वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११२ · ३१ श्लोकाःSarga 112 · 31 ślokas

ऋषियोंका भरतको श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार लौट जानेकी सलाह देना, भरतका पुनः श्रीरामके चरणोंमें गिरकर चलनेकी प्रार्थना करना, श्रीरामका उन्हें समझाकर अपनी चरणपादुका देकर उन सबको विदा करना

पादुका-प्रदान

“पादुका-प्रदान”
॥ २ · ११२ · २४–३० ॥

चित्रकूटपर्णशालाग्रे दर्भास्तीर्णे स्थण्डिले श्यामवर्णो रामो जटामण्डलधरश्चीरवल्कलकृष्णाजिनवसनो नम्रीभूय भरतस्य श्रद्धोन्नमितयोरञ्जलिकृतयोः पाण्योर्दिव्यप्रभामयीं सुवर्णभूषितां पादुकायुग्मं न्यस्यति, यत्स्वयं नाददाति तद्राज्यं ताभ्यामेव समर्पयन्; भरतश्च श्वेतशोकवस्त्रो भक्त्यश्रुभिस्ताः प्रणम्य गृह्णाति, तासां किंकरत्वेनैव राज्यं पालयितुं व्रतं गृह्णन्; श्वेतवस्त्रः शत्रुघ्नः कृताञ्जलिः पृष्ठतस्तिष्ठति, वल्कलधरो लक्ष्मणो गम्भीरं प्रेक्षते, सरलवन्यवेषा सीता च दूरे श्रद्धया तिष्ठति, परितश्च वनर्षयः सविस्मयं सादरं पश्यन्ति, यज्ञाग्नेः सूक्ष्मो धूमश्च समुत्तिष्ठति — भ्रातृस्नेहे समर्पितं राज्यं द्वयोर्दीप्तपादुकयोरधिष्ठितम्।

चित्रकूट की पर्णशाला के आगे दर्भ बिछी भूमि पर श्यामवर्ण श्रीराम जटामण्डलधारी, चीर-वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये झुककर भरत के श्रद्धा से उठाये हुए, अञ्जलिबद्ध हाथों में दिव्य प्रभा से युक्त सुवर्णभूषित पादुकाओं का युगल रख देते हैं—जिस राज्य को स्वयं नहीं लेते, उसे इन्हीं पादुकाओं को सौंप देते हैं; और श्वेत शोकवस्त्र में भरत भक्ति के आँसुओं से भरकर उन्हें प्रणाम करके ग्रहण करते हैं, इन्हीं का किंकर बनकर राज्य पालने का व्रत लेते हुए; श्वेत वस्त्र में शत्रुघ्न हाथ जोड़े पीछे खड़े हैं, वल्कलधारी लक्ष्मण गम्भीरता से देखते हैं, और सरल वनवेश में सीता श्रद्धापूर्ण दूरी पर खड़ी हैं, चारों ओर वनवासी ऋषि विस्मय और आदर से देखते हैं तथा यज्ञाग्नि का पतला धूम उठता है—भाई के स्नेह में समर्पित राज्य, दो दीप्तिमयी पादुकाओं पर प्रतिष्ठित।

On the darbha-strewn ground before the leaf-hut on Chitrakut, the blue-hued Ram — clad in bark and black deer-skin, his hair coiled high — leans forward and places into Bharat's reverently upraised, cupped hands a pair of gilded royal sandals that glow with a soft sacred light, entrusting to them the kingship he will not take; Bharat, in white mourner's cloth, bows low and receives them with tears of devotion, vowing to rule only as their servant; Shatrughna in white stands close behind with folded hands, the bark-clad Lakshman watches gravely, and the gentle Sita in forest garb waits at a reverent distance, while a ring of forest sages looks on in solemn wonder and a thread of sacred-fire smoke rises — a throne surrendered to a brother's love, borne upon two radiant sandals.

