वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०४ · ३२ श्लोकाःSarga 104 · 32 ślokas

वसिष्ठजीके साथ आती हुई कौसल्याका मन्दाकिनीके तटपर सुमित्रा आदिके समक्ष दुःखपूर्ण उद्गार, श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके द्वारा माताओंकी चरणवन्दना तथा वसिष्ठजीको प्रणाम करके श्रीराम आदिका सबके साथ बैठना

मातृ-चरणवन्दना

“मातृ-चरणवन्दना”
॥ २ · १०४ · १८–१९ ॥

मन्दाकिनीतीरे चित्रकूटाश्रमस्य दर्भास्तीर्णे महीतले पित्रे दत्तमिङ्गुदिपिण्याकं दृष्ट्वा श्वेतवसना निराभरणा विधवा कौसल्या बाष्पपूर्णमुखी पार्श्वस्थयोः सुमित्राकैकेय्योः पुरतो विलपति यत्समुद्रान्तमहीभर्ता कथमिदं वन्यफलमश्नीयादिति; पुरस्तात्तु श्यामवर्णो जटामण्डलधरः कृष्णाजिनचीरवल्कलवसनो नग्नवक्षास्तापसो रामः समुत्थाय मातॄणां चरणाम्बुजानि जग्राह, ता आयतलोचना राजपत्न्यो मृदुभिः पाणिभी रामस्य पृष्ठाद्रजः स्नेहात्प्रमार्जन्ति; एकपार्श्वे च सरलवन्यवसना साश्रुनयना सीता सादरं दूरे स्थिता, पृष्ठतश्च पर्णकुटी वनमयश्चित्रकूटगिरिश्च विराजते।

मन्दाकिनी के तट पर चित्रकूट के आश्रम में, दक्षिणाग्र कुशों पर बिछी भूमि पर पिता दशरथ के लिये अर्पित इङ्गुदी-फल का पीला पिण्ड देखकर श्वेत वस्त्रधारिणी, आभूषणहीन विधवा कौसल्या आँसुओं से भरे मुख से पास खड़ी सुमित्रा और कैकेयी के आगे विलाप कर रही हैं कि जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के अधिपति थे, वे भूपाल यह वनवासी फल कैसे पाते हैं; उनके सम्मुख श्यामवर्ण तापस श्रीराम — सिर पर ऊँचा जटामण्डल, अंगों पर चीर-वल्कल और कृष्णमृगचर्म, नंगा वक्ष, न मुकुट न मोरपंख — उठकर माताओं के चरणारविन्दों में झुक गये हैं, और विशाललोचना रानियाँ कोमल हाथों से स्नेहवश उनकी पीठ से धूल पोंछ रही हैं; एक ओर सादे वनवसन में अश्रुपूर्ण नेत्रोंवाली सीता श्रद्धापूर्वक कुछ दूरी पर खड़ी हैं, और पीछे पर्णकुटी तथा वनाच्छादित चित्रकूट पर्वत सुशोभित है।

On the bank of the Mandakini at the Chitrakut hermitage, the widowed Kausalya — clad in undyed white, her ornaments cast off — beholds the pale ball of pounded ingudi-fruit that Ram has laid on the south-pointing kusha-grass as the funerary offering for his dead father, and turns tear-broken to lament before Sumitra and Kaikeyi beside her, that a monarch who once ruled the sea-girt earth should now be fed a forest hermit's fruit; before them the blue-hued ascetic Ram — his hair coiled in a high matted topknot, his body clad in bark-cloth and black deer-skin, bare of torso, without crown or feather — has risen and bowed low to touch his mothers' lotus-feet, while the large-eyed queens reach down with soft, tender hands to wipe the dust from his back; to one side, in a simple undyed forest sari and with tear-filled eyes, Sita stands at a reverent distance, the leaf-hut and the wooded Chitrakut mountain rising behind.

