वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०५ · ४६ श्लोकाःSarga 105 · 46 ślokas

भरतका श्रीरामको अयोध्यामें चलकर राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना, श्रीरामका जीवनकी अनित्यता बताते हुए पिताकी मृत्युके लिये शोक न करनेका भरतको उपदेश देना और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही राज्य ग्रहण न करके वनमें रहनेका ही दृढ़ निश्चय बताना

अनित्यता-उपदेश

“अनित्यता-उपदेश”
॥ २ · १०५ · १४–१९ ॥

चित्रकूटपर्णशालाग्रे दीप्तपावकसमीपे जटामण्डलधरः कृष्णाजिनचीरवल्कलवसनः श्यामवर्णो रामः शान्तकरुणवदन उद्धृतहस्तेन धर्मं देशयन् राज्यं प्रत्याख्याय शोकार्तं भ्रातरं सान्त्वयति; तदग्रे श्वेतशोकवस्त्रधरो निराभरणः प्राञ्जलिर्नतशिराः साश्रुर्भरतो जानुभ्यां स्थितः शृणोति, पार्श्वे च वल्कलधरो लक्ष्मणः सरलवन्यवेषा सीता च तूष्णीमासीनौ, पृष्ठे च श्वेतवस्त्रः शत्रुघ्नस्तिष्ठति; उटजसमीपे शाखायां पक्वफलानि लम्बन्ते, एकं च भूमौ पतितम्, दूरे च मन्दाकिनी अनिवर्तमाना स्रवति—अनित्यता प्रत्यक्षीकृता।

चित्रकूट की पर्णशाला के आगे प्रज्वलित यज्ञाग्नि की दिव्य आभा में — सिर पर ऊँचा जटामण्डल, अंगों पर चीर-वल्कल और कृष्णमृगचर्म धारण किये श्यामवर्ण श्रीराम शान्त एवं करुणामय मुख से एक हाथ कोमल उपदेश-मुद्रा में उठाये, राज्य को अस्वीकार करते हुए शोकसन्तप्त भ्राता को अनित्यता का बोध कराकर सान्त्वना दे रहे हैं; उनके सम्मुख श्वेत शोकवस्त्र लपेटे, आभूषणहीन, हाथ जोड़े और सिर झुकाये अश्रुपूर्ण भरत घुटनों के बल बैठे सुन रहे हैं, पास ही वल्कलधारी लक्ष्मण और सरल वनवेश में सीता मौन विराजमान हैं, तथा एक पग पीछे श्वेतवस्त्रधारी शत्रुघ्न खड़े हैं; झोपड़ी के निकट डाली पर पके फल लटक रहे हैं और एक भूमि पर गिर चुका है, दूर मन्दाकिनी बहती हुई लौटती नहीं—मानो अनित्यता साकार हो उठी हो।

Before the leaf-hut on Chitrakut, in the divine glow of the blazing sacred fire, the blue-hued Ram — his hair coiled in a high matted topknot, clad in bark-cloth and black deer-skin — sits serene and compassionate, one hand lifted in a gentle teaching gesture as he quietly declines the throne and consoles his grief-worn brother with the truth of impermanence; before him the tearful Bharat kneels in undyed white mourner's cloth, ornaments cast off, hands folded and head bowed in listening, while beside the fire the bark-clad Lakshman and the gentle Sita in simple forest garb sit in silence, and a step behind stands Shatrughna in white; on a branch near the hut hang ripe fruits with one already fallen to the earth, and beyond, the Mandakini flows away and does not return — impermanence made visible.

॥ २ · १०५ · १ ॥
ततः पुरुषसिंहानां वृतानां तैः सुहृद्गणैः। शोचतामेव रजनी दुःखेन व्यत्यवर्तत

tataḥ puruṣasiṁhānāṁ vṛtānāṁ taiḥ suhṛdgaṇaiḥ।
śocatāmeva rajanī duḥkhena vyatyavartata ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०५ · २ ॥
रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृद्वृताः। मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्

rajanyāṁ suprabhātāyāṁ bhrātaraste suhṛdvṛtāḥ।
mandākinyāṁ hutaṁ japyaṁ kṛtvā rāmamupāgaman ॥

॥ १–२ ॥

अपने सुहृदों से घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयों की वह रात्रि पिता की मृत्यु के दुःख से शोक करते हुए ही व्यतीत हुई। सबेरा होने पर भरत आदि तीनों भाई सुहृदों के साथ ही मन्दाकिनी के तट पर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुनः श्रीराम के पास लौट आये

