दीपकसे आलोकित कक्षमें क्रोधसे जलते हुए लक्ष्मण मतवाले हाथीके समान घूमती आँखोंसे अपना विशाल धनुष थामे श्रीरामको बलपूर्वक राज्य ले लेनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं; शान्त श्यामवर्ण श्रीराम अपने भाईपर धैर्यभरा हाथ रखकर उन्हें रोक रहे हैं, और पास ही शोकसन्तप्त माता कौसल्या रोती हुई श्रीरामको पकड़नेके लिये हाथ बढ़ा रही हैं।

In Kausalya's lamplit chamber the wrath-blazing Lakshman, eyes rolling like an enraged elephant's, grips his great bow and urges Ram to seize the throne by force; the serene, blue-complexioned Ram lays a steadying hand upon his brother to restrain him, while close by the grief-stricken mother Kausalya weeps and reaches to clasp Ram.

॥ २ · २१ · १ ॥
तथा तु विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम्। उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वचः॥

tathā tu vilapantīṁ tāṁ kausalyāṁ rāmamātaram।
uvāca lakṣmaṇo dīnastatkālasadṛśaṁ vacaḥ॥

इस प्रकार विलाप करती हुई श्रीराममाता कौसल्या से अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण ने उस समय के योग्य बात कही

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॥ २ · २१ · २ ॥
रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्। त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगतः॥

na rocate mamāpyetadārye yad rāghavo vanam।
tyaktvā rājyaśriyaṁ gacchet striyā vākyavaśaṁgataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · २१ · ३ ॥
विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः। नृपः किमिव ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्ततः॥

viparītaśca vṛddhaśca viṣayaiśca pradharṣitaḥ।
nṛpaḥ kimiva na brūyāccodyamānaḥ samantataḥ॥

॥ २–३ ॥

‘बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मी का परित्याग करके वन में जायँ। महाराज तो इस समय स्त्री की बातों में आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है; दूसरे वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयों ने उन्हें वश में कर लिया है; अतः कामदेव के वशीभूत हुए न नरेश कैकेयी-जैसी स्त्री की प्रेरणा से क्या नहीं कह सकते हैं?

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॥ २ · २१ · ४ ॥
नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्। येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघवः॥

nāsyāparādhaṁ paśyāmi nāpi doṣaṁ tathāvidham।
yena nirvāsyate rāṣṭrād vanavāsāya rāghavaḥ॥

‘मैं श्रीरघुनाथजी का ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिससे इन्हें राज्य से निकाला जाय और वन में रहने के लिये विवश किया जाय

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॥ २ · २१ · ५ ॥
तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः। स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत्॥

na taṁ paśyāmyahaṁ loke parokṣamapi yo naraḥ।
svamitro'pi nirasto'pi yo'sya doṣamudāharet॥

‘मैं संसार में एक मनुष्य को भी ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त शत्रु एवं तिरस्कृत होने पर भी परोक्ष में भी इनका कोई दोष बता सके

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॥ २ · २१ · ६ ॥
देवकल्पमृजुं दान्तं रिपूणामपि वत्सलम्। अवेक्षमाणः को धर्मं त्यजेत् पुत्रमकारणात्॥

devakalpamṛjuṁ dāntaṁ ripūṇāmapi vatsalam।
avekṣamāṇaḥ ko dharmaṁ tyajet putramakāraṇāt॥

‘धर्म पर दृष्टि रखनेवाला कौन ऐसा राजा होगा, जो देवता के समान शुद्ध, सरल, जितेन्द्रिय और शत्रुओं पर भी स्नेह रखनेवाले (श्रीराम-जैसे) पुत्र का अकारण परित्याग करेगा?

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॥ २ · २१ · ७ ॥
तदिदं वचनं राज्ञः पुनर्बाल्यमुपेयुषः। पुत्रः को हृदये कुर्याद् राजवृत्तमनुस्मरन्॥

tadidaṁ vacanaṁ rājñaḥ punarbālyamupeyuṣaḥ।
putraḥ ko hṛdaye kuryād rājavṛttamanusmaran॥

‘जो पुनः बालभाव (विवेकशून्यता) को प्राप्त हो गये हैं, ऐसे राजा के इस वचन को राजनीति का ध्यान रखनेवाला कौन पुत्र अपने हृदय में स्थान दे सकता है?

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॥ २ · २१ · ८ ॥
यावदेव जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः। तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम्॥

yāvadeva na jānāti kaścidarthamimaṁ naraḥ।
tāvadeva mayā sārdhamātmasthaṁ kuru śāsanam॥

‘रघुनन्दन! जबतक कोई भी मनुष्य आपके वनवास की बात को नहीं जानता है, तबतक ही, आप मेरी सहायता से इस राज्य के शासन की बागडोर अपने हाथ में ले लीजिये

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॥ २ · २१ · ९ ॥
मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव। कः समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठतः॥

mayā pārśve sadhanuṣā tava guptasya rāghava।
kaḥ samartho'dhikaṁ kartuṁ kṛtāntasyeva tiṣṭhataḥ॥

‘रघुवीर! जब मैं धनुष लिये आपके पास रहकर आपकी रक्षा करता रहूँ और आप काल के समान युद्ध के लिये डट जायँ, उस समय आपसे अधिक पौरुष प्रकट करने में कौन समर्थ हो सकता है?

