वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०७ · १९ श्लोकाःSarga 107 · 19 ślokas

श्रीरामका भरतको समझाकर उन्हें अयोध्या जानेका आदेश देना

भरतको राज्यादेश

“भरतको राज्यादेश”
॥ २ · १०७ · १५–१८ ॥

चित्रकूटपर्णशालाग्रे दर्भास्तीर्णे स्थण्डिले शाश्वतब्रह्मेव जटामण्डलधरः कृष्णाजिनचीरवल्कलवसनः श्यामवर्णो रामः पवित्रयज्ञधूमसमीपे स्नेहदृढं करमुद्यम्य कनीयांसं भरतं पितुः सत्यरक्षणार्थमयोध्यां प्रतिनिवर्त्य राज्यं ग्रहीतुमादिशति; श्वेतशोकवस्त्रावृतो निराभरणो भरतश्च बद्धाञ्जलिः प्रणतशिराः शोकाज्ञाकारित्वयोर्मध्ये विभक्तवदनोऽनिच्छया तदादेशं प्रतिगृह्णाति, पदमेकं पश्चाच्च तथैव श्वेतवस्त्रो नतमुखः शत्रुघ्नस्तिष्ठति, उटजाभ्यन्तरे च सरलवन्यवेषा सीता वल्कलधरो लक्ष्मणश्च तूष्णीमासीनौ, शाखाभित्तौ महाकार्मुकतूणीराश्च लम्बन्ते।

चित्रकूट की पर्णशाला के आगे, कुश बिछी वेदी पर सनातन ब्रह्मा-से विराजमान श्यामवर्ण श्रीराम — सिर पर ऊँचा जटामण्डल, अंगों पर चीर-वल्कल और कृष्णमृगचर्म, पास ही उठती यज्ञधूम की पवित्र रेखा — एक हाथ स्नेह और दृढ़ता से उठाये अपने छोटे भाई को पिता के सत्य की रक्षा हेतु अयोध्या लौटकर राज्य ग्रहण करने का आदेश देते हैं; और श्वेत शोकवस्त्र में लिपटे, आभूषणहीन भरत हाथ जोड़े, सिर झुकाये उनके सम्मुख विनत होकर शोक और आज्ञाकारिता के बीच बँटे मुख से अनिच्छापूर्वक उस आदेश को स्वीकार करते हैं, एक पग पीछे उसी श्वेत वस्त्र में नतमुख शत्रुघ्न खड़े हैं, और कुटिया के भीतर सरल वनवेश में सीता तथा वल्कलधारी लक्ष्मण मौन बैठे हैं, टहनी-भित्ति पर विशाल धनुष और तूणीर टँगे हुए हैं।

Before the leaf-hut on Chitrakut, on a darbha-strewn altar, the blue-hued Ram sits serene like the eternal Brahma — his hair coiled in a high matted topknot, his body clad in bark-cloth and black deer-skin, a thread of sacred fire-smoke rising at his side — and with one hand raised in a gesture at once firm and loving he bids his younger brother return to Ayodhya and take up the throne, honouring their dead father's word; wrapped in undyed white mourner's cloth and stripped of ornament, Bharat bows low before him with palms joined, his head bent and his face divided between grief and obedience as he yields in reluctant acceptance, while a step behind stands Shatrughna, also in white and downcast, and within the hut the gentle Sita in simple forest garb and the bark-clad Lakshman sit in silence, great bows and quivers hanging on the woven-branch walls.

॥ २ · १०७ · १ ॥
पुनरेवं ब्रुवाणं तं भरतं लक्ष्मणाग्रजः। प्रत्युवाच ततः श्रीमान् ज्ञातिमध्ये सुसत्कृतः

punarevaṁ bruvāṇaṁ taṁ bharataṁ lakṣmaṇāgrajaḥ।
pratyuvāca tataḥ śrīmān jñātimadhye susatkṛtaḥ ॥

जब भरत पुनः इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनों के बीच में सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीमान् रामचन्द्रजी ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ २ · १०७ · २ ॥
उपपन्नमिदं वाक्यं यस्त्वमेवमभाषथाः। जातः पुत्रो दशरथात् कैकेय्यां राजसत्तमात्

upapannamidaṁ vākyaṁ yastvamevamabhāṣathāḥ।
jātaḥ putro daśarathāt kaikeyyāṁ rājasattamāt ॥

‘भाई! तुम नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ के द्वारा केकयराजकन्या माता कैकेयी के गर्भ से उत्पन्न हुए हो; अतः तुमने जो ऐसे उत्तम वचन कहे हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं

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॥ २ · १०७ · ३ ॥
पुरा भ्रातः पिता नः मातरं ते समुद्वहन्। मातामहे समाश्रौषीद् राज्यशुल्कमनुत्तमम्

purā bhrātaḥ pitā naḥ sa mātaraṁ te samudvahan।
mātāmahe samāśrauṣīd rājyaśulkamanuttamam ॥

