सुमन्त्रका श्रीरामके महलमें पहुँचकर महाराजका संदेश सुनाना और श्रीरामका सीतासे अनुमति ले लक्ष्मणके साथ रथपर बैठकर गाजेबाजेके साथ मार्गमें स्त्री-पुरुषोंकी बातें सुनते हुए जाना
“राम-यात्रा”
॥ २ · १६ · १६–३० ॥
तेजस्वी नीलवर्णो रामो व्याघ्रचर्मास्तीर्णे स्वर्णरत्नभूषिते दीप्ते रथे तिष्ठति, सारथिः सुमन्त्रस्तं वाहयति; पृष्ठतो भ्राता लक्ष्मणश्चित्रचामरं वीजयन् तिष्ठति; अयोध्याया उत्सवमये राजमार्गे ते गच्छन्ति, हर्म्यगवाक्षेभ्यो नार्यः पुष्पवर्षं कुर्वन्ति, पौराः हर्षेण हस्तानुद्यन्ति।
तेजस्वी नीलवर्ण श्रीराम व्याघ्रचर्मसे ढके, सोने और रत्नोंसे सजे जगमगाते रथपर खड़े हैं, जिसे श्रेष्ठ सारथि सुमन्त्र हाँक रहे हैं; पीछे भाई लक्ष्मण चित्रित चँवर डुलाते खड़े हैं; वे अयोध्याके उत्सवमय राजमार्गपर चल रहे हैं, महलोंकी अटारियोंसे झुककर स्त्रियाँ पुष्पवर्षा कर रही हैं और नगरवासी हर्षसे हाथ उठा रहे हैं; स्वर्णिम प्रभात, ध्वजाएँ और पुष्पवृष्टि।
The radiant blue-complexioned Ram stands resplendent in his fire-bright, tiger-skin-draped, gold-and-gem chariot driven by the noble Sumantra, his brother Lakshman plying a painted chowrie behind; they move down Ayodhya's festal royal road as women lean from the mansion balconies showering flowers and citizens raise joyful hands amid banners, flower-rain and golden morning light.
sa tadantaḥpuradvāraṁ samatītya janākulam ।
praviviktāṁ tataḥ kakṣyāmāsasāda purāṇavit ॥
पुरातन वृत्तान्तों के ज्ञाता सूत सुमन्त्र मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए उस अन्तःपुर के द्वार को लाँघकर महल की एकान्तकक्षा में जा पहुँचे, जहाँ भीड़ बिलकुल नहीं थी
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prāsakārmukabibhradbhiryuvabhirmṛṣṭakuṇḍalaiḥ ।
apramādibhirekāgraiḥ svānuraktairadhiṣṭhitām ॥
वहाँ श्रीराम के चरणों में अनुराग रखनेवाले एकाग्रचित्त एवं सावधान युवक प्रास और धनुष आदि लिये डटे हुए थे। उनके कानों में शुद्ध सुवर्ण के बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे
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tatra kāṣāyiṇo vṛddhānvetrapāṇīnsvalaṁkṛtān ।
dadarśa viṣṭhitāndvāri stryadhyakṣānsusamāhitān ॥
उस ड्योढ़ी में सुमन्त्र को गेरुआ वस्त्र पहने और हाथ में छड़ी लिये वस्त्राभूषणों से अलंकृत बहुत-से वृद्ध पुरुष बड़ी सावधानी के साथ द्वार पर बैठे दिखायी दिये, जो अन्तःपुर की स्त्रियों के अध्यक्ष (संरक्षक) थे
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te samīkṣya samāyāntaṁ rāmapriyacikīrṣavaḥ ।
sahasotpatitāḥ sarve hyāsanebhyaḥ sasambhramāḥ ॥
सुमन्त्र को आते देख श्रीराम का प्रिय करने की इच्छावाले वे सभी पुरुष सहसा वेगपूर्वक आसनों से उठकर खड़े हो गये
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tānuvāca vinītātmā sūtaputraḥ pradakṣiṇaḥ ।
kṣipramākhyāta rāmāya sumantro dvāri tiṣṭhati ॥
राजसेवा में अत्यन्त कुशल तथा विनीत हृदयवाले सूतपुत्र सुमन्त्र ने उनसे कहा—‘आपलोग श्रीरामचन्द्रजी से शीघ्र जाकर कहें, कि सुमन्त्र दरवाजे पर खड़े हैं’