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॥ २ · २१ · १० ॥
निर्मनुष्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजर्षभ। करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये॥

nirmanuṣyāmimāṁ sarvāmayodhyāṁ manujarṣabha।
kariṣyāmi śaraistīkṣṇairyadi sthāsyati vipriye॥

‘नरश्रेष्ठ! यदि नगर के लोग विरोध में खड़े होंगे तो मैं अपने तीखे बाणों से सारी अयोध्या को मनुष्यों से सूनी कर दूँगा

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॥ २ · २१ · ११ ॥
भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वाऽस्य हितमिच्छति। सर्वांस्तांश्च वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते॥

bharatasyātha pakṣyo vā yo vā'sya hitamicchati।
sarvāṁstāṁśca vadhiṣyāmi mṛdurhi paribhūyate॥

‘जो-जो भरत का पक्ष लेगा अथवा केवल जो उन्हींका हित चाहेगा, उन सबका मैं वध कर डालूँगा; क्योंकि जो कोमल या नम्र होता है, उसका सभी तिरस्कार करते हैं

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॥ २ · २१ · १२ ॥
प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या तुष्टो यदि नः पिता। अमित्रभूतो निःसङ्गं वध्यतां वध्यतामपि॥

protsāhito'yaṁ kaikeyyā sa tuṣṭo yadi naḥ pitā।
amitrabhūto niḥsaṅgaṁ vadhyatāṁ vadhyatāmapi॥

‘यदि कैकेयी के प्रोत्साहन देने पर उसके ऊपर सन्तुष्ट हो पिताजी हमारे शत्रु बन रहे हैं तो हमें भी मोह-ममता छोड़कर इन्हें कैद कर लेना या मार डालना चाहिये

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॥ २ · २१ · १३ ॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥

gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ।
utpathaṁ pratipannasya kāryaṁ bhavati śāsanam॥

‘क्योंकि यदि गुरु भी घमंड में आकर कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान खो बैठे और कुमार्ग पर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है

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॥ २ · २१ · १४ ॥
बलमेष किमाश्रित्य हेतुं वा पुरुषोत्तम। दातुमिच्छति कैकेय्यै उपस्थितमिदं तव॥

balameṣa kimāśritya hetuṁ vā puruṣottama।
dātumicchati kaikeyyai upasthitamidaṁ tava॥

‘पुरुषोत्तम! राजा किस बल का सहारा लेकर अथवा किस कारण को सामने रखकर आपको न्यायतः प्राप्त हुआ यह राज्य अब कैकेयी को देना चाहते हैं?

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॥ २ · २१ · १५ ॥
त्वया चैव मया चैव कृत्वा वैरमनुत्तमम्। कास्य शक्तिः श्रियं दातुं भरतायारिशासन॥

tvayā caiva mayā caiva kṛtvā vairamanuttamam।
kāsya śaktiḥ śriyaṁ dātuṁ bharatāyāriśāsana॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आपके और मेरे साथ भारी वैर बाँधकर इनकी क्या शक्ति है कि यह राज्यलक्ष्मी ये भरत को दे दें?

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॥ २ · २१ · १६ ॥
अनुरक्तोऽस्मि भावेन भ्रातरं देवि तत्त्वतः। सत्येन धनुषा चैव दत्तेनेष्टेन ते शपे॥

anurakto'smi bhāvena bhrātaraṁ devi tattvataḥ।
satyena dhanuṣā caiva datteneṣṭena te śape॥

‘देवि! (बड़ी माँ!) मैं सत्य, धनुष, दान तथा यज्ञ आदि की शपथ खाकर तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि मेरा अपने पूज्य भ्राता श्रीराम में हार्दिक अनुराग है

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॥ २ · २१ · १७ ॥
दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि रामः प्रवेक्ष्यति। प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय॥

dīptamagnimaraṇyaṁ vā yadi rāmaḥ pravekṣyati।
praviṣṭaṁ tatra māṁ devi tvaṁ pūrvamavadhāraya॥

‘देवि! आप विश्वास रखें, यदि श्रीराम जलती हुई आग में या घोर वन में प्रवेश करनेवाले होंगे तो मैं इनसे भी पहले उसमें प्रविष्ट हो जाऊँगा

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॥ २ · २१ · १८ ॥
हरामि वीर्याद् दुःखं ते तमः सूर्य इवोदितः। देवी पश्यतु मे वीर्यं राघवश्चैव पश्यतु॥

harāmi vīryād duḥkhaṁ te tamaḥ sūrya ivoditaḥ।
devī paśyatu me vīryaṁ rāghavaścaiva paśyatu॥