॥ २ · १०४ · १ ॥
वसिष्ठः पुरतः कृत्वा दारान् दशरथस्य च। अभिचक्राम तं देशं रामदर्शनतर्षितः

vasiṣṭhaḥ purataḥ kṛtvā dārān daśarathasya ca।
abhicakrāma taṁ deśaṁ rāmadarśanatarṣitaḥ ॥

महर्षि वसिष्ठजी महाराज दशरथ की रानियों को आगे करके श्रीरामचन्द्रजी को देखने की अभिलाषा लिये उस स्थान की ओर चले, जहाँ उनका आश्रम था

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॥ २ · १०४ · २ ॥
राजपत्न्यश्च गच्छन्त्यो मन्दं मन्दाकिनीं प्रति। ददृशुस्तत्र तत् तीर्थं रामलक्ष्मणसेवितम्

rājapatnyaśca gacchantyo mandaṁ mandākinīṁ prati।
dadṛśustatra tat tīrthaṁ rāmalakṣmaṇasevitam ॥

राजरानियाँ मन्द गति से चलती हुई जब मन्दाकिनी के तट पर पहुँचीं, तब उन्होंने वहाँ श्रीराम और लक्ष्मण के स्नान करने का घाट देखा

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॥ २ · १०४ · ३ ॥
कौसल्या बाष्पपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता। सुमित्रामब्रवीद् दीनां याश्चान्या राजयोषितः

kausalyā bāṣpapūrṇena mukhena pariśuṣyatā।
sumitrāmabravīd dīnāṁ yāścānyā rājayoṣitaḥ ॥

इस समय कौसल्या के मुँह पर आँसुओं की धारा बह चली। उन्होंने सूखे एवं उदास मुख से दीन सुमित्रा तथा अन्य राजरानियों से कहा—

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॥ २ · १०४ · ४ ॥
इदं तेषामनाथानां क्लिष्टमक्लिष्टकर्मणाम्। वने प्राक्कलनं तीर्थं ये ते निर्विषयीकृताः

idaṁ teṣāmanāthānāṁ kliṣṭamakliṣṭakarmaṇām।
vane prākkalanaṁ tīrthaṁ ye te nirviṣayīkṛtāḥ ॥

‘जो राज्य से निकाल दिये गये हैं तथा जो दूसरों को क्लेश न देनेवाले कार्य ही करते हैं, उन मेरे अनाथ बच्चों का यह वन में दुर्गम तीर्थ है, जिसे इन्होंने पहले-पहल स्वीकार किया है

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॥ २ · १०४ · ५ ॥
इतः सुमित्रे पुत्रस्ते सदा जलमतन्द्रितः। स्वयं हरति सौमित्रिर्मम पुत्रस्य कारणात्

itaḥ sumitre putraste sadā jalamatandritaḥ।
svayaṁ harati saumitrirmama putrasya kāraṇāt ॥

‘सुमित्रे! आलस्यरहित तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण स्वयं आकर सदा यहीं से मेरे पुत्र के लिये जल ले जाया करते हैं

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॥ २ · १०४ · ६ ॥
जघन्यमपि ते पुत्रः कृतवान् तु गर्हितः। भ्रातुर्यदर्थरहितं सर्वं तद् गर्हितं गुणैः

jaghanyamapi te putraḥ kṛtavān na tu garhitaḥ।
bhrāturyadartharahitaṁ sarvaṁ tad garhitaṁ guṇaiḥ ॥

‘यद्यपि तुम्हारे पुत्र ने छोटे-से-छोटा सेवा-कार्य भी स्वीकार किया है, तथापि इससे वे निन्दित नहीं हुए हैं; क्योंकि सद्गुणों से युक्त ज्येष्ठ भाई के प्रयोजन से रहित जो कार्य होते हैं, वे ही सब निन्दित माने गये हैं

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॥ २ · १०४ · ७ ॥
अद्यायमपि ते पुत्रः क्लेशानामतथोचितः। नीचानर्थसमाचारं सज्जं कर्म प्रमुञ्चतु

adyāyamapi te putraḥ kleśānāmatathocitaḥ।
nīcānarthasamācāraṁ sajjaṁ karma pramuñcatu ॥

‘तुम्हारा यह पुत्र भी उन क्लेशों के योग्य नहीं है, जिन्हें आजकल वह सहन करता है। अब श्रीराम लौट चलें और निम्न श्रेणी के पुरुषों के योग्य जो दुःखजनक कार्य उसके सामने प्रस्तुत है, उसे वह छोड़ दे—उसे करने का अवसर ही उसके लिये न रह जाय’

