वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११४ · २९ श्लोकाःSarga 114 · 29 ślokas

भरतके द्वारा अयोध्याकी दुरवस्थाका दर्शन तथा अन्तःपुरमें प्रवेश करके भरतका दुःखी होना

सूनी अयोध्या

“सूनी अयोध्या”
॥ २ · ११४ · १–८ ॥

शून्यराजप्रासादद्वारे श्वेतशोकवस्त्रो व्यथितो भरतः स्तब्धो निश्चलश्च तिष्ठति, सर्वहर्षरहितां नगरीं प्रेक्षमाणः — मूकनिरुद्धसौधाः, जनशून्यमार्गाः, म्लानोत्सवमालाः, प्रासादसोपाने रजश्च — नूतनशोकभारनतमुखः, पार्श्वे च रामस्य मन्दप्रभां सुवर्णपादुकां धारयन्; श्वेतवस्त्रः शत्रुघ्नः समीपे तूष्णीं रुदन् तिष्ठति, महान् प्रासादश्च छायाच्छन्नो निरानन्दः, गीतदीपरहितो, म्लाने मेघच्छन्ने प्रकाशे विभाति।

सूने राजप्रासाद के द्वार पर श्वेत शोकवस्त्र में व्यथित भरत स्तब्ध, निश्चल खड़े हैं, समस्त हर्ष से रहित नगरी को देखते हुए—मूक बंद हवेलियाँ, जनशून्य मार्ग, मुरझायी उत्सव-मालाएँ, प्रासाद की सीढ़ियों पर धूल—नूतन शोक के भार से झुके मुख से; पार्श्व में वे श्रीराम की मन्द प्रभावाली सुवर्णपादुका लिये हैं; श्वेत वस्त्र में शत्रुघ्न समीप ही मौन रोते खड़े हैं, और विशाल प्रासाद छाया से आच्छन्न, आनन्दहीन, गीत एवं दीपों से रहित, म्लान मेघाच्छन्न प्रकाश में दीखता है।

At the threshold of the emptied royal palace, the grief-worn Bharat, in white mourner's cloth, stands stricken and motionless before a city drained of all gladness — silent shuttered mansions, deserted avenues, withered festal garlands, dust upon the palace steps — his stunned face heavy with fresh grief, while beside him he keeps Ram's gilded sandals glowing with a faint sacred light; Shatrughna in white weeps quietly close behind, as the great palace looms shadowed and joyless under a wan, overcast light, empty of music and lamps.

॥ २ · ११४ · १ ॥
स्निग्धगम्भीरघोषेण स्यन्दनेनोपयान् प्रभुः। अयोध्यां भरतः क्षिप्रं प्रविवेश महायशाः

snigdhagambhīraghoṣeṇa syandanenopayān prabhuḥ।
ayodhyāṁ bharataḥ kṣipraṁ praviveśa mahāyaśāḥ ॥

इसके बाद प्रभावशाली महायशस्वी भरत ने स्निग्ध, गम्भीर घर्घर घोष से युक्त रथ के द्वारा यात्रा करके शीघ्र ही अयोध्या में प्रवेश किया

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॥ २ · ११४ · २ ॥
बिडालोलूकचरितामालीननरवारणाम्। तिमिराभ्याहतां कालीमप्रकाशां निशामिव

biḍālolūkacaritāmālīnanaravāraṇām।
timirābhyāhatāṁ kālīmaprakāśāṁ niśāmiva ॥

उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचर रहे थे। घरों के किवाड़ बंद थे। सारे नगर में अन्धकार छा रहा था। प्रकाश न होने के कारण वह पुरी कृष्णपक्ष की काली रात के समान जान पड़ती थी

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॥ २ · ११४ · ३ ॥
राहुशत्रोः प्रियां पत्नीं श्रिया प्रज्वलितप्रभाम्। ग्रहेणाभ्युदितेनैकां रोहिणीमिव पीडिताम्

rāhuśatroḥ priyāṁ patnīṁ śriyā prajvalitaprabhām।
graheṇābhyuditenaikāṁ rohiṇīmiva pīḍitām ॥

जैसे चन्द्रमा की प्रिय पत्नी और अपनी शोभा से प्रकाशित कान्तिवाली रोहिणी उदित हुए राहु नामक ग्रह के द्वारा अपने पति के ग्रस लिये जाने पर अकेली—असहाय हो जाती है, उसी प्रकार दिव्य ऐश्वर्य से प्रकाशित होनेवाली अयोध्या राजा के कालकवलित हो जाने के कारण पीड़ित एवं असहाय हो रही थी

