वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०६ · ३५ श्लोकाःSarga 106 · 35 ślokas

भरतकी पुनः श्रीरामसे अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करनेकी प्रार्थना

भरतकी पुनः प्रार्थना

“भरतकी पुनः प्रार्थना”
॥ २ · १०६ · ३१–३५ ॥

मन्दाकिनीतीरे वृक्षच्छाये पर्णशालाग्रे श्वेतशोकवस्त्रधरो निराभरणः शोकपरिप्लुतो भरतः शिरो नमयित्वा कृताञ्जलिः धर्मस्य चरमां याचनां कुर्वन् अग्रजमयोध्यां प्रत्यागत्य राज्याभिषेकं ग्रहीतुं प्रार्थयते; कुशास्तरणे उच्चजटामण्डलधरः चीरवल्कलकृष्णाजिनवसनः श्यामवर्णो रामः शान्तकरुणदृष्ट्या शृण्वन्नपि पितुर्वचने निश्चलः स्थितः; भरतस्य पृष्ठे शोकश्वेतवस्त्रे नतशिराः शत्रुघ्नः, रामपार्श्वे वल्कलधरो लक्ष्मणः, उटजद्वारे च सरलवन्यवेषा सीता समुचिते दूरे स्थिताः, पश्चाच्च त्रयो विधवामातरः श्वेतवस्त्रा रुदन्तश्च ऋत्विजः पौराश्च करुणसमूहरूपेण तस्यामेव याचनायां सम्मिलिताः।

मन्दाकिनी के वृक्षाच्छादित तट पर पर्णशाला के सम्मुख, श्वेत शोकवस्त्र लपेटे, आभूषणहीन एवं शोकजर्जर भरत सिर झुकाये, दोनों हाथ अञ्जलिबद्ध किये, धर्म की अन्तिम विनती करते हुए अपने अग्रज से अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक स्वीकार करने की प्रार्थना कर रहे हैं; कुश की चटाई पर ऊँचा जटामण्डल धारण किये, चीर-वल्कल और कृष्णमृगचर्म पहने श्यामवर्ण श्रीराम शान्त करुण दृष्टि से सुनते हुए भी पिता के वचन में अटल स्थित हैं; भरत के पीछे शोक-श्वेत में शत्रुघ्न नतमस्तक खड़े हैं, राम के पार्श्व में वल्कलधारी लक्ष्मण और कुटी के द्वार पर सादे वनवेश में सीता उचित दूरी पर विराजमान हैं, तथा पीछे तीनों विधवा माताएँ श्वेत वस्त्रों में और रोते हुए ऋत्विज् एवं पुरवासी करुण समूह बनकर उसी याचना में सम्मिलित हैं।

On the wooded bank of the Mandākinī before the leaf-hut, the grief-worn Bharat — wrapped in undyed white mourner's cloth, his ornaments laid aside — stands with head bowed and palms joined in añjali, pouring out one last appeal of dharma as he implores his elder brother to return to Ayodhya and accept consecration as king; on a mat of kuśa-grass the blue-hued Ram, his hair coiled in a high matted topknot and clad in bark-cloth and black deer-skin, listens with calm compassionate eyes yet stands immovable in his dead father's word; a step behind Bharat, Shatrughna in mourning white bows his head, Lakshman in bark waits at Ram's side and Sita sits in simple forest garb at a reverent distance by the hut door, while behind them the three widowed queen-mothers in white and the weeping priests and citizens gather as a sorrowful multitude, joining in the same entreaty.

॥ २ · १०६ · १ ॥
एवमुक्त्वा तु विरते रामे वचनमर्थवत्। ततो मन्दाकिनीतीरे रामं प्रकृतिवत्सलम्॥

evamuktvā tu virate rāme vacanamarthavat।
tato mandākinītīre rāmaṁ prakṛtivatsalam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०६ · २ ॥
उवाच भरतश्चित्रं धार्मिको धार्मिकं वचः। को हि स्यादीदृशो लोके यादृशस्त्वमरिंदम॥

uvāca bharataścitraṁ dhārmiko dhārmikaṁ vacaḥ।
ko hi syādīdṛśo loke yādṛśastvamariṁdama॥

॥ १–२ ॥

ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरत ने मन्दाकिनी के तट पर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीराम से यह विचित्र बात कही—‘शत्रुदमन रघुवीर! इस जगत् में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है?

