वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १८ · ४१ श्लोकाःSarga 18 · 41 ślokas

श्रीरामका कैकेयीसे पिताके चिन्तित होनेका कारण पूछना और कैकेयीका कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वरोंका वृत्तान्त बताकर श्रीरामको वनवासके लिये प्रेरित करना

कैकेयी-वनवासादेश

“कैकेयी-वनवासादेश”
॥ २ · १८ · ३१–४१ ॥

राज्ञो मन्दिरे कैकेयी कठोरवचनैः रामं वनवासाय आदिशति; पार्श्वे वृद्धो दशरथः आसने अवसन्नः अश्रुपूर्णमुखः पुत्रं द्रष्टुमपि न शक्नोति; शयामवर्णो रामस्तु प्रसन्नः अक्षुब्धः बद्धाञ्जलिः तिष्ठति।

राजमहलके प्रातःकक्षमें रानी कैकेयी अविचल खड़ी होकर कठोर वाणीमें श्रीरामको वनवासका आदेश सुना रही है; पास ही वृद्ध महाराज दशरथ आसनपर ढह-से गये हैं, उनका मुख आँसुओंसे भीगा और दूसरी ओर फिरा है, वे अपने प्रिय पुत्रकी ओर देख तक नहीं पाते; किंतु श्यामवर्ण मुकुटधारी श्रीराम पूर्ण शान्त एवं अविचलित भावसे हाथ जोड़े यह कठोर निर्णय ग्रहण कर रहे हैं।

In the king's morning chamber Queen Kaikeyi stands upright and implacable, coldly pronouncing the sentence of exile to Ram; beside her the aged Dasharath sits collapsed upon his seat, his tear-wet face turned away, unable even to look at his beloved son, while the blue-complexioned, crown-banded Ram receives the harsh decree with folded hands and utter serene composure.

॥ २ · १८ · १ ॥
ददर्शासने रामो विषण्णं पितरं शुभे कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता

sa dadarśāsane rāmo viṣaṇṇaṁ pitaraṁ śubhe ।
kaikeyyā sahitaṁ dīnaṁ mukhena pariśuṣyatā ॥

महल में जाकर श्रीराम ने पिता को कैकेयी के साथ एक सुन्दर आसन पर बैठे देखा । वे विषाद में डूबे हुए थे, उनका मुँह सूख गया था और वे बड़े दयनीय दिखायी देते थे

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २ ॥
पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत् ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः

sa pituścaraṇau pūrvamabhivādya vinītavat ।
tato vavande caraṇau kaikeyyāḥ susamāhitaḥ ॥

निकट पहुँचने पर श्रीराम ने विनीतभाव से पहले अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया; उसके बाद बड़ी सावधानी के साथ उन्होंने कैकेयी के चरणों में भी मस्तक झुकाया

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३ ॥
रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षणः शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम्

rāmetyuktvā tu vacanaṁ bāṣpaparyākulekṣaṇaḥ ।
śaśāka nṛpatirdīno nekṣituṁ nābhibhāṣitum ॥

उस समय दीनदशा में पड़े हुए राजा दशरथ एक बार ‘राम!’ ऐसा कहकर चुप हो गये (इससे आगे उनसे बोला नहीं गया) । उनके नेत्रों में आँसू भर आये, अतः वे श्रीराम की ओर न तो देख सके और न उनसे कोई बात ही कर सके

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ४ ॥
तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम् रामोऽपि भयमापन्नः पदा स्पृष्ट्वैव पन्नगम्

tadapūrvaṁ narapaterdṛṣṭvā rūpaṁ bhayāvaham ।
rāmo'pi bhayamāpannaḥ padā spṛṣṭvaiva pannagam ॥

राजा का वह अभूतपूर्व भयंकर रूप देखकर श्रीराम को भी भय हो गया, मानो उन्होंने पैर से किसी सर्प को छू दिया हो

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ५ ॥
इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसंतापकर्शितम् निःश्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम्

indriyairaprahṛṣṭaistaṁ śokasaṁtāpakarśitam ।
niḥśvasantaṁ mahārājaṁ vyathitākulacetasam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १८ · ६ ॥
ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम् उपप्लुतमिवादित्यमुक्तानृतमृषिं यथा

ūrmimālinamakṣobhyaṁ kṣubhyantamiva sāgaram ।
upaplutamivādityamuktānṛtamṛṣiṁ yathā ॥