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॥ २ · १०५ · ३ ॥
तूष्णीं ते समुपासीना कश्चित् किंचिदब्रवीत्। भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत्

tūṣṇīṁ te samupāsīnā na kaścit kiṁcidabravīt।
bharatastu suhṛnmadhye rāmaṁ vacanamabravīt ॥

वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदों के बीच में बैठे हुए भरत ने श्रीराम से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · १०५ · ४ ॥
सान्त्विता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम। तद् ददामि तवैवाहं भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्

sāntvitā māmikā mātā dattaṁ rājyamidaṁ mama।
tad dadāmi tavaivāhaṁ bhuṅkṣva rājyamakaṇṭakam ॥

‘भैया! पिताजी ने वरदान देकर मेरी माता को संतुष्ट कर दिया और माता ने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओर से यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवा में समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये

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॥ २ · १०५ · ५ ॥
महतेवाम्बुवेगेन भिन्नः सेतुर्जलागमे। दुरावरं त्वदन्येन राज्यखण्डमिदं महत्

mahatevāmbuvegena bhinnaḥ seturjalāgame।
durāvaraṁ tvadanyena rājyakhaṇḍamidaṁ mahat ॥

‘वर्षाकाल में जल के महान् वेग से टूटे हुए सेतु की भाँति इस विशाल राज्यखण्ड को सँभालना आपके सिवा दूसरे के लिये अत्यन्त कठिन है

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॥ २ · १०५ · ६ ॥
गतिं खर इवाश्वस्य तार्क्ष्यस्येव पतत्त्रिणः। अनुगन्तुं शक्तिर्मे गतिं तव महीपते

gatiṁ khara ivāśvasya tārkṣyasyeva patattriṇaḥ।
anugantuṁ na śaktirme gatiṁ tava mahīpate ॥

‘पृथ्वीनाथ! जैसे गदहा घोड़े की और अन्य साधारण पक्षी गरुड की चाल नहीं चल सकते, उसी प्रकार मुझमें आपकी गति का—आपकी पालन-पद्धति का अनुसरण करने की शक्ति नहीं है

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॥ २ · १०५ · ७ ॥
सुजीवं नित्यशस्तस्य यः परैरुपजीव्यते। राम तेन तु दुर्जीवं यः परानुपजीवति

sujīvaṁ nityaśastasya yaḥ parairupajīvyate।
rāma tena tu durjīvaṁ yaḥ parānupajīvati ॥

‘श्रीराम! जिसके पास आकर दूसरे लोग जीवन-निर्वाह करते हैं, उसीका जीवन उत्तम है और जो दूसरों का आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है, उसका जीवन दुःखमय है (अतः आपके लिये राज्य करना ही उचित है)

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॥ २ · १०५ · ८ ॥
यथा तु रोपितो वृक्षः पुरुषेण विवर्धितः। ह्रस्वकेन दुरारोहो रूढस्कन्धो महाद्रुमः

yathā tu ropito vṛkṣaḥ puruṣeṇa vivardhitaḥ।
hrasvakena durāroho rūḍhaskandho mahādrumaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०५ · ९ ॥
यदा पुष्पितो भूत्वा फलानि विदर्शयेत्। तां नानुभवेत् प्रीतिं यस्य हेतोः प्ररोपितः

sa yadā puṣpito bhūtvā phalāni na vidarśayet।
sa tāṁ nānubhavet prītiṁ yasya hetoḥ praropitaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०५ · १० ॥
एषोपमा महाबाहो तदर्थं वेत्तुमर्हसि। यत्र त्वमस्मान् वृषभो भर्ता भृत्यान् शाधि हि

eṣopamā mahābāho tadarthaṁ vettumarhasi।
yatra tvamasmān vṛṣabho bhartā bhṛtyān na śādhi hi ॥

॥ ८–१० ॥

‘जैसे फल की इच्छा रखनेवाले किसी पुरुष ने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कद के पुरुष के लिये उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्ष में जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्ष को लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका। ऐसी स्थिति में उसे लगानेवाला पुरुष उस प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, जो फल की प्राप्ति होने से सम्भावित थी। महाबाहो! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजी ने आप-जैसे सर्वसद्गुणसम्पन्न पुत्र को लोकरक्षा के लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालन का भार अपने हाथ में नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालन के अवसर पर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषण में समर्थ होकर भी यदि हम भृत्यों का शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी

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॥ २ · १०५ · ११ ॥
श्रेणयस्त्वां महाराज पश्यन्त्वग्र्याश्च सर्वशः। प्रतपन्तमिवादित्यं राज्यस्थितमरिंदमम्

śreṇayastvāṁ mahārāja paśyantvagryāśca sarvaśaḥ।
pratapantamivādityaṁ rājyasthitamariṁdamam ॥

‘महाराज! विभिन्न जातियों के सङ्घ और प्रधान-प्रधान पुरुष आप शत्रुदमन नरेश को सब ओर तपते हुए सूर्य की भाँति राज्यसिंहासन पर विराजमान देखें

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॥ २ · १०५ · १२ ॥
तथानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जराः। अन्तःपुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिताः

tathānuyāne kākutstha mattā nardantu kuñjarāḥ।
antaḥpuragatā nāryo nandantu susamāhitāḥ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! इस प्रकार आपके अयोध्या को लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्तःपुर की स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नतापूर्वक आपका अभिनन्दन करें’

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॥ २ · १०५ · १३ ॥
तस्य साध्वनुमन्यन्त नागरा विविधा जनाः। भरतस्य वचः श्रुत्वा रामं प्रत्यनुयाचतः

tasya sādhvanumanyanta nāgarā vividhā janāḥ।
bharatasya vacaḥ śrutvā rāmaṁ pratyanuyācataḥ ॥

इस प्रकार श्रीराम से राज्य-ग्रहण के लिये प्रार्थना करते हुए भरतजी की बात सुनकर नगर के भिन्न-भिन्न मनुष्यों ने उसका भलीभाँति अनुमोदन किया

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॥ २ · १०५ · १४ ॥
तमेवं दुःखितं प्रेक्ष्य विलपन्तं यशस्विनम्। रामः कृतात्मा भरतं समाश्वासयदात्मवान्

tamevaṁ duḥkhitaṁ prekṣya vilapantaṁ yaśasvinam।
rāmaḥ kṛtātmā bharataṁ samāśvāsayadātmavān ॥

तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीराम ने यशस्वी भरत को इस तरह दुःखी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—

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॥ २ · १०५ · १५ ॥
नात्मनः कामकारो हि पुरुषोऽयमनीश्वरः। इतश्चेतरतश्चैनं कृतान्तः परिकर्षति

nātmanaḥ kāmakāro hi puruṣo'yamanīśvaraḥ।
itaścetarataścainaṁ kṛtāntaḥ parikarṣati ॥

‘भाई! यह जीव ईश्वर के समान स्वतन्त्र नहीं है, अतः कोई यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं कर सकता। काल इस पुरुष को इधर-उधर खींचता रहता है

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॥ २ · १०५ · १६ ॥
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं जीवितम्

sarve kṣayāntā nicayāḥ patanāntāḥ samucchrayāḥ।
saṁyogā viprayogāntā maraṇāntaṁ ca jīvitam ॥

‘समस्त संग्रहों का अन्त विनाश है। लौकिक उन्नतियों का अन्त पतन है। संयोग का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है

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॥ २ · १०५ · १७ ॥
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्। एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम्

yathā phalānāṁ pakvānāṁ nānyatra patanād bhayam।
evaṁ narasya jātasya nānyatra maraṇād bhayam ॥

‘जैसे पके हुए फलों को पतन के सिवा और किसीसे भय नहीं है, उसी प्रकार उत्पन्न हुए मनुष्यों को मृत्यु के सिवा और किसीसे भय नहीं है

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॥ २ · १०५ · १८ ॥
यथाऽऽगारं दृढस्थूणं जीर्णं भूत्वोपसीदति। तथावसीदन्ति नरा जरामृत्युवशंगताः

yathā''gāraṁ dṛḍhasthūṇaṁ jīrṇaṁ bhūtvopasīdati।
tathāvasīdanti narā jarāmṛtyuvaśaṁgatāḥ ॥

‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होने पर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्यु के वश में पड़कर नष्ट हो जाते हैं

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॥ २ · १०५ · १९ ॥
अत्येति रजनी या तु सा प्रतिनिवर्तते। यात्येव यमुना पूर्णं समुद्रमुदकार्णवम्

atyeti rajanī yā tu sā na pratinivartate।
yātyeva yamunā pūrṇaṁ samudramudakārṇavam ॥

‘जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है। जैसे यमुना जल से भरे हुए समुद्र की ओर जाती ही है, उधर से लौटती नहीं

