वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११३ · २५ श्लोकाःSarga 113 · 25 ślokas

भरतका भरद्वाजसे मिलते हुए अयोध्याको लौट आना

भरद्वाज-भेंट

“भरद्वाज-भेंट”
॥ २ · ११३ · १–८ ॥

प्रयागस्य सरित्सङ्गमे पर्णकुटीरसमीपे श्वेतशोकवस्त्रो व्यथितो भरतः श्वेतश्मश्रुं भरद्वाजमुनिं प्रणमति, यश्च आशीर्वादाय करमुद्यम्य तिष्ठति; भरतस्य शिरसि च रामस्य सुवर्णभूषिते दिव्यप्रभे पादुके अनुपस्थितनृपस्य मुकुटवद्विराजेते; श्वेतवस्त्रः शत्रुघ्नः कृताञ्जलिः पदमेकं पृष्ठतस्तिष्ठति, परिचारकाः स्थगितो राजरथश्च सादरं दूरे प्रतीक्षन्ते, उच्चाश्रमवृक्षा विशालनदीसङ्गमश्च समीपे विभान्ति।

प्रयाग के नदी-संगम पर पर्णकुटी के समीप श्वेत शोकवस्त्र में व्यथित भरत श्वेतश्मश्रु भरद्वाज मुनि को प्रणाम करते हैं, जो आशीर्वाद के लिये हाथ उठाये खड़े हैं; और भरत के मस्तक पर श्रीराम की सुवर्णभूषित, दिव्य प्रभा से युक्त पादुकाएँ अनुपस्थित राजा के मुकुट के समान सुशोभित हैं; श्वेत वस्त्र में शत्रुघ्न हाथ जोड़े एक पग पीछे खड़े हैं, परिचारक और रुका हुआ राजरथ आदरपूर्वक दूरी पर प्रतीक्षा करते हैं, तथा ऊँचे आश्रम-वृक्ष एवं विशाल नदी-संगम समीप ही सुशोभित हैं।

At the leafy Prayag hermitage where the rivers meet, the grief-worn Bharat, in white mourner's cloth, bows in reverence before the white-bearded sage Bharadvaja, who lifts a hand in blessing, while upon Bharat's own head rest Ram's gilded sandals, glowing with a soft sacred light, carried like the crown of the absent king; Shatrughna in white stands a step behind with folded hands, and the halted royal chariot and attendants wait respectfully at a distance among the tall hermitage trees beside the broad river-confluence.

॥ २ · ११३ · १ ॥
ततः शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा। आरुरोह रथं हृष्टः शत्रुघ्नसहितस्तदा

tataḥ śirasi kṛtvā tu pāduke bharatastadā।
āruroha rathaṁ hṛṣṭaḥ śatrughnasahitastadā ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी की दोनों चरणपादुकाओं को अपने मस्तक पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नतापूर्वक रथ पर बैठे

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॥ २ · ११३ · २ ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिश्च दृढव्रतः। अग्रतः प्रययुः सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रपूजिताः

vasiṣṭho vāmadevaśca jābāliśca dṛḍhavrataḥ।
agrataḥ prayayuḥ sarve mantriṇo mantrapūjitāḥ ॥

वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढतापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करनेवाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देने के कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले

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॥ २ · ११३ · ३ ॥
मन्दाकिनीं नदीं रम्यां प्राङ्मुखास्ते ययुस्तदा। प्रदक्षिणं कुर्वाणाश्चित्रकूटं महागिरिम्

mandākinīṁ nadīṁ ramyāṁ prāṅmukhāste yayustadā।
pradakṣiṇaṁ ca kurvāṇāścitrakūṭaṁ mahāgirim ॥

वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वत की परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदी को पार करके पूर्वदिशा की ओर प्रस्थित हुए

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॥ २ · ११३ · ४ ॥
पश्यन् धातुसहस्राणि रम्याणि विविधानि च। प्रययौ तस्य पार्श्वेन ससैन्यो भरतस्तदा

paśyan dhātusahasrāṇi ramyāṇi vividhāni ca।
prayayau tasya pārśvena sasainyo bharatastadā ॥

उस समय भरत अपनी सेना के साथ सहस्रों प्रकार के रमणीय धातुओं को देखते हुए चित्रकूट के किनारे से होकर निकले

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॥ २ · ११३ · ५ ॥
अदूराच्चित्रकूटस्य ददर्श भरतस्तदा। आश्रमं यत्र मुनिर्भरद्वाजः कृतालयः

adūrāccitrakūṭasya dadarśa bharatastadā।
āśramaṁ yatra sa munirbharadvājaḥ kṛtālayaḥ ॥

चित्रकूट से थोड़ी ही दूर जाने पर भरत ने वह आश्रम देखा, जहाँ मुनिवर भरद्वाजजी निवास करते थे

