श्रीरामके द्वारा जाबालिके नास्तिक मतका खण्डन करके आस्तिक मतका स्थापन
“जाबालि-मत-खण्डन”
॥ २ · १०९ · १–६ ॥
चित्रकूटपर्णशालाग्रे दर्भास्तीर्णे स्थण्डिले जटामण्डलधरश्चीरवल्कलकृष्णाजिनवसनः श्यामवर्णो रामः ऋजुरासीनस्तेजस्वी दृढनिश्चयेन एकं करमुद्यम्य नास्तिकवादं निराकृत्य सत्यं धर्मं च पुनःप्रतिष्ठापयति; तत्पुरतः श्वेतश्मश्रुर्जाबालिः काषायश्वेतवसनो यज्ञोपवीती लज्जितो दृष्टिमवनम्य विरतप्रबोधकरस्तिष्ठति; समीपे श्वेतशोकवस्त्रो भरतः सादरं प्रेक्षते, वल्कलधरो लक्ष्मणः शान्तानुमोदेन शृणोति, सरलवन्यवेषा सीता च श्रद्धया दूरे तूष्णीं तिष्ठति, वनर्षयश्च अनुमोदन्ते, यज्ञाग्नेः सूक्ष्मो धूमश्च वनगिरिवायौ समुत्तिष्ठति।
चित्रकूट की पर्णशाला के आगे दर्भ बिछी भूमि पर जटामण्डलधारी, चीर-वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये श्यामवर्ण श्रीराम सीधे तेजस्वी बैठे, दृढ़ निश्चय से एक हाथ उठाये जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके सत्य और धर्म की पुनः स्थापना करते हैं; उनके सामने श्वेतश्मश्रु जाबालि कषाय-श्वेत वस्त्र में, वक्षपर यज्ञोपवीत लिये, लज्जित हो दृष्टि झुकाये अपनी समझाती हुई हथेली रोके खड़े हैं; समीप ही श्वेत शोकवस्त्र में भरत सादर देखते हैं, वल्कलधारी लक्ष्मण शान्त अनुमोदन से सुनते हैं, और सरल वनवेश में सीता श्रद्धापूर्ण दूरी पर मौन खड़ी हैं; वनवासी ऋषि अनुमोदन करते हैं और यज्ञाग्नि का पतला धूम वन-पर्वत की वायु में उठता है।
On the darbha-strewn ground before the leaf-hut on Chitrakut, the blue-hued Ram — his hair coiled high, clad in bark-cloth and black deer-skin — sits erect and luminous, one hand lifted in firm rebuttal, his grave face radiant with conviction as he overturns the priest Jābāli's materialist doctrine and re-establishes truth and dharma; before him the white-bearded Jābāli, robed in cream and ochre with the sacred thread across his chest, lowers his eyes and stills his persuading hand, his argument broken; close by, Bharat in white mourner's cloth watches intently, the bark-clad Lakshman listens with quiet approval, and the gentle Sita in simple forest garb waits silently at a reverent distance, while forest sages nod in assent and a thin thread of sacred-fire smoke rises into the wooded mountain air.
jābālestu vacaḥ śrutvā rāmaḥ satyaparākramaḥ।
uvāca parayā sūktyā buddhyāvipratipannayā॥
जाबालि का यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी संशयरहित बुद्धि के द्वारा श्रुतिसम्मत सदुक्ति का आश्रय लेकर कहा—
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bhavān me priyakāmārthaṁ vacanaṁ yadihoktavān।
akāryaṁ kāryasaṁkāśamapathyaṁ pathyasaṁnibham॥
‘विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करने की इच्छा से यहाँ जो बात कही है, वह कर्तव्य-सी दिखायी देती है; किंतु वास्तव में करनेयोग्य नहीं है। वह पथ्य-सी दीखने पर भी वास्तव में अपथ्य है।
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nirmaryādastu puruṣaḥ pāpācārasamanvitaḥ।
mānaṁ na labhate satsu bhinnacāritradarśanaḥ॥
‘जो पुरुष धर्म अथवा वेद की मर्यादा को त्याग देता है, वह पापकर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं; इसलिये वह सत्पुरुषों में कभी सम्मान नहीं पाता है।
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kulīnamakulīnaṁ vā vīraṁ puruṣamāninam।
cāritrameva vyākhyāti śuciṁ vā yadi vāśucim॥
‘आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुल में, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपने को पुरुष मानता है तथा कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?
