वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११६ · २६ श्लोकाःSarga 116 · 26 ślokas

वृद्ध कुलपतिसहित बहुत-से ऋषियोंका चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रममें जाना

ऋषियों की विदा

“ऋषियों की विदा”
॥ २ · ११६ · १–८ ॥

चित्रकूटस्य सानुनि पर्णशालाग्रे वल्कलधराः श्वेतश्मश्रवो जलकलशदण्डधारिणो वनर्षिगणा आश्रमं त्यक्तुमुद्यताः, येषामग्रे वृद्धस्तेजस्वी कुलपतिः परावृत्य करमुद्यम्य रामं विदायाशीर्वदति; श्यामवर्णो रामो वल्कलकृष्णाजिनवसनः कृताञ्जलिर्गम्भीरमृदुमुखो गमनकारणमजानन् सादरं ताँस्तपस्विनो विसृजति; समीपे वल्कलधरो लक्ष्मणः सरलवन्यवेषा सीता च श्रद्धया दूरे तिष्ठतः, गच्छतां तपस्विनां पङ्क्तिश्च वनगिरिं प्रति विसर्पति।

चित्रकूट के ढलान पर पर्णशाला के आगे वल्कलधारी, श्वेतश्मश्रु, जल-कलश एवं दण्ड लिये वनवासी ऋषिगण आश्रम छोड़ने को उद्यत हैं, जिनके आगे वृद्ध तेजस्वी कुलपति मुड़कर हाथ उठाये श्रीराम को विदा-आशीर्वाद देते हैं; श्यामवर्ण श्रीराम वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये हाथ जोड़े, गम्भीर-मृदु मुख से, जाने का कारण न जानते हुए, आदरपूर्वक उन तपस्वियों को विदा करते हैं; समीप ही वल्कलधारी लक्ष्मण और सरल वनवेश में सीता श्रद्धापूर्ण दूरी पर खड़े हैं, तथा जाते हुए तपस्वियों की पंक्ति वन-पर्वत की ओर बढ़ती जाती है।

On the wooded slope before the leaf-hut, a company of venerable forest sages — bark-clad, white-bearded, bearing water-pots and staffs — sets out to abandon the hermitage, led by an aged luminous kulapati who turns to bless Ram in farewell with a raised hand; the blue-hued Ram, clad in bark and deer-skin, stands with folded hands and a grave, gentle face, seeing the sages off with reverence though he knows not why they leave; close by, the bark-clad Lakshman and the gentle Sita in forest garb wait at a reverent distance, as the line of departing ascetics winds away into the forested Chitrakut hills.

॥ २ · ११६ · १ ॥
प्रतियाते तु भरते वसन् रामस्तदा वने। लक्षयामास सोद्वेगमथौत्सुक्यं तपस्विनाम्

pratiyāte tu bharate vasan rāmastadā vane।
lakṣayāmāsa sodvegamathautsukyaṁ tapasvinām ॥

भरत के लौट जाने पर श्रीरामचन्द्रजी उन दिनों जब वन में निवास करने लगे, तब उन्होंने देखा कि वहाँ के तपस्वी उद्विग्न हो वहाँ से अन्यत्र चले जाने के लिये उत्सुक हैं

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॥ २ · ११६ · २ ॥
ये तत्र चित्रकूटस्य पुरस्तात् तापसाश्रमे। राममाश्रित्य निरतास्तानलक्षयदुत्सुकान्

ye tatra citrakūṭasya purastāt tāpasāśrame।
rāmamāśritya niratāstānalakṣayadutsukān ॥

पहले चित्रकूट के उस आश्रम में जो तपस्वी श्रीराम का आश्रय लेकर सदा आनन्दमग्न रहते थे, उन्हींको श्रीराम ने उत्कण्ठित देखा (मानो वे कहीं जाने के विषय में कुछ कहना चाहते हों)