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॥ २ · १०४ · ८ ॥
दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु सा ददर्श महीतले। पितुरिङ्गुदिपिण्याकं न्यस्तमायतलोचना

dakṣiṇāgreṣu darbheṣu sā dadarśa mahītale।
pituriṅgudipiṇyākaṁ nyastamāyatalocanā ॥

आगे जाकर विशाललोचना कौसल्या ने देखा कि श्रीराम ने पृथ्वी पर बिछे हुए दक्षिणाग्र कुशों के ऊपर अपने पिता के लिये पिसे हुए इङ्गुदी के फल का पिण्ड रख छोड़ा है

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॥ २ · १०४ · ९ ॥
तं भूमौ पितुरार्तेन न्यस्तं रामेण वीक्ष्य सा। उवाच देवी कौसल्या सर्वा दशरथस्त्रियः

taṁ bhūmau piturārtena nyastaṁ rāmeṇa vīkṣya sā।
uvāca devī kausalyā sarvā daśarathastriyaḥ ॥

दुःखी राम के द्वारा पिता के लिये भूमि पर रखे हुए उस पिण्ड को देखकर देवी कौसल्या ने दशरथ की सब रानियों से कहा—

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॥ २ · १०४ · १० ॥
इदमिक्ष्वाकुनाथस्य राघवस्य महात्मनः। राघवेण पितुर्दत्तं पश्यतैतद् यथाविधि

idamikṣvākunāthasya rāghavasya mahātmanaḥ।
rāghaveṇa piturdattaṁ paśyataitad yathāvidhi ॥

‘बहनो! देखो, श्रीराम ने इक्ष्वाकुकुल के स्वामी रघुकुलभूषण महात्मा पिता के लिये यह विधिपूर्वक पिण्डदान किया है

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॥ २ · १०४ · ११ ॥
तस्य देवसमानस्य पार्थिवस्य महात्मनः। नैतदौपयिकं मन्ये भुक्तभोगस्य भोजनम्

tasya devasamānasya pārthivasya mahātmanaḥ।
naitadaupayikaṁ manye bhuktabhogasya bhojanam ॥

‘देवता के समान तेजस्वी वे महामना भूपाल नाना प्रकार के उत्तम भोग भोग चुके हैं। उनके लिये यह भोजन मैं उचित नहीं मानती

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॥ २ · १०४ · १२ ॥
चतुरन्तां महीं भुक्त्वा महेन्द्रसदृशो भुवि। कथमिङ्गुदिपिण्याकं भुङ्क्ते वसुधाधिपः

caturantāṁ mahīṁ bhuktvā mahendrasadṛśo bhuvi।
kathamiṅgudipiṇyākaṁ sa bhuṅkte vasudhādhipaḥ ॥

‘जो चारों समुद्रोंतक की पृथ्वी का राज्य भोगकर भूतल पर देवराज इन्द्र के समान प्रतापी थे, वे भूपाल महाराज दशरथ पिसे हुए इङ्गुदी-फल का पिण्ड कैसे खा रहे होंगे?

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॥ २ · १०४ · १३ ॥
अतो दुःखतरं लोके किंचित् प्रतिभाति मे। यत्र रामः पितुर्दद्यादिङ्गुदीक्षोदमृद्धिमान्

ato duḥkhataraṁ loke na kiṁcit pratibhāti me।
yatra rāmaḥ piturdadyādiṅgudīkṣodamṛddhimān ॥

‘संसार में इससे बढ़कर महान् दुःख मुझे और कोई नहीं प्रतीत होता है, जिसके अधीन होकर श्रीराम समृद्धिशाली होते हुए भी अपने पिता को इङ्गुदी के पिसे हुए फल का पिण्ड दें

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॥ २ · १०४ · १४ ॥
रामेणेङ्गुदिपिण्याकं पितुर्दत्तं समीक्ष्य मे। कथं दुःखेन हृदयं स्फोटति सहस्रधा

rāmeṇeṅgudipiṇyākaṁ piturdattaṁ samīkṣya me।
kathaṁ duḥkhena hṛdayaṁ na sphoṭati sahasradhā ॥

‘श्रीराम ने अपने पिता को इङ्गुदी का पिण्याक (पिसा हुआ फल) प्रदान किया है—यह देखकर दुःख से मेरे हृदय के सहस्रों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते हैं?