॥ ५–६ ॥

राजा की इन्द्रियों में प्रसन्नता नहीं थी; वे शोक और संताप से दुर्बल हो रहे थे, बारंबार लंबी साँसें भरते तथा उनके चित्त में बड़ी व्यथा और व्याकुलता थी । वे ऐसे दीखते थे, मानो तरङ्गमालाओं से उपलक्षित अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा हो, सूर्य को राहु ने ग्रस लिया हो अथवा किसी महर्षि ने झूठ बोल दिया हो

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ७ ॥
अचिन्त्यकल्पं नृपतेस्तं शोकमुपधारयन् बभूव संरब्धतरः समुद्र इव पर्वणि

acintyakalpaṁ nṛpatestaṁ śokamupadhārayan ।
babhūva saṁrabdhataraḥ samudra iva parvaṇi ॥

राजा का वह शोक सम्भावना से परे था । इस शोक का क्या कारण है—यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूर्णिमा के समुद्र की भाँति अधिक विक्षुब्ध हो उठे

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ८ ॥
चिन्तयामास चतुरो रामः पितृहिते रतः किंस्विदद्यैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति

cintayāmāsa caturo rāmaḥ pitṛhite rataḥ ।
kiṁsvidadyaiva nṛpatirna māṁ pratyabhinandati ॥

पिता के हित में तत्पर रहनेवाले परम चतुर श्रीराम सोचने लगे कि ‘आज ही ऐसी क्या बात हो गयी जिससे महाराज मुझसे प्रसन्न होकर बोलते नहीं हैं

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ९ ॥
अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते

anyadā māṁ pitā dṛṣṭvā kupito'pi prasīdati ।
tasya māmadya samprekṣya kimāyāsaḥ pravartate ॥

और दिन तो पिताजी कुपित होने पर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाते थे, आज मेरी ओर दृष्टिपात करके इन्हें क्लेश क्यों हो रहा है

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १० ॥
दीन इव शोकार्तो विषण्णवदनद्युतिः कैकेयीमभिवाद्यैव रामो वचनमब्रवीत्

sa dīna iva śokārto viṣaṇṇavadanadyutiḥ ।
kaikeyīmabhivādyaiva rāmo vacanamabravīt ॥

यह सब सोचकर श्रीराम दीन-से हो गये, शोक से कातर हो उठे, विषाद के कारण उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी । वे कैकेयी को प्रणाम करके उसीसे पूछने लगे—

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ११ ॥
कच्चिन्मया नापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय

kaccinmayā nāparāddhamajñānād yena me pitā ।
kupitastanmamācakṣva tvamevainaṁ prasādaya ॥

‘मा! मुझसे अनजान में कोई अपराध तो नहीं हो गया, जिससे पिताजी मुझपर नाराज हो गये हैं । तुम यह बात मुझे बताओ और तुम्हीं इन्हें मना दो

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १२ ॥
अप्रसन्नमनाः किं नु सदा मां प्रति वत्सलः विषण्णवदनो दीनो नहि मां प्रति भाषते

aprasannamanāḥ kiṁ nu sadā māṁ prati vatsalaḥ ।
viṣaṇṇavadano dīno nahi māṁ prati bhāṣate ॥

‘ये तो सदा मुझे प्यार करते थे, फिर इनका मन अप्रसन्न क्यों हो गया? देखता हूँ ये आज मुझसे बोलतेतक नहीं हैं, इनके मुख पर विषाद छा रहा है और ये अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १३ ॥
शारीरो मानसो वापि कच्चिदेनं बाधते संतापो वाभितापो वा दुर्लभं हि सदा सुखम्

śārīro mānaso vāpi kaccidenaṁ na bādhate ।
saṁtāpo vābhitāpo vā durlabhaṁ hi sadā sukham ॥

‘कोई शारीरिक संताप अथवा मानसिक अभिताप (चिन्ता) तो इन्हें पीड़ित नहीं कर रहा है? क्योंकि मनुष्य को सदा सुख-ही-सुख मिले—ऐसा सुयोग प्रायः दुर्लभ होता है

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १४ ॥
कच्चिन्न किंचिद् भरते कुमारे प्रियदर्शने शत्रुघ्ने वा महासत्त्वे मातॄणां वा ममाशुभम्

kaccinna kiṁcid bharate kumāre priyadarśane ।
śatrughne vā mahāsattve mātṝṇāṁ vā mamāśubham ॥

‘प्रियदर्शन कुमार भरत, महाबली शत्रुघ्न अथवा मेरी माताओं का तो कोई अमङ्गल नहीं हुआ है?

