वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १७ · २२ श्लोकाःSarga 17 · 22 ślokas

श्रीरामका राजपथकी शोभा देखते और सुहृदोंकी बातें सुनते हुए पिताके भवनमें प्रवेश

राम-भवनप्रवेश

“राम-भवनप्रवेश”
॥ २ · १७ · १–१६ ॥

त्यक्तपरिवारो रथश्च, तेजस्वी नीलवर्णो रामः एकाकी शान्तः पादाभ्यां महेन्द्रोपमस्य श्वेतहेमप्रासादस्य अन्तिमं स्तम्भाङ्गणं पितुरन्तःकक्षं प्रति व्रजति; अन्तर्द्वारे वेत्रधरा रक्षिणः प्रणमन्ति; पृष्ठतो जनाश्चन्द्रोदयं समुद्र इव अनिमेषं तं पश्यन्तस्तिष्ठन्ति।

अपने अनुचरों और रथको पीछे छोड़कर तेजस्वी नीलवर्ण श्रीराम अकेले, शान्तभावसे पैदल ही इन्द्रभवनके समान श्वेत-स्वर्ण प्रासादके अन्तिम स्तम्भयुक्त आँगनसे होकर पिताके भीतरी कक्षकी ओर जा रहे हैं; भीतरी द्वारपर बेंत लिये कुछ रक्षक झुककर प्रणाम कर रहे हैं; पीछे एकत्र लोग, चन्द्रोदयकी प्रतीक्षा करते समुद्रके समान, उनसे दृष्टि हटा न पाते अनिमेष देखते खड़े हैं।

Leaving his retinue and chariot behind, the radiant blue-complexioned Ram walks alone and serene on foot through the last pillared courtyard of the Indra-like white-and-gold palace toward his father's inner chamber; a few staff-bearing guards bow at the inner door, while behind him the gathered people gaze after him unblinking, like the ocean awaiting the rising moon, shafts of morning light through the tall pillars.

॥ २ · १७ · १ ॥
रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जनः पताकाध्वजसम्पन्नं महार्हागुरुधूपितम्

sa rāmo rathamāsthāya samprahṛṣṭasuhṛjjanaḥ ।
patākādhvajasampannaṁ mahārhāgurudhūpitam ॥

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॥ २ · १७ · २ ॥
अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम् गृहैरभ्रसंकाशैः पाण्डुरैरुपशोभितम् राजमार्गं ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम्

apaśyannagaraṁ śrīmān nānājanasamanvitam ।
sa gṛhairabhrasaṁkāśaiḥ pāṇḍurairupaśobhitam ॥
rājamārgaṁ yayau rāmo madhyenāgurudhūpitam ।

॥ १–२ ॥

इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदों को आनन्द प्रदान करते हुए रथ पर बैठे राजमार्ग के बीच में चले जा रहे थे; उन्होंने देखा—सारा नगर ध्वजा और पताकाओं से सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरु नामक धूप की सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्यों की भीड़ दिखायी देती है। वह राजमार्ग श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल भव्य भवनों से सुशोभित तथा अगुरु की सुगन्ध से व्याप्त हो रहा था

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॥ २ · १७ · ३ ॥
चन्दनानां मुख्यानामगुरूणां संचयैः

candanānāṁ ca mukhyānāmagurūṇāṁ ca saṁcayaiḥ ॥

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॥ २ · १७ · ४ ॥
उत्तमानां गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि

uttamānāṁ ca gandhānāṁ kṣaumakauśāmbarasya ca ।
aviddhābhiśca muktābhiruttamaiḥ sphāṭikairapi ॥

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॥ २ · १७ · ५ ॥
शोभमानमसम्बाधं तं राजपथमुत्तमम् संवृतं विविधैः पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि

śobhamānamasambādhaṁ taṁ rājapathamuttamam ।
saṁvṛtaṁ vividhaiḥ puṣpairbhakṣyairuccāvacairapi ॥

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॥ २ · १७ · ६ ॥
ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा दध्यक्षतहविर्लाजैर्धूपैरगुरुचन्दनैः नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम्

dadarśa taṁ rājapathaṁ divi devapatiryathā ।
dadhyakṣatahavirlājairdhūpairagurucandanaiḥ ॥
nānāmālyopagandhaiśca sadābhyarcitacatvaram ।

॥ ३–६ ॥

अच्छी श्रेणी के चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदि के रेशों से बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रों के ढेर, अनिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। वह नाना प्रकार के पुष्पों तथा भौंति-भौंति भक्ष्य पदार्थों से भरा हुआ था। उसके चौराहों की दही, अक्षत, हविष्य, लाजा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकार के पुष्पहार और गन्धद्रव्यों से सदा पूजा की जाती थी। स्वर्गलोक में बैठे देवराज इन्द्र की भौंति रथारूढ़ श्रीराम ने उस राजमार्ग को देखा