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॥ २ · ११६ · ३ ॥
नयनैर्भुकुटीभिश्च रामं निर्दिश्य शङ्किताः। अन्योन्यमुपजल्पन्तः शनैश्चक्रुर्मिथः कथाः

nayanairbhukuṭībhiśca rāmaṁ nirdiśya śaṅkitāḥ।
anyonyamupajalpantaḥ śanaiścakrurmithaḥ kathāḥ ॥

नेत्रों से, भौंहें टेढ़ी करके, श्रीराम की ओर संकेत करके मन-ही-मन शङ्कित हो आपस में कुछ सलाह करते हुए वे तपस्वी मुनि धीरे-धीरे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे

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॥ २ · ११६ · ४ ॥
तेषामौत्सुक्यमालक्ष्य रामस्त्वात्मनि शङ्कितः। कृताञ्जलिरुवाचेदमृषिं कुलपतिं ततः

teṣāmautsukyamālakṣya rāmastvātmani śaṅkitaḥ।
kṛtāñjaliruvācedamṛṣiṁ kulapatiṁ tataḥ ॥

उनकी उत्कण्ठा देख श्रीरामचन्द्रजी के मन में यह शङ्का हुई कि मुझसे कोई अपराध तो नहीं बन गया। तब वे हाथ जोड़कर वहाँ के कुलपति महर्षि से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ११६ · ५ ॥
कश्चिद् भगवन् किंचित् पूर्ववृत्तमिदं मयि। दृश्यते विकृतं येन विक्रियन्ते तपस्विनः

na kaścid bhagavan kiṁcit pūrvavṛttamidaṁ mayi।
dṛśyate vikṛtaṁ yena vikriyante tapasvinaḥ ॥

‘भगवन्! क्या मुझमें पूर्ववर्ती राजाओं का-सा कोई बर्ताव नहीं दिखायी देता अथवा मुझमें कोई विकृत भाव दृष्टिगोचर होता है, जिससे यहाँ के तपस्वी मुनि विकार को प्राप्त हो रहे हैं

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॥ २ · ११६ · ६ ॥
प्रमादाच्चरितं किंचित् कच्चिन्नावरजस्य मे। लक्ष्मणस्यर्षिभिरदृष्टं नानुरूपं महात्मनः

pramādāccaritaṁ kiṁcit kaccinnāvarajasya me।
lakṣmaṇasyarṣibhiradṛṣṭaṁ nānurūpaṁ mahātmanaḥ ॥

‘क्या मेरे छोटे भाई महात्मा लक्ष्मण का प्रमादवश किया हुआ कोई ऐसा आचरण ऋषियों ने देखा है, जो उसके योग्य नहीं है

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॥ २ · ११६ · ७ ॥
कच्चिच्छुश्रूषमाणा वः शुश्रूषणपरा मयि। प्रमदाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तां वर्तते

kaccicchuśrūṣamāṇā vaḥ śuśrūṣaṇaparā mayi।
pramadābhyucitāṁ vṛttiṁ sītā yuktāṁ na vartate ॥

‘अथवा क्या जो अर्घ्य-पाद्य आदि के द्वारा सदा आपलोगों की सेवा करती रही है, वह सीता इस समय मेरी सेवा में लग जाने के कारण एक गृहस्थ की सती नारी के अनुरूप ऋषियों की समुचित सेवा नहीं कर पाती है?’

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॥ २ · ११६ · ८ ॥
अथर्षिर्जरया वृद्धस्तपसा जरां गतः। वेपमान इवोवाच रामं भूतदयापरम्

atharṣirjarayā vṛddhastapasā ca jarāṁ gataḥ।
vepamāna ivovāca rāmaṁ bhūtadayāparam ॥

श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर एक महर्षि जो जरावस्था के कारण तो वृद्ध थे ही, तपस्याद्वारा भी वृद्ध हो गये थे, समस्त प्राणियों पर दया करनेवाले श्रीराम से काँपते हुए-से बोले—