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॥ २ · ११४ · ४ ॥
अल्पोष्णक्षुब्धसलिलां घर्मतप्तविहंगमाम्। लीनमीनझषग्राहां कृशां गिरिनदीमिव

alpoṣṇakṣubdhasalilāṁ gharmataptavihaṁgamām।
līnamīnajhaṣagrāhāṁ kṛśāṁ girinadīmiva ॥

वह पुरी उस पर्वतीय नदी की भाँति कृशकाय दिखायी देती थी, जिसका जल सूर्य की किरणों से तपकर कुछ गरम और गँदला हो रहा हो, जिसके पक्षी धूप से संतप्त होकर भाग गये हों तथा जिसके मीन, मत्स्य और ग्राह गहरे जल में छिप गये हों

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॥ २ · ११४ · ५ ॥
विधूमामिव हेमाभां शिखामग्रेः समुत्थिताम्। हविरभ्युक्षितां पश्चाच्छिखां विप्रलयं गताम्

vidhūmāmiva hemābhāṁ śikhāmagreḥ samutthitām।
havirabhyukṣitāṁ paścācchikhāṁ vipralayaṁ gatām ॥

जो अयोध्या पहले धूमरहित सुनहरी कान्तिवाली प्रज्वलित अग्निशिखा के समान प्रकाशित होती थी, वही श्रीरामवनवास के बाद हवनीय दुग्ध से सींची गयी अग्नि की ज्वाला के समान बुझकर विलीन-सी हो गयी है

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॥ २ · ११४ · ६ ॥
विध्वस्तकवचां रुग्णगजवाजिरथध्वजाम्। हतप्रवीरामापन्नां चमूमिव महाहवे

vidhvastakavacāṁ rugṇagajavājirathadhvajām।
hatapravīrāmāpannāṁ camūmiva mahāhave ॥

उस समय अयोध्या महासमर में संकटग्रस्त हुई उस सेना के समान प्रतीत होती थी, जिसके कवच कटकर गिर गये हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजा छिन्न-भिन्न हो गये हों और मुख्य-मुख्य वीर मार डाले गये हों

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॥ २ · ११४ · ७ ॥
सफेनां सस्वनां भूत्वा सागरस्य समुत्थिताम्। प्रशान्तमारुतोद्धूतां जलोर्मिमिव निःस्वनाम्

saphenāṁ sasvanāṁ bhūtvā sāgarasya samutthitām।
praśāntamārutoddhūtāṁ jalormimiva niḥsvanām ॥

प्रबल वायु के वेग से फेन और गर्जना के साथ उठी हुई समुद्र की उत्ताल तरंग सहसा वायु के शान्त हो जाने पर जैसे शिथिल और नीरव हो जाती है, उसी प्रकार कोलाहलपूर्ण अयोध्या अब शब्दशून्य-सी जान पड़ती थी

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॥ २ · ११४ · ८ ॥
त्यक्तां यज्ञायुधैः सर्वैरभिरूपैश्च याजकैः। सुत्याकाले सुनिर्वृत्ते वेदिं गतरवामिव

tyaktāṁ yajñāyudhaiḥ sarvairabhirūpaiśca yājakaiḥ।
sutyākāle sunirvṛtte vediṁ gataravāmiva ॥

यज्ञकाल समाप्त होने पर ‘स्फ्य’ आदि यज्ञसम्बन्धी आयुधों तथा श्रेष्ठ याजकों से सूनी हुई वेदी जैसे मन्त्रोच्चारण की ध्वनि से रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या सुनसान दिखायी देती थी

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॥ २ · ११४ · ९ ॥
गोष्ठमध्ये स्थितामार्तामचरन्तीं नवं तृणम्। गोवृषेण परित्यक्तां गवां पत्नीमिवोत्सुकाम्

goṣṭhamadhye sthitāmārtāmacarantīṁ navaṁ tṛṇam।
govṛṣeṇa parityaktāṁ gavāṁ patnīmivotsukām ॥

जैसे कोई गाय साँड़ के साथ समागम के लिये उत्सुक हो, उसी अवस्था में उसे साँड़ से अलग कर दिया गया हो और वह नूतन घास चरना छोड़कर आर्त भाव से गोष्ठ में बँधी हुई खड़ी हो, उसी तरह अयोध्यापुरी भी आन्तरिक वेदना से पीड़ित थी

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॥ २ · ११४ · १० ॥
प्रभाकराद्यैः सुस्निग्धैः प्रज्वलद्भिरिवोत्तमैः। वियुक्तां मणिभिर्जात्यैर्नवां मुक्तावलीमिव

prabhākarādyaiḥ susnigdhaiḥ prajvaladbhirivottamaiḥ।
viyuktāṁ maṇibhirjātyairnavāṁ muktāvalīmiva ॥

