वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११५ · २७ श्लोकाःSarga 115 · 27 ślokas

भरतका नन्दिग्राममें जाकर श्रीरामकी चरणपादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदनपूर्वक राज्यका सब कार्य करना

पादुका-अभिषेक

“पादुका-अभिषेक”
॥ २ · ११५ · १५–२५ ॥

नन्दिग्रामे विनीतसभागृहे रिक्ते सिंहासने रामस्य सुवर्णभूषिते दिव्यप्रभे पादुके उच्चश्वेतच्छत्रस्याधस्तात् प्रतिष्ठिते; तयोः पुरतो जटाधरो वल्कलकृष्णाजिनवसनो भक्तितनूकृतमुखो भरतस्तपस्वीव राज्यशासकः प्रणतः कृताञ्जलिः श्वेतचामरं ताभ्यां मृदु वीजयति, समग्रं राज्यं रामचरणवत्ताभ्यां समर्पयन्; केचिन्मन्त्रिणो वृद्धाश्च सादरं नतशिरसो दूरे तिष्ठन्ति — पवित्रन्यासरूपेण धृतं राज्यं, परस्य नाम्नैव शासतो भ्रातुः।

नन्दिग्राम के विनीत सभागृह में रिक्त सिंहासन पर श्रीराम की सुवर्णभूषित, दिव्य प्रभा से युक्त पादुकाएँ ऊँचे श्वेत छत्र के नीचे प्रतिष्ठित हैं; उनके सामने जटाधारी, वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये, भक्ति से क्षीण मुखवाले भरत तपस्वी के समान राज्यशासक बनकर प्रणत हो, हाथ जोड़े, श्वेत चामर उन पर मृदु डुलाते हैं, समस्त राज्य को श्रीराम के चरणों के समान उन्हीं को समर्पित करते हुए; कुछ मन्त्री और वृद्धजन आदरपूर्वक सिर झुकाये दूरी पर खड़े हैं—पवित्र धरोहर के रूप में धारण किया हुआ राज्य, दूसरे के ही नाम से शासन करते भाई का।

Within a modest court hall at Nandigram, Ram's gilded royal sandals rest upon the empty lion-throne, glowing with a soft sacred light beneath a tall white parasol; before them the ascetic-regent Bharat — his hair coiled in matted locks, clad in bark and deer-skin, his face worn thin by devotion — bows low with folded hands and gently waves a white yak-tail whisk over the sandals, offering the whole kingdom to them as to Ram's very feet, while a few ministers and elders stand at a respectful distance with lowered heads — a throne held in sacred trust, a brother reigning only in another's name.

॥ २ · ११५ · १ ॥
ततो निक्षिप्य मातॄस्ता अयोध्यायां दृढव्रतः। भरतः शोकसंतप्तो गुरूनिदमथाब्रवीत्

tato nikṣipya mātṝstā ayodhyāyāṁ dṛḍhavrataḥ।
bharataḥ śokasaṁtapto gurūnidamathābravīt ॥

तदनन्तर सब माताओं को अयोध्या में रखकर दृढप्रतिज्ञ भरत ने शोक से संतप्त हो गुरुजनों से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ११५ · २ ॥
नन्दिग्रामं गमिष्यामि सर्वानामन्त्रयेऽत्र वः। तत्र दुःखमिदं सर्वं सहिष्ये राघवं विना

nandigrāmaṁ gamiṣyāmi sarvānāmantraye'tra vaḥ।
tatra duḥkhamidaṁ sarvaṁ sahiṣye rāghavaṁ vinā ॥

‘अब मैं नन्दिग्राम को जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगों की आज्ञा चाहता हूँ। वहाँ श्रीराम के बिना प्राप्त होनेवाले इस सारे दुःख को सहन करूँगा

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॥ २ · ११५ · ३ ॥
गतश्चाहो दिवं राजा वनस्थः गुरुर्मम। रामं प्रतीक्षे राज्याय हि राजा महायशाः

gataścāho divaṁ rājā vanasthaḥ sa gururmama।
rāmaṁ pratīkṣe rājyāya sa hi rājā mahāyaśāḥ ॥

‘अहो! महाराज (पूज्य पिताजी) तो स्वर्ग को सिधारे और वे मेरे गुरु (पूजनीय भ्राता) श्रीरामचन्द्रजी वन में विराज रहे हैं। मैं इस राज्य के लिये वहाँ श्रीराम की प्रतीक्षा करता रहूँगा; क्योंकि वे महायशस्वी श्रीराम ही हमारे राजा हैं’