‘इस समय आप, रघुनाथजी तथा अन्य सब लोग भी मेरे पराक्रम को देखें। जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकार का नाश कर देता है, उसी प्रकार मैं भी अपनी शक्ति से आपके सब दुःख दूर कर दूँगा

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॥ २ · २१ · १९ ॥
हनिष्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्तमानसम्। कृपणं स्थितं बाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम्॥

haniṣye pitaraṁ vṛddhaṁ kaikeyyāsaktamānasam।
kṛpaṇaṁ ca sthitaṁ bālye vṛddhabhāvena garhitam॥

‘जो कैकेयी में आसक्तचित्त होकर दीन बन गये हैं, बालभाव (अविवेक) में स्थित हैं और अधिक बुढ़ापे के कारण निन्दित हो रहे हैं, उन वृद्ध पिता को मैं अवश्य मार डालूँगा

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॥ २ · २१ · २० ॥
एतत् तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य महात्मनः। उवाच रामं कौसल्या रुदती शोकलालसा॥

etat tu vacanaṁ śrutvā lakṣmaṇasya mahātmanaḥ।
uvāca rāmaṁ kausalyā rudatī śokalālasā॥

महामनस्वी लक्ष्मण के ये ओजस्वी वचन सुनकर शोकमग्न कौसल्या श्रीराम से रोती हुई बोलीं—

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॥ २ · २१ · २१ ॥
भ्रातुस्ते वदतः पुत्र लक्ष्मणस्य श्रुतं त्वया। यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते॥

bhrātuste vadataḥ putra lakṣmaṇasya śrutaṁ tvayā।
yadatrānantaraṁ tattvaṁ kuruṣva yadi rocate॥

‘बेटा! तुमने अपने भाई लक्ष्मण की कही हुई सारी बातें सुन लीं, यदि जँचे तो अब इसके बाद तुम जो कुछ करना उचित समझो, उसे करो

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॥ २ · २१ · २२ ॥
चाधर्म्यं वचः श्रुत्वा सपत्न्या मम भाषितम्। विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमर्हसि मामितः॥

na cādharmyaṁ vacaḥ śrutvā sapatnyā mama bhāṣitam।
vihāya śokasaṁtaptāṁ gantumarhasi māmitaḥ॥

‘मेरी सौत की कही हुई अधर्मयुक्त बात सुनकर मुझ शोक से संतप्त माता को छोड़कर तुम्हें यहाँ से नहीं जाना चाहिये

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॥ २ · २१ · २३ ॥
धर्मज्ञ इति धर्मिष्ठ धर्मं चरितुमिच्छसि। शुश्रूष मामिहस्थस्त्वं चर धर्ममनुत्तमम्॥

dharmajña iti dharmiṣṭha dharmaṁ caritumicchasi।
śuśrūṣa māmihasthastvaṁ cara dharmamanuttamam॥

‘धर्मिष्ठ! तुम धर्म को जाननेवाले हो, इसलिये यदि धर्म का पालन करना चाहो तो यहीं रहकर मेरी सेवा करो और इस प्रकार परम उत्तम धर्म का आचरण करो

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॥ २ · २१ · २४ ॥
शुश्रूषुर्जननीं पुत्र स्वगृहे नियतो वसन्। परेण तपसा युक्तः काश्यपस्त्रिदिवं गतः॥

śuśrūṣurjananīṁ putra svagṛhe niyato vasan।
pareṇa tapasā yuktaḥ kāśyapastridivaṁ gataḥ॥

‘वत्स! अपने घर में नियमपूर्वक रहकर माता की सेवा करनेवाले काश्यप उत्तम तपस्या से युक्त हो स्वर्गलोक में चले गये थे

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॥ २ · २१ · २५ ॥
यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम्। त्वां साहं नानुजानामि गन्तव्यमितो वनम्॥

yathaiva rājā pūjyaste gauraveṇa tathā hyaham।
tvāṁ sāhaṁ nānujānāmi na gantavyamito vanam॥

‘जैसे गौरव के कारण राजा तुम्हारे पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन जाने की आज्ञा नहीं देती, अतः तुम्हें यहाँ से वन को नहीं जाना चाहिये

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॥ २ · २१ · २६ ॥
त्वद्वियोगान्न मे कार्यं जीवितेन सुखेन च। त्वया सह मम श्रेयस्तृणानामपि भक्षणम्॥

tvadviyogānna me kāryaṁ jīvitena sukhena ca।
tvayā saha mama śreyastṛṇānāmapi bhakṣaṇam॥

‘तुम्हारे साथ तिनके चबाकर रहना भी मेरे लिये श्रेयस्कर है, परंतु तुमसे विलग हो जाने पर न मुझे इस जीवन से कोई प्रयोजन है और न सुख से

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॥ २ · २१ · २७ ॥
यदि त्वं यास्यसि वनं त्यक्त्वा मां शोकलालसाम्। अहं प्रायमिहासिष्ये शक्ष्यामि जीवितुम्॥

yadi tvaṁ yāsyasi vanaṁ tyaktvā māṁ śokalālasām।
ahaṁ prāyamihāsiṣye na ca śakṣyāmi jīvitum॥