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te rāmamupasaṁgamya bhartuḥ priyacikīrṣavaḥ ।
sahabhāryāya rāmāya kṣipramevācacakṣire ॥
स्वामी का प्रिय करने की इच्छावाले वे सब सेवक श्रीरामचन्द्रजी के पास जा पहुँचे। उस समय श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता के साथ विराजमान थे। उन सेवकों ने शीघ्र ही उन्हें सुमन्त्र का संदेश सुना दिया
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prativeditamājñāya sūtamabhyantaraṁ pituḥ ।
tatraivānāyayāmāsa rāghavaḥ priyakāmyayā ॥
द्वाररक्षकोंद्वारा दी हुई सूचना पाकर श्रीराम ने पिता की प्रसन्नता के लिये उनके अन्तरङ्ग सेवक सुमन्त्र को वहीं अन्तःपुर में बुलवा लिया
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taṁ vaiśravaṇasaṁkāśamupaviṣṭaṁ svalaṁkṛtam ।
dadarśa sūtaḥ paryaṅke sauvarṇe sottaracchade ॥
वहाँ पहुँचकर सुमन्त्र ने देखा श्रीरामचन्द्रजी वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो कुबेर के समान जान पड़ते हैं और बिछौनों से युक्त सोने के पलंग पर विराजमान हैं
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varāharudhirābheṇa śucinā ca sugandhinā ।
anuliptaṁ parārdhyena candanena paraṁtapam ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sthitayā pārśvataścāpi vālavyajanahastayā ।
upetaṁ sītayā bhūyaścitrayā śaśinaṁ yathā ॥
शत्रुओं को संताप देनेवाले रघुनाथजी के श्रीअङ्गों में वाराह के रुधिर की भाँति लाल, पवित्र और सुगन्धित उत्तम चन्दन का लेप लगा हुआ है और देवी सीता उनके पास बैठकर अपने हाथ से चँवर डुला रही हैं। सीता के अत्यन्त समीप बैठे हुए श्रीराम चित्रा से संयुक्त चन्द्रमा की भाँति शोभा पा रहे हैं
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taṁ tapantamivādityamupapannaṁ svatejasā ।
vavande varadaṁ vandī vinayajño vinītavat ॥
विनय के ज्ञाता वन्दी सुमन्त्र ने तपते हुए सूर्य की भाँति अपने नित्य प्रकाश से सम्पन्न रहकर अधिक प्रकाशित होनेवाले वरदायक श्रीराम को विनीतभाव से प्रणाम किया
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prāñjaliḥ sumukhaṁ dṛṣṭvā vihāraśayanāsane ।
rājaputramuvācedaṁ sumantro rājasatkṛtaḥ ॥
विहारकालिक शयन के लिये जो आसन था, उस पलंग पर बैठे हुए प्रसन्न मुखवाले राजकुमार श्रीराम का दर्शन करके राजा दशरथद्वारा सम्मानित सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—
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kausalyā suprajā rāma pitā tvāṁ draṣṭumicchati ।
mahiṣyāpi hi kaikeyyā gamyatāṁ tatra mā ciram ॥
‘श्रीराम! आपको पाकर महारानी कौसल्या सर्वश्रेष्ठ संतानवाली हो गयी हैं। इस समय रानी कैकेयी के साथ बैठे हुए आपके पिताजी आपको देखना चाहते हैं, अतः वहाँ चलिये, विलम्ब न कीजिये’
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evamuktastu saṁhṛṣṭo narasiṁho mahādyutiḥ ।
tataḥ sammānayāmāsa sītāmidamuvāca ha ॥
सुमन्त्र के ऐसा कहने पर महातेजस्वी नरश्रेष्ठ श्रीराम ने सीताजी का सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनसे इस प्रकार कहा—