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॥ २ · ११५ · ४ ॥
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः। अब्रुवन् मन्त्रिणः सर्वे वसिष्ठश्च पुरोहितः

etacchrutvā śubhaṁ vākyaṁ bharatasya mahātmanaḥ।
abruvan mantriṇaḥ sarve vasiṣṭhaśca purohitaḥ ॥

महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित वसिष्ठजी बोले—

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॥ २ · ११५ · ५ ॥
सुभृशं श्लाघनीयं यदुक्तं भरत त्वया। वचनं भ्रातृवात्सल्यादनुरूपं तवैव तत्

subhṛśaṁ ślāghanīyaṁ ca yaduktaṁ bharata tvayā।
vacanaṁ bhrātṛvātsalyādanurūpaṁ tavaiva tat ॥

‘भरत! भ्रातृभक्ति से प्रेरित होकर तुमने जो बात कही है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। वास्तव में वह तुम्हारे ही योग्य है

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॥ २ · ११५ · ६ ॥
नित्यं ते बन्धुलुब्धस्य तिष्ठतो भ्रातृसौहृदे। मार्गमार्यं प्रपन्नस्य नानुमन्येत कः पुमान्

nityaṁ te bandhulubdhasya tiṣṭhato bhrātṛsauhṛde।
mārgamāryaṁ prapannasya nānumanyeta kaḥ pumān ॥

‘तुम अपने भाई के दर्शन के लिये सदा लालायित रहते हो और भाई के ही सौहार्द (हितसाधन) में संलग्न हो। साथ ही श्रेष्ठ मार्ग पर स्थित हो, अतः कौन पुरुष तुम्हारे विचार का अनुमोदन नहीं करेगा’

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॥ २ · ११५ · ७ ॥
मन्त्रिणां वचनं श्रुत्वा यथाभिलषितं प्रियम्। अब्रवीत् सारथिं वाक्यं रथो मे युज्यतामिति

mantriṇāṁ vacanaṁ śrutvā yathābhilaṣitaṁ priyam।
abravīt sārathiṁ vākyaṁ ratho me yujyatāmiti ॥

मन्त्रियों का अपनी रुचि के अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरत ने सारथि से कहा—‘मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय’

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॥ २ · ११५ · ८ ॥
प्रहृष्टवदनः सर्वा मातॄः समभिभाष्य च। आरुरोह रथं श्रीमान्शत्रुघ्नेन समन्वितः

prahṛṣṭavadanaḥ sarvā mātṝḥ samabhibhāṣya ca।
āruroha rathaṁ śrīmānśatrughnena samanvitaḥ ॥

फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओं से बातचीत करके जाने की आज्ञा ली। इसके बाद शत्रुघ्न के सहित श्रीमान् भरत रथ पर सवार हुए

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॥ २ · ११५ · ९ ॥
आरुह्य तु रथं क्षिप्रं शत्रुघ्नभरतावुभौ। ययतुः परमप्रीतौ वृतौ मन्त्रिपुरोहितैः

āruhya tu rathaṁ kṣipraṁ śatrughnabharatāvubhau।
yayatuḥ paramaprītau vṛtau mantripurohitaiḥ ॥

रथ पर आरूढ़ होकर परम प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई मन्त्रियों तथा पुरोहितों से घिरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से प्रस्थित हुए

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॥ २ · ११५ · १० ॥
अग्रतो गुरवः सर्वे वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः। प्रययुः प्राङ्मुखाः सर्वे नन्दिग्रामो यतो भवेत्

agrato guravaḥ sarve vasiṣṭhapramukhā dvijāḥ।
prayayuḥ prāṅmukhāḥ sarve nandigrāmo yato bhavet ॥

आगे-आगे वसिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मण चल रहे थे। उन सब लोगों ने अयोध्या से पूर्वाभिमुख होकर यात्रा की और उस मार्ग को पकड़ा, जो नन्दिग्राम की ओर जाता था

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॥ २ · ११५ · ११ ॥
बलं तदनाहूतं गजाश्वरथसंकुलम्। प्रययौ भरते याते सर्वे पुरवासिनः

balaṁ ca tadanāhūtaṁ gajāśvarathasaṁkulam।
prayayau bharate yāte sarve ca puravāsinaḥ ॥

भरत के प्रस्थित होने पर हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे-पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये

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॥ २ · ११५ · १२ ॥
रथस्थः तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः। नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं शिरस्यादाय पादुके

rathasthaḥ sa tu dharmātmā bharato bhrātṛvatsalaḥ।
nandigrāmaṁ yayau tūrṇaṁ śirasyādāya pāduke ॥

धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत अपने मस्तक पर भगवान् श्रीराम की चरणपादुका लिये रथ पर बैठकर बड़ी शीघ्रता से नन्दिग्राम की ओर चले

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॥ २ · ११५ · १३ ॥
भरतस्तु ततः क्षिप्रं नन्दिग्रामं प्रविश्य सः। अवतीर्य रथात् तूर्णं गुरूनिदमभाषत

bharatastu tataḥ kṣipraṁ nandigrāmaṁ praviśya saḥ।
avatīrya rathāt tūrṇaṁ gurūnidamabhāṣata ॥

नन्दिग्राम में शीघ्र पहुँचकर भरत तुरंत ही रथ से उतर पड़े और गुरुजनों से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ११५ · १४ ॥
एतद् राज्यं मम भ्रात्रा दत्तं संन्यासमुत्तमम्। योगक्षेमवहे चेमे पादुके हेमभूषिते

etad rājyaṁ mama bhrātrā dattaṁ saṁnyāsamuttamam।
yogakṣemavahe ceme pāduke hemabhūṣite ॥

‘मेरे भाई ने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहर के रूप में दिया है, उनकी ये सुवर्णविभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेम का निर्वाह करनेवाली हैं’

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॥ २ · ११५ · १५ ॥
भरतः शिरसा कृत्वा संन्यासं पादुके ततः। अब्रवीद् दुःखसंतप्तः सर्वं प्रकृतिमण्डलम्

bharataḥ śirasā kṛtvā saṁnyāsaṁ pāduke tataḥ।
abravīd duḥkhasaṁtaptaḥ sarvaṁ prakṛtimaṇḍalam ॥

तत्पश्चात् भरत ने मस्तक झुकाकर उन चरणपादुकाओं के प्रति उस धरोहररूप राज्य को समर्पित करके दुःख से संतप्त हो समस्त प्रकृतिमण्डल (मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि) से कहा—

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॥ २ · ११५ · १६ ॥
छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ। आभ्यां राज्ये स्थितो धर्मः पादुकाभ्यां गुरोर्मम

chatraṁ dhārayata kṣipramāryapādāvimau matau।
ābhyāṁ rājye sthito dharmaḥ pādukābhyāṁ gurormama ॥

‘आप सब लोग इन चरणपादुकाओं के ऊपर छत्र धारण करें। मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजी के साक्षात् चरण मानता हूँ। मेरे गुरु की इन चरणपादुकाओं से ही इस राज्य में धर्म की स्थापना होगी

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॥ २ · ११५ · १७ ॥
भ्रात्रा तु मयि संन्यासो निक्षिप्तः सौहृदादयम्। तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति

bhrātrā tu mayi saṁnyāso nikṣiptaḥ sauhṛdādayam।
tamimaṁ pālayiṣyāmi rāghavāgamanaṁ prati ॥

‘मेरे भाई ने प्रेम के कारण ही यह धरोहर मुझे सौंपी है, अतः मैं उनके लौटनेतक इसकी भलीभाँति रक्षा करूँगा

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॥ २ · ११५ · १८ ॥
क्षिप्रं संयोजयित्वा तु राघवस्य पुनः स्वयम्। चरणौ तौ तु रामस्य द्रक्ष्यामि सहपादुकौ

kṣipraṁ saṁyojayitvā tu rāghavasya punaḥ svayam।
caraṇau tau tu rāmasya drakṣyāmi sahapādukau ॥

‘इसके बाद मैं स्वयं इन पादुकाओं को पुनः शीघ्र ही श्रीरघुनाथजी के चरणों से संयुक्त करके इन पादुकाओं से सुशोभित श्रीराम के उन युगल चरणों का दर्शन करूँगा

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॥ २ · ११५ · १९ ॥
ततो निक्षिप्तभारोऽहं राघवेण समागतः। निवेद्य गुरवे राज्यं भजिष्ये गुरुवर्तिताम्

tato nikṣiptabhāro'haṁ rāghaveṇa samāgataḥ।
nivedya gurave rājyaṁ bhajiṣye guruvartitām ॥

‘श्रीरघुनाथजी के आने पर उनसे मिलते ही मैं अपने उन गुरुदेव को यह राज्य समर्पित करके उनकी आज्ञा के अधीन हो उन्हींकी सेवा में लग जाऊँगा। राज्य का यह भार उनपर डालकर मैं हलका हो जाऊँगा