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॥ २ · १०४ · १५ ॥
श्रुतिस्तु खल्वियं सत्या लौकिकी प्रतिभाति मे। यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः

śrutistu khalviyaṁ satyā laukikī pratibhāti me।
yadannaḥ puruṣo bhavati tadannāstasya devatāḥ ॥

‘यह लौकिकी श्रुति (लोकविख्यात कहावत) निश्चय ही मुझे सत्य प्रतीत हो रही है कि मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, उसके देवता भी उसी अन्न को ग्रहण करते हैं’

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॥ २ · १०४ · १६ ॥
एवमार्ता सपत्न्यस्ता जग्मुराश्वास्य तां तदा। ददृशुश्चाश्रमे रामं स्वर्गच्युतमिवामरम्

evamārtā sapatnyastā jagmurāśvāsya tāṁ tadā।
dadṛśuścāśrame rāmaṁ svargacyutamivāmaram ॥

इस प्रकार शोक से आर्त हुई कौसल्या को उस समय उनकी सौतें समझा-बुझाकर उन्हें आगे ले गयीं। आश्रम पर पहुँचकर उन सबने श्रीराम को देखा, जो स्वर्ग से गिरे हुए देवता के समान जान पड़ते थे

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॥ २ · १०४ · १७ ॥
तं भोगैः सम्परित्यक्तं रामं सम्प्रेक्ष्य मातरः। आर्ता मुमुचुरश्रूणि सस्वरं शोककर्शिताः

taṁ bhogaiḥ samparityaktaṁ rāmaṁ samprekṣya mātaraḥ।
ārtā mumucuraśrūṇi sasvaraṁ śokakarśitāḥ ॥

भोगों का परित्याग करके तपस्वी जीवन व्यतीत करनेवाले श्रीराम को देखकर उनकी माताएँ शोक से कातर हो गयीं और आर्तभाव से फूट-फूटकर रोती हुई आँसू बहाने लगीं

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॥ २ · १०४ · १८ ॥
तासां रामः समुत्थाय जग्राह चरणाम्बुजान्। मातॄणां मनुजव्याघ्रः सर्वासां सत्यसंगरः

tāsāṁ rāmaḥ samutthāya jagrāha caraṇāmbujān।
mātṝṇāṁ manujavyāghraḥ sarvāsāṁ satyasaṁgaraḥ ॥

सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ श्रीराम माताओं को देखते ही उठकर खड़े हो गये और बारी-बारी से उन सबके चरणारविन्दों का स्पर्श किया

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॥ २ · १०४ · १९ ॥
ताः पाणिभिः सुखस्पर्शैर्मृद्वङ्गुलितलैः शुभैः। प्रममार्जू रजः पृष्ठाद् रामस्यायतलोचनाः

tāḥ pāṇibhiḥ sukhasparśairmṛdvaṅgulitalaiḥ śubhaiḥ।
pramamārjū rajaḥ pṛṣṭhād rāmasyāyatalocanāḥ ॥

विशाल नेत्रोंवाली माताएँ स्नेहवश जिनकी अंगुलियाँ कोमल और स्पर्श सुखद था, उन सुन्दर हाथों से श्रीराम की पीठ से धूल पोंछने लगीं

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॥ २ · १०४ · २० ॥
सौमित्रिरपि ताः सर्वा मातॄः सम्प्रेक्ष्य दुःखितः। अभ्यवादयदासक्तं शनै रामादनन्तरम्

saumitrirapi tāḥ sarvā mātṝḥ samprekṣya duḥkhitaḥ।
abhyavādayadāsaktaṁ śanai rāmādanantaram ॥

श्रीराम के बाद लक्ष्मण भी उन सभी दुःखिया माताओं को देखकर दुःखी हो गये और उन्होंने स्नेहपूर्वक धीरे-धीरे उनके चरणों में प्रणाम किया

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॥ २ · १०४ · २१ ॥
यथा रामे तथा तस्मिन् सर्वा ववृतिरे स्त्रियः। वृत्तिं दशरथाज्जाते लक्ष्मणे शुभलक्षणे

yathā rāme tathā tasmin sarvā vavṛtire striyaḥ।
vṛttiṁ daśarathājjāte lakṣmaṇe śubhalakṣaṇe ॥