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॥ २ · १७ · ७ ॥
आशीर्वादान्बहून् शृण्वन् सुहृद्भिः समुदीरितान् यथार्हं चापि सम्पूज्य सर्वानेव नरान् ययौ

āśīrvādānbahūn śṛṇvan suhṛdbhiḥ samudīritān ॥
yathārhaṁ cāpi sampūjya sarvāneva narān yayau ।

वे अपने सुहृदों के मुख से कहे गये बहुत-से आशीर्वादों को सुनते और यथायोग्य उन सब लोगों का सम्मान करते हुए चले जा रहे थे

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॥ २ · १७ · ८ ॥
पितामहैराचरितं तथैव प्रपितामहैः अद्योपादाय तं मार्गमभिषिक्तोऽनुपालय

pitāmahairācaritaṁ tathaiva prapitāmahaiḥ ॥
adyopādāya taṁ mārgamabhiṣikto'nupālaya ।

(उनके हितैषी सुहृद् कहते थे—) ‘रघुनन्दन! तुम्हारे पितामह और प्रपितामह (दादे और परदादे) जिसपर चलते आये हैं, आज उसी मार्ग को ग्रहण करके युवराज-पद पर अभिषिक्त हो आप हम सब लोगों का निरन्तर पालन करें’

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॥ २ · १७ · ९ ॥
यथा स्म पोषिताः पित्रा यथा सर्वैः पितामहैः ततः सुखतरं सर्वे रामे वत्स्याम राजनि

yathā sma poṣitāḥ pitrā yathā sarvaiḥ pitāmahaiḥ ।
tataḥ sukhataraṁ sarve rāme vatsyāma rājani ॥

(फिर वे आपस में कहने लगे—) ‘भाइयो! श्रीराम के पिता तथा समस्त पितामहोंद्वारा जिस प्रकार हमलोगों का पालन-पोषण हुआ है, श्रीराम के राजा होने पर हम उससे भी अधिक सुखी रहेंगे

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॥ २ · १७ · १० ॥
अलमद्य हि भुक्तेन परमार्थैरलं नः यदि पश्याम निर्यान्तं रामं राज्ये प्रतिष्ठितम्

alamadya hi bhuktena paramārthairalaṁ ca naḥ ।
yadi paśyāma niryāntaṁ rāmaṁ rājye pratiṣṭhitam ॥

‘यदि हम राष्ट्र पर प्रतिष्ठित हुए श्रीराम को पिता के घर से निकलते हुए देख लें—यदि राजा राम का दर्शन कर लें तो अब हमें इहलोक के भोग और परमार्थस्वरूप मोक्ष लेकर क्या करना है

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॥ २ · १७ · ११ ॥
ततो हि नः प्रियतरं नान्यत् किंचिद् भविष्यति यथाभिषेको रामस्य राज्येनामितेजसः

tato hi naḥ priyataraṁ nānyat kiṁcid bhaviṣyati ।
yathābhiṣeko rāmasya rājyenāmitejasaḥ ॥

‘अमित तेजस्वी श्रीराम का यदि राज्य पर अभिषेक हो जाय तो वह हमारे लिये जैसा प्रियतर कार्य होगा, उससे बढ़कर दूसरा कोई परम प्रिय कार्य नहीं होगा’

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॥ २ · १७ · १२ ॥
एताश्चान्याश्च सुहृदामुदासीनः शुभाः कथाः आत्मसम्पूजनीः शृण्वन् ययौ रामो महापथम्

etāścānyāśca suhṛdāmudāsīnaḥ śubhāḥ kathāḥ ।
ātmasampūjanīḥ śṛṇvan yayau rāmo mahāpatham ॥

सुहृदों के मुँह से निकली हुई ये तथा और भी कई तरह की अपनी प्रशंसा से सम्बन्ध रखनेवाली सुन्दर बातें सुनते हुए श्रीरामचन्द्रजी राजपथ पर बढ़े चले जा रहे थे

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॥ २ · १७ · १३ ॥
हि तस्मान्मनः कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात् नरः शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेऽपि राघवे

na hi tasmānmanaḥ kaściccakṣuṣī vā narottamāt ।
naraḥ śaknotyapākraṣṭumatikrānte'pi rāghave ॥

(जो श्रीराम की ओर एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था।) श्रीरघुनाथजी के दूर चले जाने पर भी कोई उन पुरुषोत्तम की ओर से अपना मन या दृष्टि नहीं हटा सकता था

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॥ २ · १७ · १४ ॥
यश्च रामं पश्येत्तु यं रामो पश्यति निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते

yaśca rāmaṁ na paśyettu yaṁ ca rāmo na paśyati ।
ninditaḥ sarvalokeṣu svātmāpyenaṁ vigarhate ॥