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॥ २ · ११६ · ९ ॥
कुतः कल्याणसत्त्वायाः कल्याणाभिरतेः सदा। चलनं तात वैदेह्यास्तपस्विषु विशेषतः

kutaḥ kalyāṇasattvāyāḥ kalyāṇābhirateḥ sadā।
calanaṁ tāta vaidehyāstapasviṣu viśeṣataḥ ॥

‘तात! जो स्वभाव से ही कल्याणमयी है और सदा सबके कल्याण में ही रत रहती है, वह विदेहनन्दिनी सीता विशेषतः तपस्वीजनों के प्रति बर्ताव करते समय अपने कल्याणमय स्वभाव से विचलित हो जाय, यह कैसे सम्भव है?

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॥ २ · ११६ · १० ॥
त्वन्निमित्तमिदं तावत् तापसान् प्रति वर्तते। रक्षोभ्यस्तेन संविग्नाः कथयन्ति मिथः कथाः

tvannimittamidaṁ tāvat tāpasān prati vartate।
rakṣobhyastena saṁvignāḥ kathayanti mithaḥ kathāḥ ॥

‘आपके ही कारण तापसों पर यह राक्षसों की ओर से भय उपस्थित होनेवाला है, उससे उद्विग्न हुए ऋषि आपस में कुछ बातें (कानाफूसी) कर रहे हैं

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॥ २ · ११६ · ११ ॥
रावणावरजः कश्चित् खरो नामेह राक्षसः। उत्पाट्य तापसान् सर्वाञ्जनस्थाननिवासिनः

rāvaṇāvarajaḥ kaścit kharo nāmeha rākṣasaḥ।
utpāṭya tāpasān sarvāñjanasthānanivāsinaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११६ · १२ ॥
धृष्टश्च जितकाशी नृशंसः पुरुषादकः। अवलिप्तश्च पापश्च त्वां तात मृष्यते

dhṛṣṭaśca jitakāśī ca nṛśaṁsaḥ puruṣādakaḥ।
avaliptaśca pāpaśca tvāṁ ca tāta na mṛṣyate ॥

॥ ११–१२ ॥

‘तात! यहाँ वनप्रान्त में रावण का छोटा भाई खर नामक राक्षस है, जिसने जनस्थान में रहनेवाले समस्त तापसों को उखाड़ फेंका है। वह बड़ा ही ढीठ, विजयोन्मत्त, क्रूर, नरभक्षी और घमंडी है। वह आपको भी सहन नहीं कर पाता है

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॥ २ · ११६ · १३ ॥
त्वं यदाप्रभृति ह्यस्मिन्नाश्रमे तात वर्तसे। तदाप्रभृति रक्षांसि विप्रकुर्वन्ति तापसान्

tvaṁ yadāprabhṛti hyasminnāśrame tāta vartase।
tadāprabhṛti rakṣāṁsi viprakurvanti tāpasān ॥

‘तात! जब से आप इस आश्रम में रह रहे हैं, तब से सब राक्षस तापसों को विशेषरूप से सताने लगे हैं

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॥ २ · ११६ · १४ ॥
दर्शयन्ति हि बीभत्सैः क्रूरैर्भीषणकैरपि। नानारूपैर्विरूपैश्च रूपैरसुखदर्शनैः

darśayanti hi bībhatsaiḥ krūrairbhīṣaṇakairapi।
nānārūpairvirūpaiśca rūpairasukhadarśanaiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११६ · १५ ॥
अप्रशस्तैरशुचिभिः सम्प्रयुज्य तापसान्। प्रतिघ्नन्त्यपरान् क्षिप्रमनार्याः पुरतः स्थितान्

apraśastairaśucibhiḥ samprayujya ca tāpasān।
pratighnantyaparān kṣipramanāryāḥ purataḥ sthitān ॥

