वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११७ · २९ श्लोकाःSarga 117 · 29 ślokas

श्रीराम आदिका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूयाद्वारा सीताका सत्कार

अत्रि-आतिथ्य

“अत्रि-आतिथ्य”
॥ २ · ११७ · ५–१२ ॥

अत्रेराश्रमे पर्णकुटीरमध्ये वृद्धस्तेजस्वी दीर्घश्वेतश्मश्रुर्जटाधरस्तपःप्रभावेण दीप्तोऽत्रिर्महर्षिरुत्थाय श्यामवर्णं रामं प्रियपुत्रवत्स्वागतयन्नाशीर्वादाय करमुद्यम्य तिष्ठति, रामश्च वल्कलकृष्णाजिनवसनः कृताञ्जलिः श्रद्धाकृतज्ञमुखस्तं प्रणमति; पार्श्वे च कृशा साध्वी वृद्धानसूया सरलतपोवसना सरलवन्यवेषां सीतां मातृवत्स्नेहेन प्रतिगृह्णाति, वल्कलधरो लक्ष्मणश्च समीपे कृताञ्जलिस्तिष्ठति, पर्णकुटीराणि होमाग्निधूमश्च वनोपवने विभान्ति।

अत्रि के आश्रम में पर्णकुटी के मध्य वृद्ध, तेजस्वी, दीर्घ श्वेतश्मश्रु, जटाधारी, तपःप्रभाव से दीप्त अत्रि महर्षि उठकर श्यामवर्ण श्रीराम का प्रिय पुत्र के समान स्वागत करते हुए आशीर्वाद के लिये हाथ उठाये खड़े हैं, और श्रीराम वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये हाथ जोड़े, श्रद्धा एवं कृतज्ञता से भरे मुख से उन्हें प्रणाम करते हैं; पार्श्व में कृश, साध्वी, वृद्ध अनसूया सरल तपोवस्त्र में सरल वनवेश वाली सीता को माता के समान स्नेह से ग्रहण करती हैं, वल्कलधारी लक्ष्मण समीप हाथ जोड़े खड़े हैं, तथा पर्णकुटियाँ एवं होमाग्नि का धूम वन-उपवन में सुशोभित हैं।

At the leafy hermitage of the sage Atri, the ancient luminous rishi — long silver beard, hair coiled high, radiant with tapas — rises and welcomes the blue-hued Ram like a dear son, one hand raised in warm blessing, as Ram bows to him with folded hands, clad in bark and black deer-skin, his face reverent and grateful; at one side the frail, saintly aged Anasuya, in her plain ascetic sari, gently receives the gentle Sita in her simple forest sari with maternal tenderness, and the bark-clad Lakshman stands near with folded hands amid the leaf-huts and the fire-altar's rising smoke.

॥ २ · ११७ · १ ॥
राघवस्त्वपयातेषु सर्वेष्वनुविचिन्तयन्। तत्रारोचयद् वासं कारणैर्बहुभिस्तदा

rāghavastvapayāteṣu sarveṣvanuvicintayan।
na tatrārocayad vāsaṁ kāraṇairbahubhistadā ॥

उन सब ऋषियों के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने जब बारंबार विचार किया, तब उन्हें बहुत-से ऐसे कारण ज्ञात हुए, जिनसे उन्होंने स्वयं भी वहाँ रहना उचित न समझा

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॥ २ · ११७ · २ ॥
इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागराः। सा मे स्मृतिरन्वेति तान् नित्यमनुशोचतः

iha me bharato dṛṣṭo mātaraśca sanāgarāḥ।
sā ca me smṛtiranveti tān nityamanuśocataḥ ॥

उन्होंने मन-ही-मन सोचा, ‘इस आश्रम में मैं भरत से, माताओं से तथा पुरवासी मनुष्यों से मिल चुका हूँ। वह स्मृति मुझे बराबर बनी रहती है और मैं प्रतिदिन उन सब लोगों का चिन्तन करके शोकमग्न हो जाता हूँ