उस समय जो श्रीराम को नहीं देखता और जिसे श्रीराम नहीं देख लेते थे, वह समस्त लोकों में निन्दित समझा जाता था तथा स्वयं उसकी अन्तरात्मा भी उसे धिक्कारती थी

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॥ २ · १७ · १५ ॥
सर्वेषु हि धर्मात्मा वर्णानां कुरुते दयाम् चतुर्णां हि वयःस्थानां तेन ते तमनुव्रताः

sarveṣu sa hi dharmātmā varṇānāṁ kurute dayām ।
caturṇāṁ hi vayaḥsthānāṁ tena te tamanuvratāḥ ॥

धर्मात्मा श्रीराम चारों वर्णों के सभी मनुष्यों पर उनकी अवस्था के अनुरूप दया करते थे, इसलिये वे सभी उनके भक्त थे

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॥ २ · १७ · १६ ॥
चतुष्पथान् देवपथांश्चैत्यांश्चायतनानि प्रदक्षिणं परिहरञ्जगाम नृपतेः सुतः

catuṣpathān devapathāṁścaityāṁścāyatanāni ca ।
pradakṣiṇaṁ pariharañjagāma nṛpateḥ sutaḥ ॥

राजकुमार श्रीराम चौराहों, देवमार्गों, चैत्यवृक्षों तथा देवमन्दिरों को अपने दाहिने छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे

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॥ २ · १७ · १७ ॥
राजकुलमासाद्य मेघसङ्घोपमैः शुभैः प्रासादशृङ्गैर्विविधैः कैलासशिखरोपमैः

sa rājakulamāsādya meghasaṅghopamaiḥ śubhaiḥ ।
prāsādaśṛṅgairvividhaiḥ kailāsaśikharopamaiḥ ॥

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॥ २ · १७ · १८ ॥
आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरैः वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतैः

āvārayadbhirgaganaṁ vimānairiva pāṇḍuraiḥ ।
vardhamānagṛhaiścāpi ratnajālapariṣkṛtaiḥ ॥

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॥ २ · १७ · १९ ॥
तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम् राजपुत्रः पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन्

tat pṛthivyāṁ gṛhavaraṁ mahendrasadanopamam ।
rājaputraḥ piturveśma praviveśa śriyā jvalan ॥

॥ १७–१९ ॥

राजा दशरथ का भवन मेघसमूहों के समान शोभा पानेवाले, सुन्दर अनेक रूप-रंगवाले कैलासशिखर के समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों (अट्टालिकाओं) से सुशोभित था। उसमें रत्नों की जाली से विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभा से प्रकाशित होते थे। वे अपनी ऊँचाई से आकाश को भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे गृहों से युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतल पर इन्द्रसदन के समान शोभा पाता था। उस राजभवन के पास पहुँचकर अपनी शोभा से प्रकाशित होनेवाले राजकुमार श्रीराम ने पिता के महल में प्रवेश किया

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॥ २ · १७ · २० ॥
कक्ष्या धन्विभिर्गुप्तास्तिस्रोऽतिक्रम्य वाजिभिः पदातिरपरे कक्ष्ये द्वे जगाम नरोत्तमः

sa kakṣyā dhanvibhirguptāstisro'tikramya vājibhiḥ ।
padātirapare kakṣye dve jagāma narottamaḥ ॥

उन्होंने धनुर्धर वीरोंद्वारा सुरक्षित महल की तीन ड्योढ़ियों को तो घोड़े जुते हुए रथ से ही पार किया, फिर दो ड्योढ़ियों में वे पुरुषोत्तम राम पैदल ही गये

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॥ २ · १७ · २१ ॥
सर्वाः समतिक्रम्य कक्ष्या दशरथात्मजः संनिवर्त्य जनं सर्वं शुद्धान्तःपुरमत्यगात्

sa sarvāḥ samatikramya kakṣyā daśarathātmajaḥ ।
saṁnivartya janaṁ sarvaṁ śuddhāntaḥpuramatyagāt ॥

इस प्रकार सारी ड्योढ़ियों को पार करके दशरथनन्दन श्रीराम साथ आये हुए सब लोगों को लौटाकर स्वयं अन्तःपुर में गये

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॥ २ · १७ · २२ ॥
तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा जनः सर्वो मुदितो नृपात्मजे प्रतीक्षते तस्य पुनः स्म निर्गमं यथोदयं चन्द्रमसः सरित्पतिः

tasmin praviṣṭe piturantikaṁ tadā janaḥ sa sarvo mudito nṛpātmaje ।
pratīkṣate tasya punaḥ sma nirgamaṁ yathodayaṁ candramasaḥ saritpatiḥ ॥

जब राजकुमार श्रीराम पिता के पास जाने के लिये अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुनः निकलने की प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओं का स्वामी समुद्र चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करता रहता है

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