॥ २ · ११२ · १ ॥
तमप्रतिमतेजोभ्यां भ्रातृभ्यां रोमहर्षणम्। विस्मिताः संगमं प्रेक्ष्य समुपेता महर्षयः

tamapratimatejobhyāṁ bhrātṛbhyāṁ romaharṣaṇam।
vismitāḥ saṁgamaṁ prekṣya samupetā maharṣayaḥ ॥

उन अनुपम तेजस्वी भ्राताओं का वह रोमाञ्चकारी समागम देख वहाँ आये हुए महर्षियों को बड़ा विस्मय हुआ

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॥ २ · ११२ · २ ॥
अन्तर्हिता मुनिगणाः स्थिताश्च परमर्षयः। तौ भ्रातरौ महाभागौ काकुत्स्थौ प्रशशंसिरे

antarhitā munigaṇāḥ sthitāśca paramarṣayaḥ।
tau bhrātarau mahābhāgau kākutsthau praśaśaṁsire ॥

अन्तरिक्ष में अदृश्य भाव से खड़े हुए मुनि तथा वहाँ प्रत्यक्षरूप में बैठे हुए महर्षि उन महान् भाग्यशाली ककुत्स्थवंशी बन्धुओं की इस प्रकार प्रशंसा करने लगे—

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॥ २ · ११२ · ३ ॥
सदार्यौ राजपुत्रौ द्वौ धर्मज्ञौ धर्मविक्रमौ। श्रुत्वा वयं हि सम्भाषामुभयोः स्पृहयामहे

sadāryau rājaputrau dvau dharmajñau dharmavikramau।
śrutvā vayaṁ hi sambhāṣāmubhayoḥ spṛhayāmahe ॥

‘ये दोनों राजकुमार सदा श्रेष्ठ, धर्म के ज्ञाता और धर्ममार्ग पर ही चलनेवाले हैं। इन दोनों की बातचीत सुनकर हमें उसे बारंबार सुनते रहने की ही इच्छा होती है’

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॥ २ · ११२ · ४ ॥
ततस्त्वृषिगणाः क्षिप्रं दशग्रीववधैषिणः। भरतं राजशार्दूलमित्यूचुः संगता वचः

tatastvṛṣigaṇāḥ kṣipraṁ daśagrīvavadhaiṣiṇaḥ।
bharataṁ rājaśārdūlamityūcuḥ saṁgatā vacaḥ ॥

तदनन्तर दशग्रीव रावण के वध की अभिलाषा रखनेवाले ऋषियों ने मिलकर राजसिंह भरत से तुरंत ही यह बात कही—

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॥ २ · ११२ · ५ ॥
कुले जात महाप्राज्ञ महावृत्त महायशः। ग्राह्यं रामस्य वाक्यं ते पितरं यद्यवेक्षसे

kule jāta mahāprājña mahāvṛtta mahāyaśaḥ।
grāhyaṁ rāmasya vākyaṁ te pitaraṁ yadyavekṣase ॥

‘महाप्राज्ञ! तुम उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारा आचरण बहुत उत्तम और यश महान् है। यदि तुम अपने पिता की ओर देखो—उन्हें सुख पहुँचाना चाहो तो तुम्हें श्रीरामचन्द्रजी की बात मान लेनी चाहिये

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॥ २ · ११२ · ६ ॥
सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः। अनृणत्वाच्च कैकेय्याः स्वर्गं दशरथो गतः

sadānṛṇamimaṁ rāmaṁ vayamicchāmahe pituḥ।
anṛṇatvācca kaikeyyāḥ svargaṁ daśaratho gataḥ ॥

‘हमलोग इन श्रीराम को पिता के ऋण से सदा उऋण देखना चाहते हैं। कैकेयी का ऋण चुका देने के कारण ही राजा दशरथ स्वर्ग में पहुँचे हैं’

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॥ २ · ११२ · ७ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं गन्धर्वाः समहर्षयः। राजर्षयश्चैव तथा सर्वे स्वां स्वां गतिं गताः

etāvaduktvā vacanaṁ gandharvāḥ samaharṣayaḥ।
rājarṣayaścaiva tathā sarve svāṁ svāṁ gatiṁ gatāḥ ॥

इतना कहकर वहाँ आये हुए गन्धर्व, महर्षि और राजर्षि सब अपने-अपने स्थान को चले गये

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॥ २ · ११२ · ८ ॥
ह्लादितस्तेन वाक्येन शुशुभे शुभदर्शनः। रामः संहृष्टवदनस्तानृषीनभ्यपूजयत्

hlāditastena vākyena śuśubhe śubhadarśanaḥ।
rāmaḥ saṁhṛṣṭavadanastānṛṣīnabhyapūjayat ॥

जिनके दर्शन से जगत् का कल्याण हो जाता है, वे भगवान् श्रीराम महर्षियों के वचन से बहुत प्रसन्न हुए। उनका मुख हर्षोल्लास से खिल उठा, इससे उनकी बड़ी शोभा हुई और उन्होंने उन महर्षियों की सादर प्रशंसा की