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॥ २ · ११७ · ३ ॥
स्कन्धावारनिवेशेन तेन तस्य महात्मनः। हयहस्तिकरीषैश्च उपमर्दः कृतो भृशम्

skandhāvāraniveśena tena tasya mahātmanaḥ।
hayahastikarīṣaiśca upamardaḥ kṛto bhṛśam ॥

‘महात्मा भरत की सेना का पड़ाव पड़ने के कारण हाथी और घोड़ों की लीदों से यहाँ की भूमि अधिक अपवित्र कर दी गयी है

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॥ २ · ११७ · ४ ॥
तस्मादन्यत्र गच्छाम इति संचिन्त्य राघवः। प्रातिष्ठत वैदेह्या लक्ष्मणेन संगतः

tasmādanyatra gacchāma iti saṁcintya rāghavaḥ।
prātiṣṭhata sa vaidehyā lakṣmaṇena ca saṁgataḥ ॥

‘अतः हमलोग भी अन्यत्र चले जायँ’ ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मण के साथ वहाँ से चल दिये

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॥ २ · ११७ · ५ ॥
सोऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशाः। तं चापि भगवानत्रिः पुत्रवत् प्रत्यपद्यत

so'trerāśramamāsādya taṁ vavande mahāyaśāḥ।
taṁ cāpi bhagavānatriḥ putravat pratyapadyata ॥

वहाँ से अत्रि के आश्रम पर पहुँचकर महायशस्वी श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया तथा भगवान् अत्रि ने भी उन्हें अपने पुत्र की भाँति स्नेहपूर्वक अपनाया

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॥ २ · ११७ · ६ ॥
स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमस्य सुसत्कृतम्। सौमित्रिं महाभागं सीतां समसान्त्वयत्

svayamātithyamādiśya sarvamasya susatkṛtam।
saumitriṁ ca mahābhāgaṁ sītāṁ ca samasāntvayat ॥

उन्होंने स्वयं ही श्रीराम का सम्पूर्ण आतिथ्य-सत्कार करके महाभाग लक्ष्मण और सीता को भी सत्कारपूर्वक संतुष्ट किया

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॥ २ · ११७ · ७ ॥
पत्नीं तामनुप्राप्तां वृद्धामामन्त्र्य सत्कृताम्। सान्त्वयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः

patnīṁ ca tāmanuprāptāṁ vṛddhāmāmantrya satkṛtām।
sāntvayāmāsa dharmajñaḥ sarvabhūtahite rataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११७ · ८ ॥
अनसूयां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्। प्रतिगृह्णीष्व वैदेहीमब्रवीदृषिसत्तमः

anasūyāṁ mahābhāgāṁ tāpasīṁ dharmacāriṇīm।
pratigṛhṇīṣva vaidehīmabravīdṛṣisattamaḥ ॥

॥ ७–८ ॥

सम्पूर्ण प्राणियों के हित में तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ अत्रि ने अपने समीप आयी हुई सबके द्वारा सम्मानित तापसी एवं धर्मपरायणा बूढ़ी पत्नी महाभागा अनसूया को सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा संतुष्ट किया और कहा—‘देवि! विदेहराजनन्दिनी सीता को सत्कारपूर्वक हृदय से लगाओ’

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॥ २ · ११७ · ९ ॥
रामाय चाचचक्षे तां तापसीं धर्मचारिणीम्। दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम्

rāmāya cācacakṣe tāṁ tāpasīṁ dharmacāriṇīm।
daśa varṣāṇyanāvṛṣṭyā dagdhe loke nirantaram ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११७ · १० ॥
यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी प्रवर्तिता। उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलंकृता

yayā mūlaphale sṛṣṭe jāhnavī ca pravartitā।
ugreṇa tapasā yuktā niyamaiścāpyalaṁkṛtā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११७ · ११ ॥
दश वर्षसहस्राणि यया तप्तं महत् तपः। अनसूयाव्रतैस्तात प्रत्यूहाश्च निबर्हिताः

daśa varṣasahasrāṇi yayā taptaṁ mahat tapaḥ।
anasūyāvrataistāta pratyūhāśca nibarhitāḥ ॥