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॥ २ · ११३ · ६ ॥
तमाश्रममागम्य भरद्वाजस्य वीर्यवान्। अवतीर्य रथात् पादौ ववन्दे कुलनन्दनः

sa tamāśramamāgamya bharadvājasya vīryavān।
avatīrya rathāt pādau vavande kulanandanaḥ ॥

अपने कुल को आनन्दित करनेवाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाज के उस आश्रम पर पहुँचकर रथ से उतर पड़े और उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया

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॥ २ · ११३ · ७ ॥
ततो हृष्टो भरद्वाजो भरतं वाक्यमब्रवीत्। अपि कृत्यं कृतं तात रामेण समागतम्

tato hṛṣṭo bharadvājo bharataṁ vākyamabravīt।
api kṛtyaṁ kṛtaṁ tāta rāmeṇa ca samāgatam ॥

उनके आने से महर्षि भरद्वाज को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरत से पूछा—‘तात! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजी से भेंट हुई?’

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॥ २ · ११३ · ८ ॥
एवमुक्तः तु ततो भरद्वाजेन धीमता। प्रत्युवाच भरद्वाजं भरतो धर्मवत्सलः

evamuktaḥ sa tu tato bharadvājena dhīmatā।
pratyuvāca bharadvājaṁ bharato dharmavatsalaḥ ॥

बुद्धिमान् भरद्वाजजी के इस प्रकार पूछने पर धर्मवत्सल भरत ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ २ · ११३ · ९ ॥
याच्यमानो गुरुणा मया दृढविक्रमः। राघवः परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत्

sa yācyamāno guruṇā mayā ca dṛḍhavikramaḥ।
rāghavaḥ paramaprīto vasiṣṭhaṁ vākyamabravīt ॥

‘मुने! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रम पर दृढ़ रहनेवाले हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजी ने भी अनुरोध किया। तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजी से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ११३ · १० ॥
पितुः प्रतिज्ञां तामेव पालयिष्यामि तत्त्वतः। चतुर्दश हि वर्षाणि या प्रतिज्ञा पितुर्मम

pituḥ pratijñāṁ tāmeva pālayiṣyāmi tattvataḥ।
caturdaśa hi varṣāṇi yā pratijñā piturmama ॥

‘मैं चौदह वर्षोंतक वन में रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजी ने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञा का ही मैं यथार्थरूप से पालन करूँगा’

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॥ २ · ११३ · ११ ॥
एवमुक्तो महाप्राज्ञो वसिष्ठः प्रत्युवाच ह। वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं राघवं वचनं महत्

evamukto mahāprājño vasiṣṭhaḥ pratyuvāca ha।
vākyajño vākyakuśalaṁ rāghavaṁ vacanaṁ mahat ॥

‘उनके ऐसा कहने पर बात के मर्म को समझनेवाले महाज्ञानी वसिष्ठजी ने बातचीत करने में कुशल श्रीरघुनाथजी से यह महत्त्वपूर्ण बात कही—

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॥ २ · ११३ · १२ ॥
एते प्रयच्छ संहृष्टः पादुके हेमभूषिते। अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरो भव

ete prayaccha saṁhṛṣṭaḥ pāduke hemabhūṣite।
ayodhyāyāṁ mahāprājña yogakṣemakaro bhava ॥

‘महाप्राज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णभूषित पादुकाएँ अपने प्रतिनिधि के रूप में भरत को दे दो और इन्हींके द्वारा अयोध्या के योगक्षेम का निर्वाह करो’

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॥ २ · ११३ · १३ ॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन राघवः प्राङ्मुखः स्थितः। पादुके हेमविकृते मम राज्याय ते ददौ

evamukto vasiṣṭhena rāghavaḥ prāṅmukhaḥ sthitaḥ।
pāduke hemavikṛte mama rājyāya te dadau ॥

‘गुरु वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजी ने अयोध्या के राज्य का संचालन करने के लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं

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॥ २ · ११३ · १४ ॥
निवृत्तोऽहमनुज्ञातो रामेण सुमहात्मना। अयोध्यामेव गच्छामि गृहीत्वा पादुके शुभे

nivṛtto'hamanujñāto rāmeṇa sumahātmanā।
ayodhyāmeva gacchāmi gṛhītvā pāduke śubhe ॥

‘तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीराम की आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओं को लेकर अयोध्या को ही जा रहा हूँ’

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॥ २ · ११३ · १५ ॥
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः। भरद्वाजः शुभतरं मुनिर्वाक्यमुदाहरत्

etacchrutvā śubhaṁ vākyaṁ bharatasya mahātmanaḥ।
bharadvājaḥ śubhataraṁ munirvākyamudāharat ॥

महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनि ने यह परम मङ्गलमय बात कही—

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॥ २ · ११३ · १६ ॥
नैतच्चित्रं नरव्याघ्रे शीलवृत्तविदां वरे। यदार्यं त्वयि तिष्ठेत्तु निम्नोत्सृष्टमिवोदकम्

naitaccitraṁ naravyāghre śīlavṛttavidāṁ vare।
yadāryaṁ tvayi tiṣṭhettu nimnotsṛṣṭamivodakam ॥