श्रीराम आदि से रहित हुई अयोध्या मोतियों की उस नूतन माला के समान श्रीहीन हो गयी थी, जिसकी अत्यन्त चिकनी-चमकीली, उत्तम तथा अच्छी जाति की पद्मराग आदि मणियाँ उससे निकालकर अलग कर दी गयी हों

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॥ २ · ११४ · ११ ॥
सहसाचरितां स्थानान्महीं पुण्यक्षयाद् गताम्। संहृतद्युतिविस्तारां तारामिव दिवश्च्युताम्

sahasācaritāṁ sthānānmahīṁ puṇyakṣayād gatām।
saṁhṛtadyutivistārāṁ tārāmiva divaścyutām ॥

जो पुण्य-क्षय होने के कारण सहसा अपने स्थान से भ्रष्ट हो पृथ्वी पर आ पहुँची हो, अतएव जिसकी विस्तृत प्रभा क्षीण हो गयी हो, आकाश से गिरी हुई उस तारिका की भाँति अयोध्या शोभाहीन हो गयी थी

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॥ २ · ११४ · १२ ॥
पुष्पनद्धां वसन्तान्ते मत्तभ्रमरशालिनीम्। द्रुतदावाग्निविप्लुष्टां क्लान्तां वनलतामिव

puṣpanaddhāṁ vasantānte mattabhramaraśālinīm।
drutadāvāgnivipluṣṭāṁ klāntāṁ vanalatāmiva ॥

जो ग्रीष्म-ऋतु में पहले फूलों से लदी हुई होने के कारण मतवाले भ्रमरों से सुशोभित होती रही हो और फिर सहसा दावानल के लपेट में आकर मुरझा गयी हो, वन की उस लता के समान पहले की उल्लासपूर्ण अयोध्या अब उदास हो गयी थी

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॥ २ · ११४ · १३ ॥
सम्मूढनिगमां सर्वां संक्षिप्तविपणापणाम्। प्रच्छन्नशशिनक्षत्रां द्यामिवाम्बुधरैर्युताम्

sammūḍhanigamāṁ sarvāṁ saṁkṣiptavipaṇāpaṇām।
pracchannaśaśinakṣatrāṁ dyāmivāmbudharairyutām ॥

वहाँ के व्यापारी वणिक् शोक से व्याकुल होने के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे, बाजार-हाट और दूकानें बहुत कम खुली थीं। उस समय सारी पुरी उस आकाश की भाँति शोभाहीन हो गयी थी, जहाँ बादलों की घटाएँ घिर आयी हों और तारे तथा चन्द्रमा ढक गये हों

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॥ २ · ११४ · १४ ॥
क्षीणपानोत्तमैर्भाजनैः शरावैरभिसंवृताम्। हतशौण्डामिव ध्वस्तां पानभूमिमसंस्कृताम्

kṣīṇapānottamairbhājanaiḥ śarāvairabhisaṁvṛtām।
hataśauṇḍāmiva dhvastāṁ pānabhūmimasaṁskṛtām ॥

(उन दिनों अयोध्यापुरी की सड़कें झाड़ी-बुहारी नहीं गयी थीं, इसलिये यत्र-तत्र कूड़े-करकट के ढेर पड़े थे। उस अवस्था में) वह नगरी उस उजड़ी हुई पानभूमि (मधुशाला) के समान श्रीहीन दिखायी देती थी, जिसकी सफाई न की गयी हो, जहाँ मधु से खाली टूटी-फूटी प्यालियाँ पड़ी हों और जहाँ के पीनेवाले भी नष्ट हो गये हों

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॥ २ · ११४ · १५ ॥
वृक्णभूमितलां निम्नां वृक्णपात्रैः समावृताम्। उपयुक्तोदकां भग्नां प्रपां निपतितामिव

vṛkṇabhūmitalāṁ nimnāṁ vṛkṇapātraiḥ samāvṛtām।
upayuktodakāṁ bhagnāṁ prapāṁ nipatitāmiva ॥

उस पुरी की दशा उस पौंसले की-सी हो रही थी, जो खम्भों के टूट जाने से ढह गया हो, जिसका चबूतरा छिन्न-भिन्न हो गया हो, भूमि नीची हो गयी हो, पानी चुक गया हो और जलपात्र टूट-फूटकर इधर-उधर सब ओर बिखरे पड़े हों