‘भैया! आज से बहुत पहले की बात है—पिताजी का जब तुम्हारी माताजी के साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नाना से कैकेयी के पुत्र को राज्य देने की उत्तम शर्त कर ली थी

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॥ २ · १०७ · ४ ॥
देवासुरे संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः। सम्प्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः प्रभुः

devāsure ca saṁgrāme jananyai tava pārthivaḥ।
samprahṛṣṭo dadau rājā varamārādhitaḥ prabhuḥ ॥

‘इसके बाद देवासुर-संग्राम में तुम्हारी माता ने प्रभावशाली महाराज की बड़ी सेवा की; इससे संतुष्ट होकर राजा ने उन्हें वरदान दिया

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॥ २ · १०७ · ५ ॥
ततः सा सम्प्रतिश्राव्य तव माता यशस्विनी। अयाचत नरश्रेष्ठं द्वौ वरौ वरवर्णिनी

tataḥ sā sampratiśrāvya tava mātā yaśasvinī।
ayācata naraśreṣṭhaṁ dvau varau varavarṇinī ॥

‘उसीकी पूर्ति के लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माता ने उन नरश्रेष्ठ पिताजी से दो वर माँगे

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॥ २ · १०७ · ६ ॥
तव राज्यं नरव्याघ्र मम प्रव्राजनं तथा। तच्च राजा तथा तस्यै नियुक्तः प्रददौ वरम्

tava rājyaṁ naravyāghra mama pravrājanaṁ tathā।
tacca rājā tathā tasyai niyuktaḥ pradadau varam ॥

‘पुरुषसिंह! एक वर के द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरे के द्वारा मेरा वनवास। इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजा ने वे दोनों वर इन्हें दे दिये

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॥ २ · १०७ · ७ ॥
तेन पित्राहमप्यत्र नियुक्तः पुरुषर्षभ। चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वरदानिकम्

tena pitrāhamapyatra niyuktaḥ puruṣarṣabha।
caturdaśa vane vāsaṁ varṣāṇi varadānikam ॥

‘पुरुषप्रवर! इस प्रकार उन पिताजी ने वरदान के रूप में मुझे चौदह वर्षोंतक वनवास की आज्ञा दी है

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॥ २ · १०७ · ८ ॥
सोऽयं वनमिदं प्राप्तो निर्जनं लक्ष्मणान्वितः। सीतया चाप्रतिद्वन्द्वः सत्यवादे स्थितः पितुः

so'yaṁ vanamidaṁ prāpto nirjanaṁ lakṣmaṇānvitaḥ।
sītayā cāpratidvandvaḥ satyavāde sthitaḥ pituḥ ॥

‘यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मण के साथ इस निर्जन वन में चला आया हूँ। यहाँ मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। मैं यहाँ पिताजी के सत्य की रक्षा में स्थित रहूँगा

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॥ २ · १०७ · ९ ॥
भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादिनम्। कर्तुमर्हसि राजेन्द्र क्षिप्रमेवाभिषिञ्चनात्

bhavānapi tathetyeva pitaraṁ satyavādinam।
kartumarhasi rājendra kṣipramevābhiṣiñcanāt ॥

‘राजेन्द्र! तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्यपद पर अपना अभिषेक करा लो और पिता को सत्यवादी बनाओ—यही तुम्हारे लिये उचित है

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॥ २ · १०७ · १० ॥
ऋणान्मोचय राजानं मत्कृते भरत प्रभुम्। पितरं त्राहि धर्मज्ञ मातरं चाभिनन्दय

ṛṇānmocaya rājānaṁ matkṛte bharata prabhum।
pitaraṁ trāhi dharmajña mātaraṁ cābhinandaya ॥

‘धर्मज्ञ भरत! तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथ को कैकेयी के ऋण से मुक्त करो, उन्हें नरक में गिरने से बचाओ और माता का भी आनन्द बढ़ाओ

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॥ २ · १०७ · ११ ॥
श्रूयते धीमता तात श्रुतिगीता यशस्विना। गयेन यजमानेन गयेष्वेव पितॄन् प्रति

śrūyate dhīmatā tāta śrutigītā yaśasvinā।
gayena yajamānena gayeṣveva pitṝn prati ॥

‘तात! सुना जाता है कि बुद्धिमान्, यशस्वी राजा गय ने गय-देश में ही यज्ञ करते हुए पितरों के प्रति एक कहावत कही थी

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॥ २ · १०७ · १२ ॥
पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः। तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः पितॄन् यः पाति सर्वतः

punnāmno narakād yasmāt pitaraṁ trāyate sutaḥ।
tasmāt putra iti proktaḥ pitṝn yaḥ pāti sarvataḥ ॥

