वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११० · ३७ श्लोकाःSarga 110 · 37 ślokas

वसिष्ठजीका सृष्टिपरम्पराके साथ इक्ष्वाकुकुलकी परम्परा बताकर ज्येष्ठके ही राज्याभिषेकका औचित्य सिद्ध करना और श्रीरामसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना

वसिष्ठ-वंश-उपदेश

“वसिष्ठ-वंश-उपदेश”
॥ २ · ११० · १–६ ॥

चित्रकूटपर्णशालाग्रे दर्भास्तीर्णे स्थण्डिले श्वेतश्मश्रुर्जटाधरो यज्ञोपवीती काषायश्वेतवसनो राजपुरोहितो वसिष्ठ उपदेशहस्तमुद्यम्य रामं प्रति नम्रो भूत्वा सृष्ट्यादित इक्ष्वाकुवंशपरम्परां वर्णयन् ज्येष्ठस्य राज्यग्रहणस्य औचित्यं बोधयति; किन्तु श्यामवर्णो रामो जटामण्डलधरश्चीरवल्कलकृष्णाजिनवसनो दर्भासने निश्चलः शान्तश्च पितुर्वचनं धारयन् स्थिरनिषेधे विराजते; समीपे श्वेतशोकवस्त्रो भरतः सोत्कण्ठं प्रतीक्षते, वल्कलधरो लक्ष्मणः शृणोति, सरलवन्यवेषा सीता च श्रद्धया दूरे तूष्णीं तिष्ठति, यत्रोटजशाखाभित्तौ महाकार्मुकतूणीराणि लम्बन्ते।

चित्रकूट की पर्णशाला के आगे दर्भ बिछी भूमि पर श्वेतश्मश्रु जटाधारी, यज्ञोपवीती, कषाय-श्वेत वस्त्रधारी राजपुरोहित वसिष्ठ उपदेश का हाथ उठाये श्रीराम की ओर झुककर सृष्टि से लेकर इक्ष्वाकुवंश की परम्परा सुनाते हुए ज्येष्ठ के राज्यग्रहण का औचित्य समझाते हैं; किन्तु श्यामवर्ण श्रीराम जटामण्डलधारी, चीर-वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये दर्भासन पर अविचल एवं शान्त, पिता के वचन को धारण किये स्थिर अस्वीकार में सुशोभित रहते हैं; समीप ही श्वेत शोकवस्त्र में भरत उत्कण्ठापूर्वक प्रतीक्षा करते हैं, वल्कलधारी लक्ष्मण सुनते हैं, और सरल वनवेश में सीता श्रद्धापूर्ण दूरी पर मौन खड़ी हैं, जहाँ झोपड़ी की टहनी-भित्ति पर विशाल धनुष-तूणीर टँगे हैं।

On the darbha-strewn ground before the leaf-hut on Chitrakut, the white-bearded preceptor Vasishtha — his hair coiled in matted locks, the sacred thread across his chest, robed as an elder purohita — leans toward Ram with a teaching hand raised, recounting the solar dynasty from creation down to the Ikshvakus and urging the eldest-born to accept the throne; but the blue-hued Ram sits composed and unmoved upon the darbha seat, clad in bark and black deer-skin, his serene face steadfast in refusal as he holds fast to his father's word; close by, Bharat in white mourner's cloth waits in anxious hope, the bark-clad Lakshman listens, and the gentle Sita in forest garb stands silently at a reverent distance, while great bows and quivers hang on the woven-branch walls of the hut.