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॥ २ · १०६ · ३ ॥
त्वां प्रव्यथयेद् दुःखं प्रीतिर्वा प्रहर्षयेत्। सम्मतश्चापि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान्॥

na tvāṁ pravyathayed duḥkhaṁ prītirvā na praharṣayet।
sammataścāpi vṛddhānāṁ tāṁśca pṛcchasi saṁśayān॥

‘कोई भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता। कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती। वृद्ध पुरुषों के सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेह की बातें पूछते हैं

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॥ २ · १०६ · ४ ॥
यथा मृतस्तथा जीवन् यथासति तथा सति। यस्यैष बुद्धिलाभः स्यात् परितप्येत केन सः॥

yathā mṛtastathā jīvan yathāsati tathā sati।
yasyaiṣa buddhilābhaḥ syāt paritapyeta kena saḥ॥

‘जैसे मरे हुए जीव का अपने शरीर आदि से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्ध से रहित है। जैसे वस्तु के अभाव में उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहने पर भी मनुष्य को राग-द्वेष से शून्य होना चाहिये। जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा?

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॥ २ · १०६ · ५ ॥
परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप। एव व्यसनं प्राप्य विषीदितुमर्हति॥

parāvarajño yaśca syād yathā tvaṁ manujādhipa।
sa eva vyasanaṁ prāpya na viṣīditumarhati॥

‘नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्मा का ज्ञान है, वही संकट में पड़ने पर भी विषाद नहीं कर सकता

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॥ २ · १०६ · ६ ॥
अमरोपमसत्त्वस्त्वं महात्मा सत्यसंगरः। सर्वज्ञः सर्वदर्शी बुद्धिमांश्चासि राघव॥

amaropamasattvastvaṁ mahātmā satyasaṁgaraḥ।
sarvajñaḥ sarvadarśī ca buddhimāṁścāsi rāghava॥

‘रघुनन्दन! आप देवताओं की भाँति सत्त्वगुण से सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं

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॥ २ · १०६ · ७ ॥
त्वामेवंगुणैर्युक्तं प्रभवाभवकोविदम्। अविषह्यतमं दुःखमासादयितुमर्हति॥

na tvāmevaṁguṇairyuktaṁ prabhavābhavakovidam।
aviṣahyatamaṁ duḥkhamāsādayitumarhati॥

‘ऐसे उत्तम गुणों से युक्त और जन्म-मरण के रहस्य को जाननेवाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता

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॥ २ · १०६ · ८ ॥
प्रोषिते मयि यत् पापं मात्रा मत्कारणात् कृतम्। क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान् मम॥

proṣite mayi yat pāpaṁ mātrā matkāraṇāt kṛtam।
kṣudrayā tadaniṣṭaṁ me prasīdatu bhavān mama॥

‘जब मैं परदेश में था, उस समय नीच विचार रखनेवाली मेरी माता ने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अतः आप उसे क्षमा करके मुझपर प्रसन्न हों

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॥ २ · १०६ · ९ ॥
धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि तेनेमां नेह मातरम्। हन्मि तीव्रेण दण्डेन दण्डार्हां पापकारिणीम्॥

dharmabandhena baddho'smi tenemāṁ neha mātaram।
hanmi tīvreṇa daṇḍena daṇḍārhāṁ pāpakāriṇīm॥

‘मैं धर्म के बन्धन में बँधा हूँ, इसलिये इस पाप करनेवाली एवं दण्डनीय माता को मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता

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॥ २ · १०६ · १० ॥
कथं दशरथाज्जातः शुभाभिजनकर्मणः। जानन् धर्ममधर्मं कुर्यां कर्म जुगुप्सितम्॥

kathaṁ daśarathājjātaḥ śubhābhijanakarmaṇaḥ।
jānan dharmamadharmaṁ ca kuryāṁ karma jugupsitam॥

‘जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथ से उत्पन्न होकर धर्म और अधर्म को जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ?