॥ १४–१५ ॥

‘वे अनार्य राक्षस बीभत्स (घृणित), क्रूर और भीषण, नाना प्रकार के विकृत एवं देखने में दुःखदायक रूप धारण करके सामने आते हैं और पापजनक अपवित्र पदार्थों से तपस्वियों का स्पर्श कराकर अपने सामने खड़े हुए अन्य ऋषियों को भी पीड़ा देते हैं

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॥ २ · ११६ · १६ ॥
तेषु तेष्वाश्रमस्थानेष्वबुद्धमवलीय च। रमन्ते तापसांस्तत्र नाशयन्तोऽल्पचेतसः

teṣu teṣvāśramasthāneṣvabuddhamavalīya ca।
ramante tāpasāṁstatra nāśayanto'lpacetasaḥ ॥

‘वे उन-उन आश्रमों में अज्ञातरूप से आकर छिप जाते हैं और अल्पज्ञ अथवा असावधान तापसों का विनाश करते हुए वहाँ सानन्द विचरते रहते हैं

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॥ २ · ११६ · १७ ॥
अवक्षिपन्ति स्रुग्भाण्डानग्नीन् सिञ्चन्ति वारिणा। कलशांश्च प्रमर्दन्ति हवने समुपस्थिते

avakṣipanti srugbhāṇḍānagnīn siñcanti vāriṇā।
kalaśāṁśca pramardanti havane samupasthite ॥

‘होमकर्म आरम्भ होने पर वे स्रुक्-स्रुवा आदि यज्ञ-सामग्रियों को इधर-उधर फेंक देते हैं। प्रज्वलित अग्नि में पानी डाल देते हैं और कलशों को फोड़ डालते हैं

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॥ २ · ११६ · १८ ॥
तैर्दुरात्मभिराविष्टानाश्रमान् प्रजिहासवः। गमनायान्यदेशस्य चोदयन्त्यृषयोऽद्य माम्

tairdurātmabhirāviṣṭānāśramān prajihāsavaḥ।
gamanāyānyadeśasya codayantyṛṣayo'dya mām ॥

‘उन दुरात्मा राक्षसों से आविष्ट हुए आश्रमों को त्याग देने की इच्छा रखकर ये ऋषिलोग आज मुझे यहाँ से अन्य स्थान में चलने के लिये प्रेरित कर रहे हैं

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॥ २ · ११६ · १९ ॥
तत् पुरा राम शारीरीमुपहिंसां तपस्विषु। दर्शयन्ति हि दुष्टास्ते त्यक्ष्याम इममाश्रमम्

tat purā rāma śārīrīmupahiṁsāṁ tapasviṣu।
darśayanti hi duṣṭāste tyakṣyāma imamāśramam ॥

‘श्रीराम! वे दुष्ट राक्षस तपस्वियों को शारीरिक हिंसा का प्रदर्शन करें, इसके पहले ही हम इस आश्रम को त्याग देंगे

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॥ २ · ११६ · २० ॥
बहुमूलफलं चित्रमविदूरादितो वनम्। अश्वस्याश्रममेवाहं श्रयिष्ये सगणः पुनः

bahumūlaphalaṁ citramavidūrādito vanam।
aśvasyāśramamevāhaṁ śrayiṣye sagaṇaḥ punaḥ ॥

‘यहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक विचित्र वन है, जहाँ फल-मूल की अधिकता है। वहीं अश्वमुनि का आश्रम है, अतः ऋषियों के समूह को साथ लेकर मैं पुनः उसी आश्रम का आश्रय लूँगा

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॥ २ · ११६ · २१ ॥
खरस्त्वय्यपि चायुक्तं पुरा राम प्रवर्तते। सहास्माभिरितो गच्छ यदि बुद्धिः प्रवर्तते

kharastvayyapi cāyuktaṁ purā rāma pravartate।
sahāsmābhirito gaccha yadi buddhiḥ pravartate ॥