॥ २ · ११० · १ ॥
क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठः प्रत्युवाच ह। जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम्

kruddhamājñāya rāmaṁ tu vasiṣṭhaḥ pratyuvāca ha।
jābālirapi jānīte lokasyāsya gatāgatim ॥

श्रीरामचन्द्रजी को रुष्ट जानकर महर्षि वसिष्ठजी ने उनसे कहा—‘रघुनन्दन! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि इस लोक के प्राणियों का परलोक में जाना और आना होता रहता है (अतः ये नास्तिक नहीं हैं)

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॥ २ · ११० · २ ॥
निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद् वाक्यमब्रवीत्। इमां लोकसमुत्पत्तिं लोकनाथ निबोध मे

nivartayitukāmastu tvāmetad vākyamabravīt।
imāṁ lokasamutpattiṁ lokanātha nibodha me ॥

‘जगदीश्वर! इस समय तुम्हें लौटाने की इच्छा से ही इन्होंने यह नास्तिकतापूर्ण बात कही थी। तुम मुझसे इस लोक की उत्पत्ति का वृत्तान्त सुनो

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॥ २ · ११० · ३ ॥
सर्वं सलिलमेवासीत् पृथिवी तत्र निर्मिता। ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूर्देवतैः सह

sarvaṁ salilamevāsīt pṛthivī tatra nirmitā।
tataḥ samabhavad brahmā svayaṁbhūrdevataiḥ saha ॥

‘सृष्टि के प्रारम्भकाल में सब कुछ जलमय ही था। उस जल के भीतर ही पृथ्वी का निर्माण हुआ। तदनन्तर देवताओं के साथ स्वयंभू ब्रह्मा प्रकट हुए

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॥ २ · ११० · ४ ॥
वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुंधराम्। असृजच्च जगत् सर्वं सह पुत्रैः कृतात्मभिः

sa varāhastato bhūtvā projjahāra vasuṁdharām।
asṛjacca jagat sarvaṁ saha putraiḥ kṛtātmabhiḥ ॥

‘इसके बाद उन भगवान् विष्णुस्वरूप ब्रह्मा ने ही वराहरूप से प्रकट होकर जल के भीतर से इस पृथ्वी को निकाला और अपने कृतात्मा पुत्रों के साथ इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की

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॥ २ · ११० · ५ ॥
आकाशप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः। तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः

ākāśaprabhavo brahmā śāśvato nitya avyayaḥ।
tasmānmarīciḥ saṁjajñe marīceḥ kaśyapaḥ sutaḥ ॥

‘आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मा से ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव हुआ है, जो नित्य, सनातन एवं अविनाशी हैं। उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए

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॥ २ · ११० · ६ ॥
विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्वयम्। तु प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुस्तु मनोः सुतः

vivasvān kaśyapājjajñe manurvaivasvataḥ svayam।
sa tu prajāpatiḥ pūrvamikṣvākustu manoḥ sutaḥ ॥

‘कश्यप से विवस्वान्‌ का जन्म हुआ। विवस्वान्‌ के पुत्र साक्षात् वैवस्वत मनु हुए, जो पहले प्रजापति थे। मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए

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॥ २ · ११० · ७ ॥
यस्येयं प्रथमं दत्ता समृद्धा मनुना मही। तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम्

yasyeyaṁ prathamaṁ dattā samṛddhā manunā mahī।
tamikṣvākumayodhyāyāṁ rājānaṁ viddhi pūrvakam ॥

‘जिन्हें मनु ने सबसे पहले इस पृथ्वी का समृद्धिशाली राज्य सौंपा था, उन राजा इक्ष्वाकु को तुम अयोध्या का प्रथम राजा समझो

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॥ २ · ११० · ८ ॥
इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः। कुक्षेरथात्मजो वीरो विकुक्षिरुदपद्यत

ikṣvākostu sutaḥ śrīmān kukṣirityeva viśrutaḥ।
kukṣerathātmajo vīro vikukṣirudapadyata ॥

‘इक्ष्वाकु के पुत्र श्रीमान् कुक्षि के नाम से विख्यात हुए। कुक्षि के वीर पुत्र विकुक्षि हुए

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॥ २ · ११० · ९ ॥
विकुक्षेस्तु महातेजाः बाणः पुत्रः प्रतापवान्। बाणस्य महाबाहुरनरण्यो महातपाः

vikukṣestu mahātejāḥ bāṇaḥ putraḥ pratāpavān।
bāṇasya ca mahābāhuranaraṇyo mahātapāḥ ॥