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॥ २ · १०६ · ११ ॥
गुरुः क्रियावान् वृद्धश्च राजा प्रेतः पितेति च। तातं परिगर्हेऽहं दैवतं चेति संसदि॥

guruḥ kriyāvān vṛddhaśca rājā pretaḥ piteti ca।
tātaṁ na parigarhe'haṁ daivataṁ ceti saṁsadi॥

‘महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करनेवाले, बड़े-बूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभा में मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ

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॥ २ · १०६ · १२ ॥
को हि धर्मार्थयोर्हीनमीदृशं कर्म किल्बिषम्। स्त्रियः प्रियचिकीर्षुः सन् कुर्याद् धर्मज्ञ धर्मवित्॥

ko hi dharmārthayorhīnamīdṛśaṁ karma kilbiṣam।
striyaḥ priyacikīrṣuḥ san kuryād dharmajña dharmavit॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्म को जानते हुए भी स्त्री का प्रिय करने की इच्छा से ऐसा धर्म और अर्थ से हीन कुत्सित कर्म कर सकता है?

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॥ २ · १०६ · १३ ॥
अन्तकाले हि भूतानि मुह्यन्तीति पुरा श्रुतिः। राज्ञैवं कुर्वता लोके प्रत्यक्षा सा श्रुतिः कृता॥

antakāle hi bhūtāni muhyantīti purā śrutiḥ।
rājñaivaṁ kurvatā loke pratyakṣā sā śrutiḥ kṛtā॥

‘लोक में एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकाल में सब प्राणी मोहित हो जाते हैं—उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथ ने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्ती की सत्यता को प्रत्यक्ष कर दिखाया

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॥ २ · १०६ · १४ ॥
साध्वर्थमभिसंधाय क्रोधान्मोहाच्च साहसात्। तातस्य यदतिक्रान्तं प्रत्याहरतु तद् भवान्॥

sādhvarthamabhisaṁdhāya krodhānmohācca sāhasāt।
tātasya yadatikrāntaṁ pratyāharatu tad bhavān॥

‘पिताजी ने क्रोध, मोह और साहस के कारण ठीक समझ कर जो धर्म का उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें—उसका संशोधन कर दें

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॥ २ · १०६ · १५ ॥
पितुर्हि समतिक्रान्तं पुत्रो यः साधु मन्यते। तदपत्यं मतं लोके विपरीतमतोऽन्यथा॥

piturhi samatikrāntaṁ putro yaḥ sādhu manyate।
tadapatyaṁ mataṁ loke viparītamato'nyathā॥

‘जो पुत्र पिता की की हुई भूल को ठीक कर देता है, वही लोक में उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिता की श्रेष्ठ संतति नहीं है

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॥ २ · १०६ · १६ ॥
तदपत्यं भवानस्तु मा भवान् दुष्कृतं पितुः। अति यत् तत् कृतं कर्म लोके धीरविगर्हितम्॥

tadapatyaṁ bhavānastu mā bhavān duṣkṛtaṁ pituḥ।
ati yat tat kṛtaṁ karma loke dhīravigarhitam॥

‘अतः आप पिता की योग्य संतान ही बने रहें। उनके अनुचित कर्म का समर्थन न करें। उन्होंने इस समय जो कुछ किया है, वह धर्म की सीमा से बाहर है। संसार में धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं

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॥ २ · १०६ · १७ ॥
कैकेयीं मां तातं सुहृदो बान्धवांश्च नः। पौरजानपदान् सर्वांस्त्रातुं सर्वमिदं भवान्॥

kaikeyīṁ māṁ ca tātaṁ ca suhṛdo bāndhavāṁśca naḥ।
paurajānapadān sarvāṁstrātuṁ sarvamidaṁ bhavān॥

‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्र की प्रजा—इन सबकी रक्षा के लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें

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॥ २ · १०६ · १८ ॥
क्व चारण्यं क्व क्षात्रं क्व जटाः क्व पालनम्। ईदृशं व्याहतं कर्म भवान् कर्तुमर्हति॥

kva cāraṇyaṁ kva ca kṣātraṁ kva jaṭāḥ kva ca pālanam।
īdṛśaṁ vyāhataṁ karma na bhavān kartumarhati॥

‘कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटा-धारण और कहाँ प्रजा का पालन? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये

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॥ २ · १०६ · १९ ॥
एष हि प्रथमो धर्मः क्षत्रियस्याभिषेचनम्। येन शक्यं महाप्राज्ञ प्रजानां परिपालनम्॥

eṣa hi prathamo dharmaḥ kṣatriyasyābhiṣecanam।
yena śakyaṁ mahāprājña prajānāṁ paripālanam॥