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १५ ॥
अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वचः मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे

atoṣayan mahārājamakurvan vā piturvacaḥ ।
muhūrtamapi neccheyaṁ jīvituṁ kupite nṛpe ॥

‘महाराज को असंतुष्ट करके अथवा इनकी आज्ञा न मानकर इन्हें कुपित कर देने पर मैं दो घड़ी भी जीवित रहना नहीं चाहूँगा

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १६ ॥
यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः कथं तस्मिन् वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते

yatomūlaṁ naraḥ paśyet prādurbhāvamihātmanaḥ ।
kathaṁ tasmin na varteta pratyakṣe sati daivate ॥

‘मनुष्य जिसके कारण इस जगत् में अपना प्रादुर्भाव (जन्म) देखता है, उस प्रत्यक्ष देवता पिता के जीते-जी वह उसके अनुकूल बर्ताव क्यों न करेगा?

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १७ ॥
कच्चित्ते परुषं किंचिदभिमानात् पिता मम उक्तो भवत्या रोषेण येनास्य लुलितं मनः

kaccitte paruṣaṁ kiṁcidabhimānāt pitā mama ।
ukto bhavatyā roṣeṇa yenāsya lulitaṁ manaḥ ॥

‘कहीं तुमने तो अभिमान या रोष के कारण मेरे पिताजी से कोई कठोर बात नहीं कह डाली, जिससे इनका मन दुःखी हो गया है?

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १८ ॥
एतदाचक्ष्व मे देवि तत्त्वेन परिपृच्छतः किंनिमित्तमपूर्वोऽयं विकारो मनुजाधिपे

etadācakṣva me devi tattvena paripṛcchataḥ ।
kiṁnimittamapūrvo'yaṁ vikāro manujādhipe ॥

‘देवि! मैं सच्ची बात पूछता हूँ, किस कारण से महाराज के मन में आज इतना विकार (संताप) है? इनकी ऐसी अवस्था तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी’

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · १९ ॥
एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वचः

evamuktā tu kaikeyī rāghaveṇa mahātmanā ।
uvācedaṁ sunirlajjā dhṛṣṭamātmahitaṁ vacaḥ ॥

महात्मा श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर अत्यन्त निर्लज्ज कैकेयी बड़ी ढिठाई के साथ अपने मतलब की बात इस प्रकार बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २० ॥
राजा कुपितो राम व्यसनं नास्य किंचन किंचिन्मनोगतं त्वस्य त्वद्भयान्नानुभाषते

na rājā kupito rāma vyasanaṁ nāsya kiṁcana ।
kiṁcinmanogataṁ tvasya tvadbhayānnānubhāṣate ॥

‘राम! महाराज कुपित नहीं हैं और न इन्हें कोई कष्ट ही हुआ है । इनके मन में कोई बात है, जिसे तुम्हारे डर से ये कह नहीं पा रहे हैं

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २१ ॥
प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम

priyaṁ tvāmapriyaṁ vaktuṁ vāṇī nāsya pravartate ।
tadavaśyaṁ tvayā kāryaṁ yadanenāśrutaṁ mama ॥

‘तुम इनके प्रिय हो, तुमसे कोई अप्रिय बात कहने के लिये इनकी जबान नहीं खुलती; किंतु इन्होंने जिस कार्य के लिये मेरे सामने प्रतिज्ञा की है, उसका तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिये

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २२ ॥
एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य पश्चात् तप्यते राजा यथान्यः प्राकृतस्तथा

eṣa mahyaṁ varaṁ dattvā purā māmabhipūjya ca ।
sa paścāt tapyate rājā yathānyaḥ prākṛtastathā ॥

‘इन्होंने पहले तो मेरा सत्कार करते हुए मुझे मुँहमाँगा वरदान दे दिया और अब ये दूसरे गँवार मनुष्यों की भाँति उसके लिये पश्चात्ताप करते हैं

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २३ ॥
अतिसृज्य ददानीति वरं मम विशाम्पतिः निरर्थं गतजले सेतुं बन्धितुमिच्छति

atisṛjya dadānīti varaṁ mama viśāmpatiḥ ।
sa nirarthaṁ gatajale setuṁ bandhitumicchati ॥

‘ये प्रजानाथ पहले ‘मैं दूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके मुझे वर दे चुके हैं और अब उसके निवारण के लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हैं, पानी निकल जाने पर उसे रोकने के लिये बाँध बाँधने की निरर्थक चेष्टा करते हैं