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anāryastvārya saṁsthānaḥ śaucāddhīnastathā śuciḥ।
lakṣaṇyavadalakṣaṇyo duḥśīlaḥ śīlavāniva॥
‘आपने जो आचार बताया है, उसे अपनानेवाला पुरुष श्रेष्ठ-सा दिखायी देने पर भी वास्तव में अनार्य होगा। बाहर से पवित्र दीखने पर भी भीतर से अपवित्र होगा। उत्तम लक्षणों से युक्त-सा प्रतीत होने पर भी वास्तव में उसके विपरीत होगा तथा शीलवान्-सा दीखने पर भी वस्तुतः वह दुःशील ही होगा।
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adharmaṁ dharmaveṣeṇa yadyahaṁ lokasaṁkaram।
abhipatsye śubhaṁ hitvā kriyāṁ vidhivivarjitām॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
kaścetayānaḥ puruṣaḥ kāryākāryavicakṣaṇaḥ।
bahu manyeta māṁ loke durvṛttaṁ lokadūṣaṇam॥
‘आपका उपदेश चोला तो धर्म का पहने हुए है, किंतु वास्तव में अधर्म है। इससे संसार में वर्ण-संकरता का प्रचार होगा। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्मों का अनुष्ठान छोड़ दूँ और विधिहीन कर्मों में लग जाऊँ तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान रखनेवाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? उस दशा में तो मैं इस जगत् में दुराचारी तथा लोक को कलङ्कित करनेवाला समझा जाऊँगा।
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kasya yāsyāmyahaṁ vṛttaṁ kena vā svargamāpnuyām।
anayā vartamāno'haṁ vṛttyā hīnapratijñayā॥
‘जहाँ अपनी की हुई प्रतिज्ञा तोड़ दी जाती है, उस वृत्ति के अनुसार बर्ताव करने पर मैं किस साधन से स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा तथा आपने जिस आचार का उपदेश दिया है, वह किसका है, जिसका मुझे अनुसरण करना होगा; क्योंकि आपके कथनानुसार मैं पिता आदि में से किसीका कुछ भी नहीं हूँ।
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kāmavṛtto'nvayaṁ lokaḥ kṛtsnaḥ samupavartate।
yadvṛttāḥ santi rājānastadvṛttāḥ santi hi prajāḥ॥
‘आपके बताये हुए मार्ग से चलने पर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी हूँगा। फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जायगा; क्योंकि राजाओं के जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है।
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satyamevānṛśaṁsaṁ ca rājavṛttaṁ sanātanam।
tasmāt satyātmakaṁ rājyaṁ satye lokaḥ pratiṣṭhitaḥ॥
‘सत्य का पालन ही राजाओं का दयाप्रधान धर्म है— सनातन आचार है, अतः राज्य सत्यस्वरूप है। सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है।
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ṛṣayaścaiva devāśca satyameva hi menire।
satyavādī hi loke'smin paraṁ gacchati cākṣayam॥
‘ऋषियों और देवताओं ने सदा सत्य का ही आदर किया है। इस लोक में सत्यवादी मनुष्य अक्षय परम धाम में जाता है।
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udvijante yathā sarpānnarādanṛtavādinaḥ।
dharmaḥ satyaparo loke mūlaṁ sarvasya cocyate॥
‘झूठ बोलनेवाले मनुष्य से सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँप से। संसार में सत्य ही धर्म की पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है।
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satyameveśvaro loke satye dharmaḥ sadāśritaḥ।
satyamūlāni sarvāṇi satyānnāsti paraṁ padam॥
‘जगत् में सत्य ही ईश्वर है। सदा सत्य के ही आधार पर धर्म की स्थिति रहती है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है।
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dattamiṣṭaṁ hutaṁ caiva taptāni ca tapāṁsi ca।
vedāḥ satyapratiṣṭhānāstasmāt satyaparo bhavet॥
‘दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद—इन सबका आधार सत्य ही है; इसलिये सबको सत्यपरायण होना चाहिये।
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ekaḥ pālayate lokamekaḥ pālayate kulam।
majjatyeko hi niraya ekaḥ svarge mahīyate॥
‘एक मनुष्य सम्पूर्ण जगत् का पालन करता है, एक समूचे कुल का पालन करता है, एक नरक में डूबता है और एक स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।
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so'haṁ piturnideśaṁ tu kimarthaṁ nānupālaye।
satyapratiśravaḥ satyaṁ satyena samayīkṛtam॥
‘मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्य की शपथ खाकर पिता के सत्य का पालन स्वीकार कर चुका हूँ, ऐसी दशा में मैं पिता के आदेश का किसलिये पालन नहीं करूँ?