‘(वह इस प्रकार है—) बेटा पुत् नामक नरक से पिता का उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है। वही पुत्र है, जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता है

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॥ २ · १०७ · १३ ॥
एष्टव्या बहवः पुत्रा गुणवन्तो बहुश्रुताः। तेषां वै समवेतानामपि कश्चिद् गयां व्रजेत्

eṣṭavyā bahavaḥ putrā guṇavanto bahuśrutāḥ।
teṣāṁ vai samavetānāmapi kaścid gayāṁ vrajet ॥

‘बहुत-से गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रों की इच्छा करनी चाहिये। सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रों में से कोई एक भी गया की यात्रा करे?

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॥ २ · १०७ · १४ ॥
एवं राजर्षयः सर्वे प्रतीता रघुनन्दन। तस्मात् त्राहि नरश्रेष्ठ पितरं नरकात् प्रभो

evaṁ rājarṣayaḥ sarve pratītā raghunandana।
tasmāt trāhi naraśreṣṭha pitaraṁ narakāt prabho ॥

‘रघुनन्दन! नरश्रेष्ठ भरत! इस प्रकार सभी राजर्षियों ने पितरों के उद्धार का निश्चय किया है, अतः प्रभो! तुम भी अपने पिता का नरक से उद्धार करो

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॥ २ · १०७ · १५ ॥
अयोध्यां गच्छ भरत प्रकृतीरुपरञ्जय। शत्रुघ्नसहितो वीर सह सर्वैर्द्विजातिभिः

ayodhyāṁ gaccha bharata prakṛtīruparañjaya।
śatrughnasahito vīra saha sarvairdvijātibhiḥ ॥

‘वीर भरत! तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणों को साथ लेकर अयोध्या को लौट जाओ और प्रजा को सुख दो

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॥ २ · १०७ · १६ ॥
प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन्। आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन

pravekṣye daṇḍakāraṇyamahamapyavilambayan।
ābhyāṁ tu sahito vīra vaidehyā lakṣmaṇena ca ॥

‘वीर! अब मैं भी लक्ष्मण और सीता के साथ शीघ्र ही दण्डकारण्य में प्रवेश करूँगा

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॥ २ · १०७ · १७ ॥
त्वं राजा भरत भव स्वयं नराणां वन्यानामहमपि राजराण्मृगाणाम्। गच्छ त्वं पुरवरमद्य सम्प्रहृष्टः संहृष्टस्त्वहमपि दण्डकान् प्रवेक्ष्ये

tvaṁ rājā bharata bhava svayaṁ narāṇāṁ
vanyānāmahamapi rājarāṇmṛgāṇām।
gaccha tvaṁ puravaramadya samprahṛṣṭaḥ
saṁhṛṣṭastvahamapi daṇḍakān pravekṣye ॥

‘भरत! तुम स्वयं मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट् बनूँगा। अब तुम अत्यन्त हर्षपूर्वक श्रेष्ठ नगर अयोध्या को जाओ और मैं भी प्रसन्नतापूर्वक दण्डक-वन में प्रवेश करूँगा

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॥ २ · १०७ · १८ ॥
छायां ते दिनकरभाः प्रबाधमानं वर्षत्रं भरत करोतु मूर्ध्नि शीताम्। एतेषामहमपि काननद्रुमाणां छायां तामतिशयिनीं शनैः श्रयिष्ये

chāyāṁ te dinakarabhāḥ prabādhamānaṁ
varṣatraṁ bharata karotu mūrdhni śītām।
eteṣāmahamapi kānanadrumāṇāṁ
chāyāṁ tāmatiśayinīṁ śanaiḥ śrayiṣye ॥

‘भरत! सूर्य की प्रभा को तिरोहित कर देनेवाला छत्र तुम्हारे मस्तक पर शीतल छाया करे। अब मैं भी धीरे-धीरे इन जंगली वृक्षों की घनी छाया का आश्रय लूँगा

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॥ २ · १०७ · १९ ॥
शत्रुघ्नस्त्वतुलमतिस्तु ते सहायः सौमित्रिर्मम विदितः प्रधानमित्रम्। चत्वारस्तनयवरा वयं नरेन्द्रं सत्यस्थं भरत चराम मा विषीद

śatrughnastvatulamatistu te sahāyaḥ
saumitrirmama viditaḥ pradhānamitram।
catvārastanayavarā vayaṁ narendraṁ
satyasthaṁ bharata carāma mā viṣīda ॥

‘भरत! अतुलित बुद्धिवाले शत्रुघ्न तुम्हारी सहायता में रहें और सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र (सहायक) हैं; हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथ के सत्य की रक्षा करें। तुम विषाद मत करो’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः ॥ १०७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०७ ॥