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devi devaśca devī ca samāgamya madantare ।
mantrayete dhruvaṁ kiṁcidabhiṣecanasaṁhitam ॥
‘देवि! जान पड़ता है, पिताजी और माता कैकेयी दोनों मिलकर मेरे विषय में ही कुछ विचार कर रहे हैं। निश्चय ही मेरे अभिषेक के सम्बन्ध में ही कोई बात होती होगी
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lakṣayitvā hyabhiprāyaṁ priyakāmā sudakṣiṇā ।
saṁcodayati rājānaṁ madarthamasitekṣaṇā ॥
‘मेरे अभिषेक के विषय में राजा के अभिप्राय को लक्ष्य करके उनका प्रिय करने की इच्छावाली परम उदार एवं समर्थ कजरारे नेत्रोंवाली कैकेयी मेरे अभिषेक के लिये ही राजा को प्रेरित कर रही होंगी
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sā prahṛṣṭā mahārājaṁ hitakāmānuvartinī ।
jananī cārthakāmā me kekayādhipateḥ sutā ॥
‘मेरी माता केकयराजकुमारी इस समाचार से बहुत प्रसन्न हुई होंगी। वे महाराज का हित चाहनेवाली और उनकी अनुगामिनी हैं। साथ ही वे मेरा भी भला चाहती हैं। अतः वे महाराज को अभिषेक करने के लिये जल्दी करने को कह रही होंगी
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diṣṭyā khalu mahārājo mahiṣyā priyayā saha ।
sumantraṁ prāhiṇod dūtamarthakāmakaraṁ mama ॥
‘सौभाग्य की बात है कि महाराज अपनी प्यारी रानी के साथ बैठे हैं और उन्होंने मेरे अभीष्ट अर्थ को सिद्ध करनेवाले सुमन्त्र को ही दूत बनाकर भेजा है
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yādṛśī pariṣat tatra tādṛśo dūta āgataḥ ।
dhruvamadyaiva māṁ rājā yauvarājye'bhiṣekṣyati ॥
‘जैसी वहाँ अन्तरङ्ग परिषत् बैठी है, वैसे ही दूत सुमन्त्रजी भी पधारे हैं। अवश्य आज ही महाराज मुझे युवराज के पद पर अभिषिक्त करेंगे
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hanta śīghramito gatvā drakṣyāmi ca mahīpatim ।
saha tvaṁ parivāreṇa sukhamāssva ramasva ca ॥
‘अतः मैं प्रसन्नतापूर्वक यहाँ से शीघ्र जाकर महाराज का दर्शन करूँगा। तुम परिजनों के साथ यहाँ सुखपूर्वक बैठो और आनन्द करो’
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patisammānitā sītā bhartāramasitekṣaṇā ।
ā dvāramanuvraja maṅgalānyabhidadhyuṣī ॥
पति के द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर कजरारे नेत्रोंवाली सीतादेवी उनका मङ्गल-चिन्तन करती हुई स्वामी के साथ-साथ द्वारतक उन्हें पहुँचाने के लिये गयीं
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rājyaṁ dvijātibhirjuṣṭaṁ rājasūyābhiṣecanam ।
kartumarhati te rājā vāsavasyeva lokakṛt ॥
उस समय वे बोलीं—‘आर्यपुत्र! ब्राह्मणों के साथ रहकर आपका युवराजपद पर अभिषेक करके महाराज दूसरे समय में राजसूय-यज्ञ में सम्राट् के पद पर आपका अभिषेक करनेयोग्य हैं। ठीक उसी तरह जैसे लोकस्रष्टा ब्रह्मा ने देवराज इन्द्र का अभिषेक किया था
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dīkṣitaṁ vratasampannaṁ varājinadharaṁ śucim ।
kuraṅgaśṛṅgapāṇiṁ ca paśyantī tvāṁ bhajāmyaham ॥
‘आप राजसूय-यज्ञ में दीक्षित हो तदनुकूल व्रत का पालन करने में तत्पर, श्रेष्ठ मृगचर्मधारी, पवित्र तथा हाथ में मृग का शृङ्ग धारण करनेवाले हों और इस रूप में आपका दर्शन करती हुई मैं आपकी सेवा में संलग्न रहूँ—यही मेरी शुभ-कामना है