॥ ९–११ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूया का परिचय देते हुए कहा—‘एक समय दस वर्षोंतक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत् निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्या से युक्त तथा कठोर नियमों से अलंकृत होकर अपने तप के प्रभाव से यहाँ फल-मूल उत्पन्न किये और मन्दाकिनी की पवित्र धारा बहायी तथा तात! जिन्होंने दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतों के प्रभाव से ऋषियों के समस्त विघ्नों का निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं

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॥ २ · ११७ · १२ ॥
देवकार्यनिमित्तं यया संत्वरमाणया। दशरात्रं कृता रात्रिः सेयं मातेव तेऽनघ

devakāryanimittaṁ ca yayā saṁtvaramāṇayā।
daśarātraṁ kṛtā rātriḥ seyaṁ māteva te'nagha ॥

‘निष्पाप श्रीराम! इन्होंने देवताओं के कार्य के लिये अत्यन्त उतावली होकर दस रात के बराबर एक ही रात बनायी थी; वे ही ये अनसूया देवी तुम्हारे लिये माता की भाँति पूजनीया हैं

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॥ २ · ११७ · १३ ॥
तामिमां सर्वभूतानां नमस्कार्यां तपस्विनीम्। अभिगच्छतु वैदेही वृद्धामक्रोधनां सदा

tāmimāṁ sarvabhūtānāṁ namaskāryāṁ tapasvinīm।
abhigacchatu vaidehī vṛddhāmakrodhanāṁ sadā ॥

‘ये सम्पूर्ण प्राणियों के लिये वन्दनीया तपस्विनी हैं। क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका है। विदेहनन्दिनी सीता इन वृद्धा अनसूया देवी के पास जायँ’

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॥ २ · ११७ · १४ ॥
एवं ब्रुवाणं तमृषिं तथेत्युक्त्वा राघवः। सीतामालोक्य धर्मज्ञामिदं वचनमब्रवीत्

evaṁ bruvāṇaṁ tamṛṣiṁ tathetyuktvā sa rāghavaḥ।
sītāmālokya dharmajñāmidaṁ vacanamabravīt ॥

ऐसी बात कहते हुए अत्रि मुनि से ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने धर्मज्ञा सीता की ओर देखकर यह बात कही—

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॥ २ · ११७ · १५ ॥
राजपुत्रि श्रुतं त्वेतन्मुनेरस्य समीरितम्। श्रेयोऽर्थमात्मनः शीघ्रमभिगच्छ तपस्विनीम्

rājaputri śrutaṁ tvetanmunerasya samīritam।
śreyo'rthamātmanaḥ śīghramabhigaccha tapasvinīm ॥

‘राजकुमारी! महर्षि अत्रि के वचन तो तुमने सुन ही लिये; अब अपने कल्याण के लिये तुम शीघ्र ही इन तपस्विनी देवी के पास जाओ

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॥ २ · ११७ · १६ ॥
अनसूयेति या लोके कर्मभिः ख्यातिमागता। तां शीघ्रमभिगच्छ त्वमभिगम्यां तपस्विनीम्

anasūyeti yā loke karmabhiḥ khyātimāgatā।
tāṁ śīghramabhigaccha tvamabhigamyāṁ tapasvinīm ॥

‘जो अपने सत्कर्मों से संसार में अनसूया के नाम से विख्यात हुई हैं, वे तपस्विनी देवी तुम्हारे आश्रय लेने योग्य हैं; तुम शीघ्र उनके पास जाओ’