‘विकुक्षि के महातेजस्वी प्रतापी पुत्र बाण हुए। बाण के महाबाहु पुत्र अनरण्य हुए, जो बड़े भारी तपस्वी थे

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॥ २ · ११० · १० ॥
नानावृष्टिर्बभूवास्मिन् दुर्भिक्षः सतां वरे। अनरण्ये महाराजे तस्करो वापि कश्चन

nānāvṛṣṭirbabhūvāsmin na durbhikṣaḥ satāṁ vare।
anaraṇye mahārāje taskaro vāpi kaścana ॥

‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज अनरण्य के राज्य में कभी अनावृष्टि नहीं हुई, अकाल नहीं पड़ा और कोई चोर भी नहीं उत्पन्न हुआ

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॥ २ · ११० · ११ ॥
अनरण्यान्महाराज पृथू राजा बभूव ह। तस्मात् पृथोर्महातेजास्त्रिशङ्कुरुदपद्यत

anaraṇyānmahārāja pṛthū rājā babhūva ha।
tasmāt pṛthormahātejāstriśaṅkurudapadyata ॥

‘महाराज! अनरण्य से राजा पृथु हुए। उन पृथु से महातेजस्वी त्रिशंकु की उत्पत्ति हुई

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॥ २ · ११० · १२ ॥
सत्यवचनाद् वीरः सशरीरो दिवं गतः। त्रिशङ्कोरभवत् सूनुर्धुन्धुमारो महायशाः

sa satyavacanād vīraḥ saśarīro divaṁ gataḥ।
triśaṅkorabhavat sūnurdhundhumāro mahāyaśāḥ ॥

‘वे वीर त्रिशंकु विश्वामित्र के सत्य वचन के प्रभाव से सदेह स्वर्गलोक को चले गये थे। त्रिशंकु के महायशस्वी धुन्धुमार हुए

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॥ २ · ११० · १३ ॥
धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो व्यजायत। युवनाश्वसुतः श्रीमान् मान्धाता समपद्यत

dhundhumārānmahātejā yuvanāśvo vyajāyata।
yuvanāśvasutaḥ śrīmān māndhātā samapadyata ॥

‘धुन्धुमार से महातेजस्वी युवनाश्व का जन्म हुआ। युवनाश्व के पुत्र श्रीमान् मान्धाता हुए

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॥ २ · ११० · १४ ॥
मान्धातुस्तु महातेजाः सुसंधिरुदपद्यत। सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधिः प्रसेनजित्

māndhātustu mahātejāḥ susaṁdhirudapadyata।
susaṁdherapi putrau dvau dhruvasaṁdhiḥ prasenajit ॥

‘मान्धाता के महान् तेजस्वी पुत्र सुसंधि हुए। सुसंधि के दो पुत्र हुए—ध्रुवसंधि और प्रसेनजित्

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॥ २ · ११० · १५ ॥
यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो रिपुसूदनः। भरतात् तु महाबाहोरसितो नाम जायत

yaśasvī dhruvasaṁdhestu bharato ripusūdanaḥ।
bharatāt tu mahābāhorasito nāma jāyata ॥

‘ध्रुवसंधि के यशस्वी पुत्र शत्रुसूदन भरत थे। महाबाहु भरत से असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ

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॥ २ · ११० · १६ ॥
यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः। हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः

yasyaite pratirājāna udapadyanta śatravaḥ।
haihayāstālajaṅghāśca śūrāśca śaśabindavaḥ ॥

‘जिसके शत्रुभूत प्रतिपक्षी राजा ये हैहय, तालजंघ और शूर शशबिन्दु उत्पन्न हुए थे

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॥ २ · ११० · १७ ॥
तांस्तु सर्वान् प्रतिव्यूह्य युद्धे राजा प्रवासितः। शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः

tāṁstu sarvān prativyūhya yuddhe rājā pravāsitaḥ।
sa ca śailavare ramye babhūvābhirato muniḥ ॥

‘उन सबका सामना करने के लिये सेना का व्यूह बनाकर युद्ध के लिये डटे रहने पर भी शत्रुओं की संख्या अधिक होने के कारण राजा असित को हारकर परदेश की शरण लेनी पड़ी। वे रमणीय शैल-शिखर पर प्रसन्नतापूर्वक रहकर मुनिभाव से परमात्मा का मनन-चिन्तन करने लगे

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॥ २ · ११० · १८ ॥
द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः। तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्

dve cāsya bhārye garbhiṇyau babhūvaturiti śrutiḥ।
tatra caikā mahābhāgā bhārgavaṁ devavarcasam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११० · १९ ॥
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षिणी पुत्रमुत्तमम्। एका गर्भविनाशाय सपत्न्यै गरलं ददौ

vavande padmapatrākṣī kāṁkṣiṇī putramuttamam।
ekā garbhavināśāya sapatnyai garalaṁ dadau ॥

॥ १८–१९ ॥

‘सुना जाता है कि असित की दो पत्नियाँ गर्भवती थीं। उनमें से एक महाभागा कमललोचना राजपत्नी ने उत्तम पुत्र पाने की अभिलाषा रखकर देवतुल्य तेजस्वी भृगुवंशी च्यवन मुनि के चरणों में वन्दना की और दूसरी रानी ने अपनी सौत के गर्भ का विनाश करने के लिये उसे जहर दे दिया

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॥ २ · ११० · २० ॥
भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः। तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी त्वभ्यवादयत्

bhārgavaścyavano nāma himavantamupāśritaḥ।
tamṛṣiṁ sābhyupāgamya kālindī tvabhyavādayat ॥

‘उन दिनों भृगुवंशी च्यवन मुनि हिमालय पर रहते थे। राजा असित की कालिन्दी नामवाली पत्नी ने ऋषि के चरणों में पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया

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॥ २ · ११० · २१ ॥
तामभ्यवदत् प्रीतो वरेप्सुं पुत्रजन्मनि। पुत्रस्ते भविता देवि महात्मा लोकविश्रुतः धार्मिकश्च सुभीमश्च वंशकर्तारिसूदनः।

sa tāmabhyavadat prīto varepsuṁ putrajanmani।
putraste bhavitā devi mahātmā lokaviśrutaḥ ॥
dhārmikaśca subhīmaśca vaṁśakartārisūdanaḥ।

‘मुनि ने प्रसन्न होकर पुत्र की उत्पत्ति के लिये वरदान चाहनेवाली रानी से इस प्रकार कहा—‘देवि! तुम्हें एक महामनस्वी लोकविख्यात पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, शत्रुओं के लिये अत्यन्त भयंकर, अपने वंश को चलानेवाला और शत्रुओं का संहारक होगा’

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॥ २ · ११० · २२ ॥
श्रुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा मुनिं तमनुमान्य

śrutvā pradakṣiṇaṁ kṛtvā muniṁ tamanumānya ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११० · २३ ॥
पद्मपत्रसमानाक्षं पद्मगर्भसमप्रभम्। ततः सा गृहमागम्य पत्नी पुत्रमजायत

padmapatrasamānākṣaṁ padmagarbhasamaprabham।
tataḥ sā gṛhamāgamya patnī putramajāyata ॥

॥ २२–२३ ॥

‘यह सुनकर रानी ने मुनि की परिक्रमा की और उनसे विदा लेकर वहाँ से अपने घर आने पर उस रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसकी कान्ति कमल के भीतरी भाग के समान सुन्दर थी और नेत्र कमलदल के समान मनोहर थे

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॥ २ · ११० · २४ ॥
सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया। गरेण सह तेनैव तस्मात् सगरोऽभवत्

sapatnyā tu garastasyai datto garbhajighāṁsayā।
gareṇa saha tenaiva tasmāt sa sagaro'bhavat ॥

‘सौत ने उसके गर्भ को नष्ट करने के लिये जो गर (विष) दिया था, उस गर के साथ ही वह बालक प्रकट हुआ; इसलिये सगर नाम से प्रसिद्ध हुआ

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॥ २ · ११० · २५ ॥
राजा सगरो नाम यः समुद्रमखानयत्। इष्ट्वा पर्वणि वेगेन त्रासयान इमाः प्रजाः

sa rājā sagaro nāma yaḥ samudramakhānayat।
iṣṭvā parvaṇi vegena trāsayāna imāḥ prajāḥ ॥

‘राजा सगर वे ही हैं, जिन्होंने पर्व के दिन यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करके खुदाई के वेग से इन समस्त प्रजाओं को भयभीत करते हुए अपने पुत्रोंद्वारा समुद्र को खुदवाया था

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॥ २ · ११० · २६ ॥
असमञ्जस्तु पुत्रोऽभूत् सगरस्येति नः श्रुतम्। जीवन्नेव पित्रा तु निरस्तः पापकर्मकृत्

asamañjastu putro'bhūt sagarasyeti naḥ śrutam।
jīvanneva sa pitrā tu nirastaḥ pāpakarmakṛt ॥

‘हमारे सुनने में आया है कि सगर के पुत्र असमञ्ज हुए, जिन्हें पापकर्म में प्रवृत्त होने के कारण पिता ने जीते-जी ही राज्य से निकाल दिया था

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॥ २ · ११० · २७ ॥
अंशुमानपि पुत्रोऽभूदसमञ्जस्य वीर्यवान्। दिलीपोंऽशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः

aṁśumānapi putro'bhūdasamañjasya vīryavān।
dilīpoṁ'śumataḥ putro dilīpasya bhagīrathaḥ ॥

‘असमञ्ज के पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे। अंशुमान्‌ के दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए

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॥ २ · ११० · २८ ॥
भगीरथात् ककुत्स्थश्च काकुत्स्था येन तु स्मृताः। ककुत्स्थस्य तु पुत्रोऽभूद् रघुर्येन तु राघवाः

bhagīrathāt kakutsthaśca kākutsthā yena tu smṛtāḥ।
kakutsthasya tu putro'bhūd raghuryena tu rāghavāḥ ॥

‘भगीरथ से ककुत्स्थ का जन्म हुआ, जिनसे उनके वंशवाले ‘काकुत्स्थ’ कहलाते हैं। ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, जिनसे उस वंश के लोग ‘राघव’ कहलाये

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॥ २ · ११० · २९ ॥
रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः। कल्माषपादः सौदास इत्येवं प्रथितो भुवि

raghostu putrastejasvī pravṛddhaḥ puruṣādakaḥ।
kalmāṣapādaḥ saudāsa ityevaṁ prathito bhuvi ॥

‘रघु के तेजस्वी पुत्र कल्माषपाद हुए, जो बड़े होने पर शापवश कुछ वर्षों के लिये नरभक्षी राक्षस हो गये थे। वे इस पृथ्वी पर सौदास नाम से विख्यात थे

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॥ २ · ११० · ३० ॥
कल्माषपादपुत्रोऽभूच्छङ्खणस्त्विति नः श्रुतम्। यस्तु तद्वीर्यमासाद्य सहसैन्यो व्यनीनशत्

kalmāṣapādaputro'bhūcchaṅkhaṇastviti naḥ śrutam।
yastu tadvīryamāsādya sahasainyo vyanīnaśat ॥

‘कल्माषपाद के पुत्र शङ्खण हुए, यह हमारे सुनने में आया है, जो युद्ध में सुप्रसिद्ध पराक्रम प्राप्त करके भी सेनासहित नष्ट हो गये थे

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॥ २ · ११० · ३१ ॥
शङ्खणस्य तु पुत्रोऽभूच्छूरः श्रीमान् सुदर्शनः। सुदर्शनस्याग्निवर्ण अग्निवर्णस्य शीघ्रगः

śaṅkhaṇasya tu putro'bhūcchūraḥ śrīmān sudarśanaḥ।
sudarśanasyāgnivarṇa agnivarṇasya śīghragaḥ ॥

‘शङ्खण के शूरवीर पुत्र श्रीमान् सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र अग्निवर्ण और अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग थे

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॥ २ · ११० · ३२ ॥
शीघ्रगस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रशुश्रुवः। प्रशुश्रुवस्य पुत्रोऽभूदम्बरीषो महामतिः

śīghragasya maruḥ putro maroḥ putraḥ praśuśruvaḥ।
praśuśruvasya putro'bhūdambarīṣo mahāmatiḥ ॥

‘शीघ्रग के पुत्र मरु, मरु के पुत्र प्रशुश्रुव तथा प्रशुश्रुव के महाबुद्धिमान् पुत्र अम्बरीष हुए

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॥ २ · ११० · ३३ ॥
अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषः सत्यविक्रमः। नहुषस्य नाभागः पुत्रः परमधार्मिकः

ambarīṣasya putro'bhūnnahuṣaḥ satyavikramaḥ।
nahuṣasya ca nābhāgaḥ putraḥ paramadhārmikaḥ ॥

‘अम्बरीष के पुत्र सत्यपराक्रमी नहुष थे। नहुष के पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे

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॥ २ · ११० · ३४ ॥
अजश्च सुव्रतश्चैव नाभागस्य सुतावुभौ। अजस्य चैव धर्मात्मा राजा दशरथः सुतः

ajaśca suvrataścaiva nābhāgasya sutāvubhau।
ajasya caiva dharmātmā rājā daśarathaḥ sutaḥ ॥

‘नाभाग के दो पुत्र हुए—अज और सुव्रत। अज के धर्मात्मा पुत्र राजा दशरथ थे

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॥ २ · ११० · ३५ ॥
तस्य ज्येष्ठोऽसि दायादो राम इत्यभिविश्रुतः। तद् गृहाण स्वकं राज्यमवेक्षस्व जगन्नृप

tasya jyeṣṭho'si dāyādo rāma ityabhiviśrutaḥ।
tad gṛhāṇa svakaṁ rājyamavekṣasva jagannṛpa ॥

‘दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र तुम हो, जिसकी ‘श्रीराम’ के नाम से प्रसिद्धि है। नरेश्वर! यह अयोध्या का राज्य तुम्हारा है, इसे ग्रहण करो और इसकी देखभाल करते रहो

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॥ २ · ११० · ३६ ॥
इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां राजा भवति पूर्वजः। पूर्वजे नावरः पुत्रो ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते

ikṣvākūṇāṁ hi sarveṣāṁ rājā bhavati pūrvajaḥ।
pūrvaje nāvaraḥ putro jyeṣṭho rājābhiṣicyate ॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के यहाँ ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता आया है। ज्येष्ठ के होते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं होता है। ज्येष्ठ पुत्र का ही राजा के पद पर अभिषेक होता है

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॥ २ · ११० · ३७ ॥
राघवाणां कुलधर्ममात्मनः सनातनं नाद्य विहन्तुमर्हसि। प्रभूतरत्नामनुशाधि मेदिनीं प्रभूतराष्ट्रां पितृवन्महायशः

sa rāghavāṇāṁ kuladharmamātmanaḥ
sanātanaṁ nādya vihantumarhasi।
prabhūtaratnāmanuśādhi medinīṁ
prabhūtarāṣṭrāṁ pitṛvanmahāyaśaḥ ॥

‘महायशस्वी श्रीराम! रघुवंशियों का जो अपना सनातन कुलधर्म है, उसको आज तुम नष्ट न करो। बहुत-से अवान्तर देशोंवाली तथा प्रचुर रत्नराशि से सम्पन्न इस वसुधा का पिता की भाँति पालन करो’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ॥ ११० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११० ॥