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naiva lobhānna mohād vā na cājñānāt tamo'nvitaḥ।
setuṁ satyasya bhetsyāmi guroḥ satyapratiśravaḥ॥
‘पहले सत्यपालन की प्रतिज्ञा करके अब लोभ, मोह अथवा अज्ञान से विवेकशून्य होकर मैं पिता के सत्य की मर्यादा भङ्ग नहीं करूँगा।
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asatyasaṁdhasya sataścalasyāsthiracetasaḥ।
naiva devā na pitaraḥ pratīcchantīti naḥ śrutam॥
‘हमने सुना है कि जो अपनी प्रतिज्ञा झूठी करने के कारण धर्म से भ्रष्ट हो जाता है, उस चञ्चल चित्तवाले पुरुष के दिये हुए हव्य-कव्य को देवता और पितर नहीं स्वीकार करते हैं।
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pratyagātmamimaṁ dharmaṁ satyaṁ paśyāmyahaṁ dhruvam।
bhāraḥ satpuruṣaiścīrṇastadarthamabhinandyate॥
‘मैं इस सत्यरूपी धर्म को समस्त प्राणियों के लिये हितकर और सब धर्मों में श्रेष्ठ समझता हूँ। सत्पुरुषों ने जटा-वल्कल आदि के धारणरूप तापस धर्म का पालन किया है, इसलिये मैं भी उसका अभिनन्दन करता हूँ।
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kṣātraṁ dharmamahaṁ tyakṣye hyadharmaṁ dharmasaṁhitam।
kṣudrairnṛśaṁsairlubdhaiśca sevitaṁ pāpakarmabhiḥ॥
‘जो धर्मयुक्त प्रतीत हो रहा है, किंतु वास्तव में अधर्मरूप है, जिसका नीच, क्रूर, लोभी और पापाचारी पुरुषों ने सेवन किया है, ऐसे क्षात्रधर्म का (पिता की आज्ञा भङ्ग करके राज्य ग्रहण करने का) मैं अवश्य त्याग करूँगा (क्योंकि वह न्याययुक्त नहीं है)।
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kāyena kurute pāpaṁ manasā sampradhārya tat।
anṛtaṁ jihvayā cāha trividhaṁ karma pātakam॥
‘मनुष्य अपने शरीर से जो पाप करता है, उसे पहले मन के द्वारा कर्तव्यरूप से निश्चित करता है। फिर जिह्वा की सहायता से उस अनृत कर्म (पाप) को वाणीद्वारा दूसरों से कहता है, तत्पश्चात् औरों के सहयोग से उसे शरीरद्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह एक ही पातक कायिक, वाचिक और मानसिक भेद से तीन प्रकार का होता है।
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bhūmiḥ kīrtiryaśo lakṣmīḥ puruṣaṁ prārthayanti hi।
satyaṁ samanuvartante satyameva bhajet tataḥ॥
‘पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी—ये सब-की-सब सत्यवादी पुरुष को पाने की इच्छा रखती हैं और शिष्ट पुरुष सत्य का ही अनुसरण करते हैं, अतः मनुष्य को सदा सत्य का ही सेवन करना चाहिये।
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śreṣṭhaṁ hyanāryameva syād yad bhavānavadhārya mām।
āha yuktikarairvākyairidaṁ bhadraṁ kuruṣva ha॥
‘आपने उचित सिद्ध करके तर्कपूर्ण वचनों के द्वारा मुझसे जो यह कहा है कि राज्य ग्रहण करने में ही कल्याण है; अतः इसे अवश्य स्वीकार करो। आपका यह आदेश श्रेष्ठ-सा प्रतीत होने पर भी सज्जन पुरुषोंद्वारा आचरण में लानेयोग्य नहीं है (क्योंकि इसे स्वीकार करने से सत्य और न्याय का उल्लङ्घन होता है)।
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kathaṁ hyahaṁ pratijñāya vanavāsamimaṁ guroḥ।
bharatasya kariṣyāmi vaco hitvā gurorvacaḥ॥
‘मैं पिताजी के सामने इस तरह वन में रहने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अब उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके मैं भरत की बात कैसे मान लूँगा।
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sthirā mayā pratijñātā pratijñā gurusaṁnidhau।