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॥ २ · ११२ · ९ ॥
त्रस्तगात्रस्तु भरतः वाचा सज्जमानया। कृताञ्जलिरिदं वाक्यं राघवं पुनरब्रवीत्

trastagātrastu bharataḥ sa vācā sajjamānayā।
kṛtāñjaliridaṁ vākyaṁ rāghavaṁ punarabravīt ॥

परंतु भरत का सारा शरीर थर्रा उठा। वे लड़खड़ाती हुई जबान से हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजी से बोले—

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॥ २ · ११२ · १० ॥
राम धर्ममिमं प्रेक्ष्य कुलधर्मानुसंततम्। कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ मम मातुश्च याचनाम्

rāma dharmamimaṁ prekṣya kuladharmānusaṁtatam।
kartumarhasi kākutstha mama mātuśca yācanām ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! हमारे कुलधर्म से सम्बन्ध रखनेवाला जो ज्येष्ठ पुत्र का राज्यग्रहण और प्रजापालनरूप धर्म है, उसकी ओर दृष्टि डालकर आप मेरी तथा माता की याचना सफल कीजिये

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॥ २ · ११२ · ११ ॥
रक्षितुं सुमहद् राज्यमहमेकस्तु नोत्सहे। पौरजानपदांश्चापि रक्तान् रञ्जयितुं तदा

rakṣituṁ sumahad rājyamahamekastu notsahe।
paurajānapadāṁścāpi raktān rañjayituṁ tadā ॥

‘मैं अकेला ही इस विशाल राज्य की रक्षा नहीं कर सकता तथा आपके चरणों में अनुराग रखनेवाले इन पुरवासी तथा जनपदवासी लोगों को भी आपके बिना प्रसन्न नहीं रख सकता

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॥ २ · ११२ · १२ ॥
ज्ञातयश्चापि योधाश्च मित्राणि सुहृदश्च नः। त्वामेव हि प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः

jñātayaścāpi yodhāśca mitrāṇi suhṛdaśca naḥ।
tvāmeva hi pratīkṣante parjanyamiva karṣakāḥ ॥

‘जैसे किसान मेघ की प्रतीक्षा करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे बन्धु-बान्धव, योद्धा, मित्र और सुहृद् सब लोग आपकी ही बाट जोहते हैं

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॥ २ · ११२ · १३ ॥
इदं राज्यं महाप्राज्ञ स्थापय प्रतिपद्य हि। शक्तिमान् हि काकुत्स्थ लोकस्य परिपालने

idaṁ rājyaṁ mahāprājña sthāpaya pratipadya hi।
śaktimān sa hi kākutstha lokasya paripālane ॥

‘महाप्राज्ञ! आप इस राज्य को स्वीकार करके दूसरे किसीको इसके पालन का भार सौंप दीजिये। वही पुरुष आपके प्रजावर्ग अथवा लोक का पालन करने में समर्थ हो सकता है’

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॥ २ · ११२ · १४ ॥
एवमुक्त्वापतद् भ्रातुः पादयोर्भरतस्तदा। भृशं सम्प्रार्थयामास राघवेऽतिप्रियं वदन्

evamuktvāpatad bhrātuḥ pādayorbharatastadā।
bhṛśaṁ samprārthayāmāsa rāghave'tipriyaṁ vadan ॥

ऐसा कहकर भरत अपने भाई के चरणों पर गिर पड़े। उस समय उन्होंने श्रीरघुनाथजी से अत्यन्त प्रिय वचन बोलकर उनसे राज्यग्रहण करने के लिये बड़ी प्रार्थना की

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॥ २ · ११२ · १५ ॥
तमङ्के भ्रातरं कृत्वा रामो वचनमब्रवीत्। श्यामं नलिनपत्राक्षं मत्तहंसस्वरः स्वयम्

tamaṅke bhrātaraṁ kṛtvā rāmo vacanamabravīt।
śyāmaṁ nalinapatrākṣaṁ mattahaṁsasvaraḥ svayam ॥

तब श्रीरामचन्द्रजी ने श्यामवर्ण कमलनयन भाई भरत को उठाकर गोद में बिठा लिया और मदमत्त हंस के समान मधुर स्वर में स्वयं यह बात कही—