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॥ २ · १०५ · २० ॥
अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषां प्राणिनामिह। आयूंषि क्षपयन्त्याशु ग्रीष्मे जलमिवांशवः

ahorātrāṇi gacchanti sarveṣāṁ prāṇināmiha।
āyūṁṣi kṣapayantyāśu grīṣme jalamivāṁśavaḥ ॥

‘दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसार में सभी प्राणियों की आयु का तीव्र गति से नाश कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्म-ऋतु में जल को शीघ्रतापूर्वक सोखती रहती हैं

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॥ २ · १०५ · २१ ॥
आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि। आयुस्तु हीयते यस्य स्थितस्यास्य गतस्य

ātmānamanuśoca tvaṁ kimanyamanuśocasi।
āyustu hīyate yasya sthitasyāsya gatasya ca ॥

‘तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरे के लिये क्यों बार-बार शोक करते हो। कोई इस लोक में स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है

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॥ २ · १०५ · २२ ॥
सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति। गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते

sahaiva mṛtyurvrajati saha mṛtyurniṣīdati।
gatvā sudīrghamadhvānaṁ saha mṛtyurnivartate ॥

‘मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है और बहुत बड़े मार्ग की यात्रा में भी साथ ही जाकर वह मनुष्य के साथ ही लौटती है

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॥ २ · १०५ · २३ ॥
गात्रेषु वलयः प्राप्ताः श्वेताश्चैव शिरोरुहाः। जरया पुरुषो जीर्णः किं हि कृत्वा प्रभावयेत्

gātreṣu valayaḥ prāptāḥ śvetāścaiva śiroruhāḥ।
jarayā puruṣo jīrṇaḥ kiṁ hi kṛtvā prabhāvayet ॥

‘शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिर के बाल सफेद हो गये। फिर जरावस्था से जीर्ण हुआ मनुष्य कौन-सा उपाय करके मृत्यु से बचने के लिये अपना प्रभाव प्रकट कर सकता है?

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॥ २ · १०५ · २४ ॥
नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमितेऽहनि। आत्मनो नावबुध्यन्ते मनुष्या जीवितक्षयम्

nandantyudita āditye nandantyastamite'hani।
ātmano nāvabudhyante manuṣyā jīvitakṣayam ॥

‘लोग सूर्योदय होने पर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होने पर भी खुश होते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवन का नाश हो रहा है

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॥ २ · १०५ · २५ ॥
हृष्यन्त्यृतुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिवागतम्। ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसंक्षयः

hṛṣyantyṛtumukhaṁ dṛṣṭvā navaṁ navamivāgatam।
ṛtūnāṁ parivartena prāṇināṁ prāṇasaṁkṣayaḥ ॥

‘किसी ऋतु का प्रारम्भ देखकर मानो वह नयी-नयी आयी हो (पहले कभी आयी ही न हो), ऐसा समझकर लोग हर्ष से खिल उठते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि इन ऋतुओं के परिवर्तन से प्राणियों के प्राणों का (आयु का) क्रमशः क्षय हो रहा है

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॥ २ · १०५ · २६ ॥
यथा काष्ठं काष्ठं समेयातां महार्णवे। समेत्य तु व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन

yathā kāṣṭhaṁ ca kāṣṭhaṁ ca sameyātāṁ mahārṇave।
sametya tu vyapeyātāṁ kālamāsādya kaṁcana ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०५ · २७ ॥
एवं भार्याश्च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च। समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः

evaṁ bhāryāśca putrāśca jñātayaśca vasūni ca।
sametya vyavadhāvanti dhruvo hyeṣāṁ vinābhavaḥ ॥

॥ २६–२७ ॥

‘जैसे महासागर में बहते हुए दो काठ कभी एक-दूसरे से मिल जाते हैं और कुछ काल के बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है

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॥ २ · १०५ · २८ ॥
नात्र कश्चिद् यथाभावं प्राणी समतिवर्तते। तेन तस्मिन् सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचतः

nātra kaścid yathābhāvaṁ prāṇī samativartate।
tena tasmin na sāmarthyaṁ pretasyāstyanuśocataḥ ॥

‘इस संसार में कोई भी प्राणी यथासमय प्राप्त होनेवाले जन्म-मरण का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्ति के लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्यु को टाल सके

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॥ २ · १०५ · २९ ॥
यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थितः। अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति

yathā hi sārthaṁ gacchantaṁ brūyāt kaścit pathi sthitaḥ।
ahamapyāgamiṣyāmi pṛṣṭhato bhavatāmiti ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०५ · ३० ॥
एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पितृपैतामहैर्ध्रुवः। तमापन्नः कथं शोचेद् यस्य नास्ति व्यतिक्रमः

evaṁ pūrvairgato mārgaḥ pitṛpaitāmahairdhruvaḥ।
tamāpannaḥ kathaṁ śoced yasya nāsti vyatikramaḥ ॥

॥ २९–३० ॥

‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियों के समुदाय से रास्ते में खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगों के पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्ग से गये हैं, जिसपर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है, उसी मार्ग पर स्थित हुआ मनुष्य किसी और के लिये शोक कैसे करे?