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॥ २ · ११७ · १७ ॥
सीता त्वेतद् वचः श्रुत्वा राघवस्य यशस्विनी। तामत्रिपत्नीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली

sītā tvetad vacaḥ śrutvā rāghavasya yaśasvinī।
tāmatripatnīṁ dharmajñāmabhicakrāma maithilī ॥

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर यशस्विनी मिथिलेश-कुमारी सीता धर्म को जाननेवाली अत्रिपत्नी अनसूया के पास गयीं

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॥ २ · ११७ · १८ ॥
शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम्। सततं वेपमानाङ्गीं प्रवाते कदलीमिव

śithilāṁ valitāṁ vṛddhāṁ jarāpāṇḍuramūrdhajām।
satataṁ vepamānāṅgīṁ pravāte kadalīmiva ॥

अनसूया वृद्धावस्था के कारण शिथिल हो गयी थीं; उनके शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं थीं तथा सिर के बाल सफेद हो गये थे। अधिक हवा चलने पर हिलते हुए कदली-वृक्ष के समान उनके सारे अङ्ग निरन्तर काँप रहे थे

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॥ २ · ११७ · १९ ॥
तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम्। अभ्यवादयदव्यग्रा स्वं नाम समुदाहरत्

tāṁ tu sītā mahābhāgāmanasūyāṁ pativratām।
abhyavādayadavyagrā svaṁ nāma samudāharat ॥

सीता ने निकट जाकर शान्तभाव से अपना नाम बताया और उन महाभागा पतिव्रता अनसूया को प्रणाम किया

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॥ २ · ११७ · २० ॥
अभिवाद्य वैदेही तापसीं तां दमान्विताम्। बद्धाञ्जलिपुटा हृष्टा पर्यपृच्छदनामयम्

abhivādya ca vaidehī tāpasīṁ tāṁ damānvitām।
baddhāñjalipuṭā hṛṣṭā paryapṛcchadanāmayam ॥

उन संयमशीला तपस्विनी को प्रणाम करके हर्ष से भरी हुई सीता ने दोनों हाथ जोड़कर उनका कुशल-समाचार पूछा

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॥ २ · ११७ · २१ ॥
ततः सीतां महाभागां दृष्ट्वा तां धर्मचारिणीम्। सान्त्वयन्त्यब्रवीद् वृद्धा दिष्ट्या धर्ममवेक्षसे

tataḥ sītāṁ mahābhāgāṁ dṛṣṭvā tāṁ dharmacāriṇīm।
sāntvayantyabravīd vṛddhā diṣṭyā dharmamavekṣase ॥

धर्म का आचरण करनेवाली महाभागा सीता को देखकर बूढ़ी अनसूया देवी उन्हें सान्त्वना देती हुई बोलीं—‘सीते! सौभाग्य की बात है कि तुम धर्म पर ही दृष्टि रखती हो

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॥ २ · ११७ · २२ ॥
त्यक्त्वा ज्ञातिजनं सीते मानवृद्धिं मानिनि। अवरुद्धं वने रामं दिष्ट्या त्वमनुगच्छसि

tyaktvā jñātijanaṁ sīte mānavṛddhiṁ ca mānini।
avaruddhaṁ vane rāmaṁ diṣṭyā tvamanugacchasi ॥

‘मानिनी सीते! बन्धु-बान्धवों को छोड़कर और उनसे प्राप्त होनेवाली मान-प्रतिष्ठा का परित्याग करके तुम वन में भेजे हुए श्रीराम का अनुसरण कर रही हो—यह बड़े सौभाग्य की बात है

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॥ २ · ११७ · २३ ॥
नगरस्थो वनस्थो वा शुभो वा यदि वाशुभः। यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः

nagarastho vanastho vā śubho vā yadi vāśubhaḥ।
yāsāṁ strīṇāṁ priyo bhartā tāsāṁ lokā mahodayāḥ ॥