उन सब माताओं ने श्रीराम के साथ जैसा बर्ताव किया था, वैसे ही उत्तम लक्षणों से युक्त दशरथनन्दन लक्ष्मण के साथ भी किया

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॥ २ · १०४ · २२ ॥
सीतापि चरणांस्तासामुपसंगृह्य दुःखिता। श्वश्रूणामश्रुपूर्णाक्षी सम्बभूवाग्रतः स्थिता

sītāpi caraṇāṁstāsāmupasaṁgṛhya duḥkhitā।
śvaśrūṇāmaśrupūrṇākṣī sambabhūvāgrataḥ sthitā ॥

तदनन्तर आँसूभरे नेत्रोंवाली दुःखिनी सीता भी सभी सासुओं के चरणों में प्रणाम करके उनके आगे खड़ी हो गयी

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॥ २ · १०४ · २३ ॥
तां परिष्वज्य दुःखार्ता माता दुहितरं यथा। वनवासकृतां दीनां कौसल्या वाक्यमब्रवीत्

tāṁ pariṣvajya duḥkhārtā mātā duhitaraṁ yathā।
vanavāsakṛtāṁ dīnāṁ kausalyā vākyamabravīt ॥

तब दुःख से पीड़ित हुई कौसल्या ने जैसे माता अपनी बेटी को हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार वनवास के कारण दीन (दुर्बल) हुई सीता को छाती से चिपका लिया और इस प्रकार कहा—

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॥ २ · १०४ · २४ ॥
वैदेहराजन्यसुता स्नुषा दशरथस्य च। रामपत्नी कथं दुःखं सम्प्राप्ता विजने वने

vaideharājanyasutā snuṣā daśarathasya ca।
rāmapatnī kathaṁ duḥkhaṁ samprāptā vijane vane ॥

‘विदेहराज जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधू तथा श्रीराम की पत्नी इस निर्जन वन में क्यों दुःख भोग रही है?

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॥ २ · १०४ · २५ ॥
पद्ममातपसंतप्तं परिक्लिष्टमिवोत्पलम्। काञ्चनं रजसा ध्वस्तं क्लिष्टं चन्द्रमिवाम्बुदैः

padmamātapasaṁtaptaṁ parikliṣṭamivotpalam।
kāñcanaṁ rajasā dhvastaṁ kliṣṭaṁ candramivāmbudaiḥ ॥

‘बेटी! तुम्हारा मुख धूप से तपे हुए कमल, कुचले हुए उत्पल, धूल से ध्वस्त हुए सुवर्ण और बादलों से ढके हुए चन्द्रमा की भाँति श्रीहीन हो रहा है

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॥ २ · १०४ · २६ ॥
मुखं ते प्रेक्ष्य मां शोको दहत्यग्निरिवाश्रयम्। भृशं मनसि वैदेहि व्यसनारणिसम्भवः

mukhaṁ te prekṣya māṁ śoko dahatyagnirivāśrayam।
bhṛśaṁ manasi vaidehi vyasanāraṇisambhavaḥ ॥

‘विदेहनन्दिनि! जैसे आग अपने उत्पत्तिस्थान काष्ठ को दग्ध कर देती है, उसी प्रकार तुम्हारे इस मुख को देखकर मेरे मन में संकटरूपी अरणि से उत्पन्न हुआ यह शोकानल मुझे जलाये देता है’

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॥ २ · १०४ · २७ ॥
ब्रुवन्त्यामेवमार्तायां जनन्यां भरताग्रजः। पादावासाद्य जग्राह वसिष्ठस्य राघवः

bruvantyāmevamārtāyāṁ jananyāṁ bharatāgrajaḥ।
pādāvāsādya jagrāha vasiṣṭhasya ca rāghavaḥ ॥

शोकाकुल हुई माता जब इस प्रकार विलाप कर रही थी, उसी समय भरत के बड़े भाई श्रीराम ने वसिष्ठजी के चरणों में पड़कर उन्हें दोनों हाथों से पकड़ लिया