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॥ २ · ११५ · २० ॥
राघवाय संन्यासं दत्त्वेमे वरपादुके। राज्यं चेदमयोध्यां धूतपापो भवाम्यहम्

rāghavāya ca saṁnyāsaṁ dattveme varapāduke।
rājyaṁ cedamayodhyāṁ ca dhūtapāpo bhavāmyaham ॥

‘मेरे पास धरोहररूप में रखे हुए इस राज्य को, अयोध्या को तथा इन श्रेष्ठ पादुकाओं को श्रीरघुनाथजी की सेवा में समर्पित करके मैं सब प्रकार के पापताप से मुक्त हो जाऊँगा

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॥ २ · ११५ · २१ ॥
अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे प्रहृष्टमुदिते जने। प्रीतिर्मम यशश्चैव भवेद् राज्याच्चतुर्गुणम्

abhiṣikte tu kākutsthe prahṛṣṭamudite jane।
prītirmama yaśaścaiva bhaved rājyāccaturguṇam ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम का अयोध्या के राज्य पर अभिषेक हो जाने पर जब सब लोग हर्ष और आनन्द में निमग्न हो जायँगे, तब मुझे राज्य पाने की अपेक्षा चौगुनी प्रसन्नता और चौगुने यश की प्राप्ति होगी’

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॥ २ · ११५ · २२ ॥
एवं तु विलपन् दीनो भरतः महायशाः। नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं दुःखितो मन्त्रिभिः सह

evaṁ tu vilapan dīno bharataḥ sa mahāyaśāḥ।
nandigrāme'karod rājyaṁ duḥkhito mantribhiḥ saha ॥

इस प्रकार दीनभाव से विलाप करते हुए दुःखमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियों के साथ नन्दिग्राम में रहकर राज्य का शासन करने लगे

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॥ २ · ११५ · २३ ॥
वल्कलजटाधारी मुनिवेषधरः प्रभुः। नन्दिग्रामेऽवसद् धीरः ससैन्यो भरतस्तदा

sa valkalajaṭādhārī muniveṣadharaḥ prabhuḥ।
nandigrāme'vasad dhīraḥ sasainyo bharatastadā ॥

सेनासहित प्रभावशाली धीर-वीर भरत ने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राम में निवास किया

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॥ २ · ११५ · २४ ॥
रामागमनमाकांक्षन् भरतो भ्रातृवत्सलः। भ्रातुर्वचनकारी प्रतिज्ञापारगस्तदा। पादुके त्वभिषिच्याथ नन्दिग्रामेऽवसत् तदा

rāmāgamanamākāṁkṣan bharato bhrātṛvatsalaḥ।
bhrāturvacanakārī ca pratijñāpāragastadā।
pāduke tvabhiṣicyātha nandigrāme'vasat tadā ॥

भाई की आज्ञा का पालन और प्रतिज्ञा के पार जाने की इच्छा करनेवाले भ्रातृवत्सल भरत श्रीरामचन्द्रजी के आगमन की आकांक्षा रखते हुए उनकी चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन दिनों नन्दिग्राम में रहने लगे

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॥ २ · ११५ · २५ ॥
सवालव्यजनं छत्रं धारयामास स्वयम्। भरतः शासनं सर्वं पादुकाभ्यां निवेदयन्

savālavyajanaṁ chatraṁ dhārayāmāsa sa svayam।
bharataḥ śāsanaṁ sarvaṁ pādukābhyāṁ nivedayan ॥

भरतजी राज्य-शासन का समस्त कार्य भगवान् श्रीराम की चरणपादुकाओं को निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे

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॥ २ · ११५ · २६ ॥
ततस्तु भरतः श्रीमानभिषिच्यार्यपादुके। तदधीनस्तदा राज्यं कारयामास सर्वदा

tatastu bharataḥ śrīmānabhiṣicyāryapāduke।
tadadhīnastadā rājyaṁ kārayāmāsa sarvadā ॥

श्रीमान् भरत बड़े भाई की उन पादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्य का सब कार्य मन्त्री आदि से कराते थे

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॥ २ · ११५ · २७ ॥
तदा हि यत् कार्यमुपैति किंचि- दुपायनं चोपहृतं महार्हम्। पादुकाभ्यां प्रथमं निवेद्य चकार पश्चाद् भरतो यथावत्

tadā hi yat kāryamupaiti kiṁci-
dupāyanaṁ copahṛtaṁ mahārham।
sa pādukābhyāṁ prathamaṁ nivedya
cakāra paścād bharato yathāvat ॥

उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओं को निवेदन करके पीछे भरतजी उसका यथावत् प्रबन्ध करते थे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११५ ॥