‘अपने स्वामी नगर में रहें या वन में, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियों को वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकों की प्राप्ति होती है

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॥ २ · ११७ · २४ ॥
दुःशीलः कामवृत्तो वा धनैर्वा परिवर्जितः। स्त्रीणामार्यस्वभावानां परमं दैवतं पतिः

duḥśīlaḥ kāmavṛtto vā dhanairvā parivarjitaḥ।
strīṇāmāryasvabhāvānāṁ paramaṁ daivataṁ patiḥ ॥

‘पति बुरे स्वभाव का, मनमाना बर्ताव करनेवाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, वह उत्तम स्वभाववाली नारियों के लिये श्रेष्ठ देवता के समान है

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॥ २ · ११७ · २५ ॥
नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं विमृशन्त्यहम्। सर्वत्र योग्यं वैदेहि तपःकृतमिवाव्ययम्

nāto viśiṣṭaṁ paśyāmi bāndhavaṁ vimṛśantyaham।
sarvatra yogyaṁ vaidehi tapaḥkṛtamivāvyayam ॥

‘विदेहराजनन्दिनि! मैं बहुत विचार करने पर भी पति से बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती। अपनी की हुई तपस्या के अविनाशी फल की भाँति वह इस लोक में और परलोक में सर्वत्र सुख पहुँचाने में समर्थ होता है

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॥ २ · ११७ · २६ ॥
त्वेवमनुगच्छन्ति गुणदोषमसत्स्त्रियः। कामवक्तव्यहृदया भर्तॄनाथाश्चरन्ति याः

na tvevamanugacchanti guṇadoṣamasatstriyaḥ।
kāmavaktavyahṛdayā bhartṝnāthāścaranti yāḥ ॥

‘जो अपने पति पर भी शासन करती हैं, वे काम के अधीन चित्तवाली असाध्वी स्त्रियाँ इस प्रकार पति का अनुसरण नहीं करतीं। उन्हें गुण-दोषों का ज्ञान नहीं होता; अतः वे इच्छानुसार इधर-उधर विचरती रहती हैं

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॥ २ · ११७ · २७ ॥
प्राप्नुवन्त्ययशश्चैव धर्मभ्रंशं मैथिलि। अकार्यवशमापन्नाः स्त्रियो याः खलु तद्विधाः

prāpnuvantyayaśaścaiva dharmabhraṁśaṁ ca maithili।
akāryavaśamāpannāḥ striyo yāḥ khalu tadvidhāḥ ॥

‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी नारियाँ अवश्य ही अनुचित कर्म में फँसकर धर्म से भ्रष्ट हो जाती हैं और संसार में उन्हें अपयश की प्राप्ति होती है

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॥ २ · ११७ · २८ ॥
त्वद्विधास्तु गुणैर्युक्ता दृष्टलोकपरावराः। स्त्रियः स्वर्गे चरिष्यन्ति यथा पुण्यकृतस्तथा

tvadvidhāstu guṇairyuktā dṛṣṭalokaparāvarāḥ।
striyaḥ svarge cariṣyanti yathā puṇyakṛtastathā ॥

‘किंतु जो तुम्हारे समान लोक-परलोक को जाननेवाली साध्वी स्त्रियाँ हैं, वे उत्तम गुणों से युक्त होकर पुण्यकर्मों में संलग्न रहती हैं; अतः वे दूसरे पुण्यात्माओं की भाँति स्वर्गलोक में विचरण करेंगी

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॥ २ · ११७ · २९ ॥
तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी। भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी यशश्च धर्मं ततः समाप्स्यसि

tadevametaṁ tvamanuvratā satī
patipradhānā samayānuvartinī।
bhava svabhartuḥ sahadharmacāriṇī
yaśaśca dharmaṁ ca tataḥ samāpsyasi ॥

‘अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लगी रहो—सतीधर्म का पालन करो, पति को प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामी की सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११७ ॥