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॥ २ · ११२ · १६ ॥
आगता त्वामियं बुद्धिः स्वजा वैनयिकी या। भृशमुत्सहसे तात रक्षितुं पृथिवीमपि

āgatā tvāmiyaṁ buddhiḥ svajā vainayikī ca yā।
bhṛśamutsahase tāta rakṣituṁ pṛthivīmapi ॥

‘तात! तुम्हें जो यह स्वाभाविक विनयशील बुद्धि प्राप्त हुई है इस बुद्धि के द्वारा तुम समस्त भूमण्डल की रक्षा करने में भी पूर्णरूप से समर्थ हो सकते हो

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॥ २ · ११२ · १७ ॥
अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च बुद्धिमद्भिश्च मन्त्रिभिः। सर्वकार्याणि सम्मन्त्र्य महान्त्यपि हि कारय

amātyaiśca suhṛdbhiśca buddhimadbhiśca mantribhiḥ।
sarvakāryāṇi sammantrya mahāntyapi hi kāraya ॥

‘इसके सिवा अमात्यों, सुहृदों और बुद्धिमान् मन्त्रियों से सलाह लेकर उनके द्वारा सब कार्य, वे कितने ही बड़े क्यों न हों, करा लिया करो

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॥ २ · ११२ · १८ ॥
लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत्। अतीयात् सागरो वेलां प्रतिज्ञामहं पितुः

lakṣmīścandrādapeyād vā himavān vā himaṁ tyajet।
atīyāt sāgaro velāṁ na pratijñāmahaṁ pituḥ ॥

‘चन्द्रमा से उसकी प्रभा अलग हो जाय, हिमालय हिम का परित्याग कर दे, अथवा समुद्र अपनी सीमा को लाँघकर आगे बढ़ जाय, किंतु मैं पिता की प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता

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॥ २ · ११२ · १९ ॥
कामाद् वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं कृतम्। तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं मातृवत्

kāmād vā tāta lobhād vā mātrā tubhyamidaṁ kṛtam।
na tanmanasi kartavyaṁ vartitavyaṁ ca mātṛvat ॥

‘तात! माता कैकेयी ने कामना से अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मन में न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माता के प्रति करना उचित है’

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॥ २ · ११२ · २० ॥
एवं ब्रुवाणं भरतः कौसल्यासुतमब्रवीत्। तेजसाऽऽदित्यसंकाशं प्रतिपच्चन्द्रदर्शनम्

evaṁ bruvāṇaṁ bharataḥ kausalyāsutamabravīt।
tejasā''dityasaṁkāśaṁ pratipaccandradarśanam ॥

जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं तथा जिनका दर्शन प्रतिपदा (द्वितीया) के चन्द्रमा की भाँति आह्लादजनक है, उन कौसल्यानन्दन श्रीराम के इस प्रकार कहने पर भरत उनसे यों बोले—

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॥ २ · ११२ · २१ ॥
अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते। एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः

adhirohārya pādābhyāṁ pāduke hemabhūṣite।
ete hi sarvalokasya yogakṣemaṁ vidhāsyataḥ ॥

‘आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणों में अर्पित हैं, आप इनपर अपने चरण रखें। ये ही सम्पूर्ण जगत् के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी’

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॥ २ · ११२ · २२ ॥
सोऽधिरुह्य नरव्याघ्रः पादुके व्यवमुच्य च। प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने

so'dhiruhya naravyāghraḥ pāduke vyavamucya ca।
prāyacchat sumahātejā bharatāya mahātmane ॥

तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीराम ने उन पादुकाओं पर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरत को सौंप दिया

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॥ २ · ११२ · २३ ॥
पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनमब्रवीत्। चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम्

sa pāduke sampraṇamya rāmaṁ vacanamabravīt।
caturdaśa hi varṣāṇi jaṭācīradharo hyaham ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११२ · २४ ॥
फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन। तवागमनमाकांक्षन् वसन् वै नगराद् बहिः

phalamūlāśano vīra bhaveyaṁ raghunandana।
tavāgamanamākāṁkṣan vasan vai nagarād bahiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११२ · २५ ॥
तव पादुकयोर्न्यस्य राज्यतन्त्रं परंतप। चतुर्दशे हि सम्पूर्णे वर्षेऽहनि रघूत्तम

tava pādukayornyasya rājyatantraṁ paraṁtapa।
caturdaśe hi sampūrṇe varṣe'hani raghūttama ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११२ · २६ ॥
द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्। तथेति प्रतिज्ञाय तं परिष्वज्य सादरम्

na drakṣyāmi yadi tvāṁ tu pravekṣyāmi hutāśanam।
tatheti ca pratijñāya taṁ pariṣvajya sādaram ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११२ · २७ ॥
शत्रुघ्नं परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत्। मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति

śatrughnaṁ ca pariṣvajya vacanaṁ cedamabravīt।
mātaraṁ rakṣa kaikeyīṁ mā roṣaṁ kuru tāṁ prati ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११२ · २८ ॥
मया सीतया चैव शप्तोऽसि रघुनन्दन। इत्युक्त्वाश्रुपरीताक्षो भ्रातरं विससर्ज

mayā ca sītayā caiva śapto'si raghunandana।
ityuktvāśruparītākṣo bhrātaraṁ visasarja ha ॥

॥ २३–२८ ॥

उन पादुकाओं को प्रणाम करके भरत ने श्रीराम से कहा—‘वीर रघुनन्दन! मैं भी चौदह वर्षोंतक जटा और चीर धारण करके फल-मूल का भोजन करता हुआ आपके आगमन की प्रतीक्षा में नगर से बाहर ही रहूँगा। परंतप! इतने दिनोंतक राज्य का सारा भार आपकी इन चरणपादुकाओं पर ही रखकर मैं आपकी बाट जोहता रहूँगा। रघुकुलशिरोमणे! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा।’ श्रीरामचन्द्रजी ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वीकृति दे दी और बड़े आदर के साथ भरत को हृदय से लगाया। तत्पश्चात् शत्रुघ्न को भी छाती से लगाकर यह बात कही—‘रघुनन्दन! मैं तुम्हें अपनी और सीता की शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम माता कैकेयी की रक्षा करना, उनके प्रति कभी क्रोध न करना’—इतना कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू उमड़ आये। उन्होंने व्यथित हृदय से भाई शत्रुघ्न को विदा किया

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॥ २ · ११२ · २९ ॥
पादुके ते भरतः स्वलंकृते महोज्ज्वले सम्परिगृह्य धर्मवित्। प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं चकार चैवोत्तमनागमूर्धनि

sa pāduke te bharataḥ svalaṁkṛte mahojjvale samparigṛhya dharmavit।
pradakṣiṇaṁ caiva cakāra rāghavaṁ cakāra caivottamanāgamūrdhani ॥

धर्मज्ञ भरत ने भलीभाँति अलंकृत की हुई उन परम उज्ज्वल चरणपादुकाओं को लेकर श्रीरामचन्द्रजी की परिक्रमा की तथा उन पादुकाओं को राजा की सवारी में आनेवाले सर्वश्रेष्ठ गजराज के मस्तक पर स्थापित किया

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॥ २ · ११२ · ३० ॥
अथानुपूर्व्या प्रतिपूज्य तं जनं गुरूंश्च मन्त्रीन् प्रकृतीस्तथानुजौ। व्यसर्जयद् राघववंशवर्धनः स्थितः स्वधर्मे हिमवानिवाचलः

athānupūrvyā pratipūjya taṁ janaṁ gurūṁśca mantrīn prakṛtīstathānujau।
vyasarjayad rāghavavaṁśavardhanaḥ sthitaḥ svadharme himavānivācalaḥ ॥

तदनन्तर अपने धर्म में हिमालय की भाँति अविचल भाव से स्थित रहनेवाले रघुवंशवर्धन श्रीराम ने क्रमशः वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु, मन्त्री, प्रजा तथा दोनों भाइयों का यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया

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॥ २ · ११२ · ३१ ॥
तं मातरो बाष्पगृहीतकण्ठ्यो दुःखेन नामन्त्रयितुं हि शेकुः। चैव मातॄरभिवाद्य सर्वा रुदन् कुटीं स्वां प्रविवेश रामः

taṁ mātaro bāṣpagṛhītakaṇṭhyo duḥkhena nāmantrayituṁ hi śekuḥ।
sa caiva mātṝrabhivādya sarvā rudan kuṭīṁ svāṁ praviveśa rāmaḥ ॥

उस समय कौसल्या आदि सभी माताओं का गला आँसुओं से रुँध गया था। वे दुःख के कारण श्रीराम को सम्बोधित भी न कर सकीं। श्रीराम भी सब माताओं को प्रणाम करके रोते हुए अपनी कुटिया में चले गये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११२ ॥