‘महाप्राज्ञ! क्षत्रिय के लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्य पर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजा का भलीभाँति पालन कर सके

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॥ २ · १०६ · २० ॥
कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थमलक्षणम्। आयतिस्थं चरेद् धर्मं क्षत्रबन्धुरनिश्चितम्॥

kaśca pratyakṣamutsṛjya saṁśayasthamalakṣaṇam।
āyatisthaṁ cared dharmaṁ kṣatrabandhuraniścitam॥

‘भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुख के साधनभूत प्रजापालनरूप धर्म का परित्याग करके संशय में स्थित, सुख के लक्षण से रहित, भविष्य में फल देनेवाले अनिश्चित धर्म का आचरण करेगा?

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॥ २ · १०६ · २१ ॥
अथ क्लेशजमेव त्वं धर्मं चरितुमिच्छसि। धर्मेण चतुरो वर्णान् पालयन् क्लेशमाप्नुहि॥

atha kleśajameva tvaṁ dharmaṁ caritumicchasi।
dharmeṇa caturo varṇān pālayan kleśamāpnuhi॥

‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्म का ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्णों का पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये

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॥ २ · १०६ · २२ ॥
चतुर्णामाश्रमाणां हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठमुत्तमम्। आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथं त्यक्तुमिच्छसि॥

caturṇāmāśramāṇāṁ hi gārhasthyaṁ śreṣṭhamuttamam।
āhurdharmajña dharmajñāstaṁ kathaṁ tyaktumicchasi॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्म के ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमों में गार्हस्थ्य को ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं?

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॥ २ · १०६ · २३ ॥
श्रुतेन बालः स्थानेन जन्मना भवतो ह्यहम्। कथं पालयिष्यामि भूमिं भवति तिष्ठति॥

śrutena bālaḥ sthānena janmanā bhavato hyaham।
sa kathaṁ pālayiṣyāmi bhūmiṁ bhavati tiṣṭhati॥

‘मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियों से आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधा का पालन कैसे करूँगा?

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॥ २ · १०६ · २४ ॥
हीनबुद्धिगुणो बालो हीनस्थानेन चाप्यहम्। भवता विनाभूतो वर्तयितुमुत्सहे॥

hīnabuddhiguṇo bālo hīnasthānena cāpyaham।
bhavatā ca vinābhūto na vartayitumutsahe॥

‘मैं बुद्धि और गुण दोनों से हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्य का पालन तो दूर की बात है

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॥ २ · १०६ · २५ ॥
इदं निखिलमप्यग्र्यं राज्यं पित्र्यमकण्टकम्। अनुशाधि स्वधर्मेण धर्मज्ञ सह बान्धवैः॥

idaṁ nikhilamapyagryaṁ rājyaṁ pitryamakaṇṭakam।
anuśādhi svadharmeṇa dharmajña saha bāndhavaiḥ॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिता का यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु-बान्धवों के साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये

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॥ २ · १०६ · २६ ॥
इहैव त्वाभिषिञ्चन्तु सर्वाः प्रकृतयः सह। ऋत्विजः सवसिष्ठाश्च मन्त्रविन्मन्त्रकोविदाः॥

ihaiva tvābhiṣiñcantu sarvāḥ prakṛtayaḥ saha।
ṛtvijaḥ savasiṣṭhāśca mantravinmantrakovidāḥ॥

‘मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रों के ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें

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॥ २ · १०६ · २७ ॥
अभिषिक्तस्त्वमस्माभिरयोध्यां पालने व्रज। विजित्य तरसा लोकान् मरुद्भिरिव वासवः॥

abhiṣiktastvamasmābhirayodhyāṁ pālane vraja।
vijitya tarasā lokān marudbhiriva vāsavaḥ॥

‘हमलोगों के द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणों से अभिषिक्त हुए इन्द्र की भाँति वेगपूर्वक सब लोकों को जीतकर प्रजा का पालन करने के लिये अयोध्या को चलें

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॥ २ · १०६ · २८ ॥
ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन् दुर्हृदः साधु निर्दहन्। सुहृदस्तर्पयन् कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम्॥

ṛṇāni trīṇyapākurvan durhṛdaḥ sādhu nirdahan।
suhṛdastarpayan kāmaistvamevātrānuśādhi mām॥

‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरों का ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओं का भलीभाँति दमन करें तथा मित्रों को उनके इच्छानुसार वस्तुओंद्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्या में मुझे धर्म की शिक्षा देते रहें

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॥ २ · १०६ · २९ ॥
अद्यार्य मुदिताः सन्तु सुहृदस्तेऽभिषेचने। अद्य भीताः पलायन्तु दुष्प्रदास्ते दिशो दश॥

adyārya muditāḥ santu suhṛdaste'bhiṣecane।
adya bhītāḥ palāyantu duṣpradāste diśo daśa॥

‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होने पर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देनेवाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग जायँ

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॥ २ · १०६ · ३० ॥
आक्रोशं मम मातुश्च प्रमृज्य पुरुषर्षभ। अद्य तत्रभवन्तं पितरं रक्ष किल्बिषात्॥

ākrośaṁ mama mātuśca pramṛjya puruṣarṣabha।
adya tatrabhavantaṁ ca pitaraṁ rakṣa kilbiṣāt॥

‘पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माता के कलङ्क को धो-पोंछकर पूज्य पिताजी को भी निन्दा से बचाइये

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॥ २ · १०६ · ३१ ॥
शिरसा त्वाभियाचेऽहं कुरुष्व करुणां मयि। बान्धवेषु सर्वेषु भूतेष्विव महेश्वरः॥

śirasā tvābhiyāce'haṁ kuruṣva karuṇāṁ mayi।
bāndhaveṣu ca sarveṣu bhūteṣviva maheśvaraḥ॥

‘मैं आपके चरणों में माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवों पर कृपा कीजिये

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॥ २ · १०६ · ३२ ॥
अथवा पृष्ठतः कृत्वा वनमेव भवानितः। गमिष्यति गमिष्यामि भवता सार्धमप्यहम्॥

athavā pṛṣṭhataḥ kṛtvā vanameva bhavānitaḥ।
gamiṣyati gamiṣyāmi bhavatā sārdhamapyaham॥

‘अथवा यदि आप मेरी प्रार्थना को ठुकराकर यहाँ से वन को ही जायेंगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा’

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॥ २ · १०६ · ३३ ॥
तथाभिरामो भरतेन ताम्यता प्रसाद्यमानः शिरसा महीपतिः। चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान् मतिं पितुस्तद् वचने प्रतिष्ठितः॥

tathābhirāmo bharatena tāmyatā prasādyamānaḥ śirasā mahīpatiḥ।
na caiva cakre gamanāya sattvavān matiṁ pitustad vacane pratiṣṭhitaḥ॥

ग्लानि में पड़े हुए भरत ने मनोभिराम राजा श्रीराम को उनके चरणों में माथा टेककर प्रसन्न करने की चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजी ने पिता की आज्ञा में ही दृढतापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जाने का विचार नहीं किया

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॥ २ · १०६ · ३४ ॥
तदद्भुतं स्थैर्यमवेक्ष्य राघवे समं जनो हर्षमवाप दुःखितः। यात्ययोध्यामिति दुःखितोऽभवत् स्थिरप्रतिज्ञत्वमवेक्ष्य हर्षितः॥

tadadbhutaṁ sthairyamavekṣya rāghave samaṁ jano harṣamavāpa duḥkhitaḥ।
na yātyayodhyāmiti duḥkhito'bhavat sthirapratijñatvamavekṣya harṣitaḥ॥

श्रीरामचन्द्रजी की वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सब लोग एक ही साथ दुःखी भी हुए और हर्ष को भी प्राप्त हुए। ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं—यह सोचकर वे दुःखी हुए और प्रतिज्ञा-पालन में उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ

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॥ २ · १०६ · ३५ ॥
तमृत्विजो नैगमयूथवल्लभास्तथा विसंज्ञाश्रुकलाश्च मातरः। तथा ब्रुवाणं भरतं प्रतुष्टुवुः प्रणम्य रामं ययाचिरे सह॥

tamṛtvijo naigamayūthavallabhāstathā visaṁjñāśrukalāśca mātaraḥ।
tathā bruvāṇaṁ bharataṁ pratuṣṭuvuḥ praṇamya rāmaṁ ca yayācire saha॥

उस समय ऋत्विज्, पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदाय के नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँसू बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहनेवाली भरत की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजी के सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलने की याचना की

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः॥ १०६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ छवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०६॥