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pūrvāṁ diśaṁ vajradharo dakṣiṇāṁ pātu te yamaḥ ।
varuṇaḥ paścimāmāśāṁ dhaneśastūttarāṁ diśam ॥
‘आपकी पूर्व दिशा में वज्रधारी इन्द्र, दक्षिण दिशा में यमराज, पश्चिम दिशा में वरुण और उत्तर दिशा में कुबेर रक्षा करें’
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atha sītāmanujñāpya kṛtakautukamaṅgalaḥ ।
niṣkrāma sumantreṇa saha rāmo niveśanāt ॥
तदनन्तर सीता की अनुमति ले उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्र के साथ अपने महल से बाहर निकले
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parvatādiva niṣkramya siṁho giriguhāśayaḥ ।
lakṣmaṇaṁ dvāri so'paśyatprahvāñjalipuṭaṁ sthitam ॥
पर्वत की गुफा में शयन करनेवाला सिंह जैसे पर्वत से निकलकर आता है, उसी प्रकार महल से निकलकर श्रीरामचन्द्रजी ने द्वार पर लक्ष्मण को उपस्थित देखा, जो विनीतभाव से हाथ जोड़े खड़े थे
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atha madhyamakakṣyāyāṁ samāgacchat suhṛjjanaiḥ ।
sa sarvānarthino dṛṣṭvā sametya pratinandya ca ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tataḥ pāvakasaṁkāśamāruroha rathottamam ।
vaiyāghraṁ puruṣavyāghro rājitaṁ rājanandanaḥ ॥
तदनन्तर मध्यम कक्षा में आकर वे मित्रों से मिले। फिर प्रार्थी जनों को उपस्थित देख उन सबसे मिलकर उन्हें संतुष्ट करके पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम व्याघ्रचर्म से आवृत, शोभाशाली तथा अग्नि के समान तेजस्वी उत्तम रथ पर आरूढ़ हुए
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meghanādamasambādhaṁ maṇihemavibhūṣitam ।
muṣṇantamiva cakṣūṁṣi prabhayā meruvarcasam ॥
उस रथ की घरघराहट मेघ की गम्भीर गर्जना के समान प्रतीत होती थी। उसमें स्थान की संकीर्णता नहीं थी। वह विस्तृत था और मणि एवं सुवर्ण से विभूषित था। उसकी कान्ति सुवर्णमय मेरुपर्वत के समान जान पड़ती थी। वह रथ अपनी प्रभा से लोगों की आँखों में चकाचौंध-सा पैदा कर देता था
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kareṇuśiśukalpaiśca yuktaṁ paramavājibhiḥ ।
hariyuktaṁ sahasrākṣo rathamindra ivāśugam ॥
उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे, जो अधिक पुष्ट होने के कारण हाथी के बच्चों के समान प्रतीत होते थे। जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंग के घोड़ों से युक्त शीघ्रगामी रथ पर सवार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम अपने उस रथ पर आरूढ़ थे
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prayayau tūrṇamāsthāya rāghavo jvalitaḥ śriyā ।
sa parjanya ivākāśe svanavānabhinādayan ॥
अपनी सहज शोभा से प्रकाशित श्रीरघुनाथजी उस रथ पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ से चल दिये। वह तेजस्वी रथ आकाश में गरजनेवाले मेघ की भाँति अपनी घर्घर ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करता हुआ महान् मेघखण्ड से निकलनेवाले चन्द्रमा के समान श्रीराम के उस भवन से बाहर निकला
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niketānniryayau śrīmān mahābhrādiva candramāḥ ।