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॥ २ · १०५ · ३१ ॥
वयसः पतमानस्य स्त्रोतसो वानिवर्तिनः। आत्मा सुखे नियोक्तव्यः सुखभाजः प्रजाः स्मृताः

vayasaḥ patamānasya strotaso vānivartinaḥ।
ātmā sukhe niyoktavyaḥ sukhabhājaḥ prajāḥ smṛtāḥ ॥

‘जैसे नदियों का प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन-दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है। उसका क्रमशः नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्मा को कल्याण के साधनभूत धर्म में लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं

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॥ २ · १०५ · ३२ ॥
धर्मात्मा सुशुभैः कृत्स्नैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः। धूतपापो गतः स्वर्गं पिता नः पृथिवीपतिः

dharmātmā suśubhaiḥ kṛtsnaiḥ kratubhiścāptadakṣiṇaiḥ।
dhūtapāpo gataḥ svargaṁ pitā naḥ pṛthivīpatiḥ ॥

‘तात! हमारे पिता धर्मात्मा थे। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणाएँ देकर प्रायः सभी परम शुभकारक यज्ञों का अनुष्ठान किया था। उनके सारे पाप धुल गये थे। अतः वे महाराज स्वर्गलोक में गये हैं

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॥ २ · १०५ · ३३ ॥
भृत्यानां भरणात् सम्यक् प्रजानां परिपालनात्। अर्थादानाच्च धर्मेण पिता नस्त्रिदिवं गतः

bhṛtyānāṁ bharaṇāt samyak prajānāṁ paripālanāt।
arthādānācca dharmeṇa pitā nastridivaṁ gataḥ ॥

‘वे भरण-पोषण के योग्य परिजनों का भरण करते थे। प्रजाजनों का भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनों से धर्म के अनुसार कर आदि के रूप में धन लेते थे—इन सब कारणों से हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोक में पधारे हैं

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॥ २ · १०५ · ३४ ॥
कर्मभिस्तु शुभैरिष्टैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः। स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः

karmabhistu śubhairiṣṭaiḥ kratubhiścāptadakṣiṇaiḥ।
svargaṁ daśarathaḥ prāptaḥ pitā naḥ pṛthivīpatiḥ ॥

‘सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणवाले यज्ञों के अनुष्ठानों से हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोक में गये हैं

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॥ २ · १०५ · ३५ ॥
इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्भोगांश्चावाप्य पुष्कलान्। उत्तमं चायुरासाद्य स्वर्गतः पृथिवीपतिः

iṣṭvā bahuvidhairyajñairbhogāṁścāvāpya puṣkalān।
uttamaṁ cāyurāsādya svargataḥ pṛthivīpatiḥ ॥

‘उन्होंने नाना प्रकार के यज्ञोंद्वारा यज्ञपुरुष की आराधना की, प्रचुर भोग प्राप्त किये और उत्तम आयु पायी थी, इसके बाद वे महाराज यहाँ से स्वर्गलोक को पधारे हैं

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॥ २ · १०५ · ३६ ॥
आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि राघवः। शोच्यः पिता तात स्वर्गतः सत्कृतः सताम्

āyuruttamamāsādya bhogānapi ca rāghavaḥ।
na sa śocyaḥ pitā tāta svargataḥ satkṛtaḥ satām ॥

‘तात! अन्य राजाओं की अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगों को पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषों के द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जाने पर भी वे शोक करनेयोग्य नहीं हैं

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॥ २ · १०५ · ३७ ॥
जीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः। दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम्

sa jīrṇamānuṣaṁ dehaṁ parityajya pitā hi naḥ।
daivīmṛddhimanuprāpto brahmalokavihāriṇīm ॥

‘हमारे पिता ने जराजीर्ण मानव-शरीर का परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोक में विहार करानेवाली है

