वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०८ · १८ श्लोकाःSarga 108 · 18 ślokas

जाबालिका नास्तिकोंके मतका अवलम्बन करके श्रीरामको समझाना

जाबालि-प्रबोधन

“जाबालि-प्रबोधन”
॥ २ · १०८ · १–८ ॥

चित्रकूटपर्णशालाग्रे दर्भास्तीर्णे स्थण्डिले श्वेतश्मश्रुर्ब्राह्मणोत्तमो जाबालिः — शिखायुक्तमुण्डशिरा यज्ञोपवीती काषायश्वेतवसनः — प्रसारितप्रत्यायकहस्तः रामं मृतपितृविषये मिथ्याकर्तव्यं त्यक्त्वा राज्यग्रहणाय प्रबोधयति; किन्तु जटामण्डलधरश्चीरवल्कलकृष्णाजिनवसनः श्यामवर्णो रामो दर्भासने निश्चलः शान्तश्च तिष्ठन् मृदुदृढनिषेधे एकं करमुद्यम्य प्रसन्नमुखस्तेजस्वी विराजते; समीपे श्वेतशोकवस्त्रो भरतो व्यथितः प्रेक्षते, वल्कलधरो लक्ष्मणः सरोषं शृणोति, सरलवन्यवेषा सीता च श्रद्धया दूरे तूष्णीं तिष्ठति, यत्रोटजशाखाभित्तौ महाकार्मुकतूणीराणि लम्बन्ते यज्ञाग्नेश्च सूक्ष्मो धूमो वनगिरिवायौ समुत्तिष्ठति।

चित्रकूट की पर्णशाला के आगे दर्भ बिछी भूमि पर श्वेतश्मश्रु ब्राह्मणश्रेष्ठ जाबालि — शिखा-सम्पन्न मुण्डित मस्तक, वक्षपर पड़ा यज्ञोपवीत, कषाय-श्वेत वस्त्र — फैली हुई समझाती हुई हथेली से झुककर श्रीराम को मृत पिता के प्रति मिथ्या कर्तव्य त्यागकर राज्य ग्रहण करने की मनौती करते हैं; किन्तु जटामण्डलधारी, चीर-वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये श्यामवर्ण श्रीराम दर्भासन पर अविचल एवं शान्त बैठे, एक हाथ मृदु किन्तु दृढ़ अस्वीकार में उठाये, प्रसन्नमुख तेजस्वी बने रहते हैं; समीप ही श्वेत शोकवस्त्र में भरत व्यथित होकर देखते हैं, वल्कलधारी लक्ष्मण रोष की झलक लिये सुनते हैं, और सरल वनवेश में सीता श्रद्धापूर्ण दूरी पर मौन खड़ी हैं, जहाँ झोपड़ी की टहनी-भित्ति पर विशाल धनुष-तूणीर टँगे हैं और यज्ञाग्नि का पतला धूम वन-पर्वत की वायु में उठता है।

On the darbha-strewn ground before the leaf-hut on Chitrakut, the white-bearded brahmin-elder Jābāli — a tuft at the crown of his shaven head, the sacred thread across his bare chest, robed in cream and ochre — leans in with an open, persuading hand, urging Ram to cast off vain duty to a dead father and simply take the throne; but the blue-hued Ram, his hair coiled high and his body clad in bark-cloth and black deer-skin, sits unmoved and serene upon the darbha seat, one hand lifted in calm, measured refusal, his face luminous and steadfast; close by, Bharat in undyed white mourner's cloth watches in anxious grief, the bark-clad Lakshman listens with a flash of indignation, and the gentle Sita in simple forest garb waits silently at a reverent distance, while great bows and quivers hang on the woven-branch walls of the hut and a thin thread of sacred-fire smoke rises into the wooded mountain air.