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॥ २ · १०४ · २८ ॥
पुरोहितस्याग्निसमस्य तस्य वै बृहस्पतेरिन्द्र इवामराधिपः। प्रगृह्य पादौ सुसमृद्धतेजसः सहैव तेनोपविवेश राघवः

purohitasyāgnisamasya tasya vai bṛhaspaterindra ivāmarādhipaḥ।
pragṛhya pādau susamṛddhatejasaḥ sahaiva tenopaviveśa rāghavaḥ ॥

जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पति के चरणों का स्पर्श करते हैं, उसी प्रकार अग्नि के समान बढ़े हुए तेजवाले पुरोहित वसिष्ठजी के दोनों पैर पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी उनके साथ ही पृथ्वी पर बैठ गये

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॥ २ · १०४ · २९ ॥
ततो जघन्यं सहितैः स्वमन्त्रिभिः पुरप्रधानैश्च तथैव सैनिकैः। जनेन धर्मज्ञतमेन धर्मवानुपोपविष्टो भरतस्तदाग्रजम्

tato jaghanyaṁ sahitaiḥ svamantribhiḥ purapradhānaiśca tathaiva sainikaiḥ।
janena dharmajñatamena dharmavānupopaviṣṭo bharatastadāgrajam ॥

तदनन्तर धर्मात्मा भरत एक साथ आये हुए अपने सभी मन्त्रियों, प्रधान-प्रधान पुरवासियों, सैनिकों तथा परम धर्मज्ञ पुरुषों के साथ अपने बड़े भाई के पास उनके पीछे जा बैठे

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॥ २ · १०४ · ३० ॥
उपोपविष्टस्तु तदातिवीर्यवांस्तपस्विवेषेण समीक्ष्य राघवम्। श्रिया ज्वलन्तं भरतः कृताञ्जलिर्यथा महेन्द्रः प्रयतः प्रजापतिम्

upopaviṣṭastu tadātivīryavāṁstapasviveṣeṇa samīkṣya rāghavam।
śriyā jvalantaṁ bharataḥ kṛtāñjaliryathā mahendraḥ prayataḥ prajāpatim ॥

उस समय श्रीराम के आसन के समीप बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी भरत ने दिव्य दीप्ति से प्रकाशित होनेवाले श्रीरघुनाथजी को तपस्वी के वेश में देखकर उनके प्रति उसी प्रकार हाथ जोड़ लिये जैसे देवराज इन्द्र प्रजापति ब्रह्मा के समक्ष विनीतभाव से हाथ जोड़ते हैं

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॥ २ · १०४ · ३१ ॥
किमेष वाक्यं भरतोऽद्य राघवं प्रणम्य सत्कृत्य साधु वक्ष्यति। इतीव तस्यार्यजनस्य तत्त्वतो बभूव कौतूहलमुत्तमं तदा

kimeṣa vākyaṁ bharato'dya rāghavaṁ praṇamya satkṛtya ca sādhu vakṣyati।
itīva tasyāryajanasya tattvato babhūva kautūhalamuttamaṁ tadā ॥

उस समय वहाँ बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषों के हृदय में यथार्थ रूप से यह उत्तम कौतूहल-सा जाग उठा कि देखें ये भरतजी श्रीरामचन्द्रजी को सत्कारपूर्वक प्रणाम करके आज उत्तम रीति से उनके समक्ष क्या कहते हैं?

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॥ २ · १०४ · ३२ ॥
राघवः सत्यधृतिश्च लक्ष्मणो महानुभावो भरतश्च धार्मिकः। वृताः सुहृद्भिश्च विरेजिरेऽध्वरे यथा सदस्यैः सहितास्त्रयोऽग्नयः

sa rāghavaḥ satyadhṛtiśca lakṣmaṇo mahānubhāvo bharataśca dhārmikaḥ।
vṛtāḥ suhṛdbhiśca virejire'dhvare yathā sadasyaiḥ sahitāstrayo'gnayaḥ ॥

वे सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम, महानुभाव लक्ष्मण तथा धर्मात्मा भरत—ये तीनों भाई अपने सुहृदों से घिरकर यज्ञशाला में सदस्योंद्वारा घिरे हुए त्रिविध अग्नियों के समान शोभा पा रहे थे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरधिकशततमः सर्गः ॥ १०४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०४ ॥