citracāmarapāṇistu lakṣmaṇo rāghavānujaḥ ॥
श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण भी हाथ में विचित्र चँवर लिये उस रथ पर बैठ गये और पीछे से अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम की रक्षा करने लगे
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jugopa bhrātaraṁ bhrātā rathamāsthāya pṛṣṭhataḥ ।
tato halahalāśabdastumulaḥ samajāyata ॥
फिर तो सब ओर से मनुष्यों की भारी भीड़ निकलने लगी। उस समय उस जन-समूह के चलने से सहसा भयंकर कोलाहल मच गया
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tasya niṣkramamāṇasya janaughasya samantataḥ ।
tato hayavarā mukhyā nāgāśca girisaṁnibhāḥ ॥
श्रीराम के पीछे-पीछे अच्छे-अच्छे घोड़े और पर्वतों के समान विशालकाय श्रेष्ठ गजराज सैकड़ों और हजारों की संख्या में चलने लगे
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anujagmustathā rāmaṁ śataśo'tha sahasraśaḥ ।
agrataścāsya saṁnaddhāścandanāgurubhūṣitāḥ ॥
उनके आगे-आगे कवच आदि से सुसज्जित तथा चन्दन और अगुरु से विभूषित हो खड्ग और धनुष धारण किये बहुत-से शूरवीर तथा मङ्गलाशंसी मनुष्य—वन्दी आदि चल रहे थे
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khaḍgacāpadharāḥ śūrā jagmurāśaṁsavo janāḥ ।
tato vāditraśabdāśca stutiśabdāśca vandinām ॥
तदनन्तर मार्ग में वाद्यों की ध्वनि, वन्दीजनों के स्तुतिपाठ के शब्द तथा शूरवीरों के सिंहनाद सुनायी देने लगे
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siṁhanādāśca śūrāṇāṁ tataḥ śuśruvire pathi ।
harmyavātāyanasthābhirbhūṣitābhiḥ samantataḥ ॥
महलों की खिड़कियों में बैठी हुई वस्त्राभूषणों से विभूषित वनिताएँ सब ओर से शत्रुदमन श्रीराम पर ढेर-के-ढेर सुन्दर पुष्प बिखेर रही थीं। इस अवस्था में श्रीराम आगे बढ़ते चले जा रहे थे
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kīryamāṇaḥ supuṣpaughairyayau strībhirariṁdamaḥ ।
rāmaṁ sarvānavadyāṅgyo rāmapiprīṣayā tataḥ ॥
उस समय अट्टालिकाओं और भूतल पर खड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी युवतियाँ श्रीराम का प्रिय करने की इच्छा से श्रेष्ठ वचनोंद्वारा उनकी स्तुति गाने लगीं
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vacobhiragryairharmyasthāḥ kṣitisthāśca vavandire ।
nūnaṁ nandati te mātā kausalyā mātṛnandana ॥
‘माता को आनन्द प्रदान करनेवाले रघुवीर! आपकी यह यात्रा सफल होगी और आपको पैतृक राज्य प्राप्त होगा। इस अवस्था में आपको देखती हुई आपकी माता कौसल्या निश्चय ही आनन्दित हो रही होंगी
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paśyantī siddhayātrāṁ tvāṁ pitryaṁ rājyamupasthitam ।
sarvasīmantinībhyaśca sītāṁ sīmantinīṁ varām ॥
‘वे नारियाँ श्रीराम की हृदयवल्लभा सीमन्तिनी सीता को संसार की समस्त सौभाग्यवती स्त्रियों से श्रेष्ठ मानती हुई कहने लगीं—
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amanyanta hi tā nāryo rāmasya hṛdayapriyām ।
tayā sucaritaṁ devyā purā nūnaṁ mahat tapaḥ ॥