‘श्रीराम! खर आपके प्रति भी कोई अनुचित बर्ताव करे, उसके पहले ही यदि आपका विचार हो तो हमारे साथ ही यहाँ से चल दीजिये

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॥ २ · ११६ · २२ ॥
सकलत्रस्य संदेहो नित्यं युक्तस्य राघव। समर्थस्यापि हि सतो वासो दुःखमिहाद्य ते

sakalatrasya saṁdeho nityaṁ yuktasya rāghava।
samarthasyāpi hi sato vāso duḥkhamihādya te ॥

‘रघुनन्दन! यद्यपि आप सदा सावधान रहनेवाले तथा राक्षसों के दमन में समर्थ हैं, तथापि पत्नी के साथ आजकल उस आश्रम में आपका रहना संदेहजनक एवं दुःखदायक है’

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॥ २ · ११६ · २३ ॥
इत्युक्तवन्तं रामस्तं राजपुत्रस्तपस्विनम्। शशाकोत्तरैर्वाक्यैरवबद्धुं समुत्सुकम्

ityuktavantaṁ rāmastaṁ rājaputrastapasvinam।
na śaśākottarairvākyairavabaddhuṁ samutsukam ॥

ऐसी बात कहकर अन्यत्र जाने के लिये उत्कण्ठित हुए उन तपस्वी मुनि को राजकुमार श्रीराम सान्त्वनाजनक उत्तरवाक्योंद्वारा वहाँ रोक नहीं सके

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॥ २ · ११६ · २४ ॥
अभिनन्द्य समापृच्छ्य समाधाय राघवम्। जगामाश्रमं त्यक्त्वा कुलैः कुलपतिः सह

abhinandya samāpṛcchya samādhāya ca rāghavam।
sa jagāmāśramaṁ tyaktvā kulaiḥ kulapatiḥ saha ॥

तत्पश्चात् वे कुलपति महर्षि श्रीरामचन्द्रजी का अभिनन्दन करके उनसे पूछकर और उन्हें सान्त्वना देकर इस आश्रम को छोड़ वहाँ से अपने दल के ऋषियों के साथ चले गये

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॥ २ · ११६ · २५ ॥
रामः संसाध्य ऋषिगणमनुगमनाद् देशात्तस्मात्कुलपतिमभिवाद्य ऋषिम्। सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थः पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसम्पेदे

rāmaḥ saṁsādhya ṛṣigaṇamanugamanād deśāttasmātkulapatimabhivādya ṛṣim।
samyakprītaistairanumata upadiṣṭārthaḥ puṇyaṁ vāsāya svanilayamupasampede ॥

श्रीरामचन्द्रजी वहाँ से जानेवाले ऋषियों के पीछे-पीछे जाकर उन्हें विदा दे कुलपति ऋषि को प्रणाम करके परम प्रसन्न हुए उन ऋषियों की अनुमति ले उनके दिये हुए कर्तव्यविषयक उपदेश को सुनकर लौटे और निवास करने के लिये अपने पवित्र आश्रम पर आये

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॥ २ · ११६ · २६ ॥
आश्रममृषिविरहितं प्रभुः क्षणमपि जहौ राघवः। राघवं हि सततमनुगतास्तापसाश्चार्षचरिते धृतगुणाः

āśramamṛṣivirahitaṁ prabhuḥ kṣaṇamapi na jahau sa rāghavaḥ।
rāghavaṁ hi satatamanugatāstāpasāścārṣacarite dhṛtaguṇāḥ ॥

उन ऋषियों से रहित हुए आश्रम को भगवान् श्रीराम ने एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ा। जिनका ऋषियों के समान ही चरित्र था, उन श्रीरामचन्द्रजी में निश्चय ही ऋषियों की रक्षा की शक्तिरूप गुण विद्यमान है। ऐसा विश्वास रखनेवाले कुछ तपस्वीजनों ने सदा श्रीराम का ही अनुसरण किया। वे दूसरे किसी आश्रम में नहीं गये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११६ ॥