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २४ ॥
धर्ममूलमिदं राम विदितं सतामपि तत् सत्यं त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा

dharmamūlamidaṁ rāma viditaṁ ca satāmapi ।
tat satyaṁ na tyajed rājā kupitastvatkṛte yathā ॥

‘राम! सत्य ही धर्म की जड़ है, यह सत्पुरुषों का भी निश्चय है । कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्य का ही छोड़ बैठें । जैसे भी इनके सत्य का पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २५ ॥
यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाशुभम् करिष्यसि ततः सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम्

yadi tad vakṣyate rājā śubhaṁ vā yadi vāśubham ।
kariṣyasi tataḥ sarvamākhyāsyāmi punastvaham ॥

‘यदि राजा जिस बात को कहना चाहते हैं, वह शुभ हो या अशुभ, तुम सर्वथा उसका पालन करो तो मैं सारी बात पुनः कहूँगी

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २६ ॥
यदि त्वभिहितं राज्ञा त्वयि तन्न विपत्स्यते ततोऽहमभिधास्यामि ह्येष त्वयि वक्ष्यति

yadi tvabhihitaṁ rājñā tvayi tanna vipatsyate ।
tato'hamabhidhāsyāmi na hyeṣa tvayi vakṣyati ॥

‘यदि राजा की कही हुई बात तुम्हारे कानों में पड़कर वहीं नष्ट न हो जाय—यदि तुम उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन कर सको तो मैं तुमसे सब कुछ खोलकर बता दूँगी, ये स्वयं तुमसे कुछ नहीं कहेंगे’

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २७ ॥
एतत् तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम् उवाच व्यथितो रामस्तां देवीं नृपसंनिधौ

etat tu vacanaṁ śrutvā kaikeyyā samudāhṛtam ।
uvāca vyathito rāmastāṁ devīṁ nṛpasaṁnidhau ॥

कैकेयी की कही हुई यह बात सुनकर श्रीराम के मन में बड़ी व्यथा हुई । उन्होंने राजा के समीप ही देवी कैकेयी से इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · २८ ॥
अहो धिङ् नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके

aho dhiṅ nārhase devi vaktuṁ māmīdṛśaṁ vacaḥ ।
ahaṁ hi vacanād rājñaḥ pateyamapi pāvake ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १८ · २९ ॥
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण हितेन

bhakṣayeyaṁ viṣaṁ tīkṣṇaṁ pateyamapi cārṇave ।
niyukto guruṇā pitrā nṛpeṇa ca hitena ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १८ · ३० ॥
तद् ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकाङ्क्षितम् करिष्ये प्रतिजाने रामो द्विर्नाभिभाषते

tad brūhi vacanaṁ devi rājño yadabhikāṅkṣitam ।
kariṣye pratijāne ca rāmo dvirnābhibhāṣate ॥

॥ २८–३० ॥

‘अहो! धिक्कार है! देवि! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुँह से नहीं निकालनी चाहिये । मैं तो महाराज के कहने से आग में भी कूद सकता हूँ, तीव्र विष का भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये देवि! राजा को जो अभीष्ट है, वह बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा । राम दो तरह की बात नहीं करता है’

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३१ ॥
तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम् उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम्

tamārjavasamāyuktamanāryā satyavādinam ।
uvāca rāmaṁ kaikeyī vacanaṁ bhṛśadāruṇam ॥

श्रीराम सरल स्वभाव से युक्त और सत्यवादी थे, उनकी बात सुनकर अनार्या कैकेयी ने अत्यन्त दारुण वचन कहना आरम्भ किया—

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३२ ॥
पुरा देवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे

purā devāsure yuddhe pitrā te mama rāghava ।
rakṣitena varau dattau saśalyena mahāraṇe ॥

‘रघुनन्दन! पहले की बात है, देवासुरसंग्राम में तुम्हारे पिता शत्रुओं के बाणों से बिंध गये थे, उस महासमर में मैंने इनकी रक्षा की थी, उससे प्रसन्न होकर इन्होंने मुझे दो वर दिये थे

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३३ ॥
तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम् गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव

tatra me yācito rājā bharatasyābhiṣecanam ।
gamanaṁ daṇḍakāraṇye tava cādyaiva rāghava ॥

‘राघव! उन्हींमें से एक वर के द्वारा तो मैंने महाराज से यह याचना की है कि भरत का राज्याभिषेक हो और दूसरा वर यह माँगा है कि तुम्हें आज ही दण्डकारण्य में भेज दिया जाय