‘यदि तुम मुझे शोक में डूबी हुई छोड़कर वन को चले जाओगे तो मैं उपवास करके प्राण त्याग दूँगी, जीवित नहीं रह सकूँगी

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॥ २ · २१ · २८ ॥
ततस्त्वं प्राप्स्यसे पुत्र निरयं लोकविश्रुतम्। ब्रह्महत्यामिवाधर्मात् समुद्रः सरितां पतिः॥

tatastvaṁ prāpsyase putra nirayaṁ lokaviśrutam।
brahmahatyāmivādharmāt samudraḥ saritāṁ patiḥ॥

‘बेटा! ऐसा होने पर तुम संसारप्रसिद्ध वह नरक-तुल्य कष्ट पाओगे, जो ब्रह्महत्या के समान है और जिसे सरिताओं के स्वामी समुद्र ने अपने अधर्म के फलरूप से प्राप्त किया था’*

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॥ २ · २१ · २९ ॥
विलपन्तीं तथा दीनां कौसल्यां जननीं ततः। उवाच रामो धर्मात्मा वचनं धर्मसंहितम्॥

vilapantīṁ tathā dīnāṁ kausalyāṁ jananīṁ tataḥ।
uvāca rāmo dharmātmā vacanaṁ dharmasaṁhitam॥

माता कौसल्या को इस प्रकार दीन होकर विलाप करती देख धर्मात्मा श्रीरामचन्द्र ने यह धर्मयुक्त वचन कहा

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॥ २ · २१ · ३० ॥
नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम। प्रसादये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम्॥

nāsti śaktiḥ piturvākyaṁ samatikramituṁ mama।
prasādaye tvāṁ śirasā gantumicchāmyahaṁ vanam॥

‘माता! मैं तुम्हारे चरणों में सिर झुकाकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझमें पिताजी की आज्ञा का उल्लङ्घन करने की शक्ति नहीं है, अतः मैं वन को ही जाना चाहता हूँ

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॥ २ · २१ · ३१ ॥
ऋषिणा पितुर्वाक्यं कुर्वता वनचारिणा। गौर्हता जानताधर्मं कण्डुना विपश्चिता॥

ṛṣiṇā ca piturvākyaṁ kurvatā vanacāriṇā।
gaurhatā jānatādharmaṁ kaṇḍunā ca vipaścitā॥

‘वनवासी विद्वान् कण्डु मुनि ने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये अधर्म समझते हुए भी गौ का वध कर डाला था

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॥ २ · २१ · ३२ ॥
अस्माकं तु कुले पूर्वं सगरस्याज्ञया पितुः। खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तः सुमहान् वधः॥

asmākaṁ tu kule pūrvaṁ sagarasyājñayā pituḥ।
khanadbhiḥ sāgarairbhūmimavāptaḥ sumahān vadhaḥ॥

‘हमारे कुल में भी पहले राजा सगर के पुत्र ऐसे हो गये हैं, जो पिता की आज्ञा से पृथ्वी खोदते हुए बुरी तरह से मारे गये थे

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॥ २ · २१ · ३३ ॥
जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम्। कृता परशुनारण्ये पितुर्वचनकारणात्॥

jāmadagnyena rāmeṇa reṇukā jananī svayam।
kṛtā paraśunāraṇye piturvacanakāraṇāt॥

‘जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही वन में फरसे से अपनी माता रेणुका का गला काट डाला था

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॥ २ · २१ · ३४ ॥
एतैरन्यैश्च बहुभिर्देवि देवसमैः कृतम्। पितुर्वचनमक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम्॥

etairanyaiśca bahubhirdevi devasamaiḥ kṛtam।
piturvacanamaklībaṁ kariṣyāmi piturhitam॥

‘देवि! इन्होंने तथा और भी बहुत-से देवतुल्य मनुष्यों ने उत्साह के साथ पिता के आदेश का पालन किया है। अतः मैं भी कायरता छोड़कर पिता का हित-साधन करूँगा

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॥ २ · २१ · ३५ ॥
खल्वेतन्मयैकेन क्रियते पितृशासनम्। एतैरपि कृतं देवि ये मया परिकीर्तिताः॥

na khalvetanmayaikena kriyate pitṛśāsanam।
etairapi kṛtaṁ devi ye mayā parikīrtitāḥ॥

‘देवि! केवल मैं ही इस प्रकार पिता के आदेश का पालन नहीं कर रहा हूँ। जिनकी मैंने अभी चर्चा की है, उन सबने भी पिता के आदेश का पालन किया है

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॥ २ · २१ · ३६ ॥
नाहं धर्ममपूर्वं ते प्रतिकूलं प्रवर्तये। पूर्वैरयमभिप्रेतो गतो मार्गोऽनुगम्यते॥

nāhaṁ dharmamapūrvaṁ te pratikūlaṁ pravartaye।
pūrvairayamabhipreto gato mārgo'nugamyate॥