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॥ २ · ११४ · १६ ॥
विपुलां विततां चैव युक्तपाशां तरस्विनाम्। भूमौ बाणैर्विनिष्कृत्तां पतितां ज्यामिवायुधात्

vipulāṁ vitatāṁ caiva yuktapāśāṁ tarasvinām।
bhūmau bāṇairviniṣkṛttāṁ patitāṁ jyāmivāyudhāt ॥

जो विशाल और सम्पूर्ण धनुष में फैली हुई हो, उसकी दोनों कोटियों (किनारों) में बाँधने के लिये जिसमें रस्सी जुड़ी हुई हो, किंतु वेगशाली वीरों के बाणों से कटकर धनुष से पृथ्वी पर गिर पड़ी हो, उस प्रत्यञ्चा के समान ही अयोध्यापुरी भी स्थानभ्रष्ट हुई-सी दिखायी देती थी

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॥ २ · ११४ · १७ ॥
सहसा युद्धशौण्डेन हयारोहेण वाहिताम्। निहतां प्रतिसैन्येन वडवामिव पातिताम्

sahasā yuddhaśauṇḍena hayāroheṇa vāhitām।
nihatāṁ pratisainyena vaḍavāmiva pātitām ॥

जिसपर युद्धकुशल घुड़सवार ने सवारी की हो और जिसे शत्रुपक्ष की सेना ने सहसा मार गिराया हो, युद्धभूमि में पड़ी हुई उस घोड़ी की जो दशा होती है, वही उस समय अयोध्यापुरी की भी थी (कैकेयी के कुचक्र से उसके संचालक नरेश का स्वर्गवास और युवराज का वनवास हो गया था)

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॥ २ · ११४ · १८ ॥
भरतस्तु रथस्थः सन् श्रीमान् दशरथात्मजः। वाहयन्तं रथश्रेष्ठं सारथिं वाक्यमब्रवीत्

bharatastu rathasthaḥ san śrīmān daśarathātmajaḥ।
vāhayantaṁ rathaśreṣṭhaṁ sārathiṁ vākyamabravīt ॥

रथ पर बैठे हुए श्रीमान् दशरथनन्दन भरत ने उस समय श्रेष्ठ रथ का संचालन करनेवाले सारथि सुमन्त्र से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ११४ · १९ ॥
किं नु खल्वद्य गम्भीरो मूर्च्छितो निशाम्यते। यथापुरमयोध्यायां गीतवादित्रनिःस्वनः

kiṁ nu khalvadya gambhīro mūrcchito na niśāmyate।
yathāpuramayodhyāyāṁ gītavāditraniḥsvanaḥ ॥

‘अब अयोध्या में पहले की भाँति सब ओर फैला हुआ गाने-बजाने का गम्भीर नाद नहीं सुनायी पड़ता; यह कितने कष्ट की बात है!

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॥ २ · ११४ · २० ॥
वारुणीमदगन्धश्च माल्यगन्धश्च मूर्च्छितः। चन्दनागुरुगन्धश्च प्रवाति समन्ततः

vāruṇīmadagandhaśca mālyagandhaśca mūrcchitaḥ।
candanāgurugandhaśca na pravāti samantataḥ ॥

‘अब चारों ओर वारुणी (मधु) की मादक गन्ध, व्याप्त हुई फूलों की सुगन्ध तथा चन्दन और अगुरु की पवित्र गन्ध नहीं फैल रही है

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॥ २ · ११४ · २१ ॥
यानप्रवरघोषश्च सुस्निग्धहयनिःस्वनः। प्रमत्तगजनादश्च महांश्च रथनिःस्वनः

yānapravaraghoṣaśca susnigdhahayaniḥsvanaḥ।
pramattagajanādaśca mahāṁśca rathaniḥsvanaḥ ॥

‘अच्छी-अच्छी सवारियों की आवाज, घोड़ों के हींसने का सुस्निग्ध शब्द, मतवाले हाथियों का चिग्घाड़ना तथा रथों की घर्घराहट का महान् शब्द—ये सब नहीं सुनायी दे रहे हैं

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॥ २ · ११४ · २२ ॥
नेदानीं श्रूयते पुर्यामस्यां रामे विवासिते। चन्दनागुरुगन्धांश्च महार्हांश्च वनस्रजः

nedānīṁ śrūyate puryāmasyāṁ rāme vivāsite।
candanāgurugandhāṁśca mahārhāṁśca vanasrajaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११४ · २३ ॥
गते रामे हि तरुणाः संतप्ता नोपभुञ्जते। बहिर्यात्रां गच्छन्ति चित्रमाल्यधरा नराः

gate rāme hi taruṇāḥ saṁtaptā nopabhuñjate।
bahiryātrāṁ na gacchanti citramālyadharā narāḥ ॥