॥ २ · १०८ · १ ॥
आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तमः। उवाच रामं धर्मज्ञं धर्मापेतमिदं वचः

āśvāsayantaṁ bharataṁ jābālirbrāhmaṇottamaḥ।
uvāca rāmaṁ dharmajñaṁ dharmāpetamidaṁ vacaḥ ॥

जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरत को इस प्रकार समझा-बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालि ने उनसे यह धर्मविरुद्ध वचन कहा—

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॥ २ · १०८ · २ ॥
साधु राघव मा भूत् ते बुद्धिरेवं निरर्थिका। प्राकृतस्य नरस्येव ह्यार्यबुद्धेस्तपस्विनः

sādhu rāghava mā bhūt te buddhirevaṁ nirarthikā।
prākṛtasya narasyeva hyāryabuddhestapasvinaḥ ॥

‘रघुनन्दन! आपने ठीक कहा, परंतु आप श्रेष्ठ बुद्धिवाले और तपस्वी हैं; अतः आपको गँवार मनुष्य की तरह ऐसा निरर्थक विचार मन में नहीं लाना चाहिये

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॥ २ · १०८ · ३ ॥
कः कस्य पुरुषो बन्धुः किमाप्यं कस्य केनचित्। एको हि जायते जन्तुरेक एव विनश्यति

kaḥ kasya puruṣo bandhuḥ kimāpyaṁ kasya kenacit।
eko hi jāyate jantureka eva vinaśyati ॥

‘संसार में कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है

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॥ २ · १०८ · ४ ॥
तस्मान्माता पिता चेति राम सज्जेत यो नरः। उन्मत्त इव ज्ञेयो नास्ति कश्चिद्धि कस्यचित्

tasmānmātā pitā ceti rāma sajjeta yo naraḥ।
unmatta iva sa jñeyo nāsti kaściddhi kasyacit ॥

‘अतः श्रीराम! जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसीके प्रति आसक्त होता है, उसे पागल के समान समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ कोई किसीका कुछ भी नहीं है

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॥ २ · १०८ · ५ ॥
यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नरः कञ्चिद् बहिर्वसेत्। उत्सृज्य तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि

yathā grāmāntaraṁ gacchan naraḥ kañcid bahirvaset।
utsṛjya ca tamāvāsaṁ pratiṣṭhetāpare'hani ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०८ · ६ ॥
एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु। आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जनाः

evameva manuṣyāṇāṁ pitā mātā gṛhaṁ vasu।
āvāsamātraṁ kākutstha sajjante nātra sajjanāḥ ॥

॥ ५–६ ॥

‘जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँव को जाते समय बाहर किसी धर्मशाला में एक रात के लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थान को छोड़कर आगे के लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन—ये मनुष्यों के आवासमात्र हैं। ककुत्स्थकुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं

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॥ २ · १०८ · ७ ॥
पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य नार्हसि नरोत्तम। आस्थातुं कापथं दुःखं विषमं बहुकण्टकम्

pitryaṁ rājyaṁ samutsṛjya sa nārhasi narottama।
āsthātuṁ kāpathaṁ duḥkhaṁ viṣamaṁ bahukaṇṭakam ॥

‘अतः नरश्रेष्ठ! आपको पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वन के कुत्सित मार्ग पर नहीं चलना चाहिये

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॥ २ · १०८ · ८ ॥
समृद्धायामयोध्यायामात्मानमभिषेचय। एकवेणीधरा हि त्वा नगरी सम्प्रतीक्षते

samṛddhāyāmayodhyāyāmātmānamabhiṣecaya।
ekaveṇīdharā hi tvā nagarī sampratīkṣate ॥

‘आप समृद्धिशालिनी अयोध्या में राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये। वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारी की भाँति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा करती है

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॥ २ · १०८ · ९ ॥
राजभोगाननुभवन् महार्हान् पार्थिवात्मज। विहर त्वमयोध्यायां यथा शक्रस्त्रिविष्टपे

rājabhogānanubhavan mahārhān pārthivātmaja।
vihara tvamayodhyāyāṁ yathā śakrastriviṣṭape ॥

‘राजकुमार! जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगों का उपभोग करते हुए अयोध्या में विहार कीजिये

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॥ २ · १०८ · १० ॥
ते कश्चिद् दशरथस्त्वं तस्य कश्चन। अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते

na te kaścid daśarathastvaṁ ca tasya ca kaścana।
anyo rājā tvamanyastu tasmāt kuru yaducyate ॥

‘राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं। राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये

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॥ २ · १०८ · ११ ॥
बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च। संयुक्तमृतुमन्मात्रा पुरुषस्येह जन्म तत्

bījamātraṁ pitā jantoḥ śukraṁ śoṇitameva ca।
saṁyuktamṛtumanmātrā puruṣasyeha janma tat ॥

‘पिता जीव के जन्म में निमित्तकारणमात्र होता है। वास्तव में ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ में धारण किये हुए वीर्य और रज का परस्पर संयोग होने पर ही पुरुष का यहाँ जन्म होता है

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॥ २ · १०८ · १२ ॥
गतः नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै। प्रवृत्तिरेषा भूतानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे

gataḥ sa nṛpatistatra gantavyaṁ yatra tena vai।
pravṛttireṣā bhūtānāṁ tvaṁ tu mithyā vihanyase ॥

‘राजा को जहाँ जाना था, वहाँ चले गये। यह प्राणियों के लिये स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ ही मारे जाते (कष्ट उठाते) हैं

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॥ २ · १०८ · १३ ॥
अर्थधर्मपरा ये ये तांस्तान् शोचामि नेतरान्। ते हि दुःखमिह प्राप्य विनाशं प्रेत्य लेभिरे

arthadharmaparā ye ye tāṁstān śocāmi netarān।
te hi duḥkhamiha prāpya vināśaṁ pretya lebhire ॥

‘जो-जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थ का परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं-उन्हींके लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरों के लिये नहीं। वे इस जगत् में धर्म के नाम पर केवल दुःख भोगकर मृत्यु के पश्चात् नष्ट हो गये हैं

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॥ २ · १०८ · १४ ॥
अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं प्रसृतो जनः। अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो हि किमशिष्यति

aṣṭakāpitṛdevatyamityayaṁ prasṛto janaḥ।
annasyopadravaṁ paśya mṛto hi kimaśiṣyati ॥

‘अष्टका आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं—श्राद्ध का दान पितरों को मिलता है। यही सोचकर लोग श्राद्ध में प्रवृत्त होते हैं; किन्तु विचार करके देखिये तो इसमें अन्न का नाश ही होता है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा

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॥ २ · १०८ · १५ ॥
यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति। दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं तत् पथ्यशनं भवेत्

yadi bhuktamihānyena dehamanyasya gacchati।
dadyāt pravasatāṁ śrāddhaṁ na tat pathyaśanaṁ bhavet ॥

‘यदि यहाँ दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाता हो तो परदेश में जानेवालों के लिये श्राद्ध ही कर देना चाहिये; उनको रास्ते के लिये भोजन देना उचित नहीं है

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॥ २ · १०८ · १६ ॥
दानसंवनना होते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः। यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज

dānasaṁvananā hote granthā medhāvibhiḥ kṛtāḥ।
yajasva dehi dīkṣasva tapastapyasva saṁtyaja ॥

‘देवताओं के लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बतानेवाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्यों ने दान की ओर लोगों की प्रवृत्ति कराने के लिये ही बनाये हैं

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॥ २ · १०८ · १७ ॥
नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते। प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठतः कुरु

sa nāsti paramityetat kuru buddhiṁ mahāmate।
pratyakṣaṁ yat tadātiṣṭha parokṣaṁ pṛṣṭhataḥ kuru ॥

‘अतः महामते! आप अपने मन में यह निश्चय कीजिये कि इस लोक के सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है (अतः वहाँ फल भोगने के लिये धर्म आदि के पालन की आवश्यकता नहीं है)। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये, परोक्ष (पारलौकिक लाभ) को पीछे ढकेल दीजिये

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॥ २ · १०८ · १८ ॥
सतां बुद्धिं पुरस्कृत्य सर्वलोकनिदर्शिनीम्। राज्यं त्वं निगृह्णीष्व भरतेन प्रसादितः

satāṁ buddhiṁ puraskṛtya sarvalokanidarśinīm।
rājyaṁ sa tvaṁ nigṛhṇīṣva bharatena prasāditaḥ ॥

‘सत्पुरुषों की बुद्धि, जो सब लोगों के लिये राह दिखानेवाली होने के कारण प्रमाणभूत है, आगे करके भरत के अनुरोध से आप अयोध्या का राज्य ग्रहण कीजिये’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाधिकशततमः सर्गः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०८ ॥