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॥ २ · १०५ · ३८ ॥
तं तु नैवंविधः कश्चित् प्राज्ञः शोचितुमर्हसि। त्वद्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान् बुद्धिमत्तरः

taṁ tu naivaṁvidhaḥ kaścit prājñaḥ śocitumarhasi।
tvadvidho madvidhaścāpi śrutavān buddhimattaraḥ ॥

‘कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजी के लिये शोक नहीं कर सकता

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॥ २ · १०५ · ३९ ॥
एते बहुविधाः शोका विलापरुदिते तदा। वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता

ete bahuvidhāḥ śokā vilāparudite tadā।
varjanīyā hi dhīreṇa sarvāvasthāsu dhīmatā ॥

‘धीर एवं प्रज्ञावान् पुरुष को सभी अवस्थाओं में ये नाना प्रकार के शोक, विलाप तथा रोदन त्याग देने चाहिये

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॥ २ · १०५ · ४० ॥
स्वस्थो भव मा शोको यात्वा चावस तां पुरीम्। तथा पित्रा नियुक्तोऽसि वशिना वदतां वर

sa svastho bhava mā śoko yātvā cāvasa tāṁ purīm।
tathā pitrā niyukto'si vaśinā vadatāṁ vara ॥

‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मन में शोक नहीं होना चाहिये। वक्ताओं में श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँ से जाकर अयोध्यापुरी में निवास करो; क्योंकि मन को वश में रखनेवाले पूज्य पिताजी ने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है

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॥ २ · १०५ · ४१ ॥
यत्राहमपि तेनैव नियुक्तः पुण्यकर्मणा। तत्रैवाहं करिष्यामि पितुरार्यस्य शासनम्

yatrāhamapi tenaiva niyuktaḥ puṇyakarmaṇā।
tatraivāhaṁ kariṣyāmi piturāryasya śāsanam ॥

‘उन पुण्यकर्मा महाराज ने मुझे भी जहाँ रहने की आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिता के आदेश का पालन करूँगा

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॥ २ · १०५ · ४२ ॥
मया शासनं तस्य त्यक्तुं न्याय्यमरिंदम। त्वयापि सदा मान्यः वै बन्धुः नः पिता

na mayā śāsanaṁ tasya tyaktuṁ nyāyyamariṁdama।
sa tvayāpi sadā mānyaḥ sa vai bandhuḥ sa naḥ pitā ॥

‘शत्रुदमन भरत! पिता की आज्ञा की अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है। वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मान के योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगों के हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे

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॥ २ · १०५ · ४३ ॥
तद् वचः पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिणाम्। कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव

tad vacaḥ piturevāhaṁ sammataṁ dharmacāriṇām।
karmaṇā pālayiṣyāmi vanavāsena rāghava ॥

‘रघुनन्दन! मैं इस वनवासरूपी कर्म के द्वारा पिताजी के ही वचन का जो धर्मात्माओं को भी मान्य है, पालन करूँगा

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॥ २ · १०५ · ४४ ॥
धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना। भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता

dhārmikeṇānṛśaṁsena nareṇa guruvartinā।
bhavitavyaṁ naravyāghra paralokaṁ jigīṣatā ॥

‘नरश्रेष्ठ! परलोक पर विजय पाने की इच्छा रखनेवाले मनुष्य को धार्मिक, क्रूरता से रहित और गुरुजनों का आज्ञापालक होना चाहिये

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॥ २ · १०५ · ४५ ॥
आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ। निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य नः

ātmānamanutiṣṭha tvaṁ svabhāvena nararṣabha।
niśāmya tu śubhaṁ vṛttaṁ piturdaśarathasya naḥ ॥

‘मनुष्यों में श्रेष्ठ भरत! हमारे पूज्य पिता दशरथ के शुभ आचरणों पर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभाव के द्वारा आत्मा की उन्नति के लिये प्रयत्न करो’

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॥ २ · १०५ · ४६ ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा पितुर्निदेशप्रतिपालनार्थम्। यवीयसं भ्रातरमर्थवच्च प्रभुर्मुहूर्ताद् विरराम रामः

ityevamuktvā vacanaṁ mahātmā piturnideśapratipālanārtham।
yavīyasaṁ bhrātaramarthavacca prabhurmuhūrtād virarāma rāmaḥ ॥

सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्ततक अपने छोटे भाई भरत से पिता की आज्ञा का पालन कराने के उद्देश्य से ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो गये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाधिकशततमः सर्गः ॥ १०५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०५ ॥