॥ २२–२३ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के निर्वासित होने के कारण ही इस पुरी में इस समय इन सब प्रकार के शब्दों का श्रवण नहीं हो रहा है। श्रीराम के चले जाने से यहाँ के तरुण बहुत ही संतप्त हैं। वे चन्दन और अगुरु की सुगन्ध का सेवन नहीं करते तथा बहुमूल्य वनमालाएँ भी नहीं धारण करते। अब इस पुरी के लोग विचित्र फूलों के हार पहनकर बाहर घूमने के लिये नहीं निकलते हैं

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॥ २ · ११४ · २४ ॥
नोत्सवाः सम्प्रवर्तन्ते रामशोकार्दिते पुरे। सा हि नूनं मम भ्रात्रा पुरस्यास्य द्युतिर्गता

notsavāḥ sampravartante rāmaśokārdite pure।
sā hi nūnaṁ mama bhrātrā purasyāsya dyutirgatā ॥

‘श्रीराम के शोक से पीड़ित हुए इस नगर में अब नाना प्रकार के उत्सव नहीं हो रहे हैं। निश्चय ही इस पुरी की वह सारी शोभा मेरे भाई के साथ ही चली गयी

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॥ २ · ११४ · २५ ॥
नहि राजत्ययोध्येयं सासारेवार्जुनी क्षपा। कदा नु खलु मे भ्राता महोत्सव इवागतः जनयिष्यत्ययोध्यायां हर्षं ग्रीष्म इवाम्बुदः।

nahi rājatyayodhyeyaṁ sāsārevārjunī kṣapā।
kadā nu khalu me bhrātā mahotsava ivāgataḥ ॥
janayiṣyatyayodhyāyāṁ harṣaṁ grīṣma ivāmbudaḥ।

‘जैसे वेगयुक्त वर्षा के कारण शुक्लपक्ष की चाँदनी रात भी शोभा नहीं पाती है, उसी प्रकार नेत्रों से आँसू बहाती हुई यह अयोध्या भी शोभित नहीं हो रही है। अब कब मेरे भाई महोत्सव की भाँति अयोध्या में पधारेंगे और ग्रीष्म-ऋतु में प्रकट हुए मेघ की भाँति सबके हृदय में हर्ष का संचार करेंगे

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॥ २ · ११४ · २६ ॥
तरुणैश्चारुवेषैश्च नरैरुन्नतगामिभिः सम्पतद्भिरयोध्यायां नाभिभान्ति महापथाः।

taruṇaiścāruveṣaiśca narairunnatagāmibhiḥ ॥
sampatadbhirayodhyāyāṁ nābhibhānti mahāpathāḥ।

‘अब अयोध्या की बड़ी-बड़ी सड़कें हर्ष से उछलकर चलते हुए मनोहर वेषधारी तरुणों के शुभागमन से शोभा नहीं पा रही हैं’

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॥ २ · ११४ · २७ ॥
इति ब्रुवन् सारथिना दुःखितो भरतस्तदा

iti bruvan sārathinā duḥkhito bharatastadā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११४ · २८ ॥
अयोध्यां सम्प्रविश्यैव विवेश वसतिं पितुः। तेन हीनां नरेन्द्रेण सिंहहीनां गुहामिव

ayodhyāṁ sampraviśyaiva viveśa vasatiṁ pituḥ।
tena hīnāṁ narendreṇa siṁhahīnāṁ guhāmiva ॥

॥ २७–२८ ॥

इस प्रकार सारथि के साथ बातचीत करते हुए दुःखी भरत उस समय सिंह से रहित गुफा की भाँति राजा दशरथ से हीन पिता के निवासस्थान राजमहल में गये

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॥ २ · ११४ · २९ ॥
तदा तदन्तःपुरमुज्झितप्रभं सुरैरिवोत्कृष्टमभास्करं दिनम्। निरीक्ष्य सर्वत्र विभक्तमात्मवान् मुमोच बाष्पं भरतः सुदुःखितः

tadā tadantaḥpuramujjhitaprabhaṁ surairivotkṛṣṭamabhāskaraṁ dinam।
nirīkṣya sarvatra vibhaktamātmavān mumoca bāṣpaṁ bharataḥ suduḥkhitaḥ ॥

जैसे सूर्य के छिप जाने से दिन की शोभा नष्ट हो जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय वह अन्तःपुर शोभाहीन हो गया था और वहाँ के लोग शोकमग्न थे। उसे सब ओर से स्वच्छता और सजावट से हीन देख भरत धैर्यवान् होने पर भी अत्यन्त दुःखी हो आँसू बहाने लगे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्दशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११४ ॥