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३४ ॥
यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि आत्मानं नरश्रेष्ठ मम वाक्यमिदं शृणु

yadi satyapratijñaṁ tvaṁ pitaraṁ kartumicchasi ।
ātmānaṁ ca naraśreṣṭha mama vākyamidaṁ śṛṇu ॥

‘नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिता को सत्यप्रतिज्ञ बनाना चाहते हो और अपनेको भी सत्यवादी सिद्ध करने की इच्छा रखते हो तो मेरी यह बात सुनो

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३५ ॥
संनिदेशे पितुस्तिष्ठ यथानेन प्रतिश्रुतम् त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च

saṁnideśe pitustiṣṭha yathānena pratiśrutam ।
tvayāraṇyaṁ praveṣṭavyaṁ nava varṣāṇi pañca ca ॥

‘तुम पिता की आज्ञा के अधीन रहो, जैसी इन्होंने प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार तुम्हें चौदह वर्षों के लिये वन में प्रवेश करना चाहिये

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३६ ॥
भरतश्चाभिषिच्येत यदेतदभिषेचनम् त्वदर्थे विहितं राज्ञा तेन सर्वेण राघव

bharataścābhiṣicyeta yadetadabhiṣecanam ।
tvadarthe vihitaṁ rājñā tena sarveṇa rāghava ॥

‘रघुनन्दन! राजा ने तुम्हारे लिये जो यह अभिषेक का सामान जुटाया है, उस सबके द्वारा यहाँ भरत का अभिषेक किया जाय

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३७ ॥
सप्त सप्त वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः अभिषेकमिदं त्यक्त्वा जटाचीरधरो भव

sapta sapta ca varṣāṇi daṇḍakāraṇyamāśritaḥ ।
abhiṣekamidaṁ tyaktvā jaṭācīradharo bhava ॥

‘और तुम इस अभिषेक को त्यागकर चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्य में रहते हुए जटा और चीर धारण करो

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३८ ॥
भरतः कोसलपतेः प्रशास्तु वसुधामिमाम् नानारत्नसमाकीर्णां सवाजिरथसंकुलाम्

bharataḥ kosalapateḥ praśāstu vasudhāmimām ।
nānāratnasamākīrṇāṁ savājirathasaṁkulām ॥

‘कोसलनरेश की इस वसुधा का, जो नाना प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी और घोड़े तथा रथों से व्याप्त है, भरत शासन करें

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ३९ ॥
एतेन त्वां नरेन्द्रोऽयं कारुण्येन समाप्लुतः शोकैः संक्लिष्टवदनो शक्नोति निरीक्षितुम्

etena tvāṁ narendro'yaṁ kāruṇyena samāplutaḥ ।
śokaiḥ saṁkliṣṭavadano na śaknoti nirīkṣitum ॥

‘बस इतनी ही बात है, ऐसा करने से तुम्हारे वियोग का कष्ट सहन करना पड़ेगा, यह सोचकर महाराज करुणा में डूब रहे हैं । इसी शोक से इनका मुख सूख गया है और इन्हें तुम्हारी ओर देखने का साहस नहीं होता

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ४० ॥
एतत् कुरु नरेन्द्रस्य वचनं रघुनन्दन सत्येन महता राम तारयस्व नरेश्वरम्

etat kuru narendrasya vacanaṁ raghunandana ।
satyena mahatā rāma tārayasva nareśvaram ॥

‘रघुनन्दन राम! तुम राजा की इस आज्ञा का पालन करो और इनके महान् सत्य की रक्षा करके इन नरेश को संकट से उबार लो’

English translation coming soon.

॥ २ · १८ · ४१ ॥
इतीव तस्यां परुषं वदन्त्यां चैव रामः प्रविवेश शोकम् प्रविव्यथे चापि महानुभावो राजा पुत्रव्यसनाभितप्तः

itīva tasyāṁ paruṣaṁ vadantyāṁ
na caiva rāmaḥ praviveśa śokam ।
pravivyathe cāpi mahānubhāvo
rājā ca putravyasanābhitaptaḥ ॥

कैकेयी के इस प्रकार कठोर वचन कहने पर भी श्रीराम के हृदय में शोक नहीं हुआ, परंतु महानुभाव राजा दशरथ पुत्र के भावी वियोगजनित दुःख से संतप्त एवं व्यथित हो उठे

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