‘भरत! तुम मनुष्यों में सिंह के समान वीर तथा शील और सदाचार के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ हो। जैसे जल नीची भूमिवाले जलाशय में सब ओर से बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों—यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है

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॥ २ · ११३ · १७ ॥
अनृणः महाबाहुः पिता दशरथस्तव। यस्य त्वमीदृशः पुत्रो धर्मात्मा धर्मवत्सलः

anṛṇaḥ sa mahābāhuḥ pitā daśarathastava।
yasya tvamīdṛśaḥ putro dharmātmā dharmavatsalaḥ ॥

‘तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकार से उऋण हो गये, जिनके तुम-जैसा धर्मप्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है’

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॥ २ · ११३ · १८ ॥
तमृषिं तु महाप्राज्ञमुक्तवाक्यं कृताञ्जलिः। आमन्त्रयितुमारेभे चरणावुपगृह्य

tamṛṣiṁ tu mahāprājñamuktavākyaṁ kṛtāñjaliḥ।
āmantrayitumārebhe caraṇāvupagṛhya ca ॥

उन महाज्ञानी महर्षि के ऐसा कहने पर भरत ने हाथ जोड़कर उनके चरणों का स्पर्श किया; फिर वे उनसे जाने की आज्ञा लेने को उद्यत हुए

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॥ २ · ११३ · १९ ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भरद्वाजं पुनः पुनः। भरतस्तु ययौ श्रीमानयोध्यां सह मन्त्रिभिः

tataḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā bharadvājaṁ punaḥ punaḥ।
bharatastu yayau śrīmānayodhyāṁ saha mantribhiḥ ॥

तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनि की परिक्रमा करके मन्त्रियोंसहित अयोध्या की ओर चल दिये

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॥ २ · ११३ · २० ॥
यानैश्च शकटैश्चैव हयैर्नागैश्च सा चमूः। पुनर्निवृत्ता विस्तीर्णा भरतस्यानुयायिनी

yānaiśca śakaṭaiścaiva hayairnāgaiśca sā camūḥ।
punarnivṛttā vistīrṇā bharatasyānuyāyinī ॥

फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियों के साथ भरत का अनुसरण करती हुई अयोध्या को लौटी

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॥ २ · ११३ · २१ ॥
ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीर्त्वोर्मिमालिनीम्। ददृशुस्तां पुनः सर्वे गङ्गां शिवजलां नदीम्

tataste yamunāṁ divyāṁ nadīṁ tīrtvormimālinīm।
dadṛśustāṁ punaḥ sarve gaṅgāṁ śivajalāṁ nadīm ॥

तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगों ने तरंगमालाओं से सुशोभित दिव्य नदी यमुना को पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजी का दर्शन किया

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॥ २ · ११३ · २२ ॥
तां रम्यजलसम्पूर्णां संतीर्य सहबान्धवः। शृङ्गवेरपुरं रम्यं प्रविवेश ससैनिकः

tāṁ ramyajalasampūrṇāṁ saṁtīrya sahabāndhavaḥ।
śṛṅgaverapuraṁ ramyaṁ praviveśa sasainikaḥ ॥

फिर बन्धु-बान्धवों और सैनिकों के साथ मनोहर जल से भरी हुई गङ्गा के भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुर में जा पहुँचे

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॥ २ · ११३ · २३ ॥
शृङ्गवेरपुराद् भूय अयोध्यां संददर्श ह। अयोध्यां तु तदा दृष्ट्वा पित्रा भ्रात्रा विवर्जिताम् भरतो दुःखसंतप्तः सारथिं चेदमब्रवीत्।

śṛṅgaverapurād bhūya ayodhyāṁ saṁdadarśa ha।
ayodhyāṁ tu tadā dṛṣṭvā pitrā bhrātrā vivarjitām ॥
bharato duḥkhasaṁtaptaḥ sārathiṁ cedamabravīt।

शृङ्गवेरपुर से प्रस्थान करने पर उन्हें पुनः अयोध्यापुरी का दर्शन हुआ, जो उस समय पिता और भाई दोनों से विहीन थी। उसे देखकर भरत ने दुःख से संतप्त हो सारथि से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ११३ · २४ ॥
सारथे पश्य विध्वस्ता अयोध्या प्रकाशते

sārathe paśya vidhvastā ayodhyā na prakāśate ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११३ · २५ ॥
निराकारा निरानन्दा दीना प्रतिहतस्वना

nirākārā nirānandā dīnā pratihatasvanā ॥

॥ २४–२५ ॥

‘सारथि सुमन्त्रजी! देखिये, अयोध्या की सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अतः यह पहले की भाँति प्रकाशित नहीं होती है। इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा। इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११३ ॥