prahṛṣṭamānasā devī kaikeyī cābhavat tadā॥
‘गुरु के समीप की हुई मेरी वह प्रतिज्ञा अटल है— किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती। उस समय जब कि मैंने प्रतिज्ञा की थी, देवी कैकेयी का हृदय हर्ष से खिल उठा था।
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vanavāsaṁ vasanneva śucirniyatabhojanaḥ।
mūlapuṣpaphalaiḥ puṇyaiḥ pitṝn devāṁśca tarpayan॥
‘मैं वन में ही रहकर बाहर-भीतर से पवित्र हो नियमित भोजन करूँगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पोंद्वारा देवताओं और पितरों को तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञा का पालन करूँगा।
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saṁtuṣṭapañcavargo'haṁ lokayātrāṁ pravāhaye।
akuhaḥ śraddadhānaḥ san kāryākāryavicakṣaṇaḥ॥
‘क्या करना चाहिये और क्या नहीं, इसका निश्चय मैं कर चुका हूँ। अतः फल-मूल आदि से पाँचों इन्द्रियों को संतुष्ट करके निश्छल, श्रद्धापूर्वक लोकयात्रा (पिता की आज्ञा के पालनरूप व्यवहार) का निर्वाह करूँगा।
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karmabhūmimimāṁ prāpya kartavyaṁ karma yacchubham।
agnirvāyuśca somaśca karmaṇāṁ phalabhāginaḥ॥
‘इस कर्मभूमि को पाकर जो शुभ कर्म हो, उसका अनुष्ठान करना चाहिये; क्योंकि अग्नि, वायु तथा सोम भी कर्म के ही फल से उन-उन पदों के भागी हुए हैं।
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śataṁ kratūnāmāhṛtya devarāṭ tridivaṁ gataḥ।
tapāṁsyugrāṇi cāsthāya divaṁ prāptā maharṣayaḥ॥
‘देवराज इन्द्र सौ यज्ञों का अनुष्ठान करके स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं। महर्षियों ने भी उग्र तपस्या करके दिव्य लोकों में स्थान प्राप्त किया है’।
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amṛṣyamāṇaḥ punarugratejā niśamya tannāstikavākyahetum।
athābravīt taṁ nṛpatestanūjo vigarhamāṇo vacanāni tasya॥
उग्र तेजस्वी राजकुमार श्रीराम परलोक की सत्ता का खण्डन करनेवाले जाबालि के पूर्वोक्त वचनों को सुनकर उन्हें सहन न कर सकने के कारण उन वचनों की निन्दा करते हुए पुनः उनसे बोले—
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satyaṁ ca dharmaṁ ca parākramaṁ ca bhūtānukampāṁ priyavāditāṁ ca।
dvijātidevātithipūjanaṁ ca panthānamāhustridivasya santaḥ॥
‘सत्य, धर्म, पराक्रम, समस्त प्राणियों पर दया, सबसे प्रिय वचन बोलना तथा देवताओं, अतिथियों और ब्राह्मणों की पूजा करना—इन सबको साधु पुरुषों ने स्वर्गलोक का मार्ग बताया है।
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tenaivamājñāya yathāvadarthamekodayaṁ sampratipadya viprāḥ।
dharmaṁ carantaḥ sakalaṁ yathāvat kāṁkṣanti lokāgamamapramattāḥ॥
‘सत्पुरुषों के इस वचन के अनुसार धर्म का स्वरूप जानकर तथा अनुकूल तर्क से उसका यथार्थ निर्णय करके एक निश्चय पर पहुँचे हुए सावधान ब्राह्मण भलीभाँति धर्माचरण करते हुए उन-उन उत्तम लोकों को प्राप्त करना चाहते हैं।
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nindāmyahaṁ karma kṛtaṁ pitustad yastvāmagṛhṇād viṣamasthabuddhim।
buddhyānayaivaṁvidhayā carantaṁ sunāstikaṁ dharmapathādapetam॥
‘आपकी बुद्धि विषम-मार्ग में स्थित है—आपने वेद-विरुद्ध मार्ग का आश्रय ले रखा है। आप घोर नास्तिक और धर्म के रास्ते से कोसों दूर हैं। ऐसी पाखण्डमयी बुद्धि के द्वारा अनुचित विचार का प्रचार करनेवाले आपको मेरे पिताजी ने जो अपना याजक बना लिया, उनके इस कार्य की मैं निन्दा करता हूँ।