‘उन देवी सीता ने पूर्वकाल में निश्चय ही बड़ा भारी तप किया होगा, तभी उन्होंने चन्द्रमा से संयुक्त हुई रोहिणी की भाँति श्रीराम का संयोग प्राप्त किया है
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rohiṇīva śaśāṅkena rāmasaṁyogamāpa yā ।
iti prāsādaśṛṅgeṣu pramadābhirnarottamaḥ ।
śuśrāva rājamārgasthaḥ priyā vāca udāhṛtāḥ ॥
इस प्रकार राजमार्ग में रथ पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रासादशिखरों पर बैठी हुई युवती स्त्रियों के द्वारा कही गयी ये प्यारी बातें सुन रहे थे
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sa rāghavastatra tadā pralāpānśuśrāva lokasya samāgatasya ।
ātmādhikārā vividhāśca vācaḥ prahṛṣṭarūpasya pure janasya ॥
उस समय अयोध्या में आये हुए दूर-दूर के लोग अत्यन्त हर्ष से भरकर वहाँ श्रीरामचन्द्रजी के विषय में जो वार्तालाप और तरह-तरह की बातें करते थे, अपने विषय में कही गयी उन सभी बातों को श्रीरघुनाथजी सुनते जा रहे थे
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eṣa śriyaṁ gacchati rāghavo'dya rājaprasādād vipulāṁ gamiṣyan ।
ete vayaṁ sarvasamṛddhakāmā yeṣāmayaṁ no bhavitā praśāstā ॥
वे कहते थे—‘इस समय ये श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथ की कृपा से बहुत बड़ी सम्पत्ति के अधिकारी होने जा रहे हैं। अब हम सब लोगों की समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी, क्योंकि ये श्रीराम हमारे शासक होंगे
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lābho janasyāsya yadeṣa sarvaṁ prapatsyate rāṣṭramidaṁ cirāya ।
na hyapriyaṁ kiṁcana jātu kaścit paśyenna duḥkhaṁ manujādhipe'smin ॥
यदि यह सारा राज्य चिरकाल के लिये इनके हाथ में आ जाय तो इस जगत् की समस्त जनता के लिये यह महान् लाभ होगा। इनके राजा होने पर कभी किसीको अप्रिय नहीं होगा और किसीको कोई दुःख भी नहीं देखना पड़ेगा’
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sa ghoṣavadbhiśca hayaiḥ sanāgaiḥ puraḥsaraiḥ svastikasūtamāgadhaiḥ ।
mahīyamānaḥ pravaraiśca vādakairabhiṣṭuto vaiśravaṇo yathā yayau ॥
हिनहिनाते हुए घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए हाथियों, जय-जयकार करते हुए आगे-आगे चलनेवाले वन्दियों, स्तुतिपाठ करनेवाले सूतों, वंश की विरुदावलि बखाननेवाले मागधों तथा सर्वश्रेष्ठ गुणगायकों के तुमुल घोष के बीच उन वन्दी आदि से पूजित एवं प्रशंसित होते हुए श्रीरामचन्द्रजी कुबेर के समान चल रहे थे
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kareṇumātaṅgarathāśvasaṁkulaṁ mahājanaughaiḥ paripūrṇacatvaram ।
prabhūtaratnaṁ bahupaṇyasaṁcayaṁ dadarśa rāmo vimalaṁ mahāpatham ॥
यात्रा करते हुए श्रीराम ने उस विशाल राजमार्ग को देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ों से खचाखच भरा हुआ था। उसके प्रत्येक चौराहे पर मनुष्यों की भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी। उसके दोनों पार्श्वभागों में प्रचुर रत्नों से भरी हुई दुकानें थीं तथा विक्रय के योग्य और भी बहुत-से द्रव्यों के ढेर वहाँ दिखायी देते थे। वह राजमार्ग बहुत साफ-सुथरा था
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