‘मा! मैं तुम्हारे प्रतिकूल किसी नवीन धर्म का प्रचार नहीं कर रहा हूँ। पूर्वकाल के धर्मात्मा पुरुषों को भी यह अभीष्ट था। मैं तो उनके चले हुए मार्ग का ही अनुसरण करता हूँ

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॥ २ · २१ · ३७ ॥
तदेतत् तु मया कार्यं क्रियते भुवि नान्यथा। पितुर्हि वचनं कुर्वन् कश्चिन्नाम हीयते॥

tadetat tu mayā kāryaṁ kriyate bhuvi nānyathā।
piturhi vacanaṁ kurvan na kaścinnāma hīyate॥

‘इस भूमण्डल पर जो सबके लिये करनेयोग्य है, वही मैं भी करने जा रहा हूँ। इसके विपरीत कोई न करनेयोग्य काम नहीं कर रहा हूँ। पिता की आज्ञा पालन करनेवाला कोई भी पुरुष धर्म से भ्रष्ट नहीं होता

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॥ २ · २१ · ३८ ॥
तामेवमुक्त्वा जननीं लक्ष्मणं पुनरब्रवीत्। वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्॥

tāmevamuktvā jananīṁ lakṣmaṇaṁ punarabravīt।
vākyaṁ vākyavidāṁ śreṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām॥

अपनी माता से ऐसा कहकर वाक्यवेत्ताओं में श्रेष्ठ समस्त धनुर्धरशिरोमणि श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा—

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॥ २ · २१ · ३९ ॥
तव लक्ष्मण जानामि मयि स्नेहमनुत्तमम्। विक्रमं चैव सत्त्वं तेजश्च सुदुरासदम्॥

tava lakṣmaṇa jānāmi mayi snehamanuttamam।
vikramaṁ caiva sattvaṁ ca tejaśca sudurāsadam॥

‘लक्ष्मण! मेरे प्रति तुम्हारा जो परम उत्तम स्नेह है, उसे मैं जानता हूँ। तुम्हारा पराक्रम, धैर्य और दुर्धर्ष तेज का भी मुझे ज्ञान है

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॥ २ · २१ · ४० ॥
मम मातुर्महद् दुःखमतुलं शुभलक्षण। अभिप्रायं विज्ञाय सत्यस्य शमस्य च॥

mama māturmahad duḥkhamatulaṁ śubhalakṣaṇa।
abhiprāyaṁ na vijñāya satyasya ca śamasya ca॥

‘शुभलक्षण लक्ष्मण! मेरी माता को जो अनुपम एवं महान् दुःख हो रहा है, वह सत्य और शम के विषय में मेरे अभिप्राय को न समझने के कारण है

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॥ २ · २१ · ४१ ॥
धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्। धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम्॥

dharmo hi paramo loke dharme satyaṁ pratiṣṭhitam।
dharmasaṁśritamapyetat piturvacanamuttamam॥

‘संसार में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। पिताजी का यह वचन भी धर्म के आश्रित होने के कारण परम उत्तम है

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॥ २ · २१ · ४२ ॥
संश्रुत्य पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा। कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता॥

saṁśrutya ca piturvākyaṁ māturvā brāhmaṇasya vā।
na kartavyaṁ vṛthā vīra dharmamāśritya tiṣṭhatā॥

‘वीर! धर्म का आश्रय लेकर रहनेवाले पुरुष को पिता, माता अथवा ब्राह्मण के वचनों का पालन करने की प्रतिज्ञा करके उसे मिथ्या नहीं करना चाहिये

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॥ २ · २१ · ४३ ॥
सोऽहं शक्ष्यामि पुनर्नियोगमतिवर्तितुम्। पितुर्हि वचनाद् वीर कैकेय्याहं प्रचोदितः॥

so'haṁ na śakṣyāmi punarniyogamativartitum।
piturhi vacanād vīra kaikeyyāhaṁ pracoditaḥ॥

‘वीर! अतः मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लङ्घन नहीं कर सकता; क्योंकि पिताजी के कहने से ही कैकेयी ने मुझे वन में जाने की आज्ञा दी है

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॥ २ · २१ · ४४ ॥
तदेतां विसृजानार्यां क्षत्रधर्माश्रितां मतिम्। धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्बुद्धिरनुगम्यताम्॥

tadetāṁ visṛjānāryāṁ kṣatradharmāśritāṁ matim।
dharmamāśraya mā taikṣṇyaṁ madbuddhiranugamyatām॥

‘इसलिये केवल क्षात्रधर्म का अवलम्बन करनेवाली इस ओछी बुद्धि का त्याग करो, धर्म का आश्रय लो, कठोरता छोड़ो और मेरे विचार के अनुसार चलो’

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॥ २ · २१ · ४५ ॥
तमेवमुक्त्वा सौहार्दाद् भ्रातरं लक्ष्मणाग्रजः। उवाच भूयः कौसल्यां प्राञ्जलिः शिरसा नतः॥

tamevamuktvā sauhārdād bhrātaraṁ lakṣmaṇāgrajaḥ।
uvāca bhūyaḥ kausalyāṁ prāñjaliḥ śirasā nataḥ॥

अपने भाई लक्ष्मण से सौहार्दवश ऐसी बात कहकर उनके बड़े भ्राता श्रीराम ने कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा—

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॥ २ · २१ · ४६ ॥
अनुमन्यस्व मां देवि गमिष्यन्तमितो वनम्। शापितासि मम प्राणैः कुरु स्वस्त्ययनानि मे॥

anumanyasva māṁ devi gamiṣyantamito vanam।
śāpitāsi mama prāṇaiḥ kuru svastyayanāni me॥

‘देवि! मैं यहाँ से वन को जाऊँगा। तुम मुझे आज्ञा दो और स्वस्तिवाचन कराओ। यह बात मैं अपने प्राणों की शपथ दिलाकर कहता हूँ

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॥ २ · २१ · ४७ ॥
तीर्णप्रतिज्ञश्च वनात् पुनरेष्याम्यहं पुरीम्। ययातिरिव राजर्षिः पुरा हित्वा पुनर्दिवम्॥

tīrṇapratijñaśca vanāt punareṣyāmyahaṁ purīm।
yayātiriva rājarṣiḥ purā hitvā punardivam॥

‘जैसे पूर्वकाल में राजर्षि ययाति स्वर्गलोक का त्याग करके पुनः भूतल पर उतर आये थे, उसी प्रकार मैं भी प्रतिज्ञा पूर्ण करके पुनः वन से अयोध्यापुरी को लौट आऊँगा

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॥ २ · २१ · ४८ ॥
शोकः संधार्यतां मातर्हृदये साधु मा शुचः। वनवासादिहैष्यामि पुनः कृत्वा पितुर्वचः॥

śokaḥ saṁdhāryatāṁ mātarhṛdaye sādhu mā śucaḥ।
vanavāsādihaiṣyāmi punaḥ kṛtvā piturvacaḥ॥

‘मा! शोक को अपने हृदय में ही अच्छी तरह दबाये रखो। शोक न करो। पिता की आज्ञा का पालन करके मैं फिर वनवास से यहाँ लौट आऊँगा

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॥ २ · २१ · ४९ ॥
त्वया मया वैदेह्या लक्ष्मणेन सुमित्रया। पितुर्नियोगे स्थातव्यमेष धर्मः सनातनः॥

tvayā mayā ca vaidehyā lakṣmaṇena sumitrayā।
piturniyoge sthātavyameṣa dharmaḥ sanātanaḥ॥

‘तुमको, मुझको, सीता को, लक्ष्मण को और माता सुमित्रा को भी पिताजी की आज्ञा में ही रहना चाहिये। यही सनातन धर्म है

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॥ २ · २१ · ५० ॥
अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दुःखं हृदि निगृह्य च। वनवासकृता बुद्धिर्मम धर्म्यानुवर्त्यताम्॥

amba sambhṛtya sambhārān duḥkhaṁ hṛdi nigṛhya ca।
vanavāsakṛtā buddhirmama dharmyānuvartyatām॥

‘मा! यह अभिषेक की सामग्री ले जाकर रख दो। अपने मन का दुःख मन में ही दबा लो और वनवास के सम्बन्ध में जो मेरा धर्मानुकूल विचार है, उसका अनुसरण करो—मुझे जाने की आज्ञा दो’

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॥ २ · २१ · ५१ ॥
एतद् वचस्तस्य निशम्य माता सुधर्म्यमव्यग्रमविक्लवं च। मृतेव संज्ञां प्रतिलभ्य देवी समीक्ष्य रामं पुनरित्युवाच॥

etad vacastasya niśamya mātā sudharmyamavyagramaviklavaṁ ca।
mṛteva saṁjñāṁ pratilabhya devī samīkṣya rāmaṁ punarityuvāca॥

श्रीरामचन्द्रजी की यह धर्मानुकूल व्यग्रता और आकुलता से रहित बात सुनकर जैसे मरे हुए मनुष्य में प्राण आ जाय, उसी प्रकार देवी कौसल्या मूर्च्छा त्यागकर होश में आ गयीं तथा अपने पुत्र श्रीराम की ओर देखकर इस प्रकार कहने लगीं—

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॥ २ · २१ · ५२ ॥
यथैव ते पुत्र पिता तथाहं गुरुः स्वधर्मेण सुहृत्तया च। त्वानुजानामि मां विहाय सुदुःखितामर्हसि पुत्र गन्तुम्॥

yathaiva te putra pitā tathāhaṁ guruḥ svadharmeṇa suhṛttayā ca।
na tvānujānāmi na māṁ vihāya suduḥkhitāmarhasi putra gantum॥

‘बेटा! धर्म और सौहार्द के नाते जैसे पिता तुम्हारे लिये आदरणीय गुरुजन हैं, वैसी ही मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन में जाने की आज्ञा नहीं देती। वत्स! मुझ दुःखिया को छोड़कर तुम्हें कहीं नहीं जाना चाहिये

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॥ २ · २१ · ५३ ॥
किं जीवितेनेह विना त्वया मे लोकेन वा किं स्वधयामृतेन। श्रेयो मुहूर्तं तव संनिधानं ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात्॥

kiṁ jīviteneha vinā tvayā me lokena vā kiṁ svadhayāmṛtena।
śreyo muhūrtaṁ tava saṁnidhānaṁ mamaiva kṛtsnādapi jīvalokāt॥

‘तुम्हारे बिना मुझे यहाँ इस जीवन से क्या लाभ है? इन स्वजनों से, देवता तथा पितरों की पूजा से और अमृत से भी क्या लेना है? तुम दो घड़ी भी मेरे पास रहो तो वही मेरे लिये सम्पूर्ण संसार के राज्य से भी बढ़कर सुख देनेवाला है

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॥ २ · २१ · ५४ ॥
नरैरिवोल्काभिरपोह्यमानो महागजो ध्वान्तमभिप्रविष्टः। भूयः प्रजज्वाल विलापमेवं निशम्य रामः करुणं जनन्याः॥

narairivolkābhirapohyamāno mahāgajo dhvāntamabhipraviṣṭaḥ।
bhūyaḥ prajajvāla vilāpamevaṁ niśamya rāmaḥ karuṇaṁ jananyāḥ॥

जैसे कोई विशाल गजराज किसी अन्धकूप में पड़ जाय और लोग उसे जलते लुआठों से मार-मारकर पीड़ित करने लगें, उस दशा में वह क्रोध से जल उठे; उसी प्रकार श्रीराम भी माता का बारंबार करुण-विलाप सुनकर (इसे स्वधर्मपालन में बाधा मानकर) आवेश में भर गये। (वन में जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया)

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॥ २ · २१ · ५५ ॥
मातरं चैव विसंज्ञकल्पामार्तां सौमित्रिमभिप्रतप्तम्। धर्मे स्थितो धर्ममुवाच वाक्यं यथा एवार्हति तत्र वक्तुम्॥

sa mātaraṁ caiva visaṁjñakalpāmārtāṁ ca saumitrimabhiprataptam।
dharme sthito dharmamuvāca vākyaṁ yathā sa evārhati tatra vaktum॥

उन्होंने धर्म में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अचेत-सी हो रही माता से और आर्त एवं सन्तप्त हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण से भी ऐसी धर्मानुकूल बात कही, जैसी उस अवसर पर वे ही कह सकते थे

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॥ २ · २१ · ५६ ॥
अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव जानामि भक्तिं पराक्रमं च। मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य मात्रा सहाभ्यर्दसि मां सुदुःखम्॥

ahaṁ hi te lakṣmaṇa nityameva jānāmi bhaktiṁ ca parākramaṁ ca।
mama tvabhiprāyamasaṁnirīkṣya mātrā sahābhyardasi māṁ suduḥkham॥

‘लक्ष्मण! मैं जानता हूँ, तुम सदा ही मुझमें भक्ति रखते हो और तुम्हारा पराक्रम कितना महान् है, यह भी मुझसे छिपा नहीं है; तथापि तुम मेरे अभिप्राय की ओर ध्यान न देकर माताजी के साथ स्वयं भी मुझे पीड़ा दे रहे हो। इस तरह मुझे अत्यन्त दुःख में न डालो

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॥ २ · २१ · ५७ ॥
धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु। ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्येव वश्याभिमता सुपुत्रा॥

dharmārthakāmāḥ khalu jīvaloke samīkṣitā dharmaphalodayeṣu।
ye tatra sarve syurasaṁśayaṁ me bhāryeva vaśyābhimatā suputrā॥

‘इस जीवजगत् में पूर्वकृत धर्म के फल की प्राप्ति के अवसरों पर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के-सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं—इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनों की साधन होती है। वह पति के वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथि-सत्कार आदि धर्म के पालन में सहायक होती है। प्रेयसीरूप से काम का साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोक की प्राप्तिरूप अर्थ की साधिका होती है

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॥ २ · २१ · ५८ ॥
यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत। द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके कामात्मता खल्वपि प्रशस्ता॥

yasmiṁstu sarve syurasaṁniviṣṭā dharmo yataḥ syāt tadupakrameta।
dveṣyo bhavatyarthaparo hi loke kāmātmatā khalvapi na praśastā॥

‘जिस कर्म में धर्म आदि सब पुरुषार्थों का समावेश न हो, उसको नहीं करना चाहिये। जिससे धर्म की सिद्धि होती हो, उसीका आरम्भ करना चाहिये। जो केवल अर्थपरायण होता है, वह लोक में सबके द्वेष का पात्र बन जाता है तथा धर्मविरुद्ध काम में अत्यन्त आसक्त होना प्रशंसा नहीं, निन्दा की बात है

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॥ २ · २१ · ५९ ॥
गुरुश्च राजा पिता वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात्। यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तन्न कुर्यादनृशंसवृत्तिः॥

guruśca rājā ca pitā ca vṛddhaḥ krodhāt praharṣādathavāpi kāmāt।
yad vyādiśet kāryamavekṣya dharmaṁ kastanna kuryādanṛśaṁsavṛttiḥ॥

‘महाराज हमलोगों के गुरु, राजा और पिता होने के साथ ही बड़े-बूढ़े माननीय पुरुष हैं। वे क्रोध से, हर्ष से अथवा काम से प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्य के लिये आज्ञा दें तो हमें धर्म समझकर उसका पालन करना चाहिये। जिसके आचरण में क्रूरता नहीं है, ऐसा कौन पुरुष पिता की आज्ञा के पालनरूप धर्म का आचरण नहीं करेगा

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॥ २ · २१ · ६० ॥
तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञामिमां कर्तुं सकलां यथावत्। ह्यावयोस्तात गुरुर्नियोगे देव्याश्च भर्ता गतिश्च धर्मः॥

na tena śaknomi pituḥ pratijñāmimāṁ na kartuṁ sakalāṁ yathāvat।
sa hyāvayostāta gururniyoge devyāśca bhartā sa gatiśca dharmaḥ॥

‘इसलिये मैं पिता की इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञा का यथावत् पालन करने से मुँह नहीं मोड़ सकता। तात लक्ष्मण! वे हम दोनों को आज्ञा देने में समर्थ गुरु हैं और माताजी के तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं

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॥ २ · २१ · ६१ ॥
तस्मिन् पुनर्जीवति धर्मराजे विशेषतः स्वे पथि वर्तमाने। देवी मया सार्धमितोऽभिगच्छेत् कथंस्विदन्या विधवेव नारी॥

tasmin punarjīvati dharmarāje viśeṣataḥ sve pathi vartamāne।
devī mayā sārdhamito'bhigacchet kathaṁsvidanyā vidhaveva nārī॥

‘वे धर्म के प्रवर्तक महाराज अभी जीवित हैं और विशेषतः अपने धर्ममय मार्ग पर स्थित हैं, ऐसी दशा में माताजी, जैसे दूसरी कोई विधवा स्त्री बेटे के साथ रहती है, उस प्रकार मेरे साथ यहाँ से वन में कैसे चल सकती हैं?

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॥ २ · २१ · ६२ ॥
सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं कुरुष्व नः स्वस्त्ययनानि देवि। यथा समाप्ते पुनराव्रजेयं यथा हि सत्येन पुनर्ययातिः॥

sā mānumanyasva vanaṁ vrajantaṁ kuruṣva naḥ svastyayanāni devi।
yathā samāpte punarāvrajeyaṁ yathā hi satyena punaryayātiḥ॥

‘अतः देवि! तुम मुझे वन में जाने की आज्ञा दो और हमारे मङ्गल के लिये स्वस्तिवाचन कराओ, जिससे वनवास की अवधि समाप्त होने पर मैं फिर तुम्हारी सेवा में आ जाऊँ। जैसे राजा ययाति सत्य के प्रभाव से फिर स्वर्ग में लौट आये थे

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॥ २ · २१ · ६३ ॥
यशो ह्यहं केवलराज्यकारणान्न पृष्ठतः कर्तुमलं महोदयम्। अदीर्घकालेन तु देवि जीविते वृणेऽवरामद्य महीमधर्मतः॥

yaśo hyahaṁ kevalarājyakāraṇānna pṛṣṭhataḥ kartumalaṁ mahodayam।
adīrghakālena tu devi jīvite vṛṇe'varāmadya mahīmadharmataḥ॥

‘केवल धर्महीन राज्य के लिये मैं महान् फलदायक धर्मपालनरूप सुयश को पीछे नहीं ढकेल सकता। मा! जीवन अधिक कालतक रहनेवाला नहीं है; इसके लिये मैं आज अधर्मपूर्वक इस तुच्छ पृथ्वी का राज्य लेना नहीं चाहता’

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॥ २ · २१ · ६४ ॥
प्रसादयन्नरवृषभः मातरं पराक्रमाज्जिगमिषुरेव दण्डकान्। अथानुजं भृशमनुशास्य दर्शनं चकार तां हृदि जननीं प्रदक्षिणम्॥

prasādayannaravṛṣabhaḥ sa mātaraṁ parākramājjigamiṣureva daṇḍakān।
athānujaṁ bhṛśamanuśāsya darśanaṁ cakāra tāṁ hṛdi jananīṁ pradakṣiṇam॥

इस प्रकार नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने धैर्यपूर्वक दण्डकारण्य में जाने की इच्छा से माता को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया तथा अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भी अपने विचार के अनुसार भलीभाँति धर्म का रहस्य समझाकर मन-ही-मन माता की परिक्रमा करने का संकल्प किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