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yathā hi coraḥ sa tathā hi buddhastathāgataṁ nāstikamatra viddhi।
tasmāddhi yaḥ śakyatamaḥ prajānāṁ sa nāstike nābhimukho budhaḥ syāt॥
‘जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार (वेदविरोधी) बुद्ध (बौद्धमतावलम्बी) भी दण्डनीय है। तथागत (नास्तिकविशेष) और नास्तिक (चार्वाक्) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिये। इसलिये प्रजा पर अनुग्रह करने के लिये राजाद्वारा जिस नास्तिक को दण्ड दिलाया जा सके, उसे तो चोर के समान दण्ड दिलाया ही जाय; परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान् ब्राह्मण कभी उन्मुख न हो—उससे वार्तालापतर्क न करे।
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tvatto janāḥ pūrvatare dvijāśca śubhāni karmāṇi bahūni cakruḥ।
chittvā sademaṁ ca paraṁ ca lokaṁ tasmād dvijāḥ svasti kṛtaṁ hutaṁ ca॥
‘आपके सिवा पहले के श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने इहलोक और परलोक की फल-कामना का परित्याग करके वेदोक्त धर्म समझकर सदा ही बहुत-से शुभकर्मों का अनुष्ठान किया है। अतः जो भी ब्राह्मण हैं, वे वेदों को ही प्रमाण मानकर स्वस्ति (अहिंसा और सत्य आदि), कृत (तप, दान और परोपकार आदि) तथा हुत (यज्ञ-याग आदि) कर्मों का सम्पादन करते हैं।
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dharme ratāḥ satpuruṣaiḥ sametāstejasvino dānaguṇapradhānāḥ।
ahiṁsakā vītamalāśca loke bhavanti pūjyā munayaḥ pradhānāḥ॥
‘जो धर्म में तत्पर रहते हैं, सत्पुरुषों का साथ करते हैं, तेज से सम्पन्न हैं, जिनमें दानरूपी गुण की प्रधानता है, जो कभी किसी प्राणी की हिंसा नहीं करते तथा जो मलसंसर्ग से रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ही संसार में पूजनीय होते हैं’।
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iti bruvantaṁ vacanaṁ saroṣaṁ rāmaṁ mahātmānamadīnasattvam।
uvāca pathyaṁ punarāstikaṁ ca satyaṁ vacaḥ sānunayaṁ ca vipraḥ॥
महात्मा श्रीराम स्वभाव से ही दैन्यभाव से रहित थे। उन्होंने जब रोषपूर्वक पूर्वोक्त बात कही, तब ब्राह्मण जाबालि ने विनयपूर्वक यह आस्तिकतापूर्ण सत्य एवं हितकर वचन कहा—
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na nāstikānāṁ vacanaṁ bravīmyahaṁ na nāstiko'haṁ na ca nāsti kiṁcana।
samīkṣya kālaṁ punarāstiko'bhavaṁ bhaveya kāle punareva nāstikaḥ॥
‘रघुनन्दन! न तो मैं नास्तिक हूँ और न नास्तिकों की बात ही करता हूँ। परलोक आदि कुछ भी नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं है। मैं अवसर देखकर फिर आस्तिक हो गया और लौकिक व्यवहार के समय आवश्यकता होने पर पुनः नास्तिक हो सकता हूँ—नास्तिकों की-सी बातें कर सकता हूँ।
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sa cāpi kālo'yamupāgataḥ śanairyathā mayā nāstikavāgudīritā।
nivartanārthaṁ tava rāma kāraṇāt prasādanārthaṁ ca mayaitadīritam॥
‘इस समय ऐसा अवसर आ गया था, जिससे मैंने धीरे-धीरे नास्तिकों की-सी बातें कह डालीं। श्रीराम! मैंने जो यह बात कही, इसमें मेरा उद्देश्य यही था कि किसी तरह आपको राजी करके अयोध्या लौटने के लिये तैयार कर लूँ’।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः ॥ १०९